रूस भारत और पाकिस्तान को एक साथ क्यों साधने में लगा है?

    • Author, इक़बाल अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत में रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव ने कहा है कि उनका देश पाकिस्तान के साथ अपनी आर्थिक भागीदारी बढ़ाना चाहता है, क्योंकि उसका मानना है कि एक 'कमज़ोर' पाकिस्तान, भारत और अफ़ग़ानिस्तान समेत क्षेत्र में किसी के हित में नहीं होगा.

1993 में भारत और रूस की दोस्ती समझौते की 30वीं वर्षगांठ पर इंडिया राइट नेटवर्क और सेंटर फ़ॉर ग्लोबल इंडिया इनसाइट्स नामक संस्था ने सोमवार को दिल्ली में एक सम्मेलन आयोजित किया था.

इस सम्मेलन का विषय था, 'भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी में अगले क़दम: ओल्ड फ़्रेन्ड्स न्यू होराइज़न'

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार इसी सम्मेलन को संबोधित करते हुए राजदूत डेनिस अलीपोव ने भारत और पाकिस्तान के बारे में कई अहम बातें कहीं.

बाद में उन्होंने ट्वीट कर यह स्पष्ट किया कि उनके कहने का असल मतलब यह था कि अस्थिर पाकिस्तान इस क्षेत्र के किसी भी देश के हित में नहीं है.

उन्होंने आगे कहा कि भारत-विरोधी एक मज़बूत पाकिस्तान भी किसी के हित में और ख़ासकर भारत के हित में नहीं है.

डेनिस अलीपोव को जनवरी 2022 में रूस ने अपना राजदूत बनाकर भारत भेजा था.

वे राजनयिक रहे हैं और उनके पास भारत का इतना अनुभव है कि उन्हें 'समर्पित भारत विशेषज्ञ' माना जाता है.

पाकिस्तान के साथ रूस के संबंधों में सुधार को लेकर भारत की चिंताओं का जवाब देते हुए अलीपोव ने कहा कि उनका देश कभी भी ऐसा कुछ नहीं करेगा, जो भारत के हितों के लिए हानिकारक हों.

उन्होंने कहा, "हम लगातार कहते रहे हैं कि हम पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों में कभी भी भारत के लिए नुक़सान पहुँचाने वाला कुछ नहीं करेंगे. इस्लामाबाद के साथ हमारे सीमित रक्षा संबंध हैं. लेकिन यह बहुत सीमित हैं और आतंकवाद विरोधी उद्देश्यों के लिए निर्देशित हैं."

राजदूत अलीपोव के बयान के बाद लोगों ने अलग-अलग तरह से प्रतिक्रियाएँ दी हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि उनके बयान को कैसे समझा और उसका विश्लेषण कैसे किया जाए.

'बयान के कुछ ख़ास मायने नहीं'

दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में रूसी और मध्य एशिया अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर संजय पांडे कहते हैं कि रूसी राजदूत के बयान के कुछ ख़ास मायने नहीं निकाले जाने चाहिए.

बीबीसी से बातचीत में प्रोफ़ेसर पांडे ने कहा कि रूस और पाकिस्तान के रिश्ते नए नहीं हैं, इसका एक लंबा इतिहास रहा है.

प्रोफ़ेसर पांडे कहते हैं, "साल 1949 में तत्कालीन सोवियत संघ ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को रूस आने का न्यौता दिया था. 1965 के ताशकंद समझौते में भी रूस की भूमिका को पूरी तरह से भारत के पक्ष में नहीं कहा जा सकता है. 90 के दशक में रूस ने पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने की कोशिश की थी. 2015-16 के बाद से रूस और पाकिस्तान एक दूसरे के और क़रीब आए हैं."

उनके अनुसार 2016 से रूस और पाकिस्तान के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास हो रहा है, 2022 में समरकंद में हुए एससीओ बैठक के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की मुलाक़ात हुई थी और फ़रवरी 2022 में जिस दिन रूस ने यूक्रेन पर हमला किया उस दिन भी पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान रूस में ही थे.

'रूस संदेश देना चाहता है'

लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और ओआरएफ़ से जुड़े प्रोफ़ेसर हर्ष पंत कहते हैं कि राजदूत अलीपोव के बयान के ज़रिए रूस भारत को एक संदेश देना चाहता है.

बीबीसी से बातचीत करते हुए प्रोफ़ेसर हर्ष पंत कहते हैं, "रूस भारत को यह संदेश देना चाहता है कि भारत अगर रूस के हितों का ध्यान नहीं रखता है तो रूस के पास भी पाकिस्तान से संबंधों को आगे बढ़ाने का विकल्प है."

रूस और भारत के संबंध बहुत ही ख़ास रहे हैं और रूस भारत को केंद्र में रखकर दक्षिण एशिया में अपनी विदेश नीति तय करता है.

लेकिन क्या इस तरह का ब्यान इशारा करता है कि रूस दक्षिण एशिया में अपनी विदेश नीति को बदलने पर विचार कर रहा है?

और अगर रूस ऐसा सोच रहा है तो पाकिस्तान और रूस के पास ऐसा क्या है, जो दोनों एक दूसरे को दे सकते हैं?

प्रोफ़ेसर संजय पांडे का कहना है कि रूस और पाकिस्तान के संबंधों की विडंबना यही है कि दोनों के पास एक दूसरे को देने के लिए कुछ नहीं है.

भारत के साथ सामरिक और रक्षा संबंधों के कारण रूस के रक्षा उद्योग को हर साल अरबों डॉलर की कमाई होती है, लेकिन पाकिस्तान के पास तो इतने पैसे भी नहीं हैं कि वो रूस से आधुनिक हथियार ख़रीद सके.

