ट्रूमैन सिद्धांत: वो 33 सेकंड जिससे 75 साल पहले हुई शीत युद्ध की शुरुआत

ट्रूमैन

कैपिटल हिल पर खचाखच भरे हाउस ऑफ रिप्रेज़ेंटेटिव्स में गोल चश्मे, गहरे रंग का सूट और धारीदार टाई पहने संयुक्त राज्य अमेरिका के 33वें राष्ट्रपति 62 साल के हैरी ट्रूमैन ने काले बिखरे हुए फोल्डर को खोला, जिसमें से उन्हें अपना भाषण पढ़ना था.

उन्होंने पानी का एक घूंट लिया, कमरे में चारों ओर मौजूद लोगों को देखा, और पोडियम पर हाथ टिका दिए. और कहा-

"आज दुनिया के सामने जो हालात हैं, उसकी गंभीरता के मद्देनजर कांग्रेस के संयुक्त सत्र में मेरी मौजूदगी की ज़रूरत है. इसमें देश की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला शामिल है."

यह 12 मार्च 1947 की बात है.

सिर्फ दो साल पहले ही, ऐसी सोच पैदा हो गई थी कि हिटलर के जर्मनी के खिलाफ जीत से अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा पक्की हो गई है.

लेकिन उस मौके पर राष्ट्रपति ने इससे भी गंभीर खतरे की तरफ ध्यान दिलाया.

ट्रूमैन सिद्धांत ने, बाद में जिस नाम से वह भाषण जाना गया, साम्यवाद और सोवियत संघ को नियंत्रण में रखने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका और द्वितीय विश्व युद्ध के इसके सहयोगियों से एकजुट होने का आग्रह किया.

हालांकि शीत युद्ध की शुरुआत कब हुई यह जटिल और बड़ी बहस का मुद्दा है, और निश्चित रूप से ट्रूमैन सिद्धांत इसका कारण नहीं था, मगर कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह वह लम्हा था, जब इसकी घोषणा की गई थी.

आशा इतनी जल्दी डर में क्यों बदल गई?

क्या बदल गया था?

कुछ खास नहीं. यह कहना है कि वर्जीनिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर एमिरेट्स और शीत युद्ध और अमेरिकी विदेश नीति पर कई किताबों के लेखक अवॉर्ड विजेता इतिहासकार मेल्विन लेफलर का. उनके मुताबिक सोवियत संघ की बनावट से ही उसके संबंध पश्चिम के साथ तनावपूर्ण हो गए थे.

" संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने 1917, 1918, 1919 में रूस में दखल दिया था."

"पूरे दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान पश्चिमी यूरोप में दूसरा मोर्चा खोलने को लेकर तनाव था. स्टालिन यह 1942 में खोलना चाहते थे, और निश्चित रूप से ऐसा 1944 तक नहीं हुआ."

ट्रूमैन सिद्धांत' के असर के कारण संकट का स्टालिन के समय का एक कैरिकेचर

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"इसके अलावा, अमेरिकियों और अंग्रेज़ों ने एक परमाणु बम बना लिया था और इसे स्टालिन से गुप्त रखा, जिन्हें अपने जासूसों से इसकी खबर मिली, जबकि अमेरिकियों को पता था कि उनकी जासूसी की जा रही है."

"लेकिन धुरी राष्ट्रों - नाजी जर्मनी, इटली और जापान - को हराने की ज़रूरत ने बाकी सारे मुद्दों को दरकिनार कर दिया था."

डोमिनो सिद्धांत

लड़ाई खत्म होते ही अमेरिकी नीति निर्माताओं की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना था कि किसी भी विरोधी के पास यूरोप और एशिया के संसाधनों पर नियंत्रण रखने की संभावना न हो.

इतिहासकार लेफ़लर साफ करते हैं, "1946 और 1947 में बड़ा डर यह नहीं था कि स्टालिन का यूएसएसआर सीधे सैन्य हमले में शामिल होगा."

