पाकिस्तान: रूस से तेल ख़रीदने को लेकर क्यों भिड़े शरीफ़ सरकार के दो मंत्री

    • Author, इक़बाल अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

तारीख़: 05 दिसंबर, जगह: इस्लामाबाद

"मैं अवाम को मुबारक़बाद देना चाहता हूं कि हमारा रूस का दौरा हमारी उम्मीदों से ज़्यादा कामयाब रहा. रूस ने यह फ़ैसला किया है कि वो हमें डिस्काउंट पर कच्चा तेल देगा. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो डिस्काउंट चल रहा है, बिल्कुल उसी तरह या उससे भी कम क़ीमत पर पाकिस्तान को कच्चा तेल मिलेगा. रूस पाकिस्तान को पेट्रोल और डीज़ल भी कम क़ीमत पर देगा. प्राइवेट सेक्टर सेलिक्वीफ़ाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) के नए सरकारी कारख़ानों के साथ लॉन्ग टर्म कॉन्ट्रैक्ट के लिए बातचीत शुरू होगी."

यह कहना था पाकिस्तान के पेट्रोलियम मंत्री मुसद्दिक़ मलिक का. मुसद्दिक़ मलिक एक प्रतिनिधिमंडल के साथ 29 नवंबर से रूस के तीन दिवसीय दौरे पर गए थे. रूस से लौटने के बाद पांच दिसंबर को इस्लामाबाद में पत्रकारों से बात करते हुए मुसद्दिक़ मलिक ने यह बातें कहीं थीं.

तारीख़: 15 दिसंबर, जगह: न्यूयॉर्क

"हम रूस से सस्ते दामों पर पेट्रोलियम पदार्थ न तो हासिल कर रहे हैं और न ही ऐसी कोई कोशिश की जा रही है. पाकिस्तान एक कठिन आर्थिक स्थिति और मुद्रास्फ़ीति का सामना कर रहा है जिसमें ऊर्जा क्षेत्र भी असुरक्षित है और इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए विभिन्न तरीक़ों पर विचार किया जा रहा है. पाकिस्तान को रूस से मिलने वाली किसी भी तरह की ऊर्जा को इस्तेमाल करने लायक़ बनाने के लिए समय चाहिए होगा."

पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ने न्यूयॉर्क में यह बातें कहीं. वो इन दिनों संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में शामिल होने के लिए अमेरिका में हैं. इसी दौरान अमेरिकी समाचार एजेंसी पीबीएस को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने यह बातें कहीं.

तारीख़: 16 दिसंबर, जगह: इस्लामाबाद

"रूस से सस्ता तेल लेने का मामला आगे बढ़ रहा है. वहां से सस्ते दामों पर हमें कच्चा तेल मिलेगा. उम्मीद है रूस हमें पेट्रोल और डीज़ल भी सस्ते दामों पर देगा. हमारा फ़र्ज़ है कि हम विदेश मंत्रालय को विश्वास में लें ताकि तेल की ख़रीदारी के मामले में किसी तरह का असमंजस ना रहे."

पाकिस्तान की शहबाज़ शरीफ़ सरकार के पेट्रोलियम मंत्री मुसद्दिक़ मलिक ने शुक्रवार को इस्लामाबाद में प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर बिलावल भुट्टो के बयान को ख़ारिज कर दिया.

हालांकि उन्होंने यह ज़रूर कहा कि बिलावल भुट्टो की बात इस हद तक सही है कि फ़िलहाल रूस से तेल ख़रीदने पर कोई समझौता नहीं हुआ है. उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान की रिफ़ाइनरी के पास ऐसी तकनीकी क्षमता है कि वो रूस के तेल को प्रोसेस कर सकती है.

अब सवाल यह उठता है कि सिर्फ़ दस दिनों के अंदर ऐसा क्या हो गया. बिलावल भुट्टो ने पहले मुसद्दिक़ मलिक की बात को ख़ारिज किया और फिर 24 घंटे के अंदर ही पेट्रोलियम मंत्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो के बयान को सिरे से ख़ारिज कर दिया.

लेकिन इस बात को समझने के लिए ज़रूरी है कि तेल से जुड़ी कुछ और बातें समझ ली जाएं.

तेल के बारे में बहुत से लोगों को लगता है कि ज़मीन से हम जो भी तेल निकालते हैं वो सभी एक ही तरह के होते हैं. लेकिन सच्चाई ऐसी नहीं है.

मोटे तौर पर कहा जाए तो ज़मीन से निकलने वाला कच्चा तेल तीन तरह का होता है और उन्हें गाढ़ापन (Viscosity), वाष्पशीलता (Volatility) और ज़हरीलापन (Toxicity) के आधार पर बांटा जा सकता है.

गाढ़ापन यानी तेल कितना हल्का या भारी है. जिसकी विस्कोसिटी ज़्यादा होती है उसको निकालने में ज़्यादा उर्जा की ज़रूरत होती है. वाष्पशीलता यानी तेल कितनी जल्दी और किस मात्रा में भाप बनकर नष्ट हो जाता है. अगर तेल ज़्यादा वाष्पशील है तो तेल निकालने के समय उसपर और ज़्यादा उपकरण की ज़रूरत होती है जिससे ख़र्च बढ़ता है.

