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डेनमार्क में क़ुरान जलाने की घटना, पाकिस्तान, तुर्की और रूस ने किया कड़ा विरोध
डेनमार्क में इस्लाम में पवित्र मानी जाने वाली क़ुरान जलाए जाने की घटना पर पाकिस्तान, तुर्की और रूस ने कड़ी आपत्ति दर्ज की है.
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है कि "कुछ दिन पहले इस्लामोफ़ोब (इस्लाम से डरने वाले व्यक्ति) ने स्वीडन में पवित्र क़ुरान को जलाया था. डेनमार्क में उनके क़ुरान का अपमान करने की हरकत का पाकिस्तान कड़े शब्दों में विरोध करता है. ये बेहद मूर्खतापूर्ण और आक्रामक काम है."
"बार-बार हो रहे इस घिनौने काम से दुनिया भर के मुसलमानों के मन में ये साफ़ कर दिया गया है कि धार्मिक नफरत फैलाने और हिंसा उकसाने के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार का दुरुपयोग किया जा रहा है."
विदेश मंत्रालय ने ये भी कहा कि इसके बाद उस क़ानूनी ढांचे पर सवाल पैदा होता है जिसकी आड़ लेकर इस्लामोफ़ोब बच निकलते हैं और नफ़रत फैलाना जारी रखते हैं.
मंत्रालय ने कहा "ऐसे दौर में जब सभी शांतिपूर्ण तरीके से मिलजुल कर रहने के लिए और सह-अस्तिस्व और आपसी सम्मान की ज़रूरत है, इस तरह के नफ़रत फैलाने वालों के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय आंखें नहीं मूंद सकती."
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस मामले में डेनमार्क सरकार को भी ज़िम्मेदार ठहराया कहा कि उन्होंने डेनमार्क सरकार को अपनी आपत्ति दर्ज कराई है.
बयान में मंत्रालय ने लिखा अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ-साथ देश की सरकार की भी ये ज़िम्मेदारी है कि इस तरह की नस्लीय और इस्लामोफ़ोबिक घटनाएं न हों.
समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार तुर्की ने इस मामले में शुक्रवार को अंकारा में मौजूद डेनमार्क के राजदूत को तलब किया और एक धुर दक्षिणपंथी कार्यकर्ता के क़ुरान जलने की घटना को लेकर आपत्ति जताई.
तुर्की ने इससे पहले स्वीडन और फिनलैंड को नेटो सैन्य गठबंधन में शामिल करने को मंजूरी देने से इनकार कर दिया था.
एजेंसी का कहना है कि इस्माल विरोधी माने जाने वाले डेनमार्क और स्वीडन की दोहरी नागरिकता रखने वाले धुर दक्षिणपंथी और कट्टरपंथी कार्यकर्ता रासमुस पैलुदान ने पहले डेनमार्क की राजधानी के पास क़ुरान की एक प्रति जलाई और फिर इसकी एक और प्रति तुर्की के दूतावास के बाहर जलाई.
तुर्की ने क्या कहा?
तुर्की के विदेश मंत्रालय ने कहा है "जिस व्यक्ति ने स्वीडन में हमारी पवित्र क़िताब के ख़िलाफ़ हेट क्राइम को अंजाम दिया उन्हें डेनमार्क ने फिर से वही इस्लाम विरोधी काम करने की इजाज़त दी."
"हमारी चेतावनी के बावजूद नीदरलैंड के बाद स्वीडन और फिर डेनमार्क में इस घृणित काम को रोका नहीं गया, जो चिंताजनक है. ये बताता है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में यूरोप में धार्मिक असहिष्णुता और नफरत ख़तरनाक तरीक़े से फैल रही है."
तुर्की के विदेश मंत्रालय के एक सूत्र के हवाले से समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने ख़बर दी है कि तुर्की ने इस घटना की कड़ी आलोचना की है.
एजेंसी के अनुसार मंत्रालय ने कहा है कि इस तरह के प्रदर्शनों दी गई इजाज़त को तुरंत रद्द की जाए. साथ ही कहा कि इस्लाम में पवित्र मानी जाने वाली क़िताब का "अपमान भड़काने वाली कार्रवाई है और हेट क्राइम के बराबर है."
रूस ने भी कुरान जलाने की घटना का किया विरोध?
डेनमार्क में रूसी दूतावास ने भी शुक्रवार को कुरान जलाने की घटना की निंदा की है. यह घटना कोपेनहेगेन में डेनमार्क के दूतावास के सामने हुई.
