वियतनाम युद्ध में इन सात कारणों से हुई थी अमेरिका की करारी हार

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- Author, मार्क शे
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका निर्विवाद के दुनिया की सबसे प्रमुख आर्थिक ताक़त बन गया था और अपनी सेना को भी उतना ही ताक़तवर मानने लगा था.
फिर भी क़रीब आठ साल की लड़ाई में अकूत धन और सैनिक संसाधन झोंकने के बावजूद अमेरिका को उत्तरी वियतनाम की सेना और उनके गुरिल्ला सहयोगियों, वियतकांग, से मुंह की खानी पड़ी.
अमेरिकी सैनिकों के 29 मार्च 1973 को हुई वापसी की 50वीं वर्षगांठ पर हमने दो विशेषज्ञों और शिक्षाविदों पूछा कि अमेरिका आखिरकार वियतनाम युद्ध कैसे हार गया.
इस दौर में शीत युद्ध चरम पर था और साम्यवादी और पूंजीवादी विश्व शक्तियाँ एक-दूसरे के ख़िलाफ़ आमने-सामने थीं.
द्वितीय विश्व युद्ध की वजह से फ्रांस लगभग दिवालिया हो गया था और इंडोचाइना क्षेत्र में अपने उपनिवेश को बचा नहीं सका और एक शांति सम्मेलन में वियतनाम का विभाजन हो गया- उत्तर में एक साम्यवादी और दक्षिण में अमेरिकी समर्थित सरकार.
लेकिन फ्रांसीसियों की हार से वियतनाम में संघर्ष समाप्त नहीं हुआ. पूरा वियतनाम और आस पड़ोस के देश ही साम्यवादी न हो जाएं इस डर ने संघर्ष को जारी रखा और इसी डर से अमेरिका एक ऐसे युद्ध में खिंचा चला गया जो एक दशक तक चला और लाखों लोगों की जान गई.
सवाल ये उठता है कि दुनिया की सबसे ताकतवर सैन्य शक्ति ने कैसे विद्रोहियों और जल्द बने ग़रीब दक्षिणपूर्व एशियाई देश के सामने घुटने टेक दिए?
यहाँ दो विशेषज्ञ आम तौर पर माने जाने वाले सबसे प्रमुख कारणों पर रोशनी डाल रहे हैं.

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ये बहुत विशाल मिशन था
दुनिया के दूसरे छोर पर युद्ध लड़ना निश्चित तौर पर एक बहुत बड़ी कार्य योजना थी. युद्ध के चरम पर अमेरिका के वियतनाम में 5 लाख से ज़्यादा सैनिक थे.
इस युद्ध का ख़र्च हैरतअंगेज़ था. 2008 में अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि युद्ध पर कुल 686 अरब डॉलर खर्च हुआ था, जो आज के वक़्त 950 अरब डॉलर से ज़्यादा है.
लेकिन इससे पहले अमेरिका ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इससे चार गुना से ज़्यादा खर्च किया और जीता. उसने ठीक पहले कोरिया जैसे दूरस्थ देश में लड़ाई की थी, इसलिए उसके आत्मविश्वास में कोई कमी नहीं थी.
ब्रिटेन में सेंट एंड्रयूज यूनिवर्सिटी में अमेरिकी विदेश और रक्षा नीति के विशेषज्ञ डॉ ल्यूक मिडुप कहते हैं कि युद्ध के शुरुआती सालों में आशावादिता की सामान्य भावना थी.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "कई चीजों में ये भी एक अजीब चीज थी जो पूरे वियतनाम युद्ध के दौरान बनी रही."
वो कहते हैं, "अमेरिका कई समस्याओं से पूरी तरह वाकिफ़ था. इस बारे में काफ़ी आशंका थी कि क्या अमेरिकी सेना इस माहौल में काम कर सकती है और फिर भी 1968 तक अमेरिकी सरकार को भरोसा था कि अंत में जीत उसी की होगी."
यह दृढ़ विश्वास जल्द ही कम होने लगा. ख़ासकर जनवरी 1968 में कम्युनिस्ट टेट के आक्रमण ने काफ़ी क्षति पहुंचाई और अंततः युद्ध के ख़र्च के लिए कांग्रेस के समर्थन की कमी ने 1973 में अमेरिकी सैनिकों को वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया.
हालांकि, डॉ मिडडुप सवाल करते हैं कि क्या अमेरिकी लड़ाकू सैनिकों को वियतनाम में होना चाहिए था, ऐसा ही मत एक दूसरे विशेषज्ञ, अमेरिका में ओरेगॉन विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रोफेसर तुओंग वु का है.

