रेचेप तैय्यप अर्दोआन की जीत के दुनिया और भारत के लिए क्या मायने हैं?

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रेचेप तैय्यप अर्दोआन राष्ट्रपति के रूप में तीसरी बार तुर्की की कमान संभालने जा रहे हैं. उन्होंने चुनावों में अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी कमाल कलचदारलू को बेहद क़रीबी मात दी है.
अर्दोआन को 52.16 फ़ीसदी वोट मिले हैं जबकि विपक्ष के साझा उम्मीदवार कमाल को 47.84 फ़ीसदी वोट मिले हैं.
चुनाव परिणामों के बाद राजधानी अंकारा में अपने आवास के बाहर समर्थकों को संबोधित करते हुए अर्दोआन ने कहा, "8.5 करोड़ लोगों के पूरे राष्ट्र की जीत हुई है."
विपक्ष के नेता कमाल कलचदारलू ने स्पष्ट रूप से इस जीत को स्वीकार नहीं किया है और इसे 'हालिया सालों में सबसे ग़लत ढंग से हुआ चुनाव' बताया है.
उनका कहना है कि राष्ट्रपति की राजनीतिक पार्टी ने एक तरह से पूरे राष्ट्र को उनके पीछे लगा दिया था.
अर्दोआन फिर एक बार तुर्की की सत्ता संभालने के लिए तैयार हैं, लेकिन उनके आगे देश की ख़स्ता होती अर्थव्यवस्था से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदलते हालात बड़ी चुनौतियां हैं.
वहीं देश में एक तबका उन पर लगातार कट्टरपंथी नीतियों को बढ़ावा देने का आरोप लगाता रहा है.
अर्दोआन की क्या नीतियां रहने वाली हैं इसके बारे में आगे विस्तार से बता रही हैं बीबीसी संवाददाता ओर्ला गुएरिन.


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अर्दोआन मतदाताओं को विश्लेषकों से बेहतर जानते हैं
रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने जीत के बाद समर्थकों को शायद ख़ुश ज़रूर कर दिया है, लेकिन जब चुनाव लड़ने की बात आती है तो वो एकदम साफ़ रहते हैं.
उन्होंने मतदाताओं को चुनावी विश्लेषकों और सर्वे से बेहतर समझा जो ये मानकर चल रहे थे कि विपक्ष उनको हरा सकता है. लेकिन ऐसा इस बार न हो सका.
उनके विरोधी उम्मीदवार कमाल कलचदारलू उनसे सिर्फ़ 4 फ़ीसदी वोटों से पीछे रहे. इसमें अब कोई शक नहीं है कि राष्ट्रपति अर्दोआन दफ़्तर में अपना तीसरा कार्यकाल शुरू कर रहे हैं.
इस रणनीतिक नेटो राष्ट्र ने अपना रास्ता ख़ुद चुना है और इसके अधिकतर मतदाताओं ने कलचदारलू के रूप में एक अपरीक्षित प्रजातंत्रवादी की तुलना में एक 'स्वेच्छाचारी शासक' को चुना है.
विपक्षी नेता कमाल के चुनाव अभियान को मिस्टर नाइस गाई (अच्छे शख़्स) के रूप में चला रहे थे जिसमें एक नए तुर्की का वादा किया गया था.

अर्दोआन को जनता ने क्यों तरजीह दी
हालांकि, उन्होंने दक्षिणपंथी रुख़ भी अपनाया और सभी शरणार्थियों को वापस भेजने का भी वादा किया. इसने कुछ राष्ट्रवादियों का अतिरिक्त समर्थन हासिल किया लेकिन यही काफ़ी नहीं था.
तुर्की के इस्लामी नेता अर्दोआन के अपने समर्थकों के साथ संबंध बीते 20 सालों से है, जिनमें अधिकतर उनकी ही तरह मज़हबी रूढ़िवादी हैं.
ये उनके साथ भयंकर महंगाई के दौरान भी जुड़े रहे हैं और इन्हीं लोगों ने उन्हें अगले पांच साल तक सत्ता में बने रहने का मौक़ा दिया है.
जैसे ही चुनाव परिणामों की घोषणा हुई तो राजधानी अंकारा की सड़कें तुर्की के झंडों से पट गईं.
अर्दोआन के समर्थक सड़कों पर नारे लगाते और कार के हॉर्न बजाते निकल पड़े.
एक बड़ी भीड़ उनके 1,000 से अधिक कमरों वाले राष्ट्रपति आवास के बाहर जमा हो गई. उनके विरोधियों ने वादा किया था कि वो इन कमरों को आम जनता के इस्तेमाल के लिए खोलेंगे.
हिजाब पहने और मुस्कुराती हुई 50 साल की हतीजे दुरान कहती हैं, "हम इस बात से धन्य हैं कि हमारे राष्ट्रपति फिर हमारा नेतृत्व करेंगे."
"इससे बड़ी और कोई भावना नहीं है. पूरी दुनिया को यह सुनने दो. वो ऐसे नेता हैं जिन्होंने पूरी दुनिया को ललकारा है और पूरी दुनिया को सबक़ सिखाया है."
अर्दोआन की चुनावी अपील साफ़ थी कि 'वो एक मज़बूत नेता हैं जो किसी के सामने झुकता नहीं है'.
चुनाव का संदेश साफ़ है कि कइयों ने अच्छे शख़्स की जगह एक सख़्त शख़्स को तरजीह दी है.
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रूस ख़ुश, पश्चिम सोच में
अब वो बेहद ख़ुश होंगे और देश के विपक्ष को बुरी तरह चोट पहुंची है. वहीं दूसरी ओर क्रेमलिन (रूसी राष्ट्रपति का कार्यालय) जश्न मना रहा है.
यह परिणाम राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चाहते थे और इसमें भी कोई अचंभा नहीं है कि तुर्की के नेता को बधाई देने वालों में वो सबसे पहले थे. पुतिन ने वो सब कुछ किया जो वो अर्दोआन के पक्ष में माहौल बनाने के लिए कर सकते थे.
उन्होंने रूसी प्राकृतिक गैस के 60 करोड़ डॉलर के भुगतान को भी स्थगित कर दिया था.
अर्दोआन इस चुनाव में काफ़ी बढ़त के साथ उतरे थे जिनमें उनकी आम चीज़ों पर पकड़ और 90 फ़ीसदी मीडिया पर उनका नियंत्रण भी शामिल था.
चुनावी जीत के बाद उन्होंने अपने भाषण में ज़ोर देकर कहा कि 'सिर्फ़ तुर्की ही विजेता है.' हालांकि, उन्होंने विपक्ष और एलजीबीटीक्यू समुदाय पर हमला करने में कोई समय नहीं लिया.

