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इस्लामाबाद मार्च पर कितना पैसा ख़र्च कर रही है इमरान ख़ान की पार्टी
- Author, अहमद एजाज़
- पदनाम, बीबीसी उर्दू के लिए, इस्लामाबाद से
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पीटीआई के अध्यक्ष इमरान ख़ान ने घोषणा की है कि वो आज यानी 25 मई को पेशावर से लॉन्ग मार्च शुरू करने के बाद इस्लामाबाद के डी-चौक पहुंचेंगे.
पाकिस्तान सरकार ने पीटीआई के लॉन्ग मार्च को रोकने की घोषणा की है और इस्लामाबाद जाने वाले मुख्य राजमार्गों पर बेरिकेडिंग की जा रही हैं. देश के गृहमंत्री राना सनाउल्लाह ने साफ़ कहा है कि किसी भी कार्यकर्ता को इस्लामाबाद में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा.
उधर पीटीआई के ट्विटर अकाउंट पर जारी एक वीडियो संदेश में, इमरान ख़ान ने घोषणा की है कि वह इस्लामाबाद में श्रीनगर हाईवे से होते हुए डी-चौक पहुंचेंगे.
इमरान ख़ान ने वीडियो संदेश में पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा है, कि 'आपको किसी भी तरह से बाहर निकलना है. अगर आपके शहर दूर हैं, तो अपने शहरों में निकलें. कराची में निकलो, क्वेटा में निकलो, हैदराबाद में निकलो.
इमरान ख़ान ने कहा, कि 'हमारा एक ही लक्ष्य है. जब तक वे चुनाव की तारीख़ की घोषणा नहीं कर देते और सरकार ख़त्म नहीं हो जाती, हमारा आंदोलन जारी रहेगा.
इमरान ख़ान ने इस्लामाबाद और रावलपिंडी के लोगों से ख़ासतौर से अपील की है कि वो बाहर निकलें. "अगर उन्होंने रास्ते बंद कर दिए हैं, तो आपको पैदल निकलना है."
पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के ख़िलाफ अविश्वास प्रस्ताव की कामयाबी ने पाकिस्तान की राजनीति में एक नई उथल-पुथल शुरू कर दी है. पीटीआई की राष्ट्रव्यापी सभाओं के अंत में, पीटीआई अध्यक्ष 25 मई को इस्लामाबाद मार्च की घोषणा कर चुके हैं.
इमरान ख़ान के मुताबिक़, इस मार्च में शामिल होने वाले लोग चुनाव की तारीख़ की घोषणा होने तक इस्लामाबाद में ही रहेंगे. दूसरी ओर केंद्र सरकार की तरफ़ से अभी तक इस बात के कोई संकेत नहीं मिले हैं जिससे अंदाज़ा लगाया जा सके कि जल्द ही चुनावों की घोषणा की जाएगी. ऐसी स्थिति में पीटीआई का यह मार्च धरने का रूप ले सकता है.
यह धरना कब तक चलेगा, यह कहना जल्दबाज़ी होगी लेकिन इससे जुड़ा एक और अहम सवाल यह है कि अगर धरना लंबा चला, तो क्या पीटीआई के पास इसके लिए जरूरी वित्तीय संसाधन मौजूद हैं और इससे भी अहम सवाल यह है कि यह धरना पीटीआई की जेब पर कितना भारी पड़ सकता है?
यहां हम सभाओं, मार्चों और धरना-प्रदर्शनों पर होने वाले ख़र्च की एक तस्वीर पेश कर रहे हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि छोटी-बड़ी सभाओं और धरना-प्रदर्शनों पर कितना और किस किस मद में ख़र्च होता है.
2014 के पीटीआई धरने पर कितना ख़र्च हुआ था?
पाकिस्तान में धरने और लॉन्ग मार्च के हालिया राजनीतिक इतिहास में 2014 में हुए पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) और पाकिस्तान अवामी तहरीक (पीएटी) का धरना बहुत महत्वपूर्ण हैं. जिसका एक पहलू इस धरने के जारी रहने वाले समय को भी बताया जाता है.
ग़ौरतलब है कि यह धरना 126 दिनों तक जारी रहा था, जिसकी शुरूआत 14 अगस्त को लाहौर से एक लॉन्ग मार्च के रूप में हुई थी और 15 अगस्त को इस्लामाबाद पहुंचने के बाद 18 अगस्त को इमरान ख़ान ने संघीय राजधानी के रेड ज़ोन (वह इलाक़ा जहां महत्वपूर्ण सरकारी इमारतें मौजूद हैं) में दाख़िल होने की घोषणा की थी.
पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के 2014 के धरने में शामिल होने वाले लोगों के खाने पीने की व्यवस्था और ख़र्च उठाने वालों में जड़ांवाला के ख़ान बहादुर डोगर भी शामिल थे, जिन्होंने 2018 में जड़ांवाला के प्रांतीय निर्वाचन क्षेत्र पीपी-100 से निर्दलीय चुनाव लड़ा था.
खाने-पीने पर रोज़ 20 लाख का ख़र्च
जब उनसे पूछा गया कि 2014 के धरने के दौरान रोज़ाना खाने-पीने पर कितना ख़र्च हो रहा था, तो उन्होंने कहा कि, जब मैंने यह ज़िम्मेदारी ली थी तो उस समय धरने में शामिल लोगों की संख्या 35 से 40 हज़ार के बीच थी, जिनके खाने-पीने पर रोज़ाना लगभग 20 लाख रुपये ख़र्च हो रहे थे.
लेकिन आख़िरी दिनों में लोगों की संख्या में कमी आने की वजह से रोज़ाना के ख़र्च में कमी आ गई थी.
ग़ौरतलब है कि 19 अगस्त को इमरान ख़ान और ताहिर-उल-क़ादरी ने अपने कार्यकर्ताओं के साथ संसद के सामने धरना दिया था और 30 अगस्त को धरने में शामिल लोगों की पुलिस से उस समय झड़प हो गई थी, जब कथित तौर पर उन्होंने संसद भवन और पीटीवी की इमारत में घुसने की कोशिश की थी.
इस धरने की व्यवस्था के कार्यों को देखने वाले एक व्यक्ति ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया कि "30 अगस्त की घटना के बाद धरने की ताक़त टूट गई थी. अगले दिन पीटीआई के लोग धरने में शामिल हुए, लेकिन वो नेताओं के भाषण सुनने के बाद अपने घरों को वापस चले गए और इसके बाद यही सिलसिला चलता रहा. इस तरह धरने के रोज़ाना के ख़र्च पर भी फ़र्क़ पड़ा."
पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) के इस्लामाबाद क्षेत्र के अध्यक्ष अली नवाज़ अवान से जब साल 2014 के धरने में रोज़ाना होने वाले ख़र्च के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा, कि "2014 के धरने के शुरू में शायद 20 लाख तक रोज़ाना ख़र्च होता था और आख़िरी दिनों में रोज़ाना 5 लाख तक ख़र्च आता था."
अली नवाज़ अवान के अनुसार, पीटीआई की सभाओं और धरने में शामिल होने वाले लोग ज़्यादातर अपना ख़र्च ख़ुद उठाते हैं, क्योंकि "लोग इमरान ख़ान से प्यार करते हैं और उनके लिए घरों से निकलते हैं."
लेकिन धरने पर खाने-पीने का ख़र्च तो केवल एक हिस्सा है. ऐसे और भी कई कारक हैं जिन्हें किसी भी बड़ी राजनीतिक सभा के लिए ज़रूरी माना जाता है और ये ख़र्च की बड़ी वजह भी बनते हैं.
साउंड सिस्टम भी एक ऐसा ही मामला है, जिसके बिना कोई भी बड़ी राजनीतिक सभा अधूरी होती है.
छह साल पहले होने वाले पीटीआई के धरने के दौरान आसिफ़ नज़र (डीजे बट) ने साउंड सिस्टम की ज़िम्मेदारी संभाली थी. साउंड सिस्टम का 126 दिन का बिल कितना था? इस संबंध में आसिफ़ नज़र (डीजे बट) ने कहा कि ''यह बिल 14 करोड़ का था.''
इस्लामाबाद मार्च पर कितना ख़र्च हो सकता है?
पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) के नेताओं के अनुसार, इस्लामाबाद मार्च और संभावित धरना सरकार को जनता के दबाव के कारण जल्दी आम चुनाव कराने के लिए मजबूर कर सकता हैं.
लेकिन इस्लामाबाद मार्च पर कितना पैसा ख़र्च हो सकता है?
इस्लामाबाद मार्च में सेवा देने वाले एक व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, कि "अगर इस्लामाबाद में 50 हज़ार लोग इकट्ठा हो जाते हैं और धरना पांच दिनों तक चलता है, तो इसमें होने वाले ख़र्च की कुल लागत 15 करोड़ से 20 करोड़ रुपये तक होने का अनुमान है."