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अमेरिकी सेना ऐसी लड़ाई के लिए अनुपयुक्त थी
हॉलीवुड फ़िल्में अक्सर युवा अमेरिकी सैनिकों को जंगल के वातावरण में संघर्ष करते हुए दिखाती हैं, जबकि वियतकांग के विद्रोही औचक हमले के लिए घनी झाड़ियों में चतुराई से रास्ता ढूंढ लेते हैं.
डॉ मिडडुप कहते हैं, "किसी भी विशाल सेना को ऐसे वातावरण में लड़ने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है, जिसमें अमेरिकी सैनिकों को लड़ने के लिए कहा जा रहा था. ये ऐसी जगह थी, जैसे दक्षिण पूर्व एशिया में कहीं भी आपको सबसे घने जंगल मिलते हैं."
लेकिन, वे कहते हैं, दोनों पक्षों के बीच क्षमता में अंतर थोड़ा बढ़ा चढ़ा कर हो सकता है.
वे कहते हैं, "एक मिथक ये है कि जिन हालात के लिए उत्तर वियतनामी सेना और वियतकांग के लड़ाके आदी थे वैसे माहौल से अमेरिकी सेना निपट नहीं सकती थी, ये वास्तव में यह सच नहीं है."
"उत्तरी वियतनामी सेना और वियतकांग को भी उस माहौल में लड़ने के लिए काफ़ी संघर्ष करना पड़ा."
डॉ मिडडुप के मुताबिक़, यह ज़्यादा महत्वपूर्ण बात थी है कि विद्रोही अपनी लड़ाई का समय और जगह चुन सकते थे और वे लाओस और कंबोडिया में सीमा पार पीछे हटने में सक्षम थे. जहां पीछा करने वाली अमेरिकी सेना को जाने की इजाज़त नहीं थी.
प्रो वु के लिए, अमेरिकियों का ध्यान वियतकांग गुरिल्लाओं से लड़ने पर अधिक था, जिसके कारण हार हुई.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "दक्षिणी इलाके के विद्रोही कभी भी साइगॉन को नहीं हरा सकते थे."

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अमेरिका घर में ही युद्ध हार गया
इस संघर्ष को अक्सर "पहला टेलीविजन युद्ध" कहा जाता है और इस युद्ध के दौरान मीडिया कवरेज अभूतपूर्व थी.
यूएस नेशनल आर्काइव्स का अनुमान है कि 1966 तक 93% अमेरिकी परिवारों के पास टीवी सेट थे और वे जो फ़ुटेज देख रहे थे वो कम सेंसर किए गए होते थे और पिछले संघर्षों की तुलना में ज़्यादा तत्काल था.
यही कारण है कि पतझड़ के दौरान साइगॉन पर हमले में अमेरिकी दूतावास परिसर के आसपास लड़ाई के फ़ुटेज इतने शक्तिशाली थे.
दर्शकों ने बहुत निकट और रियल टाइम में देखा कि वियतकांग लड़ाकों ने संघर्ष को दक्षिणी सरकार के सीधे घर में और साथ ही अमेरिकी जनता के बेडरूम में ला दिया.
लेकिन 1968 के बाद टीवी कवरेज आम तौर पर तक युद्ध के लिए प्रतिकूल हो गया. अख़बारों में और टीवी पर निर्दोष नागरिकों के मारे जाने, घायल होने और टॉर्चर की तस्वीरें दिखाई जाती थीं.
इन तस्वीरों से अमेरिकी नागरिक विचलित थे और वे युद्ध के ख़िलाफ़ हो गए. देश भर में युद्ध विरोधी विशाल आयोजन फूट पड़े.

