यूक्रेन युद्ध: रूस के पुतिन विरोधी कार्यकर्ता ने जेल से लिखा ख़त

    • Author, सारा रेन्सफ़ोर्ड
    • पदनाम, बीबीसी पूर्वी यूरोप संवाददाता

जब व्लादिमीर कारा-मुरज़ा ने इस साल की शुरुआत में रूस लौटने का एलान किया तो उनकी पत्नी इवजेनिया को इसके जोख़िमों का बख़ूबी एहसास था. फिर भी उन्होंने अपने पति को रोकने की कोशिश नहीं की.

रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया था और इसे युद्ध कहना अपराध घोषित कर दिया था. हज़ारों प्रदर्शनकारी गिरफ़्तार किए जा चुके थे. व्लादिमीर ख़ुद भी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के कट्टर विरोधी थे और उनकी सेना द्वारा ढाए जा रहे ज़ुल्मों की खुलकर आलोचना किया करते थे.

इसके बाद भी व्लादिमीर ने अपना विरोध दर्ज कराने के लिए रूस जाने की ज़िद की.

अब वो जेल मैं क़ैद हैं और उन पर राजद्रोह का केस लगा दिया गया है. पत्नी इवजेनिया को अप्रैल से ही उनसे बात करने की इजाज़त नहीं दी जा रही है.

लेकिन, व्लादिमीर कारा-मुरज़ा ने नज़रबंदी केंद्र नंबर 5 से मुझको एक के बाद एक, कई ख़त लिखे हैं. व्लादिमीर को रूस में दो बार रहस्यमयी तरीक़े से ज़हर देकर जान से मारने की कोशिश की गई. लेकिन, वो कहते हैं कि वतन वापसी का उन्हें कोई अफ़सोस नहीं है. क्योंकि इस वक़्त ख़ामोश रहने की जो क़ीमत है, वो उनके लिए 'क़तई बर्दाश्त के क़ाबिल नहीं'.

वैसे, यूक्रेन पर हमले से पहले से ही रूस में राष्ट्रपति पुतिन का विरोध करना बेहद ख़तरनाक था. लेकिन, रूस के हमले के बाद से तो विरोध के सुरों के दमन का सिलसिला और तेज़ हो गया है. इस चलन के बाद भी जो कुछ व्लादिमीर के साथ किया जा रहा है, वो और भी कठोर है.

व्लादिमीर के ऊपर लगे सभी आरोप यूक्रेन युद्ध और राष्ट्रपति पुतिन के ख़िलाफ़ बयान देने के हैं. फिर भी उनके वकील का आकलन है कि इन सारे आरोपों के चलते उन्हें 24 साल रूस के जेलों में गुज़ारने पड़ सकते हैं.

जेल की कोठरी से लिखे अपने एक ख़त में व्लादिमीर कहते हैं कि, 'हम सबको रूस में विरोध जताने के ख़तरों का बख़ूबी एहसास है. लेकिन, जो कुछ हो रहा है, उसे देखकर मैं ख़ामोश नहीं बैठ सकता था. क्योंकि, ख़ामोशी एक तरह से उसमें साझीदार बनना है.'

व्लादिमीर को ये लग रहा था कि वो विदेश में नहीं टिके रह सकते थे. वो कहते हैं कि, 'मुझे ये ठीक नहीं लगा कि मैं दूसरे लोगों को तो साहस दिखाने और विरोध जताने के लिए कहता रहूं, और ख़ुद अपनी सियासी गतिविधियां विदेश में महफ़ूज़ बैठकर चलाता रहूं.'

पत्नी और परिवार की चिंता

इवजेनिया को पहली बार अपने पति की गिरफ़्तारी के बारे में तब पता चला, जब उनके वकील ने फोन किया. ये वकील, अपने मुवक्किल के फ़ोन को ट्रैक कर रहे थे.

वो हर बार तब ऐसा करते थे, जब उनके मुवक्किल और दोस्त व्लादिमीर मॉस्को में होते थे. 11 अप्रैल को व्लादिमीर के फ़ोन की आख़िरी लोकेशन मॉस्को के एक थाने की दिख रही थी. उसके बाद उसमें हरकत बंद हो गई.

