अल्बानिया: जब 14 सालों तक दिन-रात बनते रहे बंकर

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फ़ोटोग्राफार रॉबर्ट हैकमैन ने कई बंकरों का एक संकलन तैयार किया है.
ज़्यादातर बंकर अल्बानिया के हैं जो 1975 से 1989 के बीच शीत युद्ध के दौरान बने थे.
एक अनुमान के मुताबिक़ बंकरों की संख्या पांच लाख है. कई बंकर तो आख़िरी अवस्था में हैं और कइयों का कैफ़े, घर, रेस्तरां, स्विमिंग पुल, अनाजघर, पुल और पानी टैंक के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है.
कई दशकों के कम्युनिस्ट शासन के दौरान ये मुल्क बाक़ी दुनिया से पूरी तरह से अलग-थलग रहा.
इसके वामपंथी तानाशाह एनवर होक्सहा को दुश्मनों का ऐसा ख़ौफ़ हुआ कि उसने पूरे देश में बंकर बनवा डाले.
अल्बानिया के गाइड एल्टन कॉशी मज़ाक़ में कहते हैं कि आज ये बंकर टूरिज़्म के विस्तार का ज़रिया बन गए हैं.

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शीत युद्ध के दौरान की अनिश्चितता और परमाणु युद्ध की आशंका में कई देश सामना करने की तैयारी कर रहे थे. अल्बानिया के तानाशाह एनवर होक्सहा भी शीत युद्ध के दौरान सतर्क थे. इसी तैयारी के क्रम में अल्बानिया में बंकर बनाए गए थे.

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यूं तो अल्बानिया का हज़ारों साल पुराना इतिहास है. पर आज 40 साल पुराना इतिहास, हज़ारों साल की विरासत पर भारी पड़ रही है.
आप अल्बानिया के एड्रियाटिक तट से देश के भीतरी हिस्से की तरफ़ बढ़ें, तो क़दम-क़दम पर बंकर बने हुए दिखेंगे. दीवारों के ऊपर गोलाकार ताज सा रखा हुआ है.

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ये बंकर 1970 के दशक में बनाए गए थे. उस वक़्त अल्बानिया दुनिया से पूरी तरह से कटा हुआ देश था. इन्हें बनाने की सनक तानाशाह एनवर होक्सहा को उस वक़्त चढ़ी, जब अल्बानिया के रिश्ते सोवियत संघ से ख़राब हो गए.

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एनवर को लगता था कि पड़ोसी देशों युगोस्लाविया और यूनान से लेकर अमरीका और सोवियत संघ तक, हर मुल्क उनके वतन पर चढ़ाई करने वाला है. इसी डर से एनवर होक्सहा ने पूरे देश की हिफ़ाज़त के लिए बंकर बनवाने शुरू कर दिए.
ये बंकर व्लोर की खाड़ी से लेकर राजधानी तिराना की पहाड़ियों तक पर बनाए गए हैं. मोंटेनीग्रो की सीमा से लेकर यूनान के द्वीप कोर्फू तक ये बंकर बने हुए हैं. मोटे अंदाज़े के मुताबिक़, पूरे देश में क़रीब पौने दो लाख बंकर एनवर होक्सहा के राज में बनवाए गए थे.

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आज भी ये बंकर पूरे देश में बिखरे हुए हैं. पहाड़ियों से लेकर खेतों तक, हाइवे से लेकर समुद्र तट तक बंकरों का बोलबाला है. कहा जाता है कि एक बंकर बनाने में दो बेडरूम का मकान बनाने के बराबर ख़र्च आया होगा.
इन्हें बनाने की वजह से ही अल्बानिया यूरोप का सबसे ग़रीब देश बन गया.