तीसरा पैमाना होता है कि तेल कितना ख़तरनाक और ज़हरीला है और इसको निकालने या रिफ़ाइन करते समय इससे पर्यावरण को कितना नुक़सान पहुंचता है.

इन्हीं को ध्यान में रखते हुए सरकार या निजी कंपनियां तेल रिफ़ाइनरी बनाती हैं.

अब बात करते हैं रूस के कच्चे तेल की.

जब पाकिस्तान ने रूस से तेल ख़रीदने पर विचार करना शुरू किया तो उसने अपने स्थानीय रिफ़ाइनरी से इस बात की जानकारी मांगी कि क्या रूस से तेल ख़रीदना तकनीकी और वित्तीय तौर पर सही रहेगा.

इसी साल जून में उर्जा मंत्रालय ने चार रिफ़ाइनरी के महानिदेशकों को एक ख़त लिखा था और इसका गहराई से अध्ययन कर अपनी सिफ़ारिश भेजने को कहा था.

उन्होंने मंत्रालय को दिए अपने जवाब में कहा था कि रूस से आयातित कुछ कच्चे तेल को प्रोसेस तो किया जा सकता है लेकिन उससे मशीनों के ख़राब होने का ख़तरा है.

रूस में कई तरह का कच्चा तेल मिलता है. पाकिस्तान में जो ज़्यादातर रिफ़ाइनरी हैं वो अरब देशों के हलके तेलों को प्रोसेस करने में सक्षम हैं इसलिए अगर रूस से कच्चा तेल आयात करना है तो फिर हलके क़िस्म के तेल आयात किए जा सकते हैं.

उस रिपोर्ट में रिफ़ाइनरी ने पेमेंट का मुद्दा भी उठाया था. यूक्रेन पर हमले के कारण पश्चिमी देशों ने रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए हैं. चीन और भारत के पास रूस से तेल आयात करने की क्षमता है क्योंकि यह दोनों अपने यहां से कई तरह के उत्पाद रूस को निर्यात करते हैं और फिर इन दोनों देशों का रूस के साथ करेंसी बदलने का भी प्रावधान है.

लेकिन पाकिस्तान के पास ऐसी कोई सुविधा नहीं है.

तेल के आयात में आने वाला ख़र्च भी एक अहम मुद्दा था. मध्य पूर्व के देशों से पाकिस्तान को कच्चा तेल आयात करने में एक से डेढ़ डॉलर प्रति बैरल ख़र्च होता है जबकि रूस से तेल आयात करने में पाकिस्तान को आठ डॉलर प्रति बैरल ख़र्च करना होगा.

इसलिए अगर रूस दाम में कटौती करता है तो भी इसको लाने में होने वाला ख़र्च उसको बराबर कर देगा.

पाकिस्तान के ट्रेड डेवेलपमेन्ट ऑथोरिटी के अनुसार फिलहाल पाकिस्तान यूएई से 56 फ़ीसद, सऊदी अरब से 34 फ़ीसद और क़ुवैत से चार फ़ीसद कच्चा तेल खरीदता है.

उसी तरह पाकिस्तान यूएई से 52 फ़ीसद, क़ुवैत से 16 फ़ीसद और ओमान से 6.6 फ़ीसद रिफ़ाइन्ड पेट्रोलियम पदार्थ का आयात करता है.

पाकिस्तान के ऊर्जा मंत्रालय के पास यह रिपोर्ट पहले से थी तो फिर सवाल उठता है कि पेट्रोलियम मंत्री ने रूस से तेल ख़रीदने की बात क्यों की.

पाकिस्तान की राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर नज़र रखने वाली विश्लेषक हुमा बक़ाई कहती हैं कि इसकी वजह पाकिस्तान की अपनी राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंध दोनों है.

बीबीसी से बातचीत में वो कहती हैं, "मुसद्दिक़ मलिक रूस से लौट कर आए थे और बिलावल भुट्टो ने अमेरिका में यह बयान दिया था. इसलिए दोनों ही बयान उसी संदर्भ में दिए गए हैं."

शहबाज़ शरीफ़ की सरकार मुस्लिम लीग (नवाज़) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) समेत कुल 13 पार्टियों की गठबंधन सरकार है. हुमा के अनुसार इसमें मुस्लिम लीग और पीपीपी की आपसी खींचातानी भी साफ़तौर पर देखी जा सकती है.

हुमा कहती हैं, "मुसद्दिक़ मलिक का बयान एक लोकलुभावन बयान था क्योंकि उन पर बहुत दबाव था कि इमरान ख़ान की सरकार तो रूस से तेल लेने की बातचीत कर रही थी तो आप (शहबाज़ शरीफ़ की सरकार) क्यों नहीं कर रहे हैं."

