दुनिया में छिड़ सकता है खाद युद्ध?

फ़ॉस्फ़ोरस खाद

क्या यह दुनिया के सबसे बड़े संकटों में से एक है, जिसके बारे में आपने कभी नहीं सुना? यह संकट <link type="page"><caption> खाद</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/business/2012/04/120412_career_agroindustries_salman_ms.shtml" platform="highweb"/></link> से जुड़ा है.

साल 1945 के बाद से दुनिया की आबादी तिगुनी होकर सात अरब तक हो गई है. इस बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए कृत्रिम खाद पर निर्भरता बढ़ी है.

सबसे अहम खादों में से एक फ़ॉस्फेट एक ऐसे अयस्क से मिलता है जिसकी आपूर्ति बेहद सीमित है. इसका खनन करने के बाद प्रसंस्कृत कर खेतों में डाला जाता है. बाद में यह बारिश के पानी के साथ घुलकर समुद्र में चला जाता है.

जिस दिन इसमें कमी आएगी तब क्या होगा?

लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज के रसायनशास्त्री एंड्रेया सेला का कहना है, "फसल के उत्पादन में कमी आएगी और यह साफ़ तौर पर दिखेगा."

उनका कहना है, "हम बड़ी मुश्किल में होंगे. हमें यह याद रखना होगा कि दुनिया की आबादी में बढ़ोतरी हो रही है. ऐसे में फ़ॉस्फोरस की मांग में हर साल तेज़ी आ रही है."

डॉक्टर सेला कहते हैं कि फ़ॉस्फोरस ज़िंदगी के लिए बेहद अहम है. यह ऐसा तत्व है, जिसका इस्तेमाल पौधों और जानवरों की कोशिकाएं ऊर्जा संरक्षित करने के लिए करती हैं.

यह डीएनए का मुख्य आधार होता है और यह हमारी हड्डियां और दांतों का एक अहम घटक होता है. इसके बिना खेती करना एक वास्तविक विकल्प साबित नहीं हो सकता.

कम क़ीमत

यह बात चेतावनी भरी लग सकती है कि फ़ॉस्फेट की आपूर्ति आने वाले कई दशकों में कम हो सकती है.

हालांकि जिस रफ़्तार से फ़ॉस्फेट का इस्तेमाल हो रहा है, उसके बावजूद फिलहाल इसमें कमी आने जैसी जोख़िम वाली स्थिति नहीं है.

वैसे पिछले 60 सालों में फ़ॉस्फेट के साथ एक दूसरी सबसे बड़ी दिक्कत यह रही है कि यह काफ़ी कम रकम में और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहा है. किफ़ायत से इसका इस्तेमाल करने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं मिला है.

फ़ॉस्फोरस के बेहद छोटे से अंश को पौधे अवशोषित करते हैं और इसका ज़्यादातर हिस्सा बारिश में बह जाता है.

खाद का यह पानी नदियों में जाता है. फ़ॉस्फेट और नाइट्रेट दोनों ही पर्यावरण के लिए अलग तरह का संकट पैदा करते हैं.

नदियों और तालाबों में मौजूद शैवाल को प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व मिलते हैं जिससे ये और भी ज़्यादा खिल जाते हैं और पानी हरा हो जाता है.

शैवाल खत्म होने पर जीवाणुओं के लिए भोजन बन जाते हैं और फिर ऐसे जीवाणुओं की संख्या तेज़ी से बढ़ती है और वे पानी की पूरी ऑक्सीजन ले लेते हैं. ऐसे में ऑक्सीज़न के बिना सभी मछलियों, दूसरे जानवरों और पौधे का जीवन ख़तरे में पड़ जाता है.

यूरोप में टेम्स और राइन तथा चीन की प्रमुख नदियों के निचले हिस्से में यह एक आम समस्या है.

फॉस्फोरस
इमेज कैप्शन, मोरक्को में है दुनिया का सबसे बड़ा फ़ॉस्फ़ोरस भंडार

समुद्र के कई हिस्से में ऐसे शैवाल बड़ी मात्रा में नज़र आते हैं. ख़ासतौर पर बाल्टिक सागर और मेक्सिको की खाड़ी में और वहां पानी के जीव-जंतुओं और पौधे का जीवन ख़तरे में पड़ जाता है.

