मोदी क्या नहीं जाएंगे रूस और पुतिन क्या नहीं आएंगे भारत, चर्चा गर्म

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ख़ास बातें
- हर साल भारत-रूसवार्षिकबैठक में दोनों मुल्कों के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक होती थी
- इसके साथ-साथ बीते साल से 2 प्लस 2 के फॉर्मैट के तहत भारत और रूस के रक्षा मंत्रियों और विदेश मंत्रियों की बैठक होती है
- वार्षिक समिट के तहत बीते साल दिसंबर में दिल्ली में मोदी-पुतिन की मुलाक़ात हुई थी
- कोरोना महामारी के कारण 2020 में नहीं हो सकी थी बैठक
- इस साल भारत-रूस एनुअल समिट की 22वीं बैठक मॉस्को में होनी थी

भारतीय और विदेशी मीडिया में यह ख़बर सुर्खियों में है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वार्षिक बैठक के लिए रूस नहीं जाएंगे. पिछले साल पुतिन इस बैठक के लिए दिल्ली आए थे और इस साल पीएम मोदी को रूस जाना था. हालाँकि इसे लेकर रूस और भारत की ओर से आधिकारिक रूप से कुछ भी नहीं कहा गया है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स और एएनआई ने सूत्रों के हवाले से कहा है कि संभव है कि भारतीय प्रधानमंत्री रूसी राष्ट्रपति के साथ सालाना बैठक के लिए रूस ना जाएं.
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समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच होने वाली सालाना बैठक इस साल नहीं होगी.
एजेंसी ने सूत्रों के हवाले से यह ख़बर दी है और कहा है कि दोनों नेताओं के बीच सितंबर महीने में बात हुई थी, उस दौरान इसे लेकर भी चर्चा हुई थी.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने ब्लूमबर्ग न्यूज़ के हवाले से ख़बर दी है कि ये फ़ैसला रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की धमकी के बाद लिया गया है.
रॉयटर्स लिखता है कि भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता और दिल्ली में मौजूद रूसी दूतावास के प्रवक्ता ने अब तक इस रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं दी है.
रूसी सरकारी समाचार एजेंसी तासश की एक रिपोर्ट के अनुसार, रूसी राष्ट्रपति कार्यालय के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने पुतिन-मोदी के समिट की संभावना को लेकर इसी सप्ताह कहा था बैठक "इस साल नहीं होगी."
पेस्कोव ने कहा था कि इस साल के आख़िर व्लादिमीर पुतिन की भारतीय प्रधानमंत्री से मुलाक़ात करने की कोई योजना नहीं है.
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इस साल समरकंद में हुई थी मोदी-पुतिन मुलाक़ात
लाइव मिंट ने भी अपनी रिपोर्ट में एक सूत्र के हवाले से कहा है कि भारत और रूस के बीच संबंध मज़बूत हैं लेकिन दोस्ती को लेकर खुलकर सामने आना शायद भारतीय प्रधानमंत्री के हित में ना हो.
रूसी अधिकारी के हवाले से वेबसाइट ने लिखा है कि इस साल ये सम्मेलन नहीं होगा. अधिकारी का दावा है कि इसी साल सितंबर में उज़्बेकिस्तान में हुए एक एससीओ सम्मेलन में भारत ने अपनी स्थिति साफ़ कर दी थी.
सितंबर में उज़्बेकिस्तान के समरकंद में एससीओ की 22वां सम्मेलन हुआ था जिसमें मोदी की मुलाक़ात पुतिन से हुई थी.
अपनी छोटी-सी मुलाक़ात के दौरान मोदी ने पुतिन से कहा था कि "ये युद्ध का दौर नहीं है. हमने फ़ोन पर कई बार दोनों मुल्कों के द्विपक्षीय रिश्तों को लेकर बात की है. हमें अनाज, तेल और खाद संकट का हल तलाशने की ज़रूरत है."
इस दौरान पुतिन ने कहा था, "हम यूक्रेन को लेकर और युद्ध के जुड़ी आपकी चिंता के बारे में जानते हैं. हम भी चाहते हैं कि युद्ध जल्द ख़त्म हो."
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बीते महीनों में मोदी यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेन्स्की से फो़न पर बात कर चुके हैं.
चार अक्तूबर को ज़ेलेन्स्की के साथ फ़ोन पर हुई बातचीत में मोदी ने कहा था कि "सैन्य कार्रवाई के रास्ते मुश्किलों के हल नहीं खोजे जा सकते." उन्होंने कहा था कि ज़रूरत पड़ी तो शांति कायम करने की कोशिशों में भारत अपना पूरा सहयोग देगा.

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बीते साल भारत में हुई थी बैठक
साल 2000 से इन बैठकों का सिलसिला शुरू होने के बाद से ये दूसरी बार होगा जब दोनों मुल्कों के राष्ट्राध्यक्ष निजी तौर पर आमने-सामने नहीं होंगे.
आम तौर पर हर साल दिसंबर के महीने में होने वाली ये बैठक 2020 में कोरोना महामारी के कारण नहीं हो सकी थी.
बीते साल दिसंबर में रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने सालाना आयोजित होने वाले इस बैठक के 21वें संस्करण के लिए दिल्ली पहुंचे थे.
रूसी समाचार एजेंसी ताश के अनुसार मोदी और पुतिन के बीच इस दौरान हुई बातचीत साढ़े तीन घंटे चली थी. इस दौरान दोनों ने आर्थिक, उर्जा, निवेश और तकनीक के क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों पर बात की थी.