इतिहासकार ने बीबीसी द फोरम को बताया, "बड़ा डर यह था कि वह लड़ाई के बाद के यूरोप में मौजूदा सामाजिक उथल-पुथल और राजनीतिक उथल-पुथल का फायदा उठा सकता है. न केवल पूर्वी यूरोप और मध्य यूरोप के कुछ हिस्सों में- जहां उसके सैनिक थे- बल्कि पूरे दक्षिणी और पश्चिमी यूरोप में, जहां कम्युनिस्ट पार्टियों ने इटली और फ्रांस में बड़ी कामयाबी से सत्ता के लिए दावेदारी थी.

इसके अलावा कम्युनिस्टों ने चीन में गृहयुद्ध छेड़ रखा था, और उनकी जीत का मतलब था कि स्टालिन पूरे पूर्वी एशिया में अपना प्रभाव जमाने में कामयाब होते.

और "डोमिनो सिद्धांत" जिसने दशकों तक अमेरिकी विदेश नीति को प्रभावित किया, के अनुसार संभावना और भी भयानक थी, जिसका मानना था कि एक साम्यवाद से एक गैर-कम्युनिस्ट देश की "हार" से पड़ोसी गैर-कम्युनिस्ट देशों में भी इसे बढ़ावा मिलेगा.

शब्द बाण

अनगिनत गतिविधियों के अलावा, जो बात हर पक्ष को परेशान कर रही थी वह था शब्द-बाणों का बाहुल्य, जिसने ट्रूमैन सिद्धांत के लिए रास्ता तैयार किया.

स्टालिन ने 1946 के सोवियत संघ की संसद के चुनाव की पूर्व संध्या पर अपना भाषण दिया.

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9 फरवरी, 1946 को मॉस्को में स्टालिन ने युद्ध के बाद के अपने पहले महत्वपूर्ण भाषण में एक और बड़ी लड़ाई की संभावना को हवा दी, जिसे उन्होंने छिपे शब्दों में "विश्व अर्थव्यवस्था की पूंजीवादी व्यवस्था" कहा.

उन्होंने घोषणा की कि बड़ी "सैन्य तबाही" अपरिहार्य है, क्योंकि देशों में "समन्वित और शांतिपूर्ण निर्णयों" के माध्यम से कार्रवाई करने का कोई तरीका नहीं है.

"पूंजीवादी देशों का अनियमित विकास समय के साथ उनके संबंधों में गंभीर संघर्ष की ओर ले जाता है और जिन देशों के समूह महसूस करते हैं कि उन्हें कच्चा माल और निर्यात बाजार पर्याप्त रूप से नहीं मिले हैं, हालात को बदलने और हथियारों के बल पर चीजों को अपने पक्ष में करने के लिए कोशिश करते हैं."

इसलिए, आने वाले सालों में "सभी संकटों के खिलाफ" यूएसएसआर को अपने संसाधनों और ऊर्जा को बुनियादी उद्योगों के विकास के लिए सुसज्जित करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा.

एक लंबा टेलीग्राम

यूएसए के ओहियो के वूस्टर में द कॉलेज ऑफ एजुकेशन में संचार अध्ययन के प्रोफेसर डेनिस बोस्टडॉर्फ ने बीबीसी द फोरम को बताया, "ट्रूमैन सहित कई अमेरिकी अफसरों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया. हालांकि, दूसरे लोगों ने इस भाषण को तीसरे विश्व युद्ध की घोषणा के रूप में देखा."

उदाहरण के लिए स्टालिन ने कहा कि, "वह विज्ञान की उपलब्धियों को देश के बाहर पहुंचाने के लिए विज्ञान को फाइनेंस करना चाहते हैं. और फिक्रमंद श्रोताओं ने इसका मतलब निकाला उनका आशय परमाणु बम से था. और जब उन्होंने कहा कि यूएसएसआर अपने इस्पात उत्पादन को तीन गुना करेगा तो अमेरिकी अधिकारियों और कुछ मीडिया संस्थानों ने इसका मतलब निकाला कि वह पश्चिम के साथ लड़ाई की तैयारी कर रहे हैं."

विदेशी मामलों के लिए जिम्मेदार अमेरिकी विदेश विभाग ने मास्को में अपने दूतावास से सोवियत विस्तारवाद और विश्व को लेकर उसके इरादों के विश्लेषण के लिए कहा.