हुमा के अनुसार इमरान ख़ान बार-बार कहते रहे हैं कि भारत अमेरिका के बहुत क़रीब होते हुए भी अपने राष्ट्रीय हित को देखते हुए रूस से सस्ती कीमत पर तेल ख़रीद रहा है. भारत ने अमेरिका के दबाव में आने से इनकार कर दिया और आख़िरकार अमेरिका को इस मुद्दे पर पीछे हटना पड़ा है.

वरिष्ठ पत्रकार अदनान आदिल का भी मानना है कि यह पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीतिक कलह का असर है.

अदनान आदिल के अनुसार बिलावल भुट्टो यह साबित करना चाह रहे हैं कि पाकिस्तान अमेरिका के ज़्यादा क़रीब है और रूस से उसका कोई वास्ता नहीं. उनके अनुसार अमेरिका भी यही चाहता है कि पाकिस्तान रूस से जितना हो सके दूर रहे.

वो कहते हैं कि मुस्लिम लीग पाकिस्तान की जनता को यह बताना चाहती है कि वो ज़्यादा राष्ट्रवादी है और तेल की क़ीमत कम करना चाहते हैं.

पाकिस्तान को पेट्रोलियम पदार्थों के आयात में लगभग 17 अरब डॉलर ख़र्च करना पड़ता है.

अदनान आदिल कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमत ख़ुद ही कम हो रही है तो पाकिस्तान को रूस से तेल ख़रीदने का कोई मतलब नहीं है. उनका कहना है कि पाकिस्तान के पास तो विदेशी मुद्रा है ही नहीं कि वो रूस से तेल ख़रीद सके.

कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि असल मामला राजनीतिक है. पाकिस्तान में कोई भी मुद्दा कभी भी वित्तीय या तकनीकी नहीं होता है.

पाकिस्तान अगर यूएई और सऊदी अरब के बजाए रूस से तेल ख़रीदता है तो इस बात की भी आशंका है कि पाकिस्तान का इन अरब देशों से संबंध ख़राब हो जाए. अदनान आदिल इस दलील को ख़ारिज करते हैं.

वो कहते हैं, "पाकिस्तान सऊदी अरब और दूसरे अरब देशों से तेल उधार ख़रीदता है, पाकिस्तान के पास विदेशी मुद्रा है ही नहीं. पाकिस्तान अगर रूस से ख़रीदेगा तो सऊदी अरब ख़ुश होगा कि उसे पाकिस्तान को कम उधार देना होगा."

उनके अनुसार,"पाकिस्तान को इस वित्तीय वर्ष में 32 अरब डॉलर का क़र्ज़ चाहिए. पाकिस्तान के पास फ़िलहाल 6.7 अरब फ़ॉरन रिज़र्व है और वो भी चीन और सऊदी अरब के रखे हुए पैसे हैं."

हुमा बक़ाई भी कहती हैं कि सऊदी अरब या अरब देशों से पाकिस्तान के रिश्ते ख़राब होने का कोई डर नहीं है. उनके अनुसार अभी हाल ही में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का सऊदी दौरा बहुत ही कामयाब रहा है.

चीन और रूस एक दूसरे के बहुत क़रीब हैं, इसलिए पाकिस्तान अगर रूस से कुछ तेल ख़रीद भी लेता है तो उससे पाकिस्तान और अरब देश के संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

उस समय मुसद्दिक़ मलिक ने यह भी कहा था कि जनवरी में रूस का एक प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान का दौरा करेगा और उस दौरान समझौते पर दस्तख़त किए जाएंगे.

अब उस दौरे का क्या होगा?

हुमा बक़ाई कहती हैं कि अब यह दौरा फ़रवरी में होगा.

इंस्टीट्यूट ऑफ़ स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ के सीनियर फ़ेलो अहमद नईम सालिक कहते हैं कि रूस और पाकिस्तान की बातचीत चल रही है और पाकिस्तान ने अमेरिका को भी इस मामले में विश्वास में ले लिया है.

अहमद नईम सालिक के अनुसार मुसद्दिक़ मलिक चाहते हैं कि इस मामले में अंतिम फ़ैसला करने का अधिकार पेट्रोलियम मंत्री को हो ना कि विदेश मंत्री को.

उनके अनुसार बिलावल भुट्टो जब पाकिस्तान लौट कर आएंगे तो कैबिनेट की बैठक में दोनों मंत्री अपनी-अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगे और उसके बाद स्थिति साफ़ होगी.

अदनान आदिल कहते हैं कि रूस का प्रतिनिधिमंडल फ़रवरी में आएगा ज़रूर और अगर वो भी उधार देने को तैयार हो जाता है तो मुमकिन है कि पाकिस्तान रूस से भी कुछ तेल ख़रीद ले क्योंकि राजनीतिक तौर पर मुस्लिम लीग को यह सूट करता है.

लेकिन हुमा बक़ाई कहती हैं कि जब तक पाकिस्तान में सियासी रस्साकशी ख़त्म नहीं होती यह सब चलता रहेगा और एक ही मामले में मंत्रियों के परस्पर विरोधी बयान चलते रहेंगे.

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