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शी जिनपिंग के रियाद दौरे के बाद ईरान मीडिया का सवाल, 'चीन सहयोगी या प्रतिद्वंद्वी'
चीन और सऊदी अरब ने सहयोग बढ़ाने को लेकर जो साझा बयान जारी किया उसने ईरानी मीडिया को ख़फ़ा कर दिया है. ईरान की मीडिया ने पहले से ये संदेह जताया था कि चीन उनके (ईरान के) क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी के साथ अपने रिश्ते बढ़ा रहा है.
जहां एक ओर कट्टरपंथी मीडिया इस साझा बयान पर ख़ामोश है वहीं सुधारवादी अख़बारों ने एक सहयोगी के रूप में चीन को 'अविश्वसनीय' बताया है. हालांकि कुछ मीडिया संस्थान ये भी कह रहे हैं कि चीन के लिए बतौर सहयोगी ईरान आगे भी अहम रहेगा.
दरअसल, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल और अरब देशों के राष्ट्राध्यक्षों से मुलाक़ात करने सऊदी अरब की राजधानी रियाद पहुंचे थे. उस दौरान उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, ओमान, क़तर और कुवैत के राष्ट्राध्यक्षों से मुलाक़ात की थी.
इस दौरे के आखिरी दिन शुक्रवार (नौ दिसंबर ) को जीसीसी समिट के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने एक साझा बयान जारी किया. जिसमें अरब मुल्कों में बेहतर साझेदारी और विवादों के शांतिपूर्ण निपटारे पर ज़ोर दिया गया.
इस साझा बयान में दोनों पक्षों ने आर्थिक और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की बात के साथ ही ईरान के विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम के शांतिपूर्ण निपटारे को लेकर साथ काम करने की बात कही है.
सऊदी अरब और चीन ने साझा बयान में क्या कहा?
अपने साझा बयान में उन्होंने ईरान से उसके पड़ोसियों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का सम्मान करने और उनके विदेशी मामलों में दखलअंदाजी नहीं करने को कहा है. बिना कहे इसमें कई मुद्दों का संदर्भ दिया गया है जिसमें यमन में हूतियों को ईरान से मिल रहा समर्थन भी शामिल है.
ईरान ने अपनी नाराज़गी चीन और सऊदी अरब के उस संयुक्त बयान को लेकर दी है जिसमें ये कहा गया है कि दोनों देशों के बीच इस पर सहमति बनी है, "अबू मूसा, ग्रेटर तुंब और लेसर तुंब से जुड़े विवाद के शांतिपूर्ण हल के लिए अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के तहत द्विपक्षीय वार्ता की संयुक्त अरब अमीरात की शांतिपूर्ण कोशिशों का सभी मुल्क समर्थन करेंगे."
अबू मूसा, ग्रेटर तुंब और लेसर तुंब को लेकर गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल के बयानों पर ईरान पहले भी अपनी नाराज़गी जताता रहा है लेकिन इस बार तो यह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ साझा बयान को लेकर है.
ईरान के विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?
ईरानी विदेश मंत्रालय ने चीन और सऊदी अरब के इस साझा बयान को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है.
ईरान के विदेश मंत्री हुसैन अमीर अब्दुल्लाहियान ने ट्वीट कर कहा, "फारस की खाड़ी में मौजूद अबू मूसा, ग्रेटर तुंब और लेसर तुंब ईरान का अभिन्न हिस्सा हैं और हमेशा इसका हिस्सा रहेंगे. ईरान की क्षेत्रीय अखंडता का दूसरे मुल्कों को सम्मान करना चाहिए."
ईरान के विदेश मंत्री भले ही गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल के साझा बयान पर आपत्ति जताई है लेकिन उन्होंने चीन की सीधे सीधे आलोचना नहीं की.
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नासिर कानानी ने गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल की तीन विवादास्पद खाड़ी द्वीपों की स्वतंत्रतता को लेकर दिए गए बयान पर अपनी नाराज़गी तो ज़ाहिर की लेकिन ये नहीं कहा कि चीन के राजदूत को तलब किया गया था. उन्होंने कहा कि तेहरान में चीनी राजदूत के बयान को लेकर विदेश मंत्रालय ने बैठक की थी.