तत्कालीन अपेक्षाकृत कम चर्चित राजनयिक जॉर्ज केनन की प्रतिक्रिया धमाकेदार थी.

केनन विदेश नीति के सम्मानित समूह, जिसे "द वाइज मेन" के नाम से जाना जाता है, के सदस्यों में से एक थे

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"केनन ने 8,000 शब्दों का एक टेलीग्राम तैयार किया जिसमें उन्होंने बड़ी मात्रा में रूपकों का इस्तेमाल किया: साम्यवाद एक बीमारी की तरह है, जो शरीर की पवित्रता का उल्लंघन करता है और इसे अंदर से तबाह कर देता है."

"वह ट्रेड यूनियनों, नागरिक अधिकार संगठनों, सांस्कृतिक समूहों में कम्युनिस्टों के संभावित घुसपैठ के बारे में भी फिक्रमंद थे, और उस हालत में भी दुश्मन अंदर ही था और यह घुसपैठ लगभग बलात्कार जैसी है."

उन्होंने चेतावनी दी कि सोवियत नीतियों ने पश्चिम से दुश्मनी पैदा कर ली है और सोवियत विस्तारवाद टाला नहीं जा सकता है. उनके ख्याल में मॉस्को ज़ोरदार विरोध से ही डरेगा, चाहे वह राजनीतिक हो या सैन्य. उन्होंने "लंबी बीमारी के मरीज पर कठोर और सजग नियंत्रण" की नीति की सिफारिश की.

"द लॉन्ग टेलीग्राम" के नाम से मशहूर हुआ यह टेलीग्राम बड़े पैमाने पर प्रसारित हुआ और इसने दूसरे किस्म के ज्यादा तर्कसंगत विश्लेषणों को खामोश करा दिया.

"शांति के स्तंभ"

कुछ हफ्ते बाद मार्च 1946 की शुरुआत में मिसौरी के फुल्टन में दिए एक भाषण में ब्रिटेन के युद्धकालीन नेता विंस्टन चर्चिल ने उस शाब्दिक-युद्ध में अपना योगदान देते हुए, "यूरोप में मौजूदा हालात के बारे में कुछ तथ्य" सामने रखे.

"बाल्टिक सागर में स्टेटिन से एड्रियाटिक सागर में ट्रिएस्टे तक महाद्वीप पर लोहे की एक दीवार बना दी गई है."

"इसके पीछे मध्य और पूर्वी यूरोप के प्राचीन देशों की सभी राजधानियां हैं. मुझे कहना पड़ेगा कि वारसॉ, बर्लिन, प्राग, वियना, बुडापेस्ट, बेलग्रेड, बुखारेस्ट और सोफिया, ये सभी मशहूर शहर और उनकी आबादी और उनके आसपास के देश किसी न किसी न तरह सोवियत प्रभाव के अधीन हैं. और न केवल सोवियत प्रभाव, बल्कि कई मामलों में बहुत बड़े पैमाने पर मास्को के बढ़ते नियंत्रण में हैं.

उनके "पिलर्स ऑफ पीस" भाषण को लेकर स्टालिन ने चर्चिल पर युद्ध-पिपासु होने का आरोप लगाया.

फुल्टन, मिसौरी में चर्चिल और ट्रूमैन, जहां चर्चिल ने अपना मशहूर भाषण दिया था

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" स्टालिन गुस्से में थे!" लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अंतरराष्ट्रीय इतिहास के प्रोफेसर व्लादिस्लाव जुबोक कहते हैं.

"चर्चिल, जो कुछ महीने पहले तक बहुत भले लगते थे, बुनियादी रूप से यूएस-यूके सैन्य गठबंधन की पेशकश कर रहे थे."

"इससे उनका शक बहुत गहरा हो गया. उन्होंने सोवियत लोगों से ज्यादा स्टील का उत्पादन करने का आह्वान किया, और सोवियत वैज्ञानिकों से गुप्त रूप से परमाणु बम बनाने का आह्वान किया. इसलिए नहीं कि वे तीसरा विश्व युद्ध शुरू करना चाहते थे, बल्कि इसलिए कि वे बहुत असुरक्षित थे, और उन्होंने खुद को यकीन दिलाया कि सिर्फ परमाणु शक्ति ही जीत की गारंटी होगी."