बड़ी मिन्नतों के बाद आख़िरकार व्लादिमीर को अपनी पत्नी को फ़ोन करने की इजाज़त दे दी गई. इवजेनिया, अपनी हिफ़ाज़त के लिए अपने बच्चों के साथ अमेरिका में रहती हैं. वो कहती हैं कि फ़ोन पर उनके पति को बस इतना वक़्त दिया गया कि वो कह सकें, 'फ़िक्र मत करो'!

अपने पति के उस निर्देश की वाहियात हक़ीक़त का एहसास करके आज इवजेनिया मुस्कुरा उठती हैं.

व्लादिमीर और इवजेनिया, सोवियत संघ में खुलेपन (पेरेस्त्रोइका) की नीति की पैदाइश थे. वो उस दौर के रूस में पले-बढ़े थे, जब सोवियत संघ के विघटन के बाद, रूस में लोकतांत्रिक जागरूकता फैल रही थी.

उसके बाद व्लादिमीर ने कैम्ब्रिज में पढ़ाई की और इसके साथ साथ उन्होंने रूस की राजनीति में भी अपना करियर शुरू किया था. वो युवा सुधारक बोरिस नेमत्सोव के सलाहकार बन गए थे.

व्लादिमीर और इवजेनिया ने 2004 में वैलेंटाइन डे के दिन शादी की थी. उसके बाद से ये पहली बार है, जब मियां-बीवी इतने लंबे वक़्त के लिए एक-दूसरे से जुदा हुए हैं.

व्लादिमीर कहते हैं कि इस क़ैद की सबसे तकलीफ़देह बात यही है कि वो अपने परिवार से नहीं मिल सकते हैं. वो कहते हैं कि, 'मैं हर दिन, हर पल उनके ही बारे में सोचता हूं और ये तसव्वुर भी नहीं कर पाता हूं कि वो इस वक़्त किन हालात से गुज़र रहे होंगे.'

हाल ही में जब लंदन में मेरी मुलाक़ात इवजेनिया से हुई, तो उन्होंने कहा कि, 'मैं इस इंसान की निष्ठा के लिए उनसे मोहब्बत भी करती हूं और नफ़रत भी'.

वो कहती हैं कि, 'व्लादिमीर को उन लोगों के साथ वहीं होना चाहिए था जो साहस करके सड़कों पर विरोध जताने उतर रहे थे और गिरफ़्तार हो रहे थे.' इवजेनिया का इशारा उन रूसी नागरिकों की तरफ़ है, जिन्हें युद्ध का विरोध करने के चलते हिरासत में लिया गया.

वो कहती हैं कि, 'मेरे पति ये दिखाना चाहते थे कि शैतान से सामना होने पर आपको क़तई नहीं डरना चाहिए. मैं इस बहादुरी के लिए उनका तह-ए-दिल से सम्मान करती हूं. उनकी तारीफ़ करती हूं.'

व्लादिमीर को शुरुआत में तो एक पुलिस अधिकारी की बात न मानने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. लेकिन, एक बार क़ैद किए जाने के बाद से तो मानो उनके ऊपर गंभीर आरोपों की झड़ी ही लगा दी गई.

एरिज़ोना के भाषण में व्लादिमीर ने क्या कहा था

पहले व्लादिमीर पर रूस की सेना और 'बड़े नेताओं' के ख़िलाफ़ 'झूठी बातों के प्रचार' का आरोप लगाया गया.

अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन ओवीडी-इन्फो ने युद्ध के बाद से 'फेक न्यूज़' क़ानून के तहत 100 से ज़्यादा लोगों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की जानकारी जुटाई है.

एक स्थानीय पार्षद एलेक्सी गोरिनोव को जुलाई में सात साल के लिए क़ैद की सज़ा सुनाई गई थी और एक सियासी कार्यकर्ता इलिया याशिन का मुक़दमा बहुत जल्द शुरू होने वाला है. इलिया ने यूक्रेन के बुचा शहर में आम नागरिकों के क़त्ल की बात कही थी.

व्लादिमीर का मामला, अमेरिका के एरिज़ोना में दिए गए उनके एक भाषण से जुड़ा है. उस भाषण में व्लादिमीर ने कहा था कि रूस, यूक्रेन में रिहाइशी इलाक़ों में क्लस्टर बम बरसाकर और 'जच्चा-बच्चा अस्पतालों और स्कूलों पर बम बरसाकर' युद्ध अपराध कर रहा है.

