मिस्र पर नीति के कारण अमरीका की साख ‘ख़तरे में’

- Author, किम घैटस
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन, अमरीका
लोगों का मानना है कि काहिरा की सड़कों पर सिर्फ लोकतंत्र की धज्जियाँ नहीं उड़ रही हैं बल्कि अमरीकी नीतियों की साख भी ‘ख़तरे में’ पड़ गई है. खासतौर पर 2011 में होस्नी मुबारक के सत्ता से बेदखल होने के बाद अमरीका की विश्वसनीयता और सम्मान में कमी आई है.
पिछले दिनों मिस्र में चल रही उथल-पुथल के दौरान लोकतंत्र चाहने वालों के साथ सहानुभूति रखते हुए अपने राष्ट्रीय सुरक्षा हितों का भी ध्यान रखना अमरीका के लिए दोधारी तलवार पर चलने जैसा रहा है.
अमरीका की कोशिश रही है कि <link type="page"><caption> मिस्र </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/08/130816_egypt_update_pp.shtml" platform="highweb"/></link>में जो भी सत्ता में रहे उससे अमरीका का संबंध अच्छा रहे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मिस्र में अमरीका के दोस्त एक-एक कर दूर होते जा रहे हैं. काहिरा में अब अमरीका का नाममात्र ही प्रभाव रह गया है.
पिछले कुछ समय में अमरीका ने मिस्र से जुड़े जितने भी कूटनीतिक क़दम उठाए हैं वो सभी असफल रहे. मोहम्मद मोर्सी के सत्ता के अपदस्थ होने के बाद अमरीका ने सेना और प्रदर्शनकारियों के बीच समझौता कराने के लिए मोर्सी को समझाने का प्रयास किया.
अमरीका ने सेना से भी अपील की थी कि वो मोर्सी को सत्ता से बेदखल न करे. मोर्सी के तख्तापलट के बाद उप विदेश मंत्री बिल बर्न्स सेना और मुस्लिम ब्रदरहुड के बीच समझौता कराने के लिए दो बार काहिरा गए थे.
लेकिन आजकल अमरीकी अधिकारियों के लिए काहिरा में अपनी बात को सुनाने के लिए आदमी खोजना भी मुश्किल हो गया है.
अमरीका मोर्सी के सत्ता से बाहर किए जाने को तख्तापलट कहने से भी बचता रहा ताकि <link type="page"><caption> मिस्र</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/08/130816_egypt_qus_ans_nn.shtml" platform="highweb"/></link> के सेना प्रमुख और मोर्सी को बाहर किए जाने का समर्थन करने वाले लाखों लोग नाराज न हो.
दोनों पक्षों की नाराजगी