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चार मई 1970 को ऐसे ही एक प्रदर्शन में ओहायो में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे केंट स्टेट यूनिवर्सिटी के चार छात्रों को नेशनल गार्ड्समैन ने गोली मार दी थी.
"केंट सरकारी नरसंहार" ने और अधिक लोगों को युद्ध के ख़िलाफ़ खड़ा कर दिया.
4 मई 1970 को ऐसे ही एक प्रदर्शन में ओहियो में केंट स्टेट यूनिवर्सिटी में चार शांतिपूर्ण छात्र प्रदर्शनकारियों को नेशनल गार्ड्समैन ने गोली मार दी थी.
"केंट राज्य नरसंहार" ने और अधिक लोगों को युद्ध के ख़िलाफ़ खड़ा कर दिया.
नवयुकों की अलोकप्रिय भर्ती ने भी जनता के मनोबल पर बहुत असर किया, साथ ही वियतनाम से अमेरिकी सैनिकों के ताबूतों की तस्वीरों ने भी यही काम किया. इस युद्ध में 58,000 अमेरिकी मारे गए या लापता हो गये.
प्रो वु कहते हैं कि यह उत्तर वियतनामी सैनिकों के लिए सबसे बढ़त वाली बात थीः भले ही उनका नुकसान कहीं ज़्यादा था. उनके अधिनायकवादी राज्य का मीडिया पर पूरा नियंत्रण था और सूचना पर एकाधिकार था.
वे कहते हैं, "अमेरिका और दक्षिण वियतनाम में जनता की राय को उस हद तक आकार देने की क्षमता और इच्छा नहीं थी, जितनी कम्युनिस्ट कर सकते थे."
"उन्होंने सीमा को बंद कर दिया और असंतोष को दबा दिया. जो भी युद्ध से असहमत थे उन्हें जेल भेज दिया गया."

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अमेरिका दक्षिणी वियतनाम में भी हारा दिल और ज़हन जीतने की जंग
ये एक बेहद क्रूर संघर्ष था जिसमें अमेरिका ने कई भयानक हथियारों का इस्तेमाल किया था. इनमें नापाम और एजेंट ऑरेंज का प्रयोग शामिल है.
नापलम एक ज्वलनशील पेट्रोकैमिकल पदार्थ होता है जो 2700 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर जलता है. और किसी भी चीज़ के संपर्क में आने पर उससे चिपक जाता है.
वहीं, एजेंट ऑरेंज एक ऐसा रसायन था जिसका इस्तेमाल जंगलों को नष्ट करने में किया गया. लेकिन इसने वियतनामी खेतों में खड़ी फसल भी नष्ट कर दी जिसकी वजह से स्थानीय लोगों को भुखमरी का सामना करना पड़ा.
इन दोनों चीजों के इस्तेमाल ने वियतनाम की ग्रामीण जनता के मन में अमेरिका की नकारात्मक छवि गढ़ने में एक भूमिका निभाई.
अमेरिकी सेना के 'सर्च एंड डिस्ट्रॉय' अभियानों में अनगिनत निर्दोष नागरिकों की जान गयी.
इनमें साल 1968 का माई लाइ नरसंहार शामिल है जिसमें अमेरिकी सैनिकों ने सैकड़ों वियतनामी नागरिकों को मार दिया गया था.
आम नागरिकों की मौत होने से स्थानीय आबादी अलग-थलग पड़ गयी जो असल में वियत कॉन्ग का समर्थन करने के पक्ष में नहीं थी.
डॉ मिडप कहते हैं, "दक्षिण वियतनाम की ज़्यादातर आबादी वामपंथ के प्रति समर्पित नहीं थी. ज़्यादातर लोग किसी तरह अपना जीवन गुजर-बसर करते हुए युद्ध से बचना चाहते थे."
प्रोफेसर वू मानते हैं कि अमेरिका आम लोगों के दिलों और ज़हन में जगह बनाने में कामयाब नहीं रहा.
वह कहते हैं, "विदेशी सेना के लिए आम लोगों को ख़ुश करना हमेशा मुश्किल-भरा होता है. ये सोचना भी स्वाभाविक है कि विदेशी सेना आम लोगों के स्नेह का पात्र नहीं होगी."