वीडियो कैप्शन, अमेरिका और चीन में क्या शीत युद्ध होने वाला है?

नोविकोव टेलीग्राम

जिस तरह पश्चिम आने वाले महीनों और सालों में सोवियत इरादों की एक साफ तस्वीर हासिल करने की कोशिश कर रहा था, उसी तरह सोवियत भी यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि उनके पूर्व सहयोगी क्या कर रहे हैं.

केनन लॉन्ग टेलीग्राम का सोवियत समकक्ष अमेरिका में सोवियत राजदूत, निकोलाई नोविकोव का टेलीग्राम था, जो सितंबर 1946 में भेजा गया था.

उन्होंने चेतावनी दी कि संयुक्त राज्य अमेरिका द्वितीय विश्व युद्ध से आर्थिक रूप से मजबूत हुआ है और विश्व पर नियंत्रण जमाने पर आमादा है.

"अमेरिकी विदेश नीति, अमेरिकी एकाधिकारवादी पूंजी के साम्राज्यवादी रवैये को दर्शाती है, जिसका मकसद युद्ध के बाद के दौर में दुनिया पर वर्चस्व स्थापित करना है.

"राष्ट्रपति ट्रूमैन और अमेरिकी सत्तारूढ़ हलकों के प्रतिनिधियों के कई बयानों का सही अर्थ यह है: कि संयुक्त राज्य अमेरिका को दुनिया का नेतृत्व करने का अधिकार है. अमेरिकी कूटनीति की सभी ताकतें- सेना, वायु सेना, नौसेना, उद्योग और विज्ञान- इस विदेश नीति के लिए काम कर रही हैं."

बाएं से दाएं: 1946 में संयुक्त राष्ट्र में नोविकोव, राजनयिक एंड्री विशिंस्की और विदेश मंत्री वियाचेस्लाव मोलोटोव.

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नोविकोव के टेलीग्राम ने अपने प्रभाव का विस्तार करने और पूर्वी यूरोप में अपने बफर ज़ोन को सुरक्षित करने के लिए सोवियत दृढ़ संकल्प की पुष्टि की.

और इसने एक बार फिर शीत युद्ध के दोनों पक्षों के बीच आशंका, संदेह और भरोसे की कमी को उजागर किया.

"मौत का डर"

21 फरवरी 1947 को विदेश विभाग को ब्रिटिश विदेश कार्यालय से एक संदेश प्राप्त हुआ जिसमें कहा गया था कि युद्ध के कर्ज से आर्थिक रूप से लाचार ब्रिटेन- अपनी लड़खड़ाती औद्योगिक अर्थव्यवस्था और जबरदस्त सर्दियों के बाद- अब मदद करने में सक्षम नहीं होगा. ब्रिटेन द्वारा ग्रीस और तुर्की को दी गई सुरक्षा की गारंटी से हट जाने से रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में शून्य पैदा हो जाता.

उन्नीस दिन बाद उस ऐतिहासिक भाषण में ट्रूमैन ने कांग्रेस से उन दोनों देशों की मदद और साम्यवाद से सभी मोर्चों पर लड़ने के लिए 40 करोड़ डॉलर की मांग की.

बीच की अवधि में जो हुआ वह अमेरिकी विदेश नीति में अचानक और आमूल-चूल बदलाव नहीं था.

हालांकि पहले कहे गए हजारों शब्द आने वाले समय के लिए रास्ता बना रहे थे, डेमोक्रेट ट्रूमैन को एक ऐसी नवनिर्वाचित रिपब्लिकन कांग्रेस का सामना करना पड़ा जो पूरी तरह एकांतवादी विदेश नीति से पीछे हटने के लिए तैयार थी, और ऐसी अमेरिकी जनता जो युद्ध से तंग आ चुकी थी, और अपने नौजवानों की घर वापसी के लिए फिक्रमंद थी.

वीडियो कैप्शन, मिख़ाइल गोर्बाचोव के गांव से

इसके अलावा, अमेरिका में दूसरे देशों की आर्थिक मदद करने की कोई परंपरा नहीं थी.