रूसी न्यूज़ वेबसाइट स्पूतनिक डेनमार्क में रूसी दूतावास ने टेलीग्राम पर कहा ''27 जनवरी को मुस्लिमों की पवित्र किताब कुरान को जलाने की सिलसिलेवार घटनाएं हुईं. ये घटनाएं डेनमार्क में रूसी दूतावास के सामने हुई. ''
रूसी दूतावास ने कहा कि मुस्लिमों की आस्था का खुलेआम मजाक उड़ाया गया. डेनमार्क के अधिकारियों ने इसकी अनदेखी की है. ''
डेनमार्क और स्वीडन ने क्या कहा?
डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोक रासमुसेन ने इस बात की पुष्टि की है कि उसके राजदूत को बुलाया गया था. उन्होंने कहा,''डेनमार्क और तुर्की के बीच संबंध अच्छे है और इससे इसमें कोई बदलाव नहीं होगा.''
पैलुदान ने शुक्रवार को कहा कि जब तक तुर्की स्वीडन और फिनलैंड को नेटो सदस्यता को मंजूरी नहीं देता तब तक वो कुरान को लेकर हर सप्ताह प्रदर्शन करेंगे.
इस बीच स्वीडन के नेताओं ने भी पैलुदान के प्रदर्शन की आलोचना की है. लेकिन उन्होंने अपने देश की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की नीति का बचाव किया है.
तुर्की से क्यों खफा हैं स्वीडन के लोग?
पिछले साल यूक्रेन पर रूस की ओर से हमले के बाद फिनलैंड और स्वीडन ने दशकों की सैन्य तटस्थता की नीति को दरकिना कर नेटो की सदस्यता के लिए आवेदन किया था. नेटो की सदस्यता के लिए इस गठबंधन के 30 सदस्यों की जरूरत होती है.
तुर्की और हंगरी ने ऐसे देश हैं, जिन्होंने अभी इन दोनों की नेटो सदस्यता के आवेदन को मंजूरी नहीं दी है. इसके लिए उन्हें संसद की मंजूरी लेनी होगी.
हंगरी अगले महीने इस मामले में संसद की मंजूरी लेगा. दरअसल स्वीडन और डेनमार्क की नेटो सदस्यता को तुर्की की ओर से मंजूरी न मिलने की वजह से दोनों देशों में नाराजगी बढ़ रही है.
तुर्की क्यों कर रहा है विरोध?
स्वीडन और फिनलैंड ने नेटो का सदस्य बनने के लिए पिछले साल ही औपचारिक रूप से आवेदन किया था.
लेकिन तुर्की ने नेटो सदस्य के रूप में मिली वीटो शक्तियों का प्रयोग करते हुए इन आवेदनों को रोक दिया था. हालांकि, कुछ समय बाद तुर्की ने अपने वीटो को हटा लिया था.
लेकिन तुर्की का कहना है कि स्वीडन पीकेके (कुर्दिश वर्कर्स पार्टी) जैसे हथियारबंद कुर्द समूहों को समर्थन देना बंद करे.
तुर्की ने ये भी कहा है कि स्वीडन ने पीकेके के कुछ सदस्यों को अपने यहां जगह दी है. हालांकि, स्वीडन इन आरोपों से इनकार करता रहा है.
तुर्की चाहता है कि उसे कुछ राजनीतिक रियायतें दी जाएं, जिनमें राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन के आलोचकों और कुर्द नेता (जिन्हें वो आतंकवादी कहता है) को प्रत्यर्पित किया जाना शामिल है.
तुर्की और स्वीडन के बीच विवाद पिछले कई महीनों से जारी है. इस विवाद की वजह से स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में दक्षिणपंथी तत्व तुर्की के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करते रहे हैं.
इस दौरान अति दक्षिणपंथी नेता रासमुस पैलुदान के नेतृत्व में क़ुरान जलाए जाने से दो देशों के बीच विवाद ने अंतरराष्ट्रीय स्वरूप हासिल कर लिया .
इसके बाद एक सवाल खड़ा हुआ है कि क्या इस घटना ने स्वीडन के नेटो सदस्य बनने की प्रक्रिया को और जटिल बना दिया है.
स्वीडन के कांसुलेट जनरल के सामने प्रदर्शनकारियों ने स्वीडन के झंडे को आग के हवाले कर दिया था.
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