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ऊंचा था वामपंथियों का मनोबल
डॉ मिडप मानते हैं कि दक्षिण वियतनाम की ओर से लड़ने के लिए भर्ती किए गए लोगों की अपेक्षा वामपंथी गुट के लिए लड़ने वाले युद्ध जीतने के प्रति ज़्यादा समर्पित थे.
वह कहते हैं, "अमेरिका की ओर से युद्ध के दौरान किए गए अध्ययनों में सामने आया है कि अमेरिका ने भारी संख्या में वामपंथी कैदियों से (कठोरता से) पूछताछ की थी."
"अमेरिकी रक्षा विभाग के साथ-साथ अमेरिकी सेना से जुड़े थिंक टैंक रैंड कॉरपोरेशन ने इन अध्ययनों के ज़रिए ये समझना चाहा कि उत्तरी वियतनामी लोगों और वियत कॉन्ग के लोगों ने संघर्ष क्यों किया. वे सभी इस नतीज़े पर पहुंचे कि इन लोगों (उत्तरी वियतनामी) को लगा कि वह जो काम कर रहे हैं, वह देशभक्ति है. सरल शब्दों में कहें तो देश का एक सरकार के अंतर्गत एकीकरण किया जाना."
वामपंथी ताक़तों ने जिस तरह भारी संख्या में सैनिकों के मारे जाने के बावजूद अपना संघर्ष जारी रखा, वो उनके मजबूत मनोबल का सबूत है.
अमेरिकी नेतृत्व इस युद्ध के दौरान ज़्यादा से ज़्यादा सैनिकों को मारने पर आमादा था. अमेरिकी नेतृत्व को लगता था कि अगर वे अपने शत्रु को तेजी से मार सके तो वामपंथियों का मनोबल टूट जाएगा.
इस युद्ध के दौरान 11 लाख उत्तर वियतनामी और वियत कॉन्ग लड़ाके मारे गए थे. इसके बाद भी वामपंथी युद्ध के आख़िर तक युद्ध क्षेत्र मे डटे रहे.
प्रोफेसर वू इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हैं कि उत्तरी वियतनाम का मनोबल मजबूत था या नहीं. लेकिन वे ये मानते हैं कि उत्तरी वियतनामी सैनिकों के ज़हन में जो कुछ भरा गया, उससे वे ख़तरनाक हो गए थे.
वे कहते हैं, "वे लोगों को इस उद्देश्य में भरोसा दिलाने में कामयाब थे. दुष्प्रचार और अपनी शिक्षा व्यवस्था से वे लोगों को गोलियों जितना घातक बना पाए."

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अलोकप्रिय और भ्रष्ट थी दक्षिण वियतनामी सरकार
डॉ मिडप मानते हैं कि दक्षिण वियतनाम के सामने सबसे बड़ी समस्या साख में कमी और पूर्व औपनिवेशिक ताक़त के साथ संबंध होना थी.
वह कहते हैं, "उत्तर और दक्षिण वियतनाम के बीच बंटवारा हमेशा कृत्रिम था जो कि शीत युद्ध की वजह से हुआ था. वियतनाम को दो भागों में बांटने के लिए कोई सांस्कृतिक, नस्लीय और भाषाई वजह आधार नहीं थी."
वह मानते हैं कि दक्षिण वियतनाम में रहने वाली आबादी में ज़्यादातर लोग ईसाई धर्म को मानने वाले थे.
हालांकि, पूरी वियतनामी आबादी में इस समूह की हिस्सेदारी सिर्फ़ 10 से 15 फीसद थी. उत्तरी वियतनाम से कई लोग अपने ख़िलाफ़ कार्रवाई होने के डर से दक्षिण वियतनाम भाग गए थे जिससे दक्षिण वियतनामी राजनीति में 'क्रिटिकल मास' की स्थिति पैदा हो गयी.
समाजशास्त्र में क्रिटिकल मास से आशय उस स्थिति से है जिसमें किसी एक क्षेत्र विशेष में ज़्यादातर लोगों के एक तरह के विचार में यकीन करने से वह विचार असलियत में बदलने लगता है.
दक्षिण वियतनाम के पहले राष्ट्रपति एंगो दिन्ह दिएम के अमेरिका में शक्तिशाली कैथॉलिक दोस्त थे जिनमें अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ़ केनेडी जैसे शख़्स भी शामिल थे.
मिदप कहते हैं, "धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक समूह के प्रभुत्व ने दक्षिण वियतनामी सरकार को वियतनाम की व्यापक आबादी के बीच अलोकप्रिय बना दिया जो कि बुद्ध धर्म को मानने वाली थी."
वह मानते हैं कि इस वजह से दक्षिण वियतनाम सरकार के सामने वैधता का संकट खड़ा हो गया. क्योंकि ज़्यादातर वियतनामी लोग इस सरकार को एक विदेशी सरकार मानते हैं जो फ्रांसीसी राज की विरासत जैसी थी. क्योंकि ज़्यादातर कैथोलिक लोगों ने फ्रांस की तरफ़ से युद्ध लड़ा था.
मिडप बताते हैं, "अमेरिका के पांच लाख सैनिकों की मौजूदगी इस बात को रेखांकित करती थी कि दक्षिण वियतनामी सरकार हर तरह से विदेशियों पर निर्भर है. दक्षिण वियतनाम कभी भी ऐसा राजनीतिक सपना नहीं था जिसकी ख़ातिर लड़ने के लिए ज़्यादा लोगों को तैयार किया जा सके."
वह कहते हैं कि ये बात एक प्रश्न खड़ा करती है कि क्या अमेरिकी सैनिकों को एक ऐसी सरकार खड़ी करने के लिए भेजा जाना चाहिए था जिसमें भ्रष्टाचार चरम पर था.
वह कहते हैं, "अपनी शुरुआत से लेकर अंत तक रिपब्लिक ऑफ़ वियतनाम एक बेहद भ्रष्ट राज्य रहा जहां 1960 से 1975 के बीच अमेरिका से भेजी गयी भारी आर्थिक मदद से भ्रष्टाचार ने नयी ऊंचाईंयों को छुआ. इसने दक्षिण वियतनामी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह बर्बाद कर दिया.
इसका मतलब ये था कि चाहें सेना या नागरिक सरकार से जुड़ा पद हो, रिश्वत दिए बग़ैर उसे हासिल करना संभव नहीं था."
मिडप मानते हैं कि इसने सशस्त्र बलों पर गहरा असर डाला.
वह कहते हैं, "इसके चलते अमेरिका कभी भी एक सक्षम और भरोसेमंद दक्षिण वियतनामी सेना तैयार नहीं कर सकी. ऐसे में ये होना तय था और अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने कहा भी था कि भविष्य में जब भी अमेरिकी सैनिक वियतनाम छोड़ेंगे तो दक्षिण वियतनाम राज्य ख़त्म हो जाएगा."