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इन बंकरों की ऐसी आर्थिक विरासत बनी जिसका बोझ अल्बानिया के लोग आज भी उठा रहे हैं. असल में एनवर होक्सहा ने अपने देश के लोगों को एक मंत्र दिया था-हमेशा तैयार रहो. उसका ये मिज़ाज दूसरे विश्व युद्ध में मिले तजुर्बे से बना था

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दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अल्बानिया को इटली की सेना ने केवल 5 दिन में हरा दिया था. हालांकि, इटली के कब्ज़े का विरोध अल्बानिया के लोगों ने छापामार लड़ाई के ज़रिए जारी रखा था.
युगोस्लाविया और ब्रिटेन-अमरीका की मदद से अल्बानिया के लोगों ने इटली और जर्मनी की सेनाओं पर हमले जारी रखे. इस छापामार लड़ाई के अगुवा एनवर होक्सहा ही थे.

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जैसे-जैसे मित्र देशों की सेनाएं धुरी राष्ट्रों यानी जर्मनी और इटली पर भारी पड़ने लगीं, अल्बानिया के बाग़ी भी ताक़तवर होते गए. नवंबर 1944 में अल्बानिया फ़ासीवादी ताक़तों से आज़ाद होने में कामयाब हो गया. इस जीत का श्रेय जैसे-तैसे जुटाई गई 70 हज़ार लोगों की वामपंथी सेना को जाता है.

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दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अल्बानिया को इटली की सेना ने केवल 5 दिन में हरा दिया था. हालांकि, इटली के कब्ज़े का विरोध अल्बानिया के लोगों ने छापामार लड़ाई के ज़रिए जारी रखा था.
युगोस्लाविया और ब्रिटेन-अमरीका की मदद से अल्बानिया के लोगों ने इटली और जर्मनी की सेनाओं पर हमले जारी रखे. इस छापामार लड़ाई के अगुवा एनवर होक्सहा ही थे.

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जैसे-जैसे मित्र देशों की सेनाएं धुरी राष्ट्रों यानी जर्मनी और इटली पर भारी पड़ने लगीं, अल्बानिया के बाग़ी भी ताक़तवर होते गए.
नवंबर 1944 में अल्बानिया फ़ासीवादी ताक़तों से आज़ाद होने में कामयाब हो गया. इस जीत का श्रेय जैसे-तैसे जुटाई गई 70 हज़ार लोगों की वामपंथी सेना को जाता है.

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दूसरे विश्व युद्ध के ख़ात्मे के बाद एनवर होक्सहा ने सारी सत्ता अपने हाथ में समेट ली और तानाशाह बन गए. हर विरोधी का ख़ात्मा कर दिया गया.
पहले एनवर ने सोवियत संघ के पाले में जाने का फ़ैसला किया. लेकिन, दूसरे देशों से अल्बानिया के संबंध लगातार बिगड़ते गए. 1947 में अल्बानिया ने युगोस्लाविया से रिश्ते तोड़ लिए. एनवर का मानना था कि युगोस्लाविया के लोग समाजवाद के रास्ते से भटक रहे हैं.

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1961 में जब सोवियत संघ के नेता निकिता ख़्रुश्चेव बने, तो एनवर ने सोवियत संघ से भी रिश्ते तोड़ लिए.
इसके बाद वो माओ त्से तुंग के चीन के क़रीब गए. मगर, ये दोस्ती भी ज़्यादा दिन तक नहीं चली.
जब माओ ने 1972 में अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को बीजिंग आने का न्यौता दिया, तो एनवर होक्सहा ने चीन से भी ताल्लुक़ ख़त्म कर लिया. 1978 तक चीन ने अल्बानिया से अपने सभी सलाहकार वापस बुला लिए थे.

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हैकमैन का कहना है, ''सभी म्यूनिसिपैलिटी में बंकर बनाए जा रहे थे. 1976 से 1989 के बीच बंकर बनाने का काम दिन-रात चलता रहा. बंकर बनाने वाले एक वर्कर से मैंने इंटरव्यू किया था. उसका कहना था कि वो जिस फ़ैक्ट्री में काम करता था उसमें तीन शिफ़्टों में काम होता था. सभी शिफ्ट आठ घंटे की होती थी. एक इंजीनियर ने बताया कि वो आठ सालों तक हर दिन 10 घंटे काम करता रहा. उस इंजीनियर ने बताया कि तब डर का माहौल बनाया गया था और नियमित रूप से फ़र्ज़ी एयर रेड अलार्म बजाया जाता था.''
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