इन सारी घटनाओं से जुड़े सुबूत स्वतंत्र रूप से भी जुटाए गए हैं. लेकिन, व्लादिमीर के ख़िलाफ़ दर्ज जिस चार्जशीट को मैंने देखा है, उसके मुताबिक़ रूस के जांचकर्ताओं ने व्लादिमीर के बयानों को झूठा पाया है, क्योंकि रूस का रक्षा मंत्रालय अपनी सेना को 'युद्ध के दौरान प्रतिबंधित तौर तरीक़े अपनाने की इजाज़त नहीं देता है'.

रूस का रक्षा मंत्रालय बार-बार इस बात पर भी ज़ोर देता है कि यूक्रेन के आम नागरिक 'उसके निशाने पर' नहीं हैं.

हालांकि, ज़मीनी हक़ीक़त की अनदेखी कर दी जाती है.

व्लादिमीर पर लगा एक और आरोप, सियासी क़ैदियों के लिए आयोजित एक कार्यक्रम से जुड़ा है. रूस में सियासी मुहिम चलाने वाले इसे रूस की 'दमनकारी नीतियां' कहते हैं.

पिछले महीने व्लादिमीर पर राजद्रोह का मुक़दमा दर्ज किया गया था.

इसके जवाब में व्लादिमीर ने अपने सबसे ताज़ा ख़त में प्रतिक्रिया दी है. वो कहते हैं कि, 'पुतिन की सरकार अपने विरोधियों को ग़द्दार के तौर पर पेश करना चाहती है...

लेकिन असली ग़द्दार तो वो लोग हैं, जो हमारे देश की भलाई, उसकी इज़्ज़त और भविष्य को अपनी निजी ताक़त बढ़ाने के नाम पर क़ुर्बान करना चाहते हैं. ग़द्दार वो नहीं हैं, जो इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं.'

सियासी ज़ुल्म

व्लादिमीर के ख़िलाफ़ जो राजद्रोह का मुक़दमा दर्ज किया गया है, वो विदेश में उनकी तीन तकरीरों पर आधारित है. इसमें से एक में व्लादिमीर ने ये भी कहा था कि रूस में सियासी विरोधियों का दमन किया जाता है.

वहीं, तफ़्तीश करने वालों का दावा है कि वो अमेरिका स्थिति फ्री रशिया फाउंडेशन की ओर से बयान दे रहे थे. रूस में इस संगठन पर पाबंदी लगी हुई है.

किसी प्रतिबंधित विदेशी संगठन को 'सलाह देना' या 'मदद करना', रूस की सुरक्षा के लिए ख़तरा माना जाता है, जिसे रूस में राजद्रोह कहा जा सकता है.

हालांकि, रूस की कोई गोपनीय जानकारी साझा नहीं की गई है.

व्लादिमीर के वकील वादिम प्रोखोरोव, मॉस्को से मुझसे फ़ोन पर बात करते हुए कहते हैं कि, 'अजब हाल है. सार्वजनिक भाषणों के लिए राजद्रोह का मुक़दमा होता है भला? महज़ अपनी राय जताने के लिए. किसी असली अपराध के लिए नहीं.'

कैसा था व्लादिमीर का पारिवारिक जीवन

प्रोखोरोव कहते हैं कि जब व्लादिमीर ने वो भाषण दिया था, तो उनका फ्री रशिया फाउंडेशन से कोई ताल्लुक़ ही नहीं था. वो आगे कहते हैं कि, 'ये तो एक सियासी मामला है. वो रूस में एक सामान्य और सहज सियासी विरोध जताने को भी कलंकित करना चाहते हैं.'

व्लादिमीर ख़ुद ये बताते हैं कि सियासी विरोध के लिए रूस में आख़िरी बार किसी पर राजद्रोह का मुक़दमा 1974 में नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक एलेक्ज़ेंडर सोल्झेनित्सिन पर चलाया गया था. व्लादिमीर कहते हैं कि, 'मैं राजद्रोह के मुक़दमे पर बस यही कह सकता हूं कि मैं बड़े कद्दावर लोगों की सोहबत में आकर सम्मानित महसूस कर रहा हूं.'

इवजेनिया के लिए शांत रह पाना बेहद मुश्किल होता है.

हालांकि ये पहली मर्तबा नहीं है जब वो अपने पति की हिफ़ाज़त को लेकर इतनी डरी हुई हैं. मॉस्को में रहस्यमयी तरीक़े से ज़हर दिए जाने के चलते, वो कम से कम दो बार मौत की कगार तक पहुंच चुके हैं.

