चीनी रक्षा मंत्री ली शांगफ़ू पर अमेरिकी प्रतिबंध और उनके भारत दौरे के मायने

ली शांगफ़ू

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

चीनी रक्षा मंत्री ली शांगफ़ू शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के रक्षा मंत्रियों की बैठक में भाग लेने के लिए भारत पहुंचे हैं. ये बैठक शुक्रवार को दिल्ली में हो रही है.

गुरुवार को दिल्ली पहुंचने के बाद रक्षा मंत्री ली शांगफ़ू अपने भारतीय समकक्ष राजनाथ सिंह से मिले.

इस मुलाकात के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से कहा, "भारत-चीन संबंधों का विकास सीमा पर शांति पर निर्भर है."

उन्होंने कहा, "वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सभी मुद्दों को मौजूदा द्विपक्षीय समझौतों और प्रतिबद्धताओं के अनुसार हल करने की आवश्यकता है."

चीन के रक्षा मंत्रालय ने मंगलवार को एक बयान में कहा कि ली शांगफ़ू दिल्ली में सम्मेलन को संबोधित करेंगे और "अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्थिति के साथ-साथ सुरक्षा सहयोग के मुद्दों पर संवाद करने और विचारों का आदान-प्रदान करने के लिए संबंधित देशों के प्रतिनिधिमंडलों के नेताओं से मिलेंगे."

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  • साल 2023 में भारत एससीओ का अध्यक्ष बना.
  • शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (एससीओ) का गठन 2001 में हुआ था.
  • भारत के अलावा, चीन, किर्गिस्तान, पाकिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान भी सदस्य हैं. इस बार ऑब्जर्वर के तौर पर बेलारूस और ईरान के मंत्री भी हिस्सा लेंगे.
  • नेटो जैसे पश्चिमी गठबंधन का मुक़ाबला करने के लिए एससीओ की स्थापना हुई थी. भारत और पाकिस्तान 2017 में इसके सदस्य बने थे.
  • 2020 में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच संघर्ष के बाद से चीनी रक्षा मंत्री की यह पहली भारत यात्रा है.
  • रूस के रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगू भी दिल्ली में बैठक में शामिल होंगे, जबकि पाकिस्तान के ख्वाजा आसिफ के ऑनलाइन शामिल होने की उम्मीद है.
  • पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी भारत में एससीओ के विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लेंगे.
  • सालों बाद कोई पाकिस्तानी शीर्ष अधिकारी भारत के दौरे पर आ रहे हैं.
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ली शांगफ़ू पर क्यों लगा है अमेरिकी प्रतिबंध?

1954 में जन्मे जनरल ली शांगफ़ू चीनी सेना में एक उच्च पद पर थे. उन्हें अपनी सेना के आधुनिकीकरण और उन्नत सैन्य तकनीकों को विकसित करने के चीन की कोशिशों से जुड़ा एक प्रमुख व्यक्ति माना जाता है.

2018 में अमेरिका ने उन्हें और उनके विभाग पर कथित तौर पर रूस से उन्नत सैन्य उपकरण ख़रीदने के कारण प्रतिबंध लगा दिया था. अमेरिका ने चीनी जनरल पर रूस से एसयू-35 लड़ाकू विमान और सतह से हवा में मार करने वाली एस-400 मिसाइल प्रणाली की खरीद में शामिल बताया था.

अमेरिका के अनुसार ये सौदा रूस के ख़िलाफ़ अमेरिकी प्रतिबंधों का स्पष्ट उल्लंघन था. प्रतिबंध के अनुसार कोई भी व्यक्ति या कंपनी चीनी रक्षा मंत्रालय या उससे जुड़ी किसी कंपनी या संस्था से किसी तरह की ख़रीदारी नहीं कर सकता है. न ही किसी तरह का व्यापारिक संबंध बना सकता है. इसी प्रकार का प्रतिबंध अमेरिका ने ली शांगफू पर भी लगा रखा है.

सिचुआन विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ विभाग में प्रोफ़ेसर हुआंग युनसोंग बीबीसी से एक बातचीत में कहा कि वे देश के एक अहम नेता हैं, प्रोफ़ेसर हुआंग अमेरिकी प्रतिबंध को बेतुका क़रार देते हैं.

प्रोफ़ेसर हुआंग युनसोंग कहते हैं, "चीन के ख़िलाफ़ सभी तरह की गतिविधियों के लिए अमेरिका के पास बेतुके कारण हैं जिस पर हमारे सब्र का बांध टूटता जा रहा है. आप शायद आने वाले दिनों में (चीन की तरफ़ से) इसका जवाब देखेंगे.

प्रोफ़ेसर फ़ैसल अहमद

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इमेज कैप्शन, प्रोफ़ेसर फ़ैसल अहमद मानते हैं कि चीन पर अमेरिकी प्रतिबंध पर का चीन पर कोई असर नहीं हुआ हैं.

'अमेरिकी प्रतिबंध का कोई आधार नहीं है'

दिल्ली स्थित फ़ोर स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट में चीनी मामलों के विशेषज्ञ फ़ैसल अहमद कहते हैं कि ली शांगफ़ू एक टेक्नोक्रेट हैं और उन्हें पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के आधुनिकीकरण के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है, 'इसलिए उन पर लगा प्रतिबंध चीन को किसी भी तरह से डराने वाला नहीं.'

