अर्दोआन पर क्या पीएम मोदी से मुलाक़ात के बाद हुआ ये असर

मोदी राज में तुर्की-भारत संबंध की अहम बातें

  • प्रधानमंत्री बनने के बाद से मोदी ने कभी तुर्की का दौरा नहीं किया
  • अनुच्छेद 370 हटाने पर तुर्की ने यूएन में भारत का विरोध किया था
  • पिछले हफ़्ते पीएम मोदी और राष्ट्रपति अर्दोआन की मुलाक़ात उज़्बेकिस्तान में हुई थी
  • इस मुलाक़ात के बाद अर्दोआन ने यूएनजीए को संबोधित किया और वहां कश्मीर पर उनका रुख़ बेहद नरम रहा
  • अर्दोआन को पाकिस्तान के क़रीबी सहयोगी माना जाताहै

तुर्की के राष्ट्रपति रेपेच तैय्यप अर्दोआन ने मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र की 77वीं आम सभा को संबोधित करते हुए एक बार फिर से कश्मीर का मुद्दा उठाया है. अर्दोआन ने कहा कि वह कश्मीर में उचित और स्थायी शांति की उम्मीद करते हैं.

तुर्की के राष्ट्रपति ने कहा, ''75 साल पहले भारत और पाकिस्तान दो संप्रभु देश बने लेकिन दोनों मुल्कों के बीच शांति और एकता स्थापित नहीं हो पाई है. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. हम उम्मीद और प्रार्थना करते हैं कि कश्मीर में उचित और स्थायी शांति की स्थापित हो.''

तुर्की के राष्ट्रपति को पाकिस्तान का क़रीबी सहयोगी माना जाता है.

एक हफ़्ता पहले ही उज़्बेकिस्तान के समरकंद में शंघाई कॉर्पोरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (एससीओ) समिट से अलग भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन से मुलाक़ात हुई थी.

दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय सहयोग मज़बूत करने के लिए संबंधों की समीक्षा की थी.

पाँच अगस्त 2019 को भारत की मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत मिले विशेष दर्जे को ख़त्म कर दिया था.

उसके बाद से अर्दोआन कश्मीर का मुद्दा वैश्विक मंचों पर उठाते रहे हैं. इस वजह से दोनों देशों के रिश्तों में तनाव रहा है.

कश्मीर पर अर्दोआन

कश्मीर पर अर्दोआन के पहले के बयानों की प्रतिक्रिया में भारत कहता रहा है कि यह पूरी तरह से अस्वीकार्य है. भारत ने कहा था कि तुर्की को दूसरे देशों की संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए.

अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाने के बाद से राष्ट्रपति अर्दोआन हर बार संयुक्त राष्ट्र आम सभा में कश्मीर का मुद्दा उठाते रहे हैं. लेकिन इस बार उनके भाषण का तेवर नरम बताया जा रहा है. इससे पहले वह भारत को निशाने पर लेते रहे हैं.

2019 में अर्दोआन ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर में नाकाबंदी है. 2020 में कहा कि कश्मीर एक ज्वलंत मुद्दा है और 370 हटाने से यह मुद्दा और जटिल हुआ है.

2021 में उन्होंने कहा कि कश्मीर समस्या का समाधान संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के तहत होना चाहिए. इस बार अर्दोआन ने कहा कि कश्मीर में स्थायी शांति स्थापित होनी चाहिए.

2022 आते-आते अर्दोआन कश्मीर मुद्दे को भारत और पाकिस्तान के बीच का द्विपक्षीय मामला बताने लगे हैं.

2019 से लेकर अब तक यूएन आम सभा में कश्मीर पर अर्दोआन का रुख़ नरम होता गया है. इस बार की टिप्पणी को सबसे ठंडा माना जा रहा है.

