पुष्प कमल दाहाल प्रचंड नेपाल के पीएम, सरकार में साथ आए ओली

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नेपाल में राजनीतिक दलों के बीच सरकार बनाने को बनी सहमति के बाद राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने पुष्प कमल दाहाल प्रचंड को देश का नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया है.
प्रचंड ने दूसरे दलों के साथ सहमति बनने के बाद सरकार बनाने का दावा पेश किया. प्रचंड की पार्टी सीपीएन-माओवादी सेंटर प्रतिनिधि सभा (संसद) में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है.
इसके पहले विपक्षी सीपीएन (यूएमएल) और अन्य छोटी पार्टियों ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल (माओवादी सेंटर) के चेयरमैन पुष्प कमल दाहाल प्रचंड को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन देने का एलान कर दिया.
इस बात को लेकर सहमति बनी है कि प्रचंड और ओली बारी-बारी से सरकार का नेतृत्व करेंगे जिसमें पहली बारी प्रचंड को मिलेगी.
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रविवार शाम को राष्ट्रपति कार्यालय ने एक बयान जारी किया जिसमें कहा गया है, "राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने नेपाल के संविधान के अनुच्छेद 76 (2) के तहत प्रतिनिधि सभा के पुष्प कमल दाहाल प्रचंड को नेपाल के प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त किया है."
राष्ट्रपति के प्रवक्ता सागर आचार्य ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया कि पुष्प कमल दाहाल को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया है और वो सोमवार को स्थानीय समयानुसार शाम 4.00 बजे पद की शपथ लेंगे.
इसके पहले पुष्प कमल दाहाल प्रचंड ने राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी से मुलाक़ात की और अपनी दावेदारी पेश की. अपने पत्र में प्रंचड ने दावा किया कि उन्हें 169 सांसदों का समर्थन हासिल है जिसमें निर्दलीय सांसद भी शामिल हैं.
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प्रचंड नाम से जाने जाने वाले पुष्प कमल दाहाल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल (माओवादी सेंटर) के अध्यक्ष रहे हैं और एक दशक तक देश में विद्रोह का नेतृत्व कर चुके हैं.
बीते सप्ताह हुए आम चुनावों में किसी एक पार्टी को बहुमत न मिलने के बाद देश में सियासी संकट गहरा गया. सीटों के मामले में प्रचंड की पार्टी इसमें तीसरे नंबर पर रही थी.
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रचंड के नेपाल का पीएम नियुक्त होने पर उन्हें बधाई दी है. मोदी ने ट्विटर पर लिखा कि वो प्रचंड के साथ मिलकर काम करने और दोनों देशों की दोस्ती को और मजबूत करने की दिशा में देख रहे हैं.
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2025 में ओली बनेंगे पीएम
समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली विपक्षी सीपीएन (यूएमएल), सीपीएन (माओवादी सेंटर), राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी और अन्य छोटी पार्टियां प्रचंड के नेतृत्व में नई सरकार के गठन के लिए सहमत हो गई हैं.
सीपीएन (माओवादी सेंटर) के महासचिव देब गुरुंग ने कुछ देर पहले ये बताया था कि, "सीपीएन (यूएमएल), सीपीएन (माओवादी सेंटर) और अन्य पार्टियां राष्ट्रपति के कार्यालय 'शीतल निवास' जाएंगी जहां देश के संविधान के अनुच्छेद 76(2) के तहत सांसदों के दस्तखत के साथ प्रचंड के नेतृत्व में नई सरकार के गठन के लिए दावा पेश किया जाएगा."
पूर्व प्रधानमंत्री ओली के बालकोट स्थित निवास स्थल पर हुई इस मीटिंग में उनके अलावा प्रचंड, आरएसपी अध्यक्ष रवि लामिछाने, राष्ट्रीय प्रजांतत्र पार्टी के प्रमुख राजेंद्र लिंग्देन, जनता समानवादी पार्टी के अध्यक्ष अशोक राय समेत अन्य नेताओं ने हिस्सा लिया.
इस बात को लेकर सहमति बनी है कि प्रचंड और ओली बारी-बारी से सरकार का नेतृत्व करेंगे जिसमें पहली बारी प्रचंड को मिलेगी.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार प्रचंड 2025 में प्रधानमंत्री का पद छोड़ देंगे जिसके बाद ये पद यूएमएल अध्यक्ष केपी ओली संभालेंगे.
देब गुरुंग ने "इसे लेकर सहमति बन गई है. मुख्य पोस्ट और मंत्रालय किसे-किसे मिलेंगे इस पर काम अभी बाक़ी है."
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विपक्ष में रहेगी सत्तारूढ़ नेपाली कांग्रेस
68 साल के प्रचंड गठबंधन सरकार के लिए सत्तारूढ़ नेपाली कांग्रेस पार्टी के साथ चर्चा कर रहे थे. रॉयटर्स के अनुसार लेकिन नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा ने प्रधानमंत्री पद के लिए प्रचंड को समर्थन देने से इनकार कर दिया था जिसके बाद बातचीत आगे नहीं बढ़ पाई.
275 सीटों की संसद में प्रचंड की माओवादी पार्टी ने 32 सीटें जीती थीं. वहीं यूएमएल ने 78 सीटों पर कब्ज़ा जमाया था. सरकार बनाने के लिए 138 का आंकड़ा पार करने की ज़रूरत है और इसके लिए प्रचंड की सीपीएन और ओली की यूएमएल ने दूसरी छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन किया है.
89 सीटों के साथ नेपाली कांग्रेस अब विपक्ष में रहेगी.
नेपाल में साल 2008 में 293 साल पुरानी राजशाही के ख़त्म होने के बाद अब तक 10 सरकारें आई हैं.

