'जब भी ऊंची इमारत देखती हूं तो डर जाती हूं'

छह महीने पहले बांग्लादेश की राजधानी ढाका में आठ मंजिला इमारत गिरने से ग्यारह सौ से ज़्यादा लोग मारे गए और जो इस हादसे में बचे उनमें कई विकलांग बन गए, बहुत से लोगों ने बिस्तर पकड़ लिया और और जो काम करने के लायक बचे हैं, वो तंगियों से जूझ रहे हैं.
इस हादसे के बहुत से पीड़ितों को अब तक वित्तीय मदद नहीं मिली है. कुछ लोगों के परिजनों का तो अब तक कुछ पता नहीं चला है. उन्हें सिर्फ लापता बताया जा रहा है.
मुसामत रिबेका ख़ातून राना प्लाज़ा में चलने वाली कपड़े की फैक्ट्री में सिलाई ऑपरेटर थीं. उन्हें इस हादसे में घुटने से नीचे एक पैर गंवाना पड़ा है, जबकि दूसरी टांग में टखने से नीचे पैर नहीं है. वो मलबे में दबी थीं.
छह महीने में उनके आठ ऑपरेशन हुए, और जल्द ही एक और होने वाला है.

वो बताती हैं, “हाल ही में ईद के त्यौहार के दौरान ज़्यादातर डॉक्टर अपने घर चले गए.जब वो वापस आए तो उन्होंने देखा कि मेरी एक टांग में मांस सड़ने लगा है तो उन्हें एक और कट लगाना पड़ा.”
फिलहाल डॉक्टरों का कहना है कि उन्हें संक्रमण होने की वजह से कृत्रिम अंग नहीं लगाए जा सकते हैं.
वो अब भी अस्पताल में हैं.
काम की तलाश
19 साल की आयशा अख़्तर राना प्लाज़ा में चलनी वाली कई फ़ैक्ट्रियों में से एक न्यू वेव स्टाइल लिमिटेड कंपनी में मशीन ऑपरेटर के तौर पर काम करती थीं.
जब इमारत गिरी तो उन्हें शाम तक मलबे से निकाल लिया गया था. अब उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई है, लेकिन इस हादसे ने उनकी ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया.

जब भी वो बहुमंजिला इमारत को देखती हैं तो डर जाती हैं. वो कहती हैं, “मुझे पता है कि रोज़ाना इमारतें राना प्लाज़ा की तरह नहीं गिरती हैं, लेकिन मैं फिर भी डरी रहती हूं.”
आयशा का कहना है कि वो अब कभी कपड़े की फैक्ट्री में काम नहीं करेंगी.
उनके मुताबिक, “अपने परिवार की देखभाल करने के लिए मैं काम करने को मज़बूर हूं, लेकिन वो ये भी नहीं चाहते हैं कि मैं कपड़े की फैक्ट्री में काम करूं. इसलिए में नई नौकरी तलाश रही हूं.”
छह महीने हो गए हैं और उन्हें अभी तक काम नहीं मिला है. एक गैर सरकारी संगठन ‘एक्शन एड बांग्लादेश’ के अनुसार राना प्लाज़ा में काम करने वाले लगभग 1,400 लोगों में से कुछ को अब भी काम की तलाश है.
चली गई कमाई

राना प्लाज़ा इमारत से कुछ ही दूरी पर एक मेडिकल क्लीनिक है. स्राबन अहमद जहांगीर यहीं पर काम करते हैं.
वो राना प्लाज़ा में अच्छी खासी नौकरी करते थे, लेकिन अब इस क्लीनिक में वहां से आधे वेतन पर बतौर क्लर्क काम कर रहे हैं.
वो कहते हैं, “मुझे हर महीने आठ हज़ार टका वेतन मिलता था, अब मुझे सिर्फ तीन हज़ार टका मिलते हैं. चूंकि मेरे घर का किराया तीन हज़ार टका है, तो आप समझ ही सकते हैं कि हम किस तरह के हालात में रह रहे हैं.”
हमसे बात करने के एक दिन पहले ही उन्होंने अपना घर का किराया देने के लिए अपना मोबाइल फोन बेचा है.
परिवार का बोझ
नजमा अख़्तर भी राना प्लाज़ा में काम करती थीं. वो तो इस हादसे में बच गई लेकिन उनके पति मारे गए.
अभी अभी उन्होंने एक बच्चे को जन्म दिया है, जिससे उन पर बोझ बढ़ गया है. वो कहती हैं, “हमारा भविष्य पूरी तरह से अंधकारमय है.”

वो राना प्लाज़ा के पास ही एक छोटे से मकान में रहती हैं. उन्हें अपने पति के अंतिम संस्कार के लिए 20 हज़ार टका और छह हज़ार टका गुजारे के लिए दिए गए थे.
एक एनजीओ की तरफ से उन्हें इलाज में मदद मिल रही है. लेकिन इस बारे में उन्हें कुछ पता नहीं है कि अब तक उन्हें जो राशि मिली है क्या उसे मुआवज़े में गिना जाएगा.
उन्हें ये भी नहीं पता है कि उन्हें कोई मुआवज़ा दिया जाएगा और अगर मिलेगा तो कितना. वो कहती हैं कि फ़ैक्ट्री मालिकों ने अब तक कुछ नहीं कहा है.
इस हादसे के बाद सरकार ने कुछ मदद दी थी और कुछ विदेशी कंपनियां दीर्घकालीन मुआवज़ा देने के बारे में सोच रहे हैं.
लेकिन अभी तक ये ही तय नहीं हो पाया है कि मुआवज़े के लिए सरकार, मजद़ूर यूनियन, फ़ैक्ट्री मालिकों और विदेशी खरीददारों में से कौन कितना योगदान करेगा.
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