मिस्र की हिंसा से उपजे सवाल और जवाब

मिस्र की राजधानी क़ाहिरा में सरकार-विरोधी प्रदर्शन कर रहे मुस्लिम ब्रदरहुड के समर्थकों पर की गई सैन्य कार्रवाई के बाद उपजे कुछ सवाल और उनके जवाब.
सुरक्षा बलों ने 14 अगस्त को काहिरा में दो शिविरों पर धावा बोला जिसमें अपदस्थ राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी के सैकड़ों समर्थक घायल हो गये. इसके अलावा पूर्व राष्ट्रपति के दर्जनों समर्थकों को सेना ने मौत के घाट उतार दिया. लोकतंत्र के लिए दो साल पहले उठे विद्रोह के बाद से मिस्र में यह अब तक का सबसे खूनी दिन था.
<link type="page"><caption> मिस्र: नमाज़ के बाद रैलियाँ निकालने की तैयारी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/08/130816_egypt_friday_protest_vk.shtml" platform="highweb"/></link>
मोर्सी-समर्थित आन्दोलन का क्या हुआ?
राष्ट्रपति मोर्सी के चुनाव के एक साल बाद अपदस्थ होने के बाद से देश में अशांति फैली हुई है.
सुरक्षाबलों ने 14 अगस्त की सुबह काहिरा में रब्बा-अल-अदाविया मस्जिद और नहदा स्क्वायर के पास दो विरोधी शिविरों को खाली कराने के लिए हमला बोला था.
प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आँसू-गैस और गोलियों का इस्तेमाल किया गया. शिविरों को खाली कराने के लिए बख्तरबंद बुलडोजरों का भी इस्तेमाल किया गया.
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार इस ऑपरेशन में 600 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं, जबकि मुस्लिम ब्रदरहुड के मुताबिक मारे गये लोगों की संख्या 2,000 के आसपास है.
बड़े पैमाने पर सड़कों पर प्रदर्शन के बाद अपदस्थ राष्ट्रपति मोर्सी के समर्थकों ने काहिरा की इन दो मुख्य जगहों पर कब्जा कर लिया था.
मोर्सी-समर्थक उन्हें दोबारा बहाल किए जाने की माँग कर रहे हैं.
मोर्सी के बेदखल होने के कारण
पूर्व राष्ट्रपति मोर्सी अपने कार्यकाल के पहले साल में देश के प्रमुख संस्थानों, सामाजिक क्षेत्रों को संतुष्ट करने में नाकामयाब रहे थे. इसके अलावा मिस्त्र के बहुत से नागरिकों के मुताबिक मोर्सी देश की आर्थिक व सामाजिक समस्याओं को भी सुलझाने में असफल रहे थे.
मिस्त्र, मोर्सी समर्थकों और उनके विरोधी वामपंथियों, उदारवादियों के बीच ध्रुवीकृत हो गया है.
30 जून 2013 को मोर्सी के चुनाव की पहली वर्षगाँठ के विरोध में लाखों लोग सड़कों पर उतार आए थे. यह विरोध प्रदर्शन टॅमरॉड आंदोलन द्वारा आयोजित किया गया था.
विरोध प्रदर्शन में यह चेतावनी दी गयी थी कि अगर मोर्सी 48 घंटे के अंदर जनता की माँगों को पूरा नहीं करते हैं तो सेना हस्तक्षेप कर एक नया 'रोडमैप' लागू क्रर देगी.
इस समय सीमा के पूरा होते ही मोर्सी ने खुद को देश का वैधानिक नेता करार देते हुए चेतावनी दी थी कि यदि उन्हें हटाने का कोई प्रयास किया गया तो देश में अराजकता फैल सकती है.
तीन जुलाई को सेना-प्रमुख जनरल अब्दुल फतह अल-सिसी ने संविधान के निलंबन की घोषणा करते हुए कहा कि अगले चुनाव होने तक देश में अंतरिम अवधि के लिए सरकार के मुखिया मुख्य न्यायाधीश अदली मंसूर होंगे.
मिस्त्र के लगभग सभी प्रभावशाली लोगों ने मोर्सी को हटाने के लिए अपनी स्वीकृति दे दी थी. मोर्सी का विरोध करने वालों में मिस्र के सर्वोच्च इस्लामी ताक़त अल-अजहर के शेख, ईसाई कॉप्टिक चर्च के प्रमुख, प्रमुख विपक्षी नेता मोहम्मद अल-बारदेई और सलाफ़ी नूर पार्टी भी शामिल है.