2015 में जब वो अचानक गिरकर कोमा में चले गए थे, तो डॉक्टरों ने इवजेनिया को बताया था कि उनके पति के बचने की उम्मीद महज़ पांच फ़ीसद है. लेकिन, व्लादिमीर तब मौत के मुंह से ज़िंदा बचकर निकल आए थे.

इवजेनिया ने उनकी ख़िदमत कर-कर के उन्हें फिर सेहतमंद बनाया. उन्हें दोबारा काम करना सीखने में मदद की. यहां तक कि अपने पति को उन्होंने चम्मच पकड़ना सिखाया.

तब भी व्लादिमीर काम करने की ज़िद करते थे और उनके काउच पर बैठकर वो लैपटॉप पर काम करते थे. जबकि उस वक़्त व्लादिमीर हर आधे घंटे में बीमार हो जाते थे.

इवजेनिया कहती हैं कि, 'जैसे ही वो चलने लायक़ हो गए, उन्होंने अपना बोरिया-बिस्तर बांधा और रूस पहुंच गए. ये लड़ाई उनके डर से बहुत बड़ी है.'

इवजेनिया के लिए इसका मतलब सात बरस तक अपना फ़ोन साथ में रखकर सोना भी था. वो कहती हैं कि, 'मैं हर वक़्त ये सोचकर डरी रहती थी कि कभी भी उनका या किसी और का फ़ोन आ सकता है, क्योंकि ख़ुद व्लादिमीर तो अब बात नहीं कर पाते हैं.'

इवजेनिया ने अपने पति को रूस जाने से रोकने की कोशिश के मामले में हथियार डाल दिए थे, वो बस इतना ही विरोध दर्ज कर पाती थीं कि व्लादिमीर उन्हें अपना बैग भी नहीं पैक करने देते थे. लेकिन, पिछली बार जब युद्ध शुरू होने के बाद व्लादिमीर, मॉस्को गए थे, तो इवजेनिया, फ्रांस तक उनके साथ ही आई थीं.

उन दिनों को याद करके बमुश्किल अपने आंसू रोकते हुए इवजेनिया कहती हैं कि, 'मैं उस सफ़र को ख़ूबसूरत बनाना चाहती थी. हम पेरिस की सड़कों पर पैदल ही लंबी दूरियां तय करते थे. लगातार बातें करते रहते थे. अपने दिल की गहराइयों में कहीं मुझे ये एहसास तो था कि आगे क्या होने वाला है.'

नेमत्सोव का ठिकाना

व्लादिमीर की गिरफ़्तारी के बाद से इवजेनिया ने उनका काम संभाल लिया है. वो यूक्रेन में युद्ध और रूस में सियासी दमन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के साथ साथ अपने पति का मामला भी उठाती रहती हैं.

इसी सोमवार को वो लंदन में बोरिस नेमत्सोव प्लेस का उद्घाटन करने वाली हैं. ये व्लादिमीर की अपने दोस्त और मेंटॉर को सम्मान दिलाने की लंबी मुहिम का नतीजा है. नेमत्सोव, रूस के प्रमुख सियासी विरोधी नेता थे. 2015 में क्रेमलिन के पास भाड़े के हत्यारों ने उनकी हत्या कर दी थी. उनके क़त्ल का ठेका देने वाला अब तक पकड़ा नहीं जा सका है.

लंदन की जिस सड़क का नाम बोरिस नेमत्सोव के नाम पर रखा गया है, वो दरअसल एक गोल चक्कर है और हाईगेट पर रूस के व्यापार प्रतिनिधिमंडल के दफ़्तर के बेहद क़रीब है.

इवजेनिया कहती हैं कि, 'इस चौराहे का नाम नेमत्सोव के नाम पर रखने के पीछे का विचार दरअसल ये था कि हाईगेट के बड़े दरवाज़े पर जो भी कार आएगी, उसमें बैठे लोगों को बोरिस नेमत्सोव के नाम की पट्टी ज़रूर दिखाई देगी.

' इवजेनिया बताती हैं कि उनके पति ये मानते हैं कि एक न एक दिन ज़रूर ऐसा आएगा, जब रूस अलग तरह का होगा और बोरिस नेमत्सोव के नाम पर गर्व करेगा.

