'मेरी क़ब्र पहले ही तैयार की जा चुकी है'

अहमद रब्बानी
इमेज कैप्शन, ग्वांतानामो बे में क़ैद पाकिस्तानी नागरिक अहमद रब्बानी
    • Author, हारून रशीद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद.

ग्वांतानामो बे की जेल में अपनी ज़िंदगी गुज़ार रहे कराची के अहमद रब्बानी ने अपनी कहानी कुछ इस तरह सुनाई.

"हम फ़रवरी से भूक हड़ताल पर हैं. हम बिल्कुल शांतिपूर्ण तरीक़े से अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन हमारे आंदोलन की शुरूआत से ही हमें कई तरह की यातनाएं दी जा रही हैं.

रमज़ान महीने में हमें थोड़ी 'माफ़ी' दी गई यानी हमारी यातनाओं में थोड़ी कमी आई. हमें जो कपड़े पहनने के लिए दिए जाते थे उनका रंग नारंगी से बदलकर भूरे रंग का कर दिया गया.

इसके अलावा हमें सोने के लिए कुछ अच्छे बिस्तर दिए जाने लगे.

लेकिन माफ़ी के बावजूद कुछ क़ैदियों को 24 घंटों के अंदर दोबारा सज़ाएं देना शुरू कर दी गईं.

मैं क़सम खाता हूं कि मैंने कुछ भी ग़लत नहीं किया है. एक अधिकारी से जब मैंने पूछा कि मुझे किस बात की सज़ा दी जा रही है तो इस पर अधिकारी ने केवल इतना कहा कि उसे नहीं मालूम.

यहां एक और क़ैदी हैं जिनका वज़न 65 पाउंड यानी कि लगभग 30 किलो हो गया है. उनकी लंबाई क़रीब 175 सेंटीमीटर है. उस लंबाई के तो किसी मुर्दे का ही इतना कम वज़न होगा. वो ज़मीन पर किसी मुर्दी की तरह चलते हैं. उन्होंने जेल अधिकारियों ने अपील की थी कि उन्हें इंसानों की तरह खाना दिया जाए न कि पट्टियां बांधकर ग़ैर-इंसानों की तरह उन्हें भोजन दिया जाए.

लेकिन <link type="page"><caption> ग्वांतानामो बे</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2012/01/120111_guantanamo_10yrs_pa.shtml" platform="highweb"/></link> के अधिकारियों ने उनकी ये अपील भी ठुकरा दी.

एक और क़ैदी ने कई दिनों तक पानी नहीं पिया. फिर जब वो नेमाज़ पढ़ रहे थे तो गिर गए. डॉक्टर और ढेर सारे बड़े अधिकारी आए और उन्हें अस्पताल ले जाया गया. बड़ी मुश्किलों से उनकी जान बचाई जा सकी.

अगर आप किसी को भूख हड़ताल के ज़रिए मरने नहीं देंगे तो फिर सवाल उठता है कि क़ैदियों को क्यों उस समय तक छोड़ दिया जाता है कि उनका जिस्म तबाह हो जाए और उसके बाद उन्हें ज़बरदस्ती खिलाया पिलाया जाता है ताकि उन्हें अधमरी हालत में रखा जा सके.

अलबत्ता मैंने सुना है कि ऐसे 13 लोग हैं जिन्हें जल्द ही ट्यूब की ज़रूरत पड़ेगी. हमें झुकाने और मनाने के लिए बहुत सी तरकीब अपनाई जा रही है है लेकिन हम अपनी हड़ताल जारी रखना चाहते हैं. सरकार के ज़ुल्म के आगे तमाम क़ैदी ख़ामोश हैं और अपना धैर्य बनाए हुए हैं.

पूरी तैयारी के साथ हमें यातनाएं दी जाती हैं. मिसाल के तौर पर जेल अधिकारी मुझे आधी रात को अपनी कोठरी से बाहर घूमने का मौक़ा देते हैं. मेरे साथ लगभग एक महीने तक ऐसा होता रहा. मैं कभी भी सूरज की रोशनी नहीं देख सका. अगर वे चाहते तो मुझे दिन के समय अपनी कोठरी से बाहर निकलने की अनुमति दे सकते थे या फिर नेमाज़ के समय मुझे बाहर घुमाने नहीं ले जाते ताकि मैं अपने दूसरे साथियों के साथ मिलकर नेमाज़ पढ़ लेता.

ग्वांतानामो बे में पाकिस्तानी क़ैदी

<link type="page"><caption> ग्वांतानामो बे</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2010/11/101130_wikileaks_guantanamo_rp.shtml" platform="highweb"/></link> में इस समय छह पाकिस्तानी क़ैदी हैं. उनके नाम ख़ालिद शेख़ मोहम्मद, अमान बलोच, माजिद, सैफ़ुल्लाह पराचा, मोहम्मद अहमद रब्बानी और अब्दुर रब्बानी है.

ख़ालिद शेख़ मोहम्मद (फ़ाइल फ़ोटो)
इमेज कैप्शन, ख़ालिद शेख़ मोहम्मद पर मुक़दमा चल रहा है.

मुझे सितंबर 2002 में कराची में मेरे घर से पकड़ा गया. मैं पहले जिन लोगों के यहां नौकरी करता था पुलिस को उनलोगों पर शक था. मैं शादीशुदा हूं और मेरे तीन बच्चे हैं. मेरी बेटी 18 महीने की थी जब

मुझे एक अंधेरे जेल में ले जाया गया जो ऐसा लग रहा था जैसे ज़िंदा लोगों का क़ब्रिस्तान हो.

मुझे ख़ूब यातनाएं दी गईं. मुझे ज़ंजीरों में जकड़ कर रखा जाता था, मेरी कलाईंया बांधकर मुझे अंधेरे में लटका दिया जाता था. ये सिलसिला लगभग सात महीने तक चला.

अंधेरी कोठरी में ऊंची आवाज़ में संगीत बजाया जाता था, शराब और ख़ून की बदबू, भूख-प्यास, मारपीट, ये सब कुछ बर्दाश्त करना पड़ता था. मुझे कुछ भी नहीं बताया जाता कि मेरे साथ ये क्यों हो रहा है, मैं उनसे कुछ कह भी नहीं सकता था.

एक अधिकारी ने मुझे बताया कि मेरी क़ब्र पहले ही तैयार की जा चुकी है और वे मेरे भाई, उसकी गर्भवती पत्नी, मेरी पत्नी और मेरे बच्चों को यहां ला चुके हैं. हम सब दफ़ना दिए जाएंगे.

मैंने हमेशा उनसे कहा कि मुझे <link type="page"><caption> अमरीकी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2011/03/110308_guantanamo_us_as.shtml" platform="highweb"/></link> जेल में भेज दें जहां मुझे अमरीकी इंसाफ़ मिलने की उम्मीद थी. मुझे उम्मीद थी कि शायद अदालत से मुझे कुछ इंसाफ़ मिलेगा जहां अधिकारियों के डर के बग़ैर जज के सामने अपनी बात कहने का मौक़ा मिल सकेगा.

हम मानवाधिकार और अमरीकी अदालतों के इंसाफ़ की बातें सुना करते थे लेकिन ग्वांतनामो बे में हमें केवल ज़ुल्म और उनकी दोहरी नीति देखने को मिली."

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