यूक्रेन युद्ध ने चीन और रूस के रिश्तों पर क्या असर डाला है?

    • Author, ओलगा इवशीना और हावर्ड ज़ैंग
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

यूक्रेन पर रूसी हमले के क़रीब एक साल बाद, इस तरह के संकेत मिल रहे हैं कि चीन रूस से अपनी दोस्ती पर पुनर्विचार कर रहा है. रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले चीन और रूस की दोस्ती के लिए 'फ़्रेंडशिप विथ नो लिमिट्स' शब्द का इस्तेमाल किया जाता था. यानी दोनों देशों के बीच ऐसी दोस्ती जिसकी कोई सीमा नहीं है.

लेकिन यूक्रेन में पुतिन की असफलता के बाद और अपनी समस्याओं से दो-चार चीन रूस के कारण होने वाले नुक़सान को कम करने और पश्चिमी देशों से अपने संबंधों को सुधारने की कोशिश कर रहा है.

पिछले साल फ़रवरी में यूक्रेन पर हमले से ठीक 20 दिन पहले रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाक़ात की थी.

इस ऐतिहासिक मुलाक़ात के दौरान दोनों नेताओं ने 'असीमित दोस्ती' और 'सहयोग में कुछ भी अछूता नहीं' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था.

ब्रिटेन के एक प्रतिष्ठित अख़बार 'द फ़ाइनेनशियल टाइम्स' ने सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि दोनों नेताओं ने फ़रवरी 2022 की उस मीटिंग के दौरान यूक्रेन के बारे में बातचीत की थी और राष्ट्रपति पुतिन ने 'कोई भी क़दम उठाने की संभावना से इनकार नहीं किया था' अगर रूस पर किसी भी तरह का हमला होता है तो.

लेकिन सबसे ख़ास बात यह है कि पुतिन ने उस समय यूक्रेन पर हमले की किसी भी योजना के बारे में शायद राष्ट्रपति शी को कुछ नहीं बताया था.

चीन का सावधानीपूर्वक संतुलन बनाए रखने की कोशिश

हालांकि हमलोग इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं कि शी को यूक्रेन पर रूस के हमले के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, लेकिन यह बात सच है कि मार्च के महीने में रूस के ख़िलाफ़ निंदा प्रस्ताव पर वोटिंग के दौरान चीन ने हिस्सा नहीं लिया था.

युद्ध के शुरुआती दिनों में चीन में कुछ लोगों ने रूसी सैन्य कार्रवाई को लेकर काफ़ी उत्साह दिखाया था और कई लोगों ने राष्ट्रपति पुतिन का एक वीडियो भी शेयर किया था जिसमें पुतिन ने यूक्रेन में 'स्पेशल सैन्य ऑपरेशन' की घोषणा की थी.

रूस यूक्रेन पर हमले को युद्ध के बजाए 'स्पेशल सैन्य ऑपरेशन' कहता है.

लेकिन चीन इस पूरे मामले में आधिकारिक तौर पर कुछ भी स्पष्ट रूप से नहीं कहता है और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण चुप्पी साधे रहता है.

एक तरफ़ चीन यूक्रेन युद्ध के लिए अमेरिका को ज़िम्मेदार ठहराता है क्योंकि उसके अनुसार यूरोप में नाटो के विस्तार के कारण रूस ने यूक्रेन पर हमला किया है.

दूसरी तरफ़ चीन रूस को सही मायने में किसी भी तरह की मदद करने की कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखा रहा है.

अमेरिका के अख़बार वाशिंगटन पोस्ट का दावा है कि रूस ने इस दौरान कई बार चीन से वित्तीय और तकनीकी मदद मांगी है

अख़बार का कहना है कि शी जिनपिंग रूस के साथ 'पारस्परिक रूप से लाभदायक सहयोग' के ख़िलाफ़ नहीं हैं लेकिन सच्चाई यह है कि दोनों देशों के बीच सारी बातचीत के दौरान माहौल 'तनावपूर्ण' रहा है.