वो कहते हैं, "उनके चीन के रक्षा मंत्री बनाये जाने के बाद (2018) इस तरह के प्रतिबंध अर्थहीन हो जाते हैं. वास्तव में अमेरिका ख़ुद यह महसूस करता है कि वे चीन के साथ रक्षा मंत्री स्तर की बातचीत कर सकता है लेकिन साथ ही वो ये भी दावा करना जारी रखेगा कि वो ली पर लगाए गए प्रतिबंधों को नहीं हटाएगा."

प्रोफ़ेसर फ़ैसल अहमद के मुताबिक़ वैश्विक व्यवस्था में परिवर्तन के बीच "चीन एक प्रमुख शक्ति के रूप में बढ़ती स्वीकृति का आनंद ले रहा है और ज़्यादा मुखर हो रहा है. ऐसे में अमेरिकी प्रतिबंधों का कोई ज़मीनी असर नहीं होगा."

प्रोफ़ेसर हुआंग युनसोंग

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इमेज कैप्शन, प्रोफ़ेसर हुआंग युनसोंग का मानना है कि चीन भारत के साथ सामान्य संबंध चाहता है.

18वें दौर की बातचीत के बाद चीनी रक्षा मंत्री की यात्रा

साल 2020 में भारत और चीन के सैनिकों के बीच गलवान के निकट सीमा पर हुई घातक झड़प के बाद से चीनी रक्षा मंत्री की यह पहली भारत यात्रा है. इस झड़प में 20 भारतीय सैनिक मरे गए थे. बाद में चीन के सैनिकों की भी झड़प में हताहत होने की ख़बर सामने आई थी.

चीनी रक्षा मंत्री की यात्रा, भारत और चीन सीमा विवाद को हल करने के लिए 18वें दौर की कमांडर स्तर की बातचीत संपन्न होने के कुछ दिनों बाद हो रही है.

दोनों देशों के बीच तनाव का मूल कारण हिमालय क्षेत्र में 3,440 किलोमीटर लंबी विवादित सीमा है.

तो क्या ली शांगफ़ू और भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बीच बैठक का कोई नतीजा निकल कर आएगा? क्या बैठक के बाद आपसी विश्वास बहाली की उम्मीद की जा सकती है?

प्रोफ़ेसर हुआंग युनसोंग कहते हैं, "ये अच्छे संकेत हैं कि बीजिंग और नई दिल्ली दोनों ही उस संकट के समाधान के लिए सैन्य और राजनयिक चैनल खुले रखने को तैयार हैं. चीन ने कई कारणों से जी20 और एससीओ में भारत की अध्यक्षता का समर्थन किया है, और उनमें से एक यह है कि उभरता हुआ भारत एक बहुध्रुवीय दुनिया के लिए हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप है."

इस साल जी-20 और एससीओ की अध्यक्षता भारत के पास है.

चीनी प्रोफ़ेसर कहते हैं कि "हालांकि, चीन और भारत के बीच भरोसे की कमी को आसानी से दूर नहीं किया जा सकता है. हम भरोसा जगाने के लिए अलग-अलग वक़्त में गहन बातचीत के अवसरों की तलाश कर रहे हैं, वैसे अवसर जो कि बदली हुई ज़मीनी हक़ीक़त के साथ-साथ द्विपक्षीय संबंधों के लिए हमारी सामान्य अपेक्षाओं के अनुकूल हैं.

भारत-चीन की राष्ट्रीय ध्वज

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एशियाई दिग्गजों के बीच तनाव में कमी आ सकती है?

प्रोफ़ेसर हुआंग युनसोंग कहते हैं, "लगभग तीन साल बाद इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना (गलवान झड़प) का उचित अंत होना चाहिए. चीन भारत के साथ सामान्य संबंधों से ज्यादा कुछ नहीं चाहता है. जिन मुद्दों पर हम सहयोग कर सकते हैं वहाँ सहयोग करें और जहां हम असहमति है वहां समाधान के लिए बातचीत करें. दोनों पक्षों के शीर्ष अधिकारियों के मिलने और एक-दूसरे से बार-बार बात करना वास्तव में उम्मीद की किरण है."

उनका कहना है कि भारत की ओर से "अधिक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है. नई दिल्ली द्वारा जून 2020 से चीनी कंपनियों पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण चीन को 100 अरब डॉलर से अधिक का नुक़सान हुआ है."

प्रोफ़ेसर फ़ैसल अहमद की राय में भी ली शांगफू का एससीओ शिखर सम्मेलन में शामिल होना साल 2020 से भारत-चीन के बीच तनावपूर्ण संबंधों के मद्देनज़र अहम क़दम है.

वो कहते हैं, "इस यात्रा को भविष्य में रक्षा सहयोग की संभावनाओं के बारे में आपसी समझ को बेहतर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण क़दम के रूप में देखा जाना चाहिए. वास्तव में, प्रभावी सीमा प्रबंधन के लिए यह महत्वपूर्ण है कि एससीओ नियमित रूप से "सॉलिडैरिटी" नाम के संयुक्त सीमा संचालन पर अपना कार्यक्रम आयोजित करता रहे. साथ ही, सभी पक्षों को मान्य आचार संहिता बनाए रखे."

तक़रीबन तीन सालों से जारी कड़वाहट के बीच नरमी के लक्षण तब दिखे जब पिछले महीने भारत और चीन के विदेश मंत्रियों ने जी-20 के एक सम्मेलन के दौरान भेंट की.

बैठक के बाद भारतीय विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने अपने चीनी समकक्ष किन गैंग के साथ बातचीत पर बयान दिया कि बातचीत 'द्विपक्षीय संबंधों, विशेष रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और वर्तमान चुनौतियों पर केंद्रित' रखा गया.

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