ईरानी राष्ट्रपति के डिप्टी चीफ़ ने क्या कहा?
हाल के वर्षों में ईरान का रूस और चीन की ओर झुकाव हुआ है. फारस की खाड़ी से जुड़े ईरान और सऊदी अरब आपस में प्रतिद्वंद्वी हैं और ईरान का मानना है कि उसके ख़िलाफ़ अमेरिकी एजेंडा के पीछे सऊदी अरब का ही हाथ है.
इस संयुक्त बयान के जवाब में राजनीतिक मामलों के लिए ईरानी राष्ट्रपति के डिप्टी चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ मोहम्मद जमशीदी ने चीनी राष्ट्रपति के सऊदी अरब की राजधानी रियाद के दौरे पर दिए गए साझा बयान पर जवाब दिया है.
उन्होंने शनिवार को ट्वीट किया, "चीन के सहयोगियों को याद दिला दूं, एक ओर जहां सीरिया और यमन में सऊदी अरब और अमेरिका समर्थित आईएसआईएस,अल क़ायदा ने अपनी क्रूरता दिखाई है. वहीं ईरान क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए इन आतंकवादी समूहों से लड़ता रहा है और साथ ही इनके प्रसार को पूर्व और पश्चिम दोनों ओर बढ़ने से रोकने की लड़ाई भी लड़ता रहा है."
रिपोर्टों के मुताबिक इस घोषणा में ईरान के लंबे समय से प्रतिद्वंद्वी रहे सऊदी अरब और रणनीतिक साझेदार चीन ने साझा बयान दिए.
इस दौरान दोनों देशों ने परमाणु के अप्रसार दौर को बरकरार रखने पर सहमति जताते हुए ईरान के परमाणु कार्यक्रम का शांतिपूर्ण हल सुनिश्चित करने और अच्छे पड़ोसी के सिद्धान्त के लिए सम्मान पर ज़ोर दिया.
मीडिया में क्या कहा जा रहा है?
ईरान के पूर्व के प्रति झुकाव की पारंपरिक विरोधी रहे कई मीडिया संस्थानों का कहना है कि इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि चीन अपने हितों को साध रहा है, जैसा कि उन्होंने पहले भी चेतावनी दी थी.
पूर्व राजनयिक फ़रीदोन मजलेसी ने तेहरान के अख़बार 'अरमान-ए-इमरोज़' में लिखे अपने लेख में याद दिलाया कि चीन ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव पर छह बार अपना समर्थन दिया है.
उन्होंने ये भी लिखा कि इस वक़्त ईरान चीन पर कतई भरोसा नहीं कर सकता और सभी साझेदारी अपनी राष्ट्रीय हितों को देखते हुए रणनीतिक गणना पर आधारित होते हैं.
उन्होंने ये भी लिखा कि वैचारिक मतभेद के बावजूद चीन ने अपने हितों को देखते हुए अमेरिका के साथ अपनी आर्थिक साझेदारी बढ़ाई ही है.
सुधारवादी 'आफ़ताब-ए यज़्द' के साथ इंटरव्यू में भू-राजनीति के प्रोफ़ेसर अब्दोलरेज़ा फ़राजीराद सवाल उठाते हैं कि चीन 'सहयोगी है या प्रतिद्वंद्वी.'
वे कहते हैं कि चीन इस क्षेत्र में अपने पैर जमाने के लिए अमेरिकी डेमोक्रेट्स के प्रति फ़ारस की खाड़ी के अरबों के विरोध का फायदा उठा रहा है.
उन्होंने दक्षिण कॉकेशस क्षेत्र में ईरान के बढ़ते अलगाव पर भी ज़ोर दिया क्योंकि रूस उधर यूक्रेन के साथ लड़ाई में व्यस्त है और तुर्की उसका लाभ सीरिया में उठाने में लगा है.
आर्थिक अख़बार 'एशिया' लिखता है, "चीन और सऊदी अरब अचानक ममेरे भाई बन गए हैं."
