अब यही है बेघर मुसलमान औरतों का घर

- Author, राहिला बानो
- पदनाम, बीबीसी एशियन नेटवर्क
ब्रिटेन में बेघर मुसलमान महिलाओं की माँग पूरी करने के लिए मुसलमानों से जुड़ी एक धर्मार्थ संस्था नया हॉस्टल खोलने जा रही है.
दि नेशनल ज़कात फ़ाउंडेशन (एनज़ेडएफ़) लंदन और बर्मिंघम में पहले ही ऐसे दो हॉस्टल चला रही है.
अपनी इस पहल के बारे में एनज़ेडएफ़ ने बताया, "साल भर पहले ये हॉस्टल खोले गए थे. तभी से 100 मुसलमान औरतें इस बारे में संपर्क कर चुकी हैं. उनमें से ज़्यादातर उत्पीड़न का शिकार थीं."
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एनज़ेडएफ़ के दोनों हॉस्टल्स में अभी तक 54 मुसलमान महिलाओं को जगह मिल पाई है और ग्रेट मैनचेस्टर में तीसरे हॉस्टल के लिए पैसा जुटा लिया गया है.
अगले कुछ महीने में इस तीसरे हॉस्टल के शुरू होने की संभावना ज़ाहिर की गई है.
धर्मार्थ संस्था ने बताया कि उनसे संपर्क करने वाली ज़्यादातर औरतों की उम्र 18 साल से 72 साल के बीच थीं.
वे शारीरिक और मानसिक यातना, घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न की शिकार थीं. इनमें से कुछ तो ज़बरदस्ती की शादी के दबाव का सामना कर रही थीं.

बांग्लादेशी मूल की एक 19 साल की लड़की कहती हैं, "मेरी माँ और बहन मुझे पीटेंगी और वो मुझ पर झूठे आरोप लगाएंगी."
वह घर वालों के बदले की कार्रवाई के डर से अपना नाम ज़ाहिर नहीं करना चाहती थीं.
घरेलू ग़ुलाम
उन्होंने बताया, "एक दिन मैंने सुना कि मेरी माँ और मेरे चाचा फ़ोन पर बांग्लादेश में एक रिश्तेदार के साथ मेरी शादी के बारे में बात कर रही थे.
मुझे यक़ीन नहीं हुआ कि वे मेरे पीठ पीछे इस हद तक जा सकते थे. इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, मैंने घर छोड़ने का फैसला कर लिया. ये चीज़ें आख़िर में ऑनर किलिंग में बदल सकती हैं."
पाकिस्तानी मूल की साराह ज़िंदगी के 20 साल देख चुकीं हैं और स्टैफ़ोर्डशायर से हैं. घरेलू यातना से तंग आकर उन्होंने भी एनज़ेडएफ़ से संपर्क किया.
उन्होंने बताया कि दो साल पहले वे ब्रिटेन आईं थीं और उनसे घरेलू ग़ुलामों की तरह सुलूक किया गया.
<link type="page"><caption> पढ़ें: घरेलू हिंसा का आपबीती</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/03/120320_nitabhalla_violence_sm.shtml" platform="highweb"/></link>
वह कहती हैं, "खाना पसंद न आने पर मेरे ससुराल वाले मुझे मारते. मेरा शौहर मुझे प्यार नहीं करता था. उसने मुझे बताया कि वह मुझे पसंद तक नहीं करता. मुझे पुलिस को फ़ोन करना पड़ा था, तब वे मेरी मदद को आए."
हालांकि एनज़ेडएफ़ की इन पनाहगाहों के लिए मुसलमान समुदाय ही पैसा जुटाता है, लेकिन ये संस्था हॉस्टल के लिए उपयुक्त जगह की तलाश में 'नेशनल सोशल हाउसिंग ऑर्गनाइज़ेशन', 'ट्राइडेंट रीच दी पीपुल' और 'वीमेंस एड' जैसे संगठनों के साथ भी काम कर चुकी है.

चैरिटी संस्था ट्राइडेंट बर्मिंघम और डर्बीशायर में शरणार्थियों के लिए दो हॉस्टल चलाती है. ट्राइडेंट के मुताबिक़ हाल के सालों में मुसलमान औरतों के लिए हॉस्टल की माँग बढ़ी है, ख़ासकर बर्मिंघम के इलाक़े में.
हिंसा और दमन
बर्मिंघम हॉस्टल के प्रबंधक कहते हैं, "अगर 10 साल पीछे मुड़कर देखें तो कई मुसलमान औरतें घरेलू हिंसा के बारे में खुलकर बात करने से डरती थीं और ज़्यादातर महिलाओं को ये तक पता न था कि उन्हें किस तरह की मदद मिल सकती हैं. कुछ तो रीति-रिवाज़ों की वजह से भी वे मदद माँगने से रुक जाया करती थीं."
"लेकिन अब हालात बदल गए हैं. कई मुसलमान महिलाएँ खुलकर सामने आ रही हैं और हिंसा और दमन के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट कर रही हैं."
<link type="page"><caption> पढ़ें: सहर गुल के शौहर की तलाश</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2012/01/120103_afghan_unit_sdp.shtml" platform="highweb"/></link>
परवीन जावेद मैनचेस्टर स्थित पाकिस्तानी रिसोर्स सेंटर में घरेलू हिंसा पीड़ितों के लिए काम करती हैं. उन्हें भी लगता है कि पिछले साल मदद के लिए आने वाली पाकिस्तानी और बांग्लादेशी मूल की महिलाओं की संख्या बढ़ी है.
परवीन कहती हैं, "मुझे लगता है कि उन्हें उपलब्ध सहूलियतों के बारे में पता है."
एनज़ेडएफ़ से जुड़े इक़बाल नसीम का कहना है, "परियोजना शुरू करते वक़्त हमें अंदाज़ा नहीं था कि कितनी औरतें इसका फ़ायदा उठा पाएंगी, लेकिन अब यह साफ़ है कि हॉस्टल्स के लिए बढ़ी हुई माँग ने हमारी उम्मीदें बढ़ा दी हैं."
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