फलस्तीनी क़ैदियों की रिहाई को इसराइल की मंज़ूरी

इसराइली कैबिनेट ने शांति प्रक्रिया शुरू करने के <link type="page"><caption> अमरीकी प्रयासों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/07/130718_israel_paletinians_agreement_ar.shtml" platform="highweb"/></link> के तहत कई फलस्तीनी <link type="page"><caption> क़ैदियों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/07/130718_israel_paletinians_agreement_ar.shtml" platform="highweb"/></link> को रिहा करने को मंज़ूरी दे दी है.

प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतान्येहू के इस विवादास्पद प्रस्ताव पर कैबिनेट बंटी हुई थी. 13 मंत्रियों ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया जबकि सात लोगों ने इसका विरोध किया.

कैबिनेट ने उस विधेयक को भी अपना समर्थन दिया जिसमें फलस्तीनियों के साथ किसी भी शांति समझौते के लिए जनमत संग्रह की शर्त रखी गई है.

फलस्तीनी सूत्रों के हवाले से ख़बर आई है कि 2010 से रुकी शांति वार्ता अगले हफ्ते अमरीका में शुरू हो सकती है.

'कड़े फ़ैसले'

अगर शांति वार्ता सही दिशा में आगे बढ़ती है तो लंबे समय से इसराइली जेलों में बंद 104 क़ैदियों को कई महीनों में चार चरणों में रिहा किया जाएगा.

फ़लस्तीनी क़ैदियों को रिहा करने के प्रस्ताव पर हुई वोटिंग में दो मंत्रियों ने हिस्सा नहीं लिया जबकि समाचार एजेंसी एपी को सूत्रों के हवाले से मिली ख़बर के मुताबिक प्रधानमंत्री लिकुड पार्टी के दो मंत्रियों ने प्रस्ताव के विपक्ष में मतदान किया.

जिन क़ैदियों को रिहा करने के प्रस्ताव को मंजू़री दी गई है उनमें से कुछ ऐसे चरमपंथी हमलों के दोषी हैं जिनमें इसराइली नागरिकों की जानें गई थीं और उन्हें 30 साल तक की सज़ा सुनाई गई है.

रविवार को हुई बैठक से ठीक पहले प्रधानमंत्री नेतान्येहू ने कहा, "ये क्षण मेरे लिए आसान नहीं है, ये कैबिनेट मंत्रियों के लिए भी आसान नहीं है और खासतौर पर ये उन लोगों के परिवारों के लिए भी आसान नहीं है जिन्होंने अपनों को खोया है. लेकिन कुछ मौके ऐसे होते हैं जब राष्ट्रहित के लिए कठिन फैसले लेने पड़ते हैं और ये ऐसा ही मौक़ा है."

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'राजनीतिक ग़लती'

बैठक से पहले उप रक्षा मंत्री डैनी डैनन ने इस प्रस्ताव की निंदा की और इसराइली रेडियो पर कहा, "ये एक राजनीतिक ग़लती है, ये एक नैतिक ग़लती है. हम चरमपंथियों को यही संदेश दे रहे हैं कि हम आखिरकार उन्हें हीरो बनाकर छोड़ देते हैं."

लेकिन फलस्तीनी क़ैदियों के अधिकार के लिए संघर्ष करने वाले समूह के प्रमुख कडूरा फेयर्स ने कहा कि "जब तक क़ैदी रिहा नहीं हो जाते तब तक कोई वार्ता नहीं होगी."

फलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने भी किसी भी शांति समझौते पर जनमत संग्रह की बात कही है.
इमेज कैप्शन, फलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने भी किसी भी शांति समझौते पर जनमत संग्रह की बात कही है.

प्रधानमंत्री नेतान्येहू के दफ्तर से जारी बयान में कहा गया था कि, "ये ज़रूरी है कि ऐसे ऐतिहासिक फैसलों पर देश के हर नागरिक को प्रत्यक्ष रूप से वोट करना चाहिए. वार्ता के बाद जो भी नतीजे निकलेंगे उस पर जनमत संग्रह कराया जाएगा."

अमरीकी विदेश मंत्री जॉन कैरी ने 19 जुलाई को ये एलान किया था कि इसराइल और फलस्तीनी शासन के बीच शांति वार्ता "अगले हफ्ते" शुरू हो सकती है.

फलस्तीनी इस बात पर बार-बार ज़ोर देते रहे हैं कि इसराइल 1967 से पूर्व की युद्धविराम रेखा को <link type="page"><caption> 'फलस्तीनी राज्य'</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/07/130718_israel_paletinians_agreement_ar.shtml" platform="highweb"/></link> की सीमा माने लेकिन नेतान्येहू की गठबंधन सरकार में शामिल दक्षिणपंथी सदस्य इसका विरोध करते रहे हैं.

दोनों देशों के बीच शांति वार्ता विवादित क्षेत्र में बसावट के मसले पर 2010 में रुक गई थी.

फलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने भी कहा है कि दोनों देशों के बीच जो भी शांति समझौता होगा उस पर वो जनमत संग्रह करवाएंगे.

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