वाशिंगटन पोस्ट ने सूत्र के हवाले से लिखा है कि चीन रूस की मजबूरी समझता है लेकिन वो अपनी हालत को भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता है.

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नुक़सान को कम करने की कोशिश

यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से दोनों नेता सिर्फ़ एक बार सितंबर में समरक़ंद में हुए एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में मिले थे.

यह मुलाक़ात उस समय हुई थी जब यूक्रेन ने रूस के ज़रिए जीते गए कई इलाक़ों पर दोबारा अपना क़ब्ज़ा जमा लिया था.

समरक़ंद में मुलाक़ात के बाद राष्ट्रपति पुतिन ने कहा था कि यूक्रेन युद्ध पर चीन के संतुलित दृष्टिकोण की वह बहुत सराहना करते हैं.

इस दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा था, "चीन रूस के साथ मिलकर बड़ी शक्तियों के रोल को निभाने, दुनिया में स्थायित्व और सकारात्मक ऊर्जा लाने के लिए नेतृत्व करने को तैयार है."

लेकिन कैमरे के पीछे की हक़ीक़त कुछ और थी. यूक्रेन युद्ध ने चीन के लिए कई तरह की दिक़्क़्तें पैदा कर दीं हैं जो कि आसानी के साथ ना तो सुलझाया जा सकता है और ना ही उससे बचा जा सकता है.

रूस ने यूरोप के देशों पर जो 'गैस वार' छेड़ी है उसके कारण वहां महंगाई बढ़ गई है. यूरोप के लोगों के पास अब उतने अतिरिक्त पैसे नहीं हैं कि वो चीनी सामानों को ख़रीदने में ख़र्च कर सकें.

चीन ने यूक्रेन पर रूसी हमले की निंदा करने से इनकार कर दिया था, इस कारण चीन और पश्चिमी देशों के रिश्ते में खटास पैदा हो गई है. अमेरिका और यूरोपीय यूनियन चीन के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार हैं.

साल 2022 के पहले छह महीनों में चीन ने रूस में कोई भी नया निवेश नहीं किया था. विश्लेषकों का मानना है कि चीन अब बहुत बचकर चलना चाहता है और अमेरिका के प्रतिबंधों का शिकार होने से बचना चाहता है.

दोस्ती ज़मीन पर कितनी दिखती है?

रूस और चीन के विशेषज्ञ लियोनिड कोवाशिक का मानना है कि 'असीमित दोस्ती' वाला बयान ज़मीन पर कभी नहीं दिखा.

वो कहते हैं, ''यह चीन के हित में नहीं है कि वो एक ही साथ पूरे पश्चिमी देशों से अपने संबंधों को पेचीदा बना दे.''

विशेषज्ञ कहते हैं कि चीन और अमेरिका के संबंधों में लंबे समय तक तनाव बना रहेगा और इसे देखते हुए 'यह चीन के लिए महत्वपूर्ण है कि वो कम से कम यूरोपीय यूनियन के साथ अपने संबंधों को और नहीं बिगाड़े.'

हो सकता है कि चीन ने शुरू में इस बात को नहीं समझा होगा कि यूक्रेन युद्ध यूरोपीय यूनियन के लिए कितना संवेदनशील मुद्दा है और यूक्रेन की वित्तीय और सैन्य मदद के लिए यूरोप कितना सक्रिय होगा.

कोविशक कहते हैं, "यही कारण है कि चीन अब चीज़ों को सुधारने की कोशिश कर रहा है, कम से कम बयानों को लेकर."

यूक्रेन युद्ध ने ताइवान के प्रति चीन के रवैये को भी प्रभावित किया है. चीन ताइवान को अपना ही एक प्रांत मानता है. हाल के महीनों में उस क्षेत्र में तनाव काफ़ी बढ़ गया था जब चीन ने दिसंबर में वहां एक बड़ा समुद्र और हवाई सैन्य अभ्यास किया था.