एक अन्य आर्थिक अख़बार 'डोन्या-ए इक्तेसाद' लिखता है कि चीन के साथ एक रणनीतिक साझेदारी पर हस्ताक्षर करने के बावजूद ईरान उसे ऊर्जा की आपूर्ति करने वाला सबसे अहम देश नहीं होगा बल्कि ये फ़ारस की खाड़ी के देश होंगे.
सकारात्मक नज़रिया
वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो दोनों देशों के साझा बयान के वाबजूद कुछ अलग और सकारात्मक नज़रिया रखते हैं.
लेबनान में राजदूत रह चुके अहमद दस्तमलचियान एक अलग नज़रिया पेश करते हैं. 'अरमान-ए मेली' में वे घटते अमेरिकी प्रभाव के बीच सऊदी अरब का चीन की तरफ हो रहे झुकाव को स्वीकारते हुए ये लिखते हैं कि चीन की ऊर्जा सुरक्षा ईरान के हाथ में है.
वे इस बात पर तो सहमति जताते हैं कि चीन अमेरिकी डेमोक्रेट्स के प्रति फ़ारस की खाड़ी के अरबों के विरोध का फायदा तो उठा रहा है. लेकिन साथ ही ये भी कहते हैं कि अमेरिकी निर्भरता से ख़ुद को दूर करने के लिए ये इन सरकारों के लिए सामान्य बात है.
वे कहते हैं कि अमेरिका अब इन देशों के संरक्षक की अपनी पारंपरिक भूमिका नहीं निभा सकता.
साथ ही वे सऊदी-चीन की इस नई साझेदारी के दरम्यान ईरान और चीन के बीच संबंधों को कमज़ोर होते नहीं देखते हैं.
दस्तमलचियान तर्क देते हैं कि ऐतिहासिक रूप से चीन ने कभी भी किसी नए साझेदार के लिए अपने पुराने साझेदार को नहीं छोड़ा है बल्कि वो सभी पक्षों के साथ अपने संबंध मजूबूत करने की कोशिश करता है.
वे कहते हैं कि ईरान इस क्षेत्र में चीन के हितों की सुरक्षा करने में मददगार है क्योंकि उसके बिना चीन इस इलाके में अपनी सुरक्षित उपस्थिति नहीं बना सकता.
अंत में वे कहते हैं कि चीन अरब देशों में अपने पैठ बना रहा है ताकि अमेरिका की कमी का इन देशों में कोई अन्य मुल्क फ़ायदा न उठा सके.
क्या है विवाद?
फारस की खाड़ी में मौजूद अबू मूसा, ग्रेटर तुंब और लेसर तुंब तीन छोटे द्वीप हैं जिन पर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात दोनों ही अपना दावा करते हैं.
यूएई का कहना है कि इतिहास और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के अनुसार इन तीनों द्वीपों पर यूएई का हक़ है और वो उचित मंच पर अपनी ये मांग दोहराता रहेगा.
वहीं ईरान यूएई के इस दावे को बिना आधार के और बेतुका बताता है. उसका कहना है कि इन पर दावा करना ईरान की क्षेत्रीय अखंडता पर हमला करने समान है.
अबू मूसा क़रीब 13 वर्ग किलोमीटर का, ग्रेटर तुंब क़रीब 10 वर्ग किलोमीटर का और लेसर तुंब क़रीब 2 वर्ग किलोमीटर का द्वीप है जिन पर आबादी कम है. हालांकि यहां ईरानी सेना की मौजूदगी है.
ये तीनों द्वीप होर्मूज़ की खाड़ी के पास मौजूद हैं और रणनीतिक तौर पर दुनिया के सबसे अहम जलमार्गों में से एक के पास अपनी मौजूदगी के कारण दोनों मुल्कों के लिए बेहद अहम हैं.
होर्मूज़ की खाड़ी से गुज़रने वाले सभी जहाज़ों को इन तीनों द्वीपों के पास से हो कर गुज़रना पड़ता है. ऐसे में खाड़ी में जहाज़ों की आवाजाही पर नियंत्रण के लिए इन तीनों द्वीपों पर नियंत्रण अहम है.
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