अंतरराष्ट्रीय शक्ति समीकरण पर असर
अब दोनों पहले से ज़्यादा निशाने पर रहेंगे और आने वाले समय में मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और घटेगी. तुर्की में सबसे अधिक लंबे समय से पद पर क़ाबिज़ नेता संयम के लिए नहीं जाने जाते हैं.
जिन तक़रीबन 48 फ़ीसदी मतदाताओं ने बदलाव के लिए मतदान किया था वो निराश होंगे और शायद डरे भी हुए होंगे.
कइयों का अनुमान है कि इस धर्म-निरपेक्ष गणतंत्र में सार्वजनिक जीवन में अधिक धर्म शामिल होगा और कम स्वतंत्रता होगी. ग़ौरतलब है कि अक्तूबर में तुर्की अपने गठन के 100 साल पूरे कर रहा है.
तुर्की अब एक विभाजित राष्ट्र है जिसकी अर्थव्यवस्था संकट हुई है. आलोचकों का कहना है कि राष्ट्रपति के पास उसका भी कोई समाधान नहीं है.
अब सवाल ये भी उठता है कि चुनाव परिणाम तुर्की के पड़ोसियों और नेटो साझेदारों को कहां ले जाएंगे? वे अधिक सतर्क रहेंगे क्योंकि वे जानते हैं कि राष्ट्रपति अर्दोआन अक्सर स्थापित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को पलटने में ख़ुश होते हैं.


