क्या दूर हो पाएगा पाकिस्तान का अँधेरा?

- Author, शाहज़ेब जिलानी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कराची
तीसरी बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने <link type="page"><caption> नवाज़ शरीफ</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/05/130512_nawaz_new_profile_ml.shtml" platform="highweb"/></link> के सामने कई आर्थिक चुनौतियां हैं. लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा संकट को लेकर है.
शाम ठीक आठ बजे कराची के मालीर जिले में बिजली गुल हो गई. इसके बाद घर में बंद बच्चे गलियों में निकल कर धमाचौकड़ी मचाने लगते हैं.
गर्मी और उमस से बचने के लिए महिलाएं और बुजुर्ग घरों के छज्जों और छतों पर निकल आते हैं.
जिनके पास जेनरेटर हैं वो फटाफट उन्हें चालू कर लेते हैं. जो जेनरेटर नहीं रख सकते वे बैटरी से चलने वाले यूपीएस (अनइंट्रप्टेड पावर सप्लाई) के भरोसे हो जाते हैं. यूपीएस से कुछ बल्ब और एकाध पंखे चल जाते हैं.
जो लोग जेनरेटर और यूपीएस दोनों नहीं रख सकते, उनके लिए तो बस मोमबत्तियों और हाथ के पंखों का ही सहारा है.
लोगों की नाराजगी

मोमबत्ती की रोशनी में अपना गृहकार्य पूरा कर रही स्कूली छात्रा हादिया सोहैल कहती हैं कि यह बेहद निराशाजनक है. मैं रात को सो नहीं पाती. <link type="page"><caption> बिजली की कटौती</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/05/130523_pakistan_electricity_power_situation_vr.shtml" platform="highweb"/></link> के कारण मैं स्कूल में थकान और चिड़चिड़ापन महसूस करती हूं.
हादिया के बयान से साफ है कि पूरे पाकिस्तान में चल रही बिजली की कटौती से आम लोग कितने खफ़ा हैं.
बिजली कटौती अब रोज की बात हो गई है. और साल दर साल कटौती के घण्टे बढ़ते जा रहे हैं.
देश का सबसे बड़ा सूबा पंजाब बिजली कटौती का सबसे बड़ा शिकार है. पंजाब में 20 घण्टे तक कटौती हो जाती है.
कटौती के कारण कल कारखाने ठप हो जाते हैं और आम लोगों का कामकाज बंद हो जाता है.
यही वजह है कि 11 मई, 2013 को हुए आम चुनाव में बिजली कटौती का मुद्दा निर्णायक रहा था.
चुनावी मुद्दा

ज्यादातर विश्लेषकों का मानना है कि ज़रदारी सरकार की तमाम नाकामियों के बावजूद बिजली कटौती के मुद्दे के कारण ही पीपीपी को <link type="page"><caption> पंजाब में चुनाव</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/06/130601_pak_national_assembly_ml.shtml" platform="highweb"/></link> हारना पड़ा.
<link type="page"><caption> नवाज़ शरीफ</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/05/130513_media_on_sharif_rd.shtml" platform="highweb"/></link> ने वादा किया था कि चुनाव जीतने पर वह बिजली संकट से लोगों को निजात दिलाएंगे और देश की आर्थिक प्रगति को तेज करेंगे.
इन वादों की उनकी चुनावी जीत में बड़ी भूमिका रही थी.
लेकिन वादों के सहारे चुनाव जीतना आसान था.
असली चुनौती तो पाकिस्तान की डांवाडोल अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की है.
चुनौतियाँ
नवाज़ शरीफ ने पाकिस्तान की बागडोर ऐसे वक्त में संभाली है जब देश की अर्थव्यस्था की सेहत बेहद खराब है.
पिछले पांच वर्षों के दौरान पाकिस्तान में भुगतान संतुलन की स्थिति बेहद खराब हो गई है.
विदेशी मुद्रा भंडार सिकुड़ता जा रहा है और देश के पास लगभग केवल तीन महीने तक आयात करने के लिए विदेशी मुद्रा है.
इस साल आईएमएफ को एक बड़ा पुनर्भुगतान करना है, ऐसे में देश एक बड़े संकट का सामना कर रहा है. विकास और निवेश कम बने हुए हैं.
रोजगार के नए अवसरों के अभाव का अर्थ है कि अधिक से अधिक संख्या में शिक्षित युवाओं के काम नहीं मिल सकेगा.
मंदी की स्थिति

कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक अर्थव्यवस्था मुद्रास्फीति जनित मंदी का सामना कर रही है.
यह स्थिति लंबे समय तक आर्थिक मंदी के बाद कीमतों में तेजी से आए उछाल के कारण पैदा होती है.
इससे धनी और साधन-संपन्न लोग पर बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ता है, लेकिन बाकी लोग बुरी तरह से प्रभावित होते हैं.
सरकार के सामने चुनौतियाँ काफी बड़ी हैं और उसका समाधान खोजने के लिए समय काफी कम है.
नई सरकार को कार्यभार ग्रहण करने के बाद अब जल्द ही वित्त वर्ष 2013-14 का बजट पेश करना है.
नवाज शरीफ को देश के व्यापक राजकोषीय असंतुलन को काबू में करना होगा.
उनकी सरकार को ऐसे रास्ते तलाशने होंगे ताकि कर राजस्व बढ़े और सरकार के खर्चों में कमी आए.
कर सुधार

पाकिस्तान में कर चोरी को रोकने के लिए शरीफ को कर सुधार के एजेंडे को आगे बढ़ाना होगा. करीब 18 करोड़ आबादी के इस देश में केवल लगभग 0.9% लोग कर देते हैं.
पिछली सरकार द्वारा कर के दायरे को बढ़ाने की घोषणा के बावजूद पिछले साल देश का कर-जीडीपी अनुपात 9% दर्ज किया गया, जो वैश्विक औसत के मुकाबले काफी कम है.
चूँकि नए प्रधानमंत्री खुद एक उद्योगपति हैं, इसलिए व्यापारियों और उद्योगपतियों में उम्मीद बंधी है.
माना जाता है कि उन्हें अर्थव्यवस्था के सामने खड़ी चुनौतियों की समझ है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि वह बड़े कारोबारियों के बेहद करीबी भी हैं.
ऐसे में शरीफ सुधार के एजेंडे को आगे तो बढ़ाएंगे, लेकिन उन पर इतना दबाव भी नहीं डालेंगे कि उनका समर्थन खोना पड़ जाए.
सउदी बेल-आउट
इन दबावों को कम करने के लिए शरीफ को तत्काल विदेशी मुद्रा के प्रवाह में बढ़ोतरी की दरकार है.
ज्यादातर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि नई सरकार के पास आईएमएफ के पास जाने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं है.
लेकिन यह एक ऐसा विकल्प है जिसे लेकर नई सरकार बहुत अधिक उत्साहित नहीं है.
पूर्व वित्त मंत्री और शरीफ के करीबी सरताज अज़ीज ने कहा है कि देश अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए अन्य विकल्पों पर विचार कर रहा है.
शरीफ और उनके सलाहकारों को सउदी के शाही परिवार से मदद की उम्मीद है.
रिपोर्ट इस ओर इशारा कर रही हैं कि उनकी सरकार राजशाही के साथ बातचीत कर रही है ताकि बाद में भुगतान करके तेल का आयात किया जा सके.
प्रस्तावित समझौते की शर्ते अभी साफ नहीं हैं. लेकिन ऐसा कोई समझौता होता है तो उसका ब्यौरा शरीफ की आगामी सउदी यात्रा के दौरान ही सामने आएगा.
आगे का सफर

निवेश फर्म एकेडी सिक्युरिटीज के शोध प्रमुख रज़ा जाफरी ने बताया, "यदि आप ऊर्जा संकट का समाधान खोज लेते हैं, आप उन ज्यादातर चुनौतियों को हल कर लेंगे, जिनका पाकिस्तान सामना कर रहा है."
उन्होंने कहा कि, "मैं सोचता हूँ कि नई सरकार के मिले मजबूत जनादेश के कारण इस बात की काफी संभावनाएँ हैं कि वे अपने वादों को पूरा करने के लिए आगे बढ़ सकेंगे."
विश्लेषकों का मानना है कि अल्पावधि में सरकार का लक्ष्य यह जताना होगा कि वह ऊर्जा संकट के समाधान के लिए कुछ कर रही है.
ऐसे में उसे पाकिस्तान में ऊर्जा की माँग और पूर्ति के बीच अंतर को खत्म करने के तरीकों को खोजने के लिए वक्त मिल जाएगा.
एक अनुमान के मुताबिक यह अंतर करीब 6,000 मेगावाट है.
मध्यावधि में हालाँकि सरकार को व्यापक आधार वाले संरचनात्मक सुधार के एजेंडे को आगे बढ़ाना होगा.
इसमें सब्सिडी में कटौती और बिजली की दरों में बढ़ोतरी जैसे लंबे समय से टाले जा रहे उपाए शामिल हैं, जो जनता के लिए अप्रिय हो सकते हैं. पाकिस्तान को जलविद्युत और कोयला आधारित बिजली के विकास पर भी जोर देना चाहिए.
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