राष्ट्रपति ने उनका समर्थन हासिल करने के लिए कांग्रेस नेताओं के साथ निजी तौर पर मुलाकात की.

सीनेट की विदेश संबंध समिति के अध्यक्ष और अमेरिका की एकांतवादी नीति के समर्थक सीनेटर आर्थर वैंडेनबर्ग ने उन्हें बताया कि रिपब्लिकन उनका समर्थन करेंगे अगर उन्होंने सार्वजनिक रूप से ग्रीस को सहायता का पक्ष लिया, जो कम्युनिस्ट विद्रोहियों के साथ गृहयुद्ध लड़ रहा था, और डार्डानेल्स स्ट्रेट पर कब्जे में साझेदारी के लिए यूएसएसआर तुर्की पर दबाव डाल रहा था.

वैंडेनबर्ग ने कहा, अगर उन्हें जनता का समर्थन चाहिए, तो उन्हें "अमेरिकी लोगों को मौत का डर दिखाना होगा."

बात ने जादू की तरह असर किया

ट्रूमैन ने सीनेटर की सलाह मानते हुए एक भाषण दिया जिसमें 19 मिनट के भाषण में 33 सेकंड में बोले गए शब्द उसका मर्म हैं:

"मेरा मानना है कि संयुक्त राज्य अमेरिका की नीति उन आजाद लोगों का समर्थन करने की होनी चाहिए जो हथियारबंद अल्पसंख्यकों या बाहरी दबावों की अधीनता के प्रयासों का विरोध करते हैं." "मेरा मानना है कि हमें आजाद लोगों को अपने तरीके से अपना भाग्य बनाने में मदद करनी चाहिए." "मेरा मानना है कि हमारी मदद बुनियादी रूप से आर्थिक और वित्तीय होनी चाहिए, जो आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता के लिए जरूरी है."

ट्रूमैन ने विदेशी सहायता सहायता कानून पर हस्ताक्षर किए जिससे ग्रीस और तुर्की को एक विदेशी सहायता कार्यक्रम मिला.
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तथ्य यह है कि ट्रूमैन इस मौके पर शब्दों के जादूगर वक्ता की तरह नहीं बोल रहे थे, लेकिन समय उनके पक्ष में था: वह बिना किसी लाग-लपेट के बोल रहे थे, और इसने उन्हें ज्यादा असरदार बना दिया.

हालांकि सांसदों ने खड़े होकर तालियों से उनके भाषण का स्वागत किया, लेकिन बहुत दमदार समर्थन नहीं मिला. अगले कुछ हफ्तों तक इस मुद्दे पर गर्मागर्म बहस होती रही.

बहरहाल दोनों सदनों ने प्रस्ताव पारित कर दिया, और 22 मई 1947 को ट्रूमैन के हस्ताक्षर के बाद यह विधेयक कानून बन गया, जिसके लिए उन्होंने कहा कि यह "एक चेतावनी है कि कम्युनिस्टों के मार्च को बिना रोक-टोक सफल होने की इजाजत नहीं दी जाएगी."

सोवियत इतिहासकार आंद्रेय शेस्ताकोव की शिक्षा पाठ्यक्रम की किताब "यूएसएसआर के इतिहास का संग्रह" का इसके उलट कहना है कि: "राष्ट्रपति ट्रूमैन ने 1947 में दूसरे देशों के अंदरूनी मामलों में दखल देने के संयुक्त राज्य अमेरिका के अधिकार की घोषणा की."

वीडियो कैप्शन, शीत युद्ध को ख़त्म करने में अहम भूमिका निभाने वाले मिखाइल गोर्वाचेव से ख़ास बातचीत

ट्रूमैन सिद्धांत ने मार्शल योजना, नाटो के गठन को बढ़ावा दिया, और उस युद्ध के 40 से ज्यादा सालों तक और उसके बाद भी अमेरिकी विदेश नीति को आकार दिया.

दुनिया को बांटने वाली महागाथा में चरित्रों द्वारा इस्तेमाल बयानबाजी और रूपक हमेशा जीवित रहेंगे.

बॉस्टडॉर्फ ने कहा था. "कभी-कभी हम भाषा का इस्तेमाल करते हैं और कभी-कभी भाषा हमारा इस्तेमाल करती है."

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