द ब्रूकिंग्स इंस्टिट्यूशन की सीनियर फेलो तन्वी मदान ने अर्दोआन का वीडियो रीट्वीट करते हुए लिखा है, ''दरअसल, अर्दोआन कश्मीर पर नरम पिछले साल ही संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में पड़ गए थे. इसके अलावा जून में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ प्रेस कॉन्फ़्रेंस में भी अर्दोआन ने कहा था कि कश्मीर समस्या का समाधान संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के तहत होना चाहिए.''

यह भी कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी से मुलाक़ात के बाद तुर्की राष्ट्रपति का रुख़ यूएनजीए में नरम पड़ा है. पाकिस्तान के पत्रकार ग़ुलाम अब्बास शाह ने लिखा है कि यूएनजीए में तुर्की के राष्ट्रपति ने कश्मीर में स्थायी शांति की बात कही लेकिन एससीओ की बैठक में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने कश्मीर का ज़िक्र तक नहीं किया था.

अर्दोआन ने यूएनजीए में पिछले साल क्या कहा था?

तुर्की के राष्ट्रपति ने पिछले साल संयुक्त राष्ट्र की 76वीं आम सभा में भी कश्मीर का मुद्दा उठाया था.

उन्होंने कहा था कि पिछले 74 सालों से कश्मीर समस्या उलझी हुई है और इसे संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के तहत दोनों पक्षों को सुलझाना चाहिए. वहीं 2020 में अर्दोआन ने कश्मीर से अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी करने का मुद्दा भी उठाया था.

2020 में यूएन की 75वीं आम सभा में अर्दोआन ने कहा था, ''कश्मीर संघर्ष दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता के लिहाज़ से काफ़ी अहम है. यह अब भी एक ज्वलंत मुद्दा है. जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किए जाने के बाद से स्थिति और जटिल हो गई है. हमलोग कश्मीर मुद्दे का समाधान संवाद, यूएन के प्रस्ताव और कश्मीर के लोगों की उम्मीदों के हिसाब से करने के पक्ष में हैं. दक्षिण एशिया में शांति, स्थिरता और संपन्नता को कश्मीर मुद्दे से अलग नहीं किया जा सकता.''

2020 के फ़रवरी महीने में तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन पाकिस्तान के दौरे पर गए थे और तब उन्होंने पाकिस्तानी संसद को संबोधित करते हुए कहा था कि कश्मीर का मुद्दा जितना अहम पाकिस्तानियों के लिए है उतना ही तुर्की के लोगों के लिए है.

समरकंद में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति अर्दोआन की मुलाक़ात हुई थी तो समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने इसे अप्रत्याशित बताया था. रॉयटर्स ने लिखा था, ''मुस्लिम बहुल विवादित कश्मीर पर अर्दोआन की टिप्पणी के कारण भारत से रिश्तों में तनाव के दो साल बाद दोनों नेता आमने-सामने आए.''

2020 में भारत ने तुर्की के राजदूत को समन किया था और अर्दोआन के पाकिस्तान दौरे में कश्मीर पर टिप्पणी को लेकर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी.

अर्दोआन ने कहा था कि कश्मीर की स्थिति बदतर हो रही है. समरकंद में दोनों नेताओं की मुलाक़ात के बाद भारत की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि दोनों नेताओं ने अलग-अलग क्षेत्रों में संबंधों में गर्मजोशी लाने पर बात की है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद से गेहूं की आपूर्ति बाधित हुई है और तुर्की भारत से गेहूं ख़रीद रहा है.

तुर्की भारत से चावल भी ख़रीद रहा है. फ़रवरी में रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था और तब से अर्दोआन के अलावा पीएम मोदी भी पुतिन के संपर्क में रहे हैं.

मोदी सरकार और तुर्की

हाल के वर्षों में भारत और तुर्की के रिश्ते लगातार ख़राब हुए हैं. नरेंद्र मोदी पीएम बनने के बाद मध्य-पूर्व के लगभग सभी अहम देशों के दौरे पर गए लेकिन तुर्की नहीं गए.

