जहाँ 100 रुपए के लिए जिंदगी दांव पर लग जाती है

    • Author, रियाज़ सुहैल
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, कराची से

<link type="page"><caption> पाकिस्तान</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/06/130605_pakistan_economy_sharif_ap.shtml" platform="highweb"/></link> में हाल ही में किए गए एक <link type="page"><caption> आर्थिक</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/05/130513_media_on_sharif_rd.shtml" platform="highweb"/></link><link type="page"><caption> सर्वेक्षेण</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/05/130507_mother_children_dp.shtml" platform="highweb"/></link> के मुताबिक 14 साल तक के बच्चों की संख्या आठ करोड़ 36 लाख है.

इनमें से कई बच्चे अपने और अपने <link type="page"><caption> परिवार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/05/130513_nawaz_sharif_iv_va.shtml" platform="highweb"/></link> के गुजारे के लिए काम भी करते हैं.

कराची शहर में ऐसे ही कुछ बच्चे हैं जो कुछ सौ रुपयों के लिए हर रोज अपनी जिंदगी दांव पर लगाते हैं.

हुसैन और रफीक की कहानी

सूरज की किरणों के साथ ही हुसैन और उसका साथी रफ़ीक सफर के लिए तैयार हो जाते हैं. वे दोनो ही मछुआरों के परिवार से ताल्लुक रखते हैं.

इस सफर के लिए उनके पास कोई आम सवारी नहीं है. जुगाड़ जैसी नाव के सहारे उन्हें अपना सफर तय करना है.

खुला समंदर और हवाओं के थपेडे़ उनका इंतजार कर रहे हैं.

इन्हें समंदर का सीना चीरकर तकरीबन दो किलोमीटर दूर मौजूद मैंग्रोव के जंगलों में जाना है. जहाँ वे अपनी किस्मत आजमाएंगे.

रात को समंदर का जब पानी उतरता है और छोटे छोटे कई ज़जीरे (टापू) सर उभारते हैं तो हुसैन जैसे कई बच्चे यहाँ पहुँच जाते हैं और उन्हें तलाश होती है एक शिकार की.

ये बच्चे यहाँ केकड़ों के शिकार के लिए आते हैं. इन केकड़ों को देखकर आम बच्चे जरूर डरते होंगे लेकिन इन बच्चों को इन्हीं केकड़ों की तलाश रहती है.

स्कूल के वक्त

हुसैन कहते है, "रोज़ाना 10-15 केकड़े पकड़ता हूँ. 20 रुपए चलता है हमारा. ये टांग टूटी हुई इस केकड़े की. ये हमारे काम नहीं आता. मेहनत हमारी बेकार हो जाती है."

इस दलदली जमीन पर जहाँ चलना भी मुश्किल है वहाँ सुबह सात बजे से लेकर दोपहर 12 बजे तक ये बच्चे केकड़े पकड़ते हैं.

यह वही वक्त होता है जब आम तौर पर स्कूलों में बच्चे पढ़ रहे होते हैं.

रफ़ीक कहते हैं, "केकड़ा सब पकड़कर उसे बेचकर जो पैसा मिलेगा उसे घर में देंगे. घर में अम्मी है, वह रोटी पकाएगी. हम वो खाकर कुछ और करेंगे...."

बचपन

इन टापुओं पर अब पानी चढ़ने लगा है. हुसैन और रफीक को जल्दी ही यहाँ से निकलना होगा.

कई घंटों की मेहनत के बाद वापसी का सफर उन्हें बहुत थका देता है. आज उनकी मेहनत बेकार नहीं गई.

कई घंटों की मेहनत का सिला सिर्फ 300 रुपए कोई बड़ी रकम तो नहीं. पर ये छोटे शिकार इस पर भी खुश हैं.

कई बार तो उन्हें खाली हाथ भी लौटना पड़ता है.

एक वक्त का था जब बोट मछुआरे खुशहाल हुआ करते थे क्योंकि समंदर भी खुशहाल था.

लेकिन जब से शहर के गंदे पानी ने समंदर को गंदा करना शुरू किया तब से समंदर और उसके बांशिदे भी मछुआरों से नाराज रहने लगे हैं.

अब मछुआरों के घरों में गरीबी ने डेरा डाल रखा है और कई बच्चों से उनका बचपन छिन चुका है.

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