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अमेरिका और दक्षिण वियतनाम की मजबूरियां
प्रोफेसर वू का मानना है कि दक्षिण वियतनाम सरकार की हार निश्चित नहीं थी और अमेरिकी विशेषज्ञ वियतनाम को लेकर बहाने तलाशते हैं.
वे कहते हैं, "वे इस नुकसान के लिए किसी को आरोपी ठहराना चाहते हैं. और इसके लिए दक्षिण वियतनाम को आरोपी ठहराना सबसे आसान है."
इसके साथ ही उन्होंने बताया कि अमेरिकी रिपोर्ट्स में कैथॉलिक धर्म को मानने वालों के भ्रष्टाचार और फेवरेटिज़्म की आलोचना बढ़ा-चढ़ाकर की गयी है.

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वह तर्क देते हुए कहते हैं कि 'भ्रष्टाचार काफ़ी ज़्यादा था. लेकिन इतना ज़्यादा नहीं था कि युद्ध की वजह बन जाए. भ्रष्टाचार ने कई अक्षमताओं और अप्रभावी सैन्य इकाइयों को जन्म दिया लेकिन व्यापक रूप से देखें तो दक्षिण वियतनामी सेना काफ़ी अच्छे ढंग से लड़ी.'
ऐसे में प्रोफेसर वू मानते हैं कि दक्षिण वियतनामी सेना के लिए अच्छा ये रहता कि वह अपने दम पर अमेरिकी हथियारों और पैसे से जंग लड़ती. इस जंग में दक्षिण वियतनामी सेना ने दो से ढाई लाख सैनिकों की मौत हुई थी.
प्रोफेसर वू मानते हैं कि उत्तर वियतनाम की ओर से बेहद लंबे समय तक युद्ध में बने रहने की क्षमता ने निर्णायक भूमिका अदा की.
क्योंकि दक्षिणी वियतनाम की उदारवादी सरकार लंबे समय तक ऐसा नहीं कर सकी.

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ये राजनीतिक ढांचा कुछ ऐसा था कि लोगों को युद्ध में भरोसा था लेकिन उन्हें हताहतों की संख्या आदि के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं पता था.
वू कहते हैं, "अमेरिका और दक्षिण वियतनाम आम राय को उस तरह आकार देने में सक्षम नहीं हुई जिस तरह वामपंथी नहीं दे सके."
वह कहते हैं, "भारी संख्या में लोगों के मारे जाने के बाद भी वे नए सैनिक खड़े कर सके.", जिसका मतलब ये है कि उत्तर के पास आत्मघाती हमले करने की सुविधा थी, लेकिन दक्षिण के पास नहीं थी."
इसके साथ ही वह कहते हैं कि उत्तर वियतनाम को सोवियत संघ और चीन से मिलने वाले आर्थिक और सैन्य समर्थन में कमी नहीं आई जिसका सामना दक्षिण वियतनाम को करना पड़ा.
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