चीन और उत्तर कोरिया की दोस्ती टूट तो नहीं रही

शी जिनपिंग
इमेज कैप्शन, बीओएओ इकॉनॉमिक फोरम की बैठक के दौरान शी जिनपिंग.

दक्षिण चीन के हैनान द्वीप पर ‘बीओएओ इकॉनॉमिक फोरम’ की बैठक के दौरान चीन के नए राष्ट्रपति शी जिनपिंग मिलनसार मिजाज के लग रहे थे.

चीन की सरकारी मीडिया ने भी राष्ट्रपति शी की कई तस्वीरें जारी की हैं जिनमें उन्हें अन्य देशों के नेताओं से खुशमिजाजी के साथ हाथ मिलाते हुए दिखाया गया है.

ठीक इसके विपरीत <link type="page"><caption> उत्तर कोरिया</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/04/130408_korea_japan_us_war_foreigners_vd.shtml" platform="highweb"/></link> को लेकर वहां बयानबाजियों का दौर जारी रहा.

फोरम की बैठक की शुरुआत में राष्ट्रपति शी ने कहा, “किसी को भी अपने निजी स्वार्थ के लिए एक इलाके को या फिर पूरी दुनिया को अराजकता की ओर धकेलने की इजाजत नहीं दी जाएगी.”

हालांकि चीन के राष्ट्रपति ने अपने भाषण में <link type="page"><caption> किसी देश</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/04/130408_north_korea_test_pkp.shtml" platform="highweb"/></link> का नाम नहीं लिया लेकिन सभी लोग यह समझ रहे थे कि इशारा उत्तर कोरिया की ओर ही था.

दशकों पहले चीन और <link type="page"><caption> उत्तर कोरिया</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/04/130407_us_korea_missile_va.shtml" platform="highweb"/></link> के दरम्यां साझा इतिहास और वैचारिक गठजोड़ के नाम पर रिश्ते करीब हुए थे लेकिन अब इन संबंधों पर काली छाया मंडराती हुई दिख रही है.

'दोनो देशों के दरम्यां रिश्तों पर जमी बर्फ'

चीन के फॉरेन अफेयर्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सु हाओ दोनो देशों के रिश्तों पर रोशनी डालते हुए कहते हैं, “फरवरी में उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण के बाद से ही चीन और <link type="page"><caption> उत्तर कोरिया</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/04/130405_north_korea_warn_embassies_aa.shtml" platform="highweb"/></link> के बीच उच्च स्तर पर आधिकारिक रूप से कोई बातचीत नहीं है और दोनो देशों के दरम्यां रिश्तों पर बर्फ जमी हुई है.”

कुछ लोग कहते हैं कि किम जॉन्ग द्वितीय की मृत्यु के बाद से ही दोनो देश अपने रिश्तों को सामान्य बनाने के मसले पर नाकाम हुए हैं.

चीन ही उत्तर कोरिया की खाद्य और तेल की जरूरत को पूरा करता रहा है. इसके बावजूद किम जॉन्ग उन सत्ता में आने के बाद से चीन के नेताओं के प्रति सदभाव प्रकट करने में विफल रहे.

बीजिंग की रेनमिन यूनिवर्सिटी के अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक अध्ययन केंद्र के उप निदेशक चेंग जिया कहते हैं, “उनके दादा और पिता की तुलना में चीन का संपर्क इस युवा नेता से बहुत कम रहा है. किम जॉन्ग ने सत्ता में आने के बाद से ही अमरीका और दक्षिण कोरिया की तरफ कड़ा रुख अपानाया. इतना ही नहीं चीन के प्रति उनका रवैया भी वैसा ही था.”

एकीकरण के मुद्दे का समर्थन?

उत्तर कोरिया
इमेज कैप्शन, उत्तर कोरिया के नए नेतृत्व ने शुरू से ही दक्षिण कोरिया और अमरीका के प्रति अपना रवैया सख्त रखा है.

अब चीन में अकादमिक जगत के कुछ लोग और कुछ पत्रकार बीजिंग में इस बात के लिए माहौल बना रहे हैं कि उत्तर कोरिया को लेकर जारी नीति पर पुनर्विचार किया जाए.

फरवरी में चीन के आर्थिक जगत के अखबार ने एक लेख में कहा गया, ‘चीन को उत्तर कोरिया से किनारा कर लेना चाहिए’.

अखबार के संपादक डेंग युवान ने लेख में इस बात पर ज़ोर दिया कि बीजिंग को कोरियाई देशों के एकीकरण के मुद्दे का समर्थन करना चाहिए.

हालांकि बाद में चीन के विदेश मंत्रालय ने इस लेख पर अपनी आपत्ति जाहिर की और इसकी वजह से डेंग युवान को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा.

डेंग की राय को चीन के इंटरनेट मंचों पर खासा समर्थन हासिल हुआ है हालांकि इसके बावजूद वह अल्पमत में ही हैं.

चीन के कई प्रमुख सरकारी अधिकारी उत्तर कोरिया के मामले में यथास्थिति बरकरार रखने के पक्ष में हैं. और इसकी वजहें बेहद सामान्य सी हैं.

उनका कहना है कि अगर किम की सरकार गिर गई तो लाखों उत्तर कोरियाई शरणार्थी चीन की सीमा पार करके उनकी तरफ आ जाएंगे. इससे बीजिंग पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ जाएगा.

चीन की चिंता

इसके अलावा एक वजह यह भी है कि एकीकृत कोरिया का झुकाव संभव है कि अमरीका की तरफ ज्यादा हो और चीन की सीमा पर अमरीका का एक सहयोगी खड़ा हो जाए.

हालांकि डॉक्टर चेंग कहते हैं, “यह पुरानी चिंता है और दशक भर पहले तक ही यह प्रासंगिक था. चीन एक बड़ी अर्थव्यवस्था और आधुनिक सेना के साथ एक ताकतवर देश है. उसे किसी के हमले का डर नहीं है और न ही किसी अन्य देश से घिर जाने का.”

ठीक इसी वक्त चीन खुद अपनी घरेलू समस्याओं से जूझ रहा है. चीन के कई इलाके अशांति के दौर से गुजर रहे हैं.

जाहिर है इन हालात में उत्तर कोरिया की तरफ आने वाले कोई नई परेशानी चीन नहीं चाहेगा.

उत्तर कोरिया पर लगाम

शी जिनपिंग
इमेज कैप्शन, चीन के राष्ट्रपति ने उत्तर कोरिया को इशारों में ही स्पष्ट संकेत दिया है.

चीन के कूटनयिक इस बात को लेकर कोशिश कर रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिबंधों के जरिए उत्तर कोरिया पर लगाम लगाई जा सके.

इसके लिए कड़े शब्दों का सहारा भी लिया जा रहा है.

अगर इन कोशिशों का कुछ नतीजा नहीं निकल पाता है तो कुछ सीधी कार्रवाई की जा सकती है, जैसा कि तेल की आपूर्ति कम की जा सकती है. अतीत में चीन ने ऐसा किया भी है.

अगर इन उपायों का फिर भी कोई नतीजा नहीं निकलता है तो यह संभव है कि चीन उत्तर कोरिया के पुराने शासक के दिनों को दोबारा याद करे.