प्रोफ़ेसर हर्ष पंत का भी मानना है कि पाकिस्तान की स्थिति इस समय इतनी ख़राब है कि वो ना तो आर्थिक तौर पर किसी का पार्टनर बनने के क़ाबिल है ना वो आपकी रक्षा नीति के बदलाव में कोई मदद कर सकता है.

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रूस को अलग-थलग करने की कोशिश

तो फिर रूस पाकिस्तान की तरफ़ बढ़ने की कोशिश क्यों करेगा?

इसका जवाब देते हुए प्रोफ़ेसर संजय पांडे कहते हैं कि अमेरिका और पश्चिमी देश रूस को अलग-थलग करने में लगे हैं, ऐसे में रूस अफ़्रीक़ा समेत कई देशों से अपने संबंधों को बेहतर करने की कोशिश कर रहा है और पाकिस्तान तो फिर भी उसके पड़ोस में है और एक महत्वपूर्ण देश है.

प्रोफ़ेसर हर्ष पंत के अनुसार रूस और पाकिस्तान का क़रीब आना उतनी बड़ी बात नहीं है लेकिन रूस, पाकिस्तान और चीन एक दूसरे के क़रीब आते हैं और किसी तरह का एक गुट बनाते हैं तो यह एक महत्वूपर्ण घटना होगी.

प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं कि शीत युद्ध के समय अमेरिका-चीन-पाकिस्तान का गठजोड़ भारत के लिए परेशानी की वजह थी, जबकि रूस भारत का सबसे क़रीबी साथी था. लेकिन अब अगर रूस, चीन और पाकिस्तान मिलते हैं तो भारत के लिए यह चिंता का विषय होगा.

भारत की चिंता

प्रोफ़ेसर पंत के अनुसार हाल के वर्षों में भारत की विदेश नीति की सफलता रही है कि उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को पूरी तरह से हाशिए पर ला दिया है लेकिन अगर रूस, चीन और पाकिस्तान साथ आते हैं तो भारत की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है.

उनके अनुसार रूस के ज़रिए भारत तालिबान पर दबाव डालने में सफल रहा है कि वो चरमपंथ को भारत की तरफ़ मुड़ने से रोके.

लेकिन अगर रूस और पाकिस्तान की दोस्ती बढ़ती है, तो अफ़ग़ानिस्तान और सेंट्रल एशिया में सक्रिय चरमपंथी संगठनों का रुख़ भारत की ओर होने का ख़तरा बना रहेगा.

लेकिन प्रोफ़ेसर संजय पांडे कहते हैं कि यह ज़्यादा चिंता का विषय नहीं है क्योंकि पिछले कुछ सालों से अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर रूस, चीन और पाकिस्तान कई बार एक साथ आए हैं.

एक सवाल यह भी पैदा होता है कि पाकिस्तान क्या अमेरिका के साथ अपने ऐतिसाहिक रिश्ते को नकारते हुए पूरी तरह रूस और चीन के ख़ेमे में जाने की हिम्मत करेगा?

प्रोफ़ेसर संजय पांडे के अनुसार पाकिस्तान इतनी हिम्मत नहीं कर सकता है, क्योंकि पाकिस्तान को इस समय सबसे ज़्यादा ज़रूरत पैसों की है और वो आईएमएफ़ का दरवाज़ा खटखटा रहा है.

आईएमएफ़ से क़र्ज़ लेने के लिए पाकिस्तान को अमेरिका और पश्चिमी देशों की मदद की ज़रूरत है, इस मामले में उसका पुराना दोस्त चीन भी बहुत ज़्यादा मदद नहीं कर सकता है और रूस तो कुछ भी नहीं कर सकता है.

लेकिन यह भी सच है कि चीन कभी भी पाकिस्तान को रूस से पूरी तरह अलग नहीं होने देगा.

प्रोफ़ेसर हर्ष पंत भी मानते हैं कि चीन कभी भी पाकिस्तान को इतना कमज़ोर नहीं होने देगा कि भारत उस पर अपना वर्चस्व क़ायम कर सके.

ऐसे में भारत के लिए सबसे बेहतर रणनीति क्या होगी?

प्रोफ़ेसर संजय पांडे के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में और ख़ासकर यूक्रेन युद्ध के बाद बहुत सारे देश एक दूसरे के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं और रूस भी वही संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है.

उनके अनुसार रूस भारत के साथ अपने संबंधों के महत्व को समझता है, लेकिन इसके साथ ही वो पाकिस्तान को पूरी तरह छोड़ना भी नहीं चाहेगा.

प्रोफ़ेसर संजय पांडे कहते हैं कि हथियार सप्लाई के मामले में भारत को रूस जैसा भरोसेमंद साथी मिलना मुमकिन नहीं है, जो तकनीक ट्रांसफ़र भी करे और संयुक्त प्रोडक्शन भी करे.

इसके अलावा भारत कभी नहीं चाहेगा कि रूस से किसी तरह की दूरी बने और वो पूरी तरह चीन के ख़ेमे में चला जाए.

प्रोफ़ेसर संजय कहते हैं कि यूक्रेन मामले में वियतनाम, सऊदी अरब और यूएई समेत कई देश पश्चिमी देशों और रूस के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाए हुए हैं.

उनके अनुसार फ़िलहाल भारत भी इसी तरह अपने संबंधों में संतुलन बनाए रखेगा.

प्रोफ़ेसर संजय पांडे कहते हैं, "भारत यूक्रेन को लेकर रूस के ख़िलाफ़ नहीं जाएगा, लेकिन अन्य कई मसलों पर अमेरिका और पश्चिम के साथ भारत अपने संबंधों को आगे बढ़ाता रहेगा."

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