वैसे पर्यावरणीय लिहाज से फ़ॉस्फेट की कीमत साफ़तौर पर बेहद कम रही है.

बदलाव के आसार

हालांकि अब इसमें भी बदलाव दिख रहा है. फ़ॉस्फेट अयस्क की कीमतें पिछले दशक में पांच गुना बढ़ गई हैं क्योंकि विकासशील देशों से मांग में तेज़ी आई है.

खाद उत्पादन की लागत में भी काफी इज़ाफ़ा हुआ है.

यूएस फंड मैनेजर ग्रांथम मेयो वैन ओट्टेरलू के जेरेमी ग्रांथम का कहना है, "जब तक हम किसी संसाधन का खनन कम लागत पर करते हैं, तब तक हम उसकी कीमत कम ही रखेंगे. हम तब तक इसके भंडार का इस्तेमाल करते हैं जब तक ये महंगे नहीं हो जाते और उसके बाद हम इसे संरक्षित करने की कवायद करने की सोचते हैं."

क्या हम फ़ॉस्फोरस को अपशिष्ट पदार्थों से निकालकर उसका फिर से प्रयोग कर सकते हैं? स्वीडन और जर्मनी कुछ ऐसा ही कर रहे हैं.

पश्चिमी देशों में पर्यावरण के अनुकूल "कंपोस्ट टॉयलेट" वाले कुटीर उद्योग हैं.

ब्रिटेन में टेम्स वॉटर नाम की कंपनी एक अनूठा प्रयोग कर रही है. उसने एक ऐसा नया रिएक्टर पेश किया है, जो नाली के कचरे को साफ-सुथरी खाद में बदल देता है.

टेम्स वॉटर
इमेज कैप्शन, ब्रिटेन की पानी की कंपनी टेम्स वॉटर कचरे से फ़ॉस्फेट निकालने के काम में जुटी है.

लेकिन सवाल है कि आखिर रिसाइक्लिंग से भविष्य में कितनी मात्रा में खाद की आपूर्ति हो पाएगी. ऐसा कहा जा रहा है कि मौजूदा तकनीक का इस्तेमाल कर 20 फ़ीसदी तक की भरपाई हो पाएगी.

ऐसी तकनीक के ज़रिए उन पाइपों को साफ़ करने की लागत की भी बचत होगी जो फ़ॉस्फोरस की गाद से भर गए हैं.

क्या है विकल्प

इसमें कोई शक नहीं कि फ़ॉस्फेट की बढ़ती कीमतों की वजह से ही इसकी रिसाइक्लिंग की शुरुआत हुई है. क्या हमें इसकी ज़्यादा कीमत का स्वागत करना चाहिए? यह काफी हद तक आप पर निर्भर करता है.

आमतौर पर आपकी जितनी कम आमदनी होती है, आप उसका ज़्यादा हिस्सा खाने पर ख़र्च करते हैं. आप खाने के अधिक खर्च के प्रति ज़्यादा संवेदनशील होते हैं. खाद्य पदार्थ की महंगाई महंगी खाद का नतीजा है.

दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि फ़ॉस्फेट की ज़्यादा क़ीमतों से ग़रीब लोगों पर ज़्यादा असर पड़ता है और निश्चित तौर पर पूरा देश इससे अछूता नहीं रह सकता.

जेरेमी ग्रांथम का कहना है कि कई उत्तरी अफ़्रीकी देश खाद आयात पर निर्भर होते हैं और खाद्य पदार्थ की बढ़ती कीमतों से ही परेशान लोगों ने 2011 में विरोध छेड़ा, जिसका नतीजा अरब क्रांति है.

इनमें से ही एक देश मोरक्को है, जहां दुनिया का बेहतरीन गुणवत्ता वाले फ़ॉस्फेट का तीन-चौथाई भंडार है. मुमकिन है कि इसकी वजह से मोरक्को भविष्य में बेहद अमीर देशों में शुमार होने लगा.

हालांकि मोरक्को के फ़ॉस्फेट का बड़ा भंडार पश्चिमी सहारा क्षेत्र में है. वहां मोरक्को की सेना है, लेकिन वहां थोड़ी तनाव की स्थिति भी है.

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