अभी डरना ज़रूरी है..!

    • Author, ब्रजेश उपाध्याय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन

अमरीका में अक्तूबर डरने और डराने का मौसम होता है. इन दिनों यहां हैलोवीन का त्योहार मनता है, घर के बाहर डरावने मुखौटे टांगे जाते हैं.

बच्चे चेहरे पर काला रंग पोतते हैं, शैतान, चुड़ैल, राक्षसों जैसे चेहरे बनाते हैं, घर-घर जाकर चॉकलेट की मांग करते हैं.

लोग एक दूसरे को डरावने क़िस्से सुनाते हैं, टीवी पर डरावनी फ़िल्में दिखाई जाती हैं...उनमें रामगोपाल वर्मा की फ़िल्में नहीं होतीं!

बड़े भी तरह-तरह के स्वांग रचते हैं लेकिन बड़ों की पार्टियों में शैतान और चुड़ैल की केमिस्ट्री कुछ अलग सी होती है. वहां डर की अभिव्यक्ति कुछ वैसी ही होती है जैसी हिंदी फ़िल्मों में बारिश में भीगी नायिका और बिजली के कड़कने पर होती है. उसका ज़िक्र फिर कभी!

तो इस अक्तूबर अमरीका ने भी दुनिया को डराया. फ़र्क़ बस ये था कि शैतान और चुड़ैल का मुखौटा नहीं लगाया, अपने लोकतंत्र का एक डरावना चेहरा दिखा दिया. दुनिया सकते में थी.

'लोकतंत्र के हाथों बंधक'

टेड क्रूज़, अमरीका, सीनेट, रिपब्लिकन
इमेज कैप्शन, टेड क्रूज़ कर्ज़ संकट के दौरान रिपब्लिकन पार्टी के अहम नेता के तौर पर उभरे हैं.

जो अमरीका दुनिया के सामने अपने लोकतंत्र की पीठ थपथपाने का शायद की कोई मौका छोड़ता था, कभी-कभी उसे निर्यात करने की भी कोशिश करता था--वही अमरीका, उसी लोकतंत्र के हाथों बंधक बना नज़र आ रहा था. और अमरीका अगर बंधक बन जाए तो ज़ाहिर है दुनिया बंधक बन जाती है. आप अमरीका के साथ हों या ख़िलाफ़ हों, आज की हक़ीक़त फ़िलहाल तो यही है.

किसी देश ने अपनी पूंजी डॉलरों में जमा कर रखी है तो कोई मुल्क अमरीकी ट्रेज़री बॉन्ड ख़रीदकर अपनी आर्थिक सुरक्षा की गारंटी मांगता है. और उसमें जब सेंध लगने का डर सताए तो रातों की नींद तो हराम होती ही है.

देखा जाए तो जैसा अक्सर हर जगह होता है वही अमरीका में हो रहा था. एक छोटी सोच मुख्यधारा की सोच पर हावी हो गई. बेचारा लोकतंत्र बेवजह बदनाम हुआ.

रिपब्लिकन पार्टी के अंदर के एक गुट और एक ख़ास तरह की सोच ने इतना शोर मचाया कि वो पूरी पार्टी का नारा बन गया. और उस अतिवादी सोच के अंदर भी कुछ अति-अतिवादी भी थे जिनका भद्दापन पराकाष्ठा पर था.

डरना ज़रूरी है!

कामबंदी, अमरीका, कर्ज़ संकट
इमेज कैप्शन, अमरीका में कामबंदी के दौरान हज़ारों कर्मचारियों को छुट्टी पर भेज दिया गया था.

एक ने कहा ओबामा घुटने पर बैठना छोड़ें और कुरान पर से हाथ हटाएँ तभी देश का भला होगा, दूसरे ने कहा कि उन्हें व्हाइट हाउस छोड़ देना चाहिए. छह साल पहले बाइबल पर हाथ रखकर व्हाइट हाउस में प्रवेश करने वाले ओबामा के मज़हब को अब भी एक तबका शक की नज़र से देखता है या फिर जानबूझकर शक पैदा करता है.

इस अति-अतिवादी तबके की झलक आपको भारत में भी दिख सकती है जो कभी वैलेंटाइन डे पर प्रेमी जोड़ों को निशाना बनाता है तो कभी बुर्का न पहनने पर चेहरे पर एसिड डालने की धमकी देता है.

कभी-कभी जब कंप्यूटर बेवजह परेशान करने लगता है तो उसे रीबूट कर देते हैं. एक नई शुरूआत होती है, नई उम्मीदें जगती हैं.

रिपब्लिकन पार्टी के भी कई उदारवादी नेता रीबूट की मांग करने लगे हैं. लेकिन फ़िलहाल वैसा होता हुआ नज़र नहीं आ रहा.

रामगोपाल वर्मा के शब्दों में कहूं तो दुनिया और अमरीका दोनों ही के लिए अभी -- डरना ज़रूरी है!

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