'फ़िस्कल क्लिफ़' से जुड़े कुछ अहम सवाल

अमरीका में नए कानून पर सहमति बनाने की समय-सीमा के नज़दीक आने के साथ ही ऐसी आशंका जोर पकड़ने लगी है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की गाड़ी सुधार की पटरी पर दौड़ेगी या फिर इसे मंदी की मार झेलनी होगी.

फ़िस्कल क्लिफ़ पर पिछले दो सालों से बात हो रही है लेकिन 31 दिसंबर की तारीख के करीब आने के साथ ही इस पर जोर-शोर से चर्चा हो रही है.

अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा अपनी छुट्टियां घटा कर वापस वाशिंगटन आ गए हैं ताकि 'फ़िस्कल क्लिफ़' के मसले पर कोई फैसला करने के लिए बैठक की जाए.

क्या है मसला?

सरकारी खर्च और कर दरों के स्तर पर राष्ट्रपति ओबामा और कांग्रेस में कोई सहमति नहीं बन पा रही है. कांग्रेस ने अमरीकी सरकार की उधारी सीमा बढ़ाने से इनकार कर दिया है. कर्ज़ की यह सीमा कानून द्वारा तय की गई है.

राष्ट्रपति बराक ओबामा
इमेज कैप्शन, राष्ट्रपति बराक ओबामा अमीरों को कोई कर रियायत नहीं देना चाहते

कांग्रेस द्वारा पारित किए गए दूसरे कानून संघ सरकार को खर्च करने की इजाजत देने के साथ ही कर राजस्व बढ़ाने की इसकी क्षमता को परिभाषित करते हैं, लेकिन इसे वैधानिक उधारी सीमा के साथ लागू करने का डर भी होता है.

इस गतिरोध को तोड़ने के लिए दोनों पक्षों ने अगस्त 2011 में एक द्विदलीय समिति की स्थापना करने पर सहमति बनाई ताकि अगले 10 सालों तक अमरीकी सरकार के खर्च की सीमा तय करने और 1.2 ट्रिलियन डॉलर की बचत के तरीके ढूंढे जाएं.

समिति ने खुद ही इसकी समय-सीमा तय की है. इस मसले पर अगर कोई समाधान नहीं हो पाया तो खर्च में कटौती और करों में बढ़ोतरी का कानून स्वतः लागू हो जाएगा.

फ़िस्कल क्लिफ़ क्या है?

राहत पैकेज के तहत दी गई अस्थायी कर कटौती की समय-सीमा 31 दिसंबर को ख़त्म होने वाली है और इसके साथ ही बड़े पैमाने पर सरकारी खर्च कटौती स्वतः लागू हो जाएगी.

अमरीकी के इस राजकोषीय संकट को ही फ़िस्कल क्लिफ़ कहा जा रहा है. कर इज़ाफा और सरकारी ठेके, फायदे तथा समर्थन में कमी आने से आम जनता और कंपनियों पर भी इसका असर पड़ेगा.

करीब 607 अरब डॉलर की खर्च कटौती और कर में बढ़ोतरी की योजना बनाई गई है जिनमें रक्षा बजट में कमी, कर्मचारियों के लिए दी जा रही कर छूट को खत्म करना, चिकित्सा भत्ते और निजी करों में बदलाव शामिल है.

इस फ़िस्कल क्लिफ़ से रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों ही पक्षों के पास राजनीतिक रूप से खोने के लिए काफी कुछ है.

रिपब्लिकन जहां ज्यादा आमदनी पाने वालों के लिए बुश के दौर की कर कटौती के खत्म होने या रक्षा खर्च कटौती से असंतुष्ट हैं वहीं डेमोक्रेट यह चाहते है कि ओबामा बेरोज़गारों और कम आय वालों की मदद के लिए उपाय करें. वे यह भी चाहते हैं कि गैर-रक्षा खर्चों में ज्यादा कटौती न की जाए.

अमरीका के वित्त मंत्री टिमोथी गिथनर ने भी यह चेतावनी दी है कि सरकार कानूनी कर्ज़ सीमा के काफी क़रीब है.

कैसे शुरू हुआ यह संकट?

मौजूदा संकट के सिरे वर्ष 2001 से जुड़ें हैं जब राष्ट्रपति जॉर्ज बुश 1.7 अरब डॉलर की कर कटौती योजना पारित करने की कोशिश कर रहे थे.

फिस्कल क्लिफ
इमेज कैप्शन, विश्लेषकों का कहना है कि फिस्कल क्लिफ का असर दुनिया के बाजारों पर दिखेगा

कांग्रेस में उन्हें बहुमत नहीं मिल पाया लेकिन इसे दूसरे तरीके से आगे बढ़ाने की कोशिश हुई और यह कर कटौती 2011 में ख़त्म होनी थी.

वर्ष 2010 में ओबामा के राष्ट्रपति पद पर निर्वाचित होने के दो साल बाद रिपब्लिकन बहुमत वाले कांग्रेस के साथ एक करार कर इसकी समय-सीमा दो साल के लिए बढ़ा दी गई.

दूसरे कर बदलाव और खर्च से जुड़े अस्थायी उपायों को भी इस कानून में जोड़ा गया और ओबामा ने उम्मीद जताई कि मंदी और बेरोज़गारी दर बढ़ने के संकट से जूझ रही अर्थव्यवस्था को थोड़ा संबल मिलेगा.

आख़िर क्यों है यह अहम?

विश्लेषकों का मानना है कि इससे दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था पर मंदी का ख़तरा मंडरा रहा है और मुमकिन है कि इसका असर लंबे समय से कर्ज संकट झेल रहे यूरोजोन पर भी पड़ेगा.

फिच रेटिंग एजेंसी ने भी ऐसी आशंका जताते हुए फ़िस्कल क्लिफ़ को वैश्विक अर्थव्यवस्था की रिकवरी की राह में एक बड़ा ख़तरा बताया है. फिच के मुताबिक इससे वर्ष 2013 में वैश्विक वृद्धि दर आधी हो जाने की आशंका है.

आईएमएफ (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) ने भी चेतावनी दी है कि फ़िस्कल क्लिफ़ से उपजी अनिश्चितता से दुनिया भर के निवेश और नौकरियों के मौके पर असर दिख सकता है. बेशक यह संकट एशियाई बाजारों और उनके निवेशकों पर भी भारी पड़ सकता है.