व्हीलचेयर पर करतारपुर पहुँचे बिशन सिंह बेदी, इंतिख़ाब आलम ने कहा - लवली टू सी यू

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- Author, अब्दुल रशीद शकूर
- पदनाम, बीबीसी के लिए, कराची से
'लवली टू सी यू' भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान बिशन सिंह बेदी इस बात को सुनने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे. इस इंतज़ार में नौ साल बीत गए थे, और आख़िरकार अपने पुराने दोस्त इंतिख़ाब आलम को अपनी आंखों के सामने देखने की उनकी इच्छा पूरी हो गई.
इन दोनों दोस्तों को 4 अक्तूबर को करतारपुर में मिलने का मौक़ा मिला. करतारपुर को भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद इसे बिछड़े हुए अपनों के मिलने का केंद्र कहा जाने लगा है.
सीमा के दोनों ओर के लोग अपनों से मिलने के लिए यहां जाते हैं और इन मुलाक़ातों की भावनात्मक तस्वीरें देखने को मिलती हैं. इंतिख़ाब आलम और बिशन सिंह बेदी की मुलाक़ात भी इन भावनाओं से ख़ाली नहीं थी.
बीबीसी उर्दू से बात करते हुए पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान इंतिख़ाब आलम ने कहा कि यह एक भावनात्मक पल था क्योंकि काफ़ी लंबे समय के बाद हम दोनों आमने-सामने हैं.
बिशन सिंह बेदी को इस यात्रा के लिए एक दिन का वीज़ा मिला था, जो आमतौर पर करतारपुर जाने वाले भारतीय नागरिकों को मिलता है ताकि वो वहां पाकिस्तान में रहने वाले अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से मिल सकें.
इंतिख़ाब आलम बताते हैं, ''बिशन सिंह बेदी पिछले कुछ समय से काफ़ी बीमार हैं. लेकिन, डॉक्टरों ने उन्हें यात्रा करने की इजाज़त दे दी थी इसलिए उन्होंने इस मुलाक़ात का मौक़ा नहीं छोड़ा. वह इस मुलाक़ात के लिए व्हीलचेयर पर आए थे. जब हम दोनों की नज़रें मिलीं तो मैंने देखा कि बेदी को अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था.''
''मैंने उनसे कहा, 'लवली टू सी यू' और ये कहकर हमने एक-दूसरे को झप्पी डाली और गले लग गए. उस वक़्त दोनों की आंखों में आंसू थे. इस मौक़े पर हम दोनों के अलावा पूर्व टेस्ट क्रिकेटर शफ़क़त राणा और हमारे परिवार के अलावा कोई और मौजूद नहीं था.''
इंतिख़ाब आलम कहते हैं, ''आख़िरी बार हम दोनों जनवरी 2013 में कलकत्ता के ईडन गार्डन में मिले थे, जब पाकिस्तान और भारत के कप्तानों को वहां आमंत्रित किया गया था, उसके बाद हम फ़ोन और व्हाट्सएप पर बात करते थे. हालांकि, डेढ़ साल पहले बिशन सिंह बेदी लकवे के कारण बहुत बीमार हो गए थे और लंबे समय से उनकी मुझसे मिलने की इच्छा थी.''

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अमेरिकी गायक की मिमिक्री पर बेदी हंस पड़े
इंतिख़ाब आलम और बिशन सिंह बेदी दोनों का सेंस ऑफ़ ह्यूमर गजब है. इस मुलाक़ात में इंतिख़ाब आलम ने बिशन सिंह बेदी को कुछ चुटकुले भी सुनाए और अमेरिकी गायक लुइस आर्मस्ट्रांग की मिमिक्री करते हुए एक गाना भी सुनाया, जिस पर बिशन सिंह बेदी की पत्नी का कहना था कि इंतिख़ाब भाई आपकी बहुत तारीफ़ सुनी है कि आप इस गायक की बहुत अच्छी मिमिक्री करते हैं. आज आपने बेदी साहब को हंसा दिया है.
इंतिख़ाब आलम ने कहा, "मैं अपने करियर में स्कॉटलैंड में भी खेल चुका हूँ, वहां मेरी टीम में एक क्रिकेटर था जो लुइस आर्मस्ट्रांग के गाने गाता था. मैंने उस क्रिकेटर से ये गाने सीखे और फिर मैं उनकी मिमिक्री कर लेता था."
''जब बेदी और मैं 1971 में वर्ल्ड इलेवन की तरफ़ से ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर थे, तो उस समय वीकेंड पर खिलाड़ियों की पार्टी में मुझसे लुइस आर्मस्ट्रांग की आवाज़ में गाने के लिए कहा जाता था.''

आप मेरे पीछे क्यों पड़ गए हैं?
इंतिख़ाब आलम ने कहा, ''वैसे तो बिशन सिंह बेदी और मैं साठ के दशक में काउंटी क्रिकेट खेलना शुरू कर चुके थे, लेकिन सही मायनों में हमारी दोस्ती 1971 में शुरू हुई थी जब भारत और पाकिस्तान की टीम इंग्लैंड के दौरे पर थीं. भारतीय टीम का एक मैच मेरी काउंटी सरे के ख़िलाफ़ था.
मुझे याद है कि मैंने बेदी की गेंदों पर लगातार दो छक्के मारे तो उन्होंने मुझ पर जुमला कसा कि आप मेरे ही पीछे क्यों पड़ गए हो? और भी दो स्पिनर परसन्ना और शेखर भी तो हैं उन्हें छक्के क्यों नहीं मारते हो?''

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पत्नी का पाकिस्तान से गहरा नाता
बिशन सिंह बेदी बीमारी के कारण बहुत कम बात कर पाते हैं. उनकी पत्नी ने बीबीसी उर्दू को बताया कि जब बेदी साहब इंतिख़ाब आलम और शफ़क़त राणा से मिल रहे थे, तो उन्होंने ख़ास तौर पर यह महसूस किया कि बेदी साहब के चेहरे पर एक अजीब-सी ख़ुशी थी.
बेदी साहब की पत्नी का कहना है कि उनका पाकिस्तान से गहरा नाता है क्योंकि उनके माता-पिता पाकिस्तान के थे और मुरी में मेरे पिता की भी एक दुकान थी.
वह कई बार पाकिस्तान जा चुकी हैं और अपने पिता का घर और दुकान देखने के लिए पेशावर और मुरी भी जा चुकी हैं. पाकिस्तान आकर उन्हें सबसे अच्छी चीज़ पाकिस्तानियों की मोहब्बत लगी.

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'पता नहीं अब कब मुलाक़ात हो'
बिशन सिंह बेदी और इंतिख़ाब आलम ने करतारपुर में पूरा दिन एक साथ बिताया और अपनी दोस्ती के यादगार पलों को ख़ूब याद किया.
लेकिन इंतिख़ाब आलम के मुताबिक़, वह पल हम दोनों के लिए बहुत भारी था जब हम इस गलियारे में एक-दूसरे को अलविदा कहकर वापस लौट रहे थे, उस वक़्त बिशन सिंह बेदी बहुत भावुक हो गए और कहा कि ख़ुशी है कि हम मिल लिए हैं, 'पता नहीं अब दोबारा मिल भी पायें या नहीं.
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