बोरिस नेमत्सोव ने कई बरस तक व्लादिमीर के साथ मिलकर काम किया था. पश्चिमी देशों को इस बात के लिए राज़ी करने की मुहिम चलाई थी कि मानव अधिकारों के उल्लंघन के लिए रूस के वरिष्ठ अधिकारियों और नेताओं पर पाबंदी लगाई जानी चाहिए.

इस मुहिम में बोरिस और व्लादिमीर की कामयाबी से रूस का सत्ताधारी वर्ग बेहद ख़फ़ा हो गया था क्योंकि उससे पहले वो आराम से विदेशी दौरे करते थे और अपनी अवैध कमाई विदेशों में जमा करते थे.

एक बार मॉस्को में व्लादिमीर ने मुझे बताया था कि वो इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि पश्चिमी देशों द्वारा 'मैग्नित्सकी एक्ट' के तहत रूसियों पर लगाई गई पाबंदियों के चलते ही बोरिस और उन्हें जान से मारने की कोशिशें की गईं.

अपने पति की जगह लेने की इवजेनिया को भारी क़ीमत चुकानी पड़ रही है. लेकिन, वही जज़्बा उनकी ताक़त भी बन गया है.

वो कहती हैं कि, 'मैं वही कर रही हूं, जो मुझे करना चाहिए था ताकि उन्हें अपने बच्चों से वापस मिला सकूं और ये जंग रुक जाए. ताकि इस क़ातिल हुकूमत को इंसाफ़ के दरवाज़े पर खड़ा किया जा सके.'

जेल में क़ैद व्लादिमीर भी ख़ामोश नहीं बैठे हैं.

जेल में हाथ से लिखे उनके लंबे ख़त इस बात की गवाही देते हैं कि रूस हमेशा ही तानाशाही के शिकंजे में तड़पने के लिए अभिशप्त नहीं है. न ही उसका हर नागरिक पुतिन का अंधभक्त है.

जेल में वक्त कैसे बिताते थे व्लादिमीर

व्लादिमीर बड़ी तादाद में अपने पास आने वाली उन चिट्ठियों की तरफ़ इशारा करते हैं, जो पूरे रूस से उनके समर्थक भेजा करते हैं. इन चिट्ठियों में यूक्रेन पर हमले और रूस की मौजूदा सरकार की खुली आलोचना होती है.

व्लादिमीर उन लोगों का भी हवाला देते हैं, जो तमाम जोखिम के बावजूद अभी भी सड़कों पर उतरकर विरोध जता रहे हैं. व्लादिमीर पश्चिमी देशों से ये अपील करते हैं कि वो रूसी समाज के इन नागरिकों को अलग थलग न करें, जो 'अपने देश का एक अलग मुस्तकबिल चाहती है.'

वो ये चेतावनी भी देते हैं कि जब तक पुतिन सत्ता में हैं, तब तक यूक्रेन में जंग ख़त्म नहीं होगी.

व्लादिमीर लिखते हैं कि, 'पुतिन के लिए समझौता करना कमज़ोरी की निशानी है, जिससे दुश्मन और आक्रामक हो जाता है. अगर पुतिन को इस जंग से ठीक-ठाक शर्तों के साथ निकलने की राह दे दी गई, तो एक या दो साल में वो दूसरा मोर्चा खोल देंगे.'

व्लादिमीर कहते हैं कि वो क़ैद में अपना वक़्त वर्ज़िश करने, प्रार्थना करते, किताबें पढ़ने और चिट्ठियां लिखने में बिताते हैं. एक इतिहासकार के तौर पर उन्हें सोवियत संघ के दौर में हुकूमत के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वालों में ज़बरदस्त दिलचस्पी है. अब जब वो अपना मुक़दमा शुरू होने का इंतज़ार कर रहे हैं, तो वो इन बाग़ियों के बारे में ख़ूब पढ़ते हैं.

अपने ख़त में व्लादिमीर लिखते हैं कि, 'उस वक़्त सोवियत संघ के उन क़ैदियों का जाम टकराने का पसंदीदा जुमला 'अपने नाउम्मीदी भरे मक़सद की कामयाबी के नाम' था. लेकिन, आज हम सबको पता है कि उनकी लड़ाई इतनी नाउम्मीदी भरी भी नहीं थी.'

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