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कौन हैं प्रचंड?
समय -समय पर अलग-अलग नामों से जाने गए प्रचंड उन चुनिंदा नेपाली नेताओं में से एक हैं जो लगातार 32 सालों से पार्टी का शीर्ष पद संभाल रहे हैं.
11 दिसंबर 1954 को कास्की ज़िले के पोखारा के पास ढिकुरपोखरी में एक साधारण परिवार में जन्म लेने वाले पुष्प कमल दाहाल प्रचंड तीसरी बार देश का प्रधानमंत्री पद संभालने जा रहे हैं. इससे पहले वो 2008-2009 में और फिर 2016-17 में प्रधानमंत्री पद पर थे.
कहा जाता है कि 25 साल तक भूमिगत रहने वाले प्रचंड के नेतृत्व में दस साल का सशस्त्र संघर्ष चलाया गया. और ये संघर्ष नेपाल में राजनीतिक परिवर्तन का एक बड़ा कारण रहा है. माओवादी इस संघर्ष को एक 'जनयुद्ध' के रूप में देखते हैं.
प्रचंड के नेतृत्व वाले संघर्ष में कई निर्दोष नागरिकों के मारे जाने, गायब किए जाने, और विस्थापित किए जाने को लेकर उनकी आलोचना की जाती है. शांति वार्ता के माध्यम से चुनावी राजनीति में प्रवेश करने के बाद, उनके नेतृत्व में सीपीएन-माओवादी संसद में सबसे बड़ी पार्टी बन गई.
प्रचंड के छह नाम
प्रचंड ने छह बार अपना नाम बदला है. स्टालिन, जिन्हें प्रचंड राजनीतिक रोल मॉडल मानते थे, ने भी तीन बार अपना नाम बदला. स्टालिन नाम रखने से पहले, उनका नाम कोबा था, और उसका असली नाम जोसेफ विसारियोनोविच जुगास्विली था.
लेनिन का असली नाम व्लादिमीर उल्यानोव था. लेकिन कम्युनिस्ट नेताओं का कहना है कि नाम बदलने के मामले में प्रचंड ने उन नामी नेताओं को पीछे छोड़ दिया.
चितवन के नारायणी विद्या मंदिर में कक्षा 10 में पढ़ते समय, प्रचंड ने अपना नाम छविलाल दाहाल से बदलकर पुष्प कमल दाहाल रख लिया. साल 1981 में पंचायत विरोधी आंदोलन में भूमिगत हुए प्रचंड 20 जुलाई 2006 को बालूवाटार में सार्वजनिक रूप से दिखाई दिए.
भूमिगत रहते हुए उन्होंने कल्याण, विश्वास, निर्माण और प्रचंड नाम लिया. इससे पहले वे छविलाल से पुष्प कमल बने थे. जब वह एक शिक्षक के रूप में काम कर रहे थे, तब वह कल्याण नाम से जाने जाते थे. इसके बाद मशाल के केंद्रीय सदस्य बनने पर वह विश्वास नाम से जाने गए.
राजनीतिक सफर
प्रचंड का राजनीतिक सफर एक अध्यापक के रूप में शुरू हुआ.
साल 1971 में मात्र 17 वर्ष की आयु में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बनने वाले प्रचंड अलग - अलग राजनीतिक भूमिकाओं में आगे बढ़े. लेकिन अपने संगठन के बाहर उनकी छवि एक शिक्षक की ही रही.
साम्यवादी राजनीति में शामिल होने के 18 साल बाद 35 साल की उम्र में प्रचंड सीपीएन (मशाल) के महासचिव बने.
इस पार्टी में सबसे मुख्य भूमिका महासचिव की ही होती थी. सरल शब्दों में कहें तो प्रचंड ही पार्टी के मुखिया हुआ करते थे. क्योंकि पार्टी में सर्वोच्च पद महासचिव का ही था.
वह एक प्रभावशाली नेता थे लेकिन यंग कम्युनिस्ट लीग में उनकी लोकप्रियता ने उन्हें शीर्ष पद तक पहुंचने में मदद की.
साल 1996 में प्रचंड के नेता मोहन बैद्य के नेतृत्व में उनकी पार्टी मशाल ने शाही सरकार द्वारा घोषित आम चुनाव को बाधित करने के लिए पुलिस चौकियों पर हमला करने की कोशिश की.
नेपाल की साम्यवादी राजनीति में इस घटना को सेक्टर स्कैंडल के नाम से जाना जाता है.
हमला सफल नहीं होने के बाद पार्टी के भीतर मांग की गई कि वैद्य को पार्टी नेतृत्व छोड़ देना चाहिए. इसके बाद खुद मोहन बैद्य ने अपने पार्टी का नेतृत्व त्याग दिया.
मशाल के तत्कालीन नेता नारायण प्रसाद शर्मा का कहना है कि प्रचंड ने बैद्य को पार्टी अध्यक्ष के पद से हटाने के लिए उनके ख़िलाफ़ आलोचना का माहौल तैयार किया. शर्मा कहते हैं, ''आलोचना का माहौल को बनाने में प्रचंड की भूमिका थी. उनका गुट लगातार इस मुद्दे को उठा रहा था."
कुछ साल बाद प्रचंड ने मशाल का नेतृत्व संभाला और बाबूराम भट्टाराई, हरिबोल गजुरेल, निर्मल लामा और रूपलाल विश्वकर्मा के नेतृत्व वाली छोटी कम्युनिस्ट पार्टियों को एक साथ जोड़ा.
और साल 1992 में आयोजित आम सम्मेलन में पार्टी का नाम बदलकर एकता केंद्र कर दिया. और इसी अधिवेशन में प्रचंड एक बार फिर से महासचिव चुने गए.
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