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अर्दोआन की जीत और तुर्की के भविष्य पर बात
तीसरी बार राष्ट्रपति चुने जाने के बाद विशेषज्ञों की अटकलों का दौर शुरू हो चुका है. अर्दोआन अपनी रूढ़िवादी पहचान के लिए जाने जाते हैं, वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी वो अपना अलग रुख़ अपनाते रहे हैं.
सोशल मीडिया पर कोई ट्वीट करके इस जीत पर ख़ुशी जता रहा है तो कोई तुर्की के भविष्य पर चिंता जता रहा है.
तुर्की के लेखक मुस्तफ़ा अकयोल ने ट्वीट किया है कि 'तुर्की की समस्या चुनाव नहीं है. क़ानून के शासन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कमी है. वहीं हर नागरिक बिना डर के ज़िंदगी गुज़ारता नज़र नहीं आता.'
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नीदरलैंड्स की सांसद काटी पीरी ने ट्वीट किया है कि 'अर्दोआन ने तुर्की को तानाशाही में बदल दिया है. ऐसे में विरोधियों को जेल में डालने वाले, मीडिया और न्यायपालिका को नियंत्रित करने वाले व्यक्ति को हराना असंभव था. इसके बावजूद आपने यह भी दिखाया कि आधा देश दूसरी दिशा में जाना चाहता है. उम्मीद रखिए और यूरोपीय संघ तुर्की में डेमोक्रेट्स के बारे में नहीं भूल सकता है.'
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तुर्की लगातार कोशिश करता रहा है कि वो यूरोपीय संघ में शामिल हो, लेकिन उसकी मांग अब तक पूरी नहीं हुई है. वो नेटो का सदस्य ज़रूर है लेकिन यूरोप में उसे अब तक जगह नहीं दी गई है.
अमेरिका के आयोवा में लूथर कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर ओचुन सेल्चुक ने ट्वीट किया है कि विपक्ष इस्तांबुल और अंकारा जैसे मेट्रोपॉलिटन इलाक़ों में मज़बूत हुआ है और 2024 स्थानीय चुनावों से पहले ये महत्वपूर्ण है.
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भारत और तुर्की के रिश्ते
अर्दोआन के तीसरी बार राष्ट्रपति चुने जाने के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करके उन्हें बधाई दी है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अर्दोआन की जीत पर ट्वीट किया, "तुर्की के राष्ट्रपति पद पर दोबारा चुने जाने के लिए रेचेप तैय्यप अर्दोआन को बधाई. मुझे भरोसा है कि हमारे द्विपक्षीय संबंध और वैश्विक मुद्दों पर सहयोग आने वाले समय में भी बढ़ना जारी रहेगा."
मोदी ने भले बधाई दे दी है लेकिन उन्हें पता है कि अर्दोआन के सत्ता में आने के बाद भारत से रिश्ते सहज नहीं रहे हैं. पिछले नौ सालों में पीएम मोदी ने मध्य-पूर्व के कई देशों का दौरा किया लेकिन तुर्की नहीं गए.
2019 में मोदी तुर्की का दौरा करने वाले थे लेकिन ऐन मौक़े पर दौरा रद्द हो गया था. पाँच अगस्त 2019 को कश्मीर का विशेष दर्जा भारत ने ख़त्म कर दिया था और तुर्की ने इसका खुलकर विरोध किया था. अर्दोआन ने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में भी उठाया था.
भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने भी ट्वीट कर इस बात पर चिंता जताई है कि अर्दोआन की जीत भारत के लिए किसी भी लिहाज़ से ठीक नहीं है.
कंवल सिब्बल ने अपने ट्वीट में लिखा है, ''तुर्की में अर्दोआन की जीत भारत के लिए बहुत सहज स्थिति नहीं है. तुर्की कश्मीर पर इस्लामिक लाइन पर समर्थन पाकिस्तान को देगा. ओआईसी में भी कश्मीर पर सक्रिय रहेगा. पाकिस्तान के साथ तुर्की की जुगलबंदी चिंताजनक है. ऑटोमन साम्राज्य वाला अर्दोआन का लक्ष्य भी विनाशकारी है. अर्दोआन के नेतृत्व में तुर्की का ब्रिक्स में आना किसी भी मायने में ठीक नहीं है. रूस के साथ भी अर्दोआन की दोस्ती बहुत अच्छी है.''
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भारत और तुर्की के रिश्ते हमेशा से उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं. तुर्की का पाकिस्तान परस्त रुख़ रहा है. कहा जाता है कि इसकी शुरुआत 1950 के शुरुआती दशक या फिर शीत युद्ध के दौर में हुई थी.
इसी दौर में भारत-पाकिस्तान के बीच दो जंगें भी हुई थीं. तुर्की और भारत के बीच राजनयिक संबंध 1948 में स्थापित हुए थे. तब भारत को आज़ाद हुए मुश्किल से एक साल ही हुआ था.
इन दशकों में भारत और तुर्की के बीच क़रीबी साझेदारी विकसित नहीं हो पाई. कहा जाता है कि तुर्की और भारत के बीच तनाव दो वजहों से रहा है. पहला कश्मीर के मामले में तुर्की का पाकिस्तान परस्त रुख़ और दूसरा शीत युद्ध में तुर्की अमेरिकी ख़ेमे में था जबकि भारत गुटनिरपेक्षता की वकालत कर रहा था.

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जब शीत युद्ध कमज़ोर पड़ने लगा था तब तुर्की के 'पश्चिम परस्त' और 'उदार' राष्ट्रपति माने जाने वाले तुरगुत ओज़ाल ने भारत से संबंध पटरी पर लाने की कोशिश की थी.
1986 में ओज़ाल ने भारत का दौरा किया था. इस दौरे में ओज़ाल ने दोनों देशों के दूतावासों में सेना के प्रतिनिधियों के दफ़्तर बनाने का प्रस्ताव रखा था.
इसके बाद 1988 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तुर्की का दौरा किया था. राजीव गांधी के दौरे के बाद दोनों देशों के रिश्ते कई मोर्चे पर सुधरे थे.
लेकिन इसके बावजूद कश्मीर के मामले में तुर्की का रुख़ पाकिस्तान के पक्ष में ही रहा इसलिए रिश्ते में नज़दीकी नहीं आई. भारत तुर्की की इन आपत्तियों के जवाब में कहता रहा है कि कश्मीर उसका आंतरिक मामला है और तुर्की की टिप्पणी भारत के आंतरिक मामलो में हस्तक्षेप है.
साल 2000 में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 50.5 करोड़ डॉलर का था जो 2018 में 8.7 अरब डॉलर हो गया. पूर्वी एशिया में चीन के बाद भारत तुर्की का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर बन गया.
दूसरी तरफ़ पाकिस्तान का तुर्की से व्यापार एक अरब डॉलर भी नहीं पहुंच पाया है.

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