यूक्रेन युद्ध के शुरू में कई विश्लेषक इस बात से चिंतित थे कि चीन ताइवान के ख़िलाफ़ कोई क़दम उठाने का फ़ैसला कर सकता है.

लेकिन अब राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध के मामले में पश्चिमी देशों की संयुक्त प्रतिक्रिया देखने के बाद चीन अब ऐसा करने की जुर्रत नहीं करेगा.

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चीन में विदेश मंत्रालय में बदलाव

पिछले साल के अंत में चीन का नया विदेश मंत्री बनने के बाद किन गांग ने रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से नौ जनवरी को बातचीत की थी. चीन का कहना है कि रूस के अनुरोध पर दोनों विदेश मंत्रियों के बीच बात हुई थी. चीन ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा था कि चीन और रूस का संबंध तीसरे पक्ष के प्रति गुट-निरपेक्षता और हमले ना करने के सिद्धांत पर आधारित है.

पिछले साल फ़रवरी में असीमित दोस्ती वाले बयान से यह ताज़ा बयान बिल्कुल अलग है.

किन के विदेश मंत्री बनने के साथ ही विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता चाओ लीजियान को भी उनके पद से हटा दिया गया जहां पर वो पिछले तीन साल से काम कर रहे थे.

चाओ लीजिया अपनी तीखी ज़बान के लिए जाने जाते थे जो कि चीन की नीतियों का पूरे दमख़म से बचाव करते थे और अपने विरोधियों की जमकर आलोचना करते थे. कुछ लोग उनकी तुलना रूसी विदेश मंत्रालय की मारिया ज़ख़ारोवा से भी करने लगे थे जो कि पश्चिमी देशों की सख़्त आलोचना के लिए जानी जाती थीं.

कुछ विश्लेषकों का कहना है कि चाओ लीजियान का हटाया जाना सिर्फ़ एक दिखावा है जबकि कुछ दूसरे विश्लेषकों का कहना है कि चीन ने दूसरे देशों से अपने संबंधों को सुधारने के लिए जानबूझकर ऐसा फ़ैसला किया है.

चीन को दूसरे देशों के साथ अपने संबंधों को सुधारना बहुत ज़रूरी है क्योंकि चीन अपने व्यापार में दोबारा विश्वास बढ़ाना चाहता है. इसके लिए चीन ने विवादास्पद ज़ीरो-कोविड नीति को भी समाप्त कर दिया है.

चीन की सरकार के समर्थकों का कुछ राजनीतिक विश्लेषकों से अपना नाम सार्वजनिक नहीं किए जाने की शर्त पर कहना है कि चीन का नेतृत्व रूस से निराश है.

इसका एक संकेत उस वक़्त मिला जब शी जिनपिंग ने पिछले साल नवंबर में परोक्ष रूप से राष्ट्रपति पुतिन की आलोचना की थी जब उन्होंने जर्मनी के चांसलर ओलाफ़ स्कोल्ज़ के साथ एक संयुक्त बयान में कहा था कि परमाणु हथियारों का इस्तेमाल या इस्तेमाल करने की धमकी देना अस्वीकार्य है.

फ़ाइनेनशियल टाइम्स ने एक चीनी अधिकारी के हवाले से लिखा है, "पुतिन झक्की हैं. यूक्रेन पर हमला करने का फ़ैसला कुछ ही लोगों ने लिया था. चीन को रूस की हर बात नहीं माननी चाहिए."

इसकी संभावना कम ही है कि चीन सार्वजनिक तौर पर रूस के विरोध में कोई स्टैंड लेगा लेकिन यह निश्चित है कि वो बहुत सोच समझकर क़दम उठाएगा. रूस यूक्रेन पर हमले करके जो हासिल करना चाहता था, उसमें असफल होने और इस क्रम में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो उथल-पुथल मचेगी, उसके परिणामों को चीन हर हालत में कम करने की कोशिश करेगा.

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