मोर्सी समर्थकों और विपक्षी प्रदर्शनकारियों के हज़ारों की संख्या में सड़कों पर उतरने के बाद राजधानी काहिरा मे कई प्रमुख स्थानों पर सेना बख्तरबंद वाहनों के साथ वापस लौट आई है.
अल-बारदेई को अंतरिम उप-राष्ट्रपति बनाया गया था, लेकिन 14 अगस्त को सेना के ऑपरेशन के बाद उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया.
<link type="page"><caption> मिस्र में हिंसा का ख़ूनी दौर- तस्वीरें</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/08/130816_egypt_new_picture_gall_vs.shtml" platform="highweb"/></link>
आख़िर कौन हैं मोहम्मद मोर्सी? क्या हुआ उनके साथ?
मोहम्मद मोर्सी दशकों तक प्रतिबंधित रहे इस्लामिक आंदोलन मुस्लिम ब्रदरहुड के मुख्य नेता व इसके राजनीतिक विंग फ्रीडम और जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष रहे हैं.
जून 2012 में राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने के बाद वह मिस्त्र के पहले लोकतांत्रिक राष्ट्रपति निर्वाचित हुए. राष्ट्रपति पद से अपदस्थ किए जाने के बाद से अब तक मुर्सी नज़रबंद हैं.
मुस्लिम ब्रदरहुड के खैरत-अल-शतेर सहित कई दूसरे वरिष्ठ नेताओं को भी हिंसा भड़काने के आरोप में हिरासत में ले लिया गया है.

सैन्य अधिग्रहण के बाद क्या हुआ?
मोर्सी के अपदस्थ होने के बाद उनके समर्थकों द्वारा राजधानी काहिरा में राष्ट्रपति गार्ड मुख्यालय के बाहर प्रतिदिन रैलियाँ आयोजित की जा रही हैं, क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि मोर्सी को नज़रबंद कर यहीं रखा गया है.
आठ जुलाई को राष्ट्रपति गार्ड मुख्यालय के बाहर 51 लोगों की मौत के बाद फ्रीडम और जस्टिस पार्टी ने एक बड़े विद्रोह का आहवान किया है.
रब्बा-अल-अदाविया में सुरक्षाबलों के साथ हुए एक संघर्ष में 70 लोग मारे गये थे. इस कार्यवाही में सुरक्षाबलों पर अनावश्यक हमला करने का आरोप लगाया गया था, जबकि गृह मंत्रालय के अनुसार प्रदर्शनकारियों के स्वचालित हथियारों का प्रयोग करने का बाद सेना को कार्यवाही के लिये मजबूर होना पड़ा था.
मोर्सी-विरोधी भी सड़कों पर उतर रहे है. जनरल सिसी द्वारा सेना के समर्थन के लिए "संभावित हिंसा और आतंकवाद का सामना करने के लिए जनादेश" 26 जुलाई को प्रदर्शन करने का आहवान किया गया था.
<link type="page"><caption> यूएन: मिस्र में सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/08/130815_egypt_violence_un_emergency_meet_dil.shtml" platform="highweb"/></link>
आगे क्या होगा?
जनरल सिसी के मुताबिक राष्ट्रपति चुनाव होने तक मुख्य न्यायाधीश मंसूर एक निश्चित अवधि तक प्रभारी रहेंगे.
मंसूर को मोर्सी-समर्थित संविधान की समीक्षा करने और नए सिरे से संसदीय चुनाव होने की योजना से बाहर रखा गया है. मुस्लिम ब्रदरहुड ने इस योजना को अस्वीकार कर दिया है. इसके अलावा वामपंथी और उदारवादी दलों द्वारा भी इसकी आलोचना की जा रही है.
जनरल सिसी ने कोई भी आंदोलन न होने और "युवाओं को सशक्त बनाने और राज्य के संस्थानों में उन्हें एकीकृत करने के लिए" सभी उपाय करने का वादा किया है.
उन्होंने सरकार की अवधि और सेना की भूमिका के बारे में कुछ नहीं कहा.
मिस्त्र में सेना सबसे ताकतवर संस्था है, और सेना के स्वामित्व वाले व्यापार मिस्त्र की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण हिस्सा अदा करते हैं.
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