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क्या बोले भारतीय विदेश मंत्री
शुक्रवार को भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर एक निजी टीवी चैनल के कार्यक्रम में शामिल हुए, जहाँ उन्होंने कहा कि यूक्रेन और रूस संघर्ष का हल बातचीत और कूटनीति से निकाला जाना चाहिए.
जयशंकर ने कहा था कि कई देश चाहते हैं कि ये युद्ध जल्द से जल्द ख़त्म हो क्योंकि इसका असर अनाज, खाद और तेल की क़ीमतों पर पड़ रहा है.
उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी एक तरह से दुनिया की, ख़ासकर विकासशील देशों की आवाज़ बन गए हैं, क्योंकि युद्ध का बड़ा असर विकासशील देशों पर हो रहा है."
जयशंकर से सवाल किया गया कि क्या संघर्ष ख़त्म करने और शांति के रास्ते पर लौटने के लिए भारत कोशिश करेगा, लेकिन उन्होंने इसका सीधा-सीधा जवाब नहीं दिया.
उन्होंने कहा, "अभी इस पर कुछ भी कहना मुमकिन नहीं है लेकिन इस मामले में काफी कुछ स्थिति पर निर्भर करेगा."
उन्होंने कहा, "मैं इतना कह सकता हूं कि कुछ देश हैं जिनके साथ सभी दूसरे मुल्क अपनी राय साझा करते हैं. हम उन देशों में शामिल हैं."
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भारत को जी20 की अध्यक्षता मिलने और इसमें व्लादिमीर पुतिन के शामिल होने को लेकर एस जयशंकर ने कहा कि आज के ध्रुवीकरण के समय मे सबका साथ और सबका विश्वास बनाए रखना आसान नहीं है.
क्या पुतिन अगले साल जी-20 समिट में भारत आएंगे? इस सवाल के जवाब में जयशंकर ने कहा, ''भविष्य तो भविष्य होता है लेकिन बाली में भी एक समय था जब सबको (लीडर्स) के एक कमरे में रखना मुश्किल लग रहा था. भारत और भी कुछ देश इस काम में लगे थे कि कैसे इंडोनेशिया को इतना सपोर्ट दें कि उनकी अध्यक्षता सफल रहे. सफलता का पैमाना ये था कि जी 20 के सभी नेता आएं और सभी एक कमरे में बैठें और हम ऐसा कर भी पाए लेकिन किस स्तर तक कर पाए वो एक अलग बात है.''
"आगे देखते हैं, जैसा कि मैंने कहा था कि अगर दुनिया की स्थिति देखी जाए तो तनाव है, विवाद है. ऐसे में भारत की ज़िम्मेदारी और बढ़ गई है. लेकिन क्या होगा अभी कहना सही नहीं है."

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जी20 बैठक में शामिल नहीं हुए थे पुतिन
इस साल नवंबर में इंडोनेशिया के बाली में हुए जी20 देशों के सम्मेलन में रूस राष्ट्रपति पुतिन शामिल नहीं हुए थे. उनकी जगह पर विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोफ़ इस बैठक में शिरकत करने पहुँचे थे.
जी20 देशों के सम्मेलन में यूक्रेनी राष्ट्रपति ज़ेलेन्स्की ने वर्चुअल संबोधन दिया था और इनमें रूसी राष्ट्रपति की अनुपस्थिति से चलते इसे जी-19 नाम दिया था.
इस संबोधन के कुछ घंटों बाद लावरोफ सम्मेलन से बाहर निकल गए थे. इस मामले में आयोजक इंडोनेशिया ने कहा कि उनके जाने के कारणों के बारे में कोई जानकारी नहीं है.
इससे पहले सेर्गेई लावरोफ़ के बीमार होने और उन्हें अस्तपाल में भर्ती कराए जाने की ख़बर आई जिसका रूस ने खंडन किया और कहा कि उनके बारे में फ़र्ज़ी ख़बर फैलाई जा रही है.
रूसी विदेश मंत्रालय का प्रवक्ता मारिया ज़खारोवा ने इसे "झूठ की पराकाष्ठा" क़रार दिया था.
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भारत और रूस के रिश्ते
भारत और रूस के बीच लंबे वक़्त से मज़बूत रिश्ते रहे हैं. भारत रूस से बड़ी मात्रा में हथियार ख़रीदता रहा है और हाल के दिनों में वो रूस से तेल भी ख़रीद रहा है.
यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से भारत पर दबाव भी रहा कि वो रूस के ख़िलाफ़ अपनी स्थिति स्पष्ट करे. हालांकि भारत ने इस मामले में संयुक्त राष्ट्र में रूस के ख़िलाफ़ आए प्रस्तावों से ख़ुद को अलग रखा और बातचीत का रास्ता अख्तियार करने की बात की है.
बीते सप्ताह दुनिया की सात बड़ी अर्थव्यवस्थाओं समेत यूरोपीय यूनियन और ऑस्ट्रेलिया ने रूस से होने वाले तेल के निर्यात को लेकर कीमतों की सीमा तय की. ये सीमा इसी सप्ताह सोमवार को लागू हुई थी. इसे प्राइस कैप कहा जा रहा है.
लेकिन इसके बाद भारत ने रूस से तेल ख़रीदने के अपने फ़ैसले का समर्थन करते हुए कहा कि उसे जहां से सस्ता तेल मिलेगा वो वहीं से तेल ख़रीदेगा.
इसी सप्ताह जर्मनी की विदेश मंत्री एनालेना बारबोक से मुलाक़ात के बाद भारतीय विदेश मंत्री ने कहा था कि भारत अपनी उर्जा ज़रूरतें पूरी करने को प्राथमिकता देगा और रूस से तेल ख़रीदना जारी रखेगा.
जयशंकर ने कहा, ये सही नहीं है कि यूरोपीय देश ऊर्जा की अपनी ज़रूरतों को तो प्राथमिकता दें लेकिन "लेकिन भारत को कुछ और करने को कहें."
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