अमरीका के इस क़दम से मुस्लिम ब्रदरहुड और उसके समर्थक नाराज हो गए. उन्हें लगता है कि लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई उनकी सरकार को सत्ता से बेदखल करना अन्याय है.
अमरीका के इस क़दम से मिस्र की अंतरिम सत्ता खुश नहीं हुई. मिस्र की सेना के अधिकारी और मोर्सी विरोधियों अमरीका की इस बात के लिए आलोचना कर रहे थे. इन लोगों का मानना है कि जब मोहम्मद मोर्सी सत्ता में थे तो अमरीका ने उनकी हर प्रकार से सहायता की थी.
अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी छुट्टियों के बीच मिस्र में हुए हालिया हिंसा की “कड़ी” निंदा करते हुए कहा कि वो मिस्र में सैन्य शासन लागू किए जाने के विरोध में है.
बयान देते समय ओबामा निराश और सख्त नज़र आ रहे थे. उन्होंने यह बयान एक खुशनुमा आरामगाह से दिया था लेकिन उनके चेहरे से ज़्यादातर समय झुंझलाहट झलकती रही.
ओबामा ने कहा, “अमरीका मिस्र के भविष्य का फैसला नहीं कर सकता. यह काम मिस्र की जनता का है. हम किसी राजनीतिक दल या नेता की तरफदारी नहीं करते हैं.”
केरी का बयान
कुछ लोगों का कहना है कि अमरीका का मिस्र को सैन्य सहायता देना यह प्रमाणित करता है कि अमरीका सैन्य शासन की तरफदारी कर रहा है. लेकिन मिस्र के सैन्य प्रमुख जनरल अब्दुल फतह अल-सिसि अमरीका की तीखी आलोचना करते हैं.
वॉशिंगटन पोस्ट को हाल में दिए एक इंटरव्यू में जनरल अल-सिसि ने कहा, “आपने मिस्रवासियों को अकेला छोड़ दिया. आपने हमसे मुँह फेर लिया. मिस्रवासी इस बात को कभी नहीं भूलेंगे.”
वहीं ओबामा ने कहा कि मिस्र मे हो रही घटनाओं के मिल अमरीका या पश्चिमी देशों को दोष देना आसान है.
ओबामा ने कहा, “मोर्सी समर्थक हम पर आरोप लगा रहे हैं. मोर्सी विरोधी भी हम पर ही आरोप लगा रहे हैं जैसे कि हम मोर्सी के समर्थक हों. इस तरह के रुख से कोई लाभ नहीं होने वाला है. हम शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक मिस्र चाहते हैं. यही हमारे हित में भी हैं. और ऐसे मिस्र के निर्माण की जिम्मेदारी मिस्री की जनता की है.”
ओबामा ने अमरीका और <link type="page"><caption> मिस्र</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/08/130814_egypt_pic_gallery.shtml" platform="highweb"/></link> के प्रस्तावित संयुक्त सैन्य अभ्यास कार्यकर्म को रद्द दिया और कहा कि अमरीका मिस्र को दी जाने वाली सैन्य सहायता की समीक्षा करेगा.
लेकिन मिस्र के सैनिक अधिकारी अमरीका की बात नहीं सुन रहे हैं जबकि दो हफ्ते पहले ही अमरीकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने पाकिस्तान के जीओ टीवी को दिए साक्षात्कार में कहा था कि “सेना ने मिस्र के लाखों-लाख लोगों के कहने पर हस्तक्षेप किया है. ये लोग अराजकता और हिंसा फैलने की संभावना से डरे हुए थे. और जहाँ तक हमारी समक्ष है सेना ने सत्ता पर कब्जा नहीं किया है.”
पेचीदा नीति

अमरीका की अब तक की मिस्र नीति पेचीदा ही रही है. अमरीकी अधिकारियों ने कैरी के बयान के सफाई देने की पूरी कोशिश की लेकिन तीर कमान से निकल चुका था.
अमरीकी प्रशासन की आलोचना दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है. रिपब्लिकन सिनेटर जॉन मैक्केन ने जोर देते हुए कहा कि अमरीकी सरकार को मिस्र में हुई सैन्य कार्रवाई को तख्तापलट घोषित करना चाहिए और मिस्र को दी जाने वाली सैन्य सहायता बंद करनी चाहिए.
तुर्की के प्रधानमंत्री रेचप तैय्यब अर्दोआन ने कहा कि मिस्र में हुए ख़ूनखराबे के लिए अमरीका भी जिम्मेदार है. लोगों के बीच यह सोच जोर पकड़ती जा रही है कि मिस्र के साथ सैन्य संबंध बहाल रखना अमरीका के लिए महंगा साबित हो रहा है.
कैरी का बयान अमरीका और मिस्र के बीच के लम्बे दोस्ताना संबंधों की भी झलक दे रहा था. सारी उठापटक के बावजूद मिस्र और इसकी सेना अमरीका के ज़रूरी सुरक्षा सहयोगी हैं.
इजराइल के साथ मिस्र के 1979 के कैम्प डेविड शांति समझौते के बने रहने के लिए भी मिस्र की सेना का सहयोग ज़रूरी है. अमरीका इजराइल सीमा से लगे सिनाई में चरमपंथियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई में भी मिस्र की मदद करता रहा है. अमरीका स्वेज नहर में प्रवेश को लेकर भी चिंतित है.
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