20 अक्टूबर, 2019 को अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू ने एक रिपोर्ट छापी थी कि मोदी 2019 के आख़िरी महीनों में तुर्की जाने वाले थे लेकिन कश्मीर पर अर्दोआन की लाइन पाकिस्तान के पक्ष में होने कारण दौरा रद्द कर दिया था.

तब भारत में तुर्की के तत्कालीन राजदूत साकिर ओज़कान ने द हिन्दू से कहा था, ''हमारी सरकार को उम्मीद थी कि पीएम मोदी अंकारा आएंगे. यह केवल उम्मीद ही नहीं थी बल्कि हाल ही में इस पर बात भी हुई थी. हमलोग अब कोई दूसरी तारीख़ का इंतज़ार कर रहे हैं. आने वाले महीनों में पीएम मोदी के वक़्त के हिसाब से कोई नई तारीख़ तय होने का इंतज़ार है. भारत सरकार ने यह फ़ैसला लिया है लेकिन निश्चित तौर पर इसे लेकर चर्चा हुई थी.''

तुर्की के राजदूत ने ये भी कहा था कि कश्मीर पर चीन ने भी भारत की आलोचना की थी लेकिन चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भारत दौरा हुआ. दोनों देशों के संबंधों में आई कड़वाहट के लिए तुर्की का कश्मीर और एफ़एटीएफ़ में पाकिस्तान का समर्थन मुख्य वजहें हैं. जब तुर्की ने उत्तरी सीरिया में कुर्दों पर हमले शुरू किए तो भारत ने भी इसके लिए तुर्की की आलोचना की थी और कहा था कि संप्रभुता का सम्मान होना चाहिए.

भारत ने तुर्की के अनादोलु शिपयार्ड से भारत में नेवी सपोर्ट शिप बनाने की डील को भी रद्द कर दिया था. भारत ने ये क़दम कश्मीर और एफ़एटीएफ़ पर तुर्की के पाकिस्तान के साथ खड़े होने के जवाब में उठाए थे.

पाकिस्तान-तुर्की दोस्ती

पाकिस्तान और तुर्की के बीच संबंध भारत के तुलना में काफ़ी अच्छे रहे हैं. दोनों मुल्क इस्लामिक दुनिया के सुन्नी प्रभुत्व वाले हैं. अर्दोआन के पाकिस्तान से हमेशा से अच्छे संबंध रहे हैं.

जब जुलाई 2016 में तुर्की में सेना का अर्दोआन के ख़िलाफ़ तख्तापलट नाकाम रहा तो पाकिस्तान खुलकर अर्दोआन के पक्ष में आया था. पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने अर्दोआन को फ़ोन कर समर्थन किया था. इसके बाद शरीफ़ ने तुर्की का दौरा भी किया था. तब से अर्दोआन और पाकिस्तान के संबंध और अच्छे हुए हैं.

2017 से तुर्की ने पाकिस्तान में एक अरब डॉलर का निवेश किया है. तुर्की पाकिस्तान में कई परियोजनाओं पर काम कर रहा है. वो पाकिस्तान को मेट्रोबस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम भी मुहैया कराता रहा है. दोनों देशों के बीच प्रस्तावित फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट को लेकर अब भी काम चल रहा है.

परवेज़ मुशर्रफ़ पाशा के सेक्युलर सुधारों और सख़्त शासन की प्रशंसा करते रहे हैं. पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान अर्दोआन की प्रशंसा करते रहे हैं.

2016 में तुर्की में तख़्तापलट नाकाम करने पर इमरान ख़ान ने अर्दोआन को नायक कहा था. ज़ाहिर है इमरान ख़ान भी नहीं चाहते हैं कि पाकिस्तान में राजनीतिक सरकार के ख़िलाफ़ सेना का तख्तापलट हो, जिसकी आशंका पाकिस्तान में हमेशा बनी रहती है.

पिछले साल 14 फ़रवरी को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने इस्लामाबाद में पाकिस्तान-तुर्की बिज़नेस फोरम को संबोधित करते हुए कहा था कि तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन पाकिस्तान में चुनाव लड़ेंगे तो जीत जाएंगे.

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