"लेकिन यह केवल इस्लामाबाद में पड़ाव डालने का ख़र्च है. इसमें उन गाड़ियों के किराये, पेट्रोल, डीज़ल और कर्मचारियों का ख़र्च शामिल नहीं है, जो योजना के अनुसार गिलगित-बाल्टिस्तान, कश्मीर, सिंध, पंजाब या ख़ैबर पख़्तूनख़्वा से आनी हैं.
"इस मार्च और धरने के पहले पांच दिनों में केवल साउंड सिस्टम पर जो ख़र्च आ रहा है, वह रोज़ाना का एक करोड़ 73 लाख बनता है."
लाइट, ट्रक और जेनरेटर का ख़र्च अलग है. ध्यान रहे कि ट्रकों पर साउंड सिस्टम लगाया जाता है और प्रत्येक ट्रक पर लाइट्स लगाई जाती है और एक जनरेटर भी होता है."
पीटीआई के इस्लामाबाद मार्च के लिए इस तरह के क़रीब 122 ट्रक तैयार किए गए हैं और रोज़ाना एक ट्रक का ख़र्च क़रीब 24 हज़ार रुपये बनता है.
इन ट्रकों को पंजाब और ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के विभिन्न जिलों में भेजा जाएगा, जहां से काफ़िले इस्लामाबाद आने हैं, जिनमें ख़ैबर पख़्तूनख़्वा से डीआई ख़ान, बन्नू, कोहाट, पेशावर, हरिपुर, एबटाबाद, मानसेहरा और चारसद्दा शामिल हैं. जबकि पंजाब से चकवाल, झेलम, गुजरात, गुजरांवाला, सियालकोट, लाहौर, ओकाड़ा और मुल्तान शामिल हैं.
धरने के दौरान बड़ी संख्या में जनरेटर भी इस्तेमाल होते हैं.
विभिन्न धरनों, रैलियों और सभाओं में जनरेटर उपलब्ध कराने वाले एक व्यक्ति ने बताया, कि "एक जनरेटर का रोज़ाना का किराया 15 हज़ार रुपये तक होता है. एक बड़ा जनरेटर का प्रति घंटे 20 लीटर तेल का ख़र्च है और इस धरने में 100 से अधिक जनरेटर का इस्तेमाल हो सकता हैं."
यह पैसा कहां से आएगा? इस सवाल पर पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) के इस्लामाबाद क्षेत्र के अध्यक्ष अली नवाज़ अवान का कहना था, कि पूरा ख़र्च पार्टी के समर्थक ख़ुद उठा रहे हैं और 'नमंज़ूर डॉट कॉम' वेबसाइट पर हमारे पास इसके लिए अच्छी ख़ासी रक़म जमा हो चुकी है.
धरनों और रैलियों के वो ख़र्च जो लोगों को दिखाई नहीं देते
आसिफ़ नज़र (डीजे बट) ने हमसे बात करते हुए कहा, कि "जब हम दूसरे शहर में जाते हैं, तो हमें कुछ दिन पहले जाना पड़ता है. उस शहर तक पहुँचने के लिए अगर एक दिन की यात्रा करनी पड़ती है, तो इवेंट से लगभग तीन दिन पहले निकलना पड़ता है."
उन्होंने कहा कि इसका ख़र्च ज़्यादा आता है, लेबर कॉस्ट भी ज़्यादा आती है, ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट भी बढ़ जाती है और जो काम 3 लाख रुपये का होता है वह 4 से 5 लाख रुपये में होता है. अगर लाहौर से इस्लामाबाद जाकर साउंड सिस्टम लगाया जाए तो प्रतिदिन का ख़र्च इस बात पर निर्भर करेगा कि सिस्टम कितना बड़ा लगाना है, क्योंकि यह देखना होगा कि रैली कितनी बड़ी है, लोगों की संख्या कितनी हैं."
पीटीआई की रैलियों की व्यवस्था देखने वाले एक व्यक्ति ने बताया, कि "जिस शहर में रैली होती है, और उस शहर का कोई व्यक्ति धरना स्थल पर आता है तो वह ख़ुद अपनी जेब से खा-पी रहा होता है. लेकिन धरना स्थल में मौजूद हर कोई अपनी जेब से खाना-पीना नहीं कर रहा होता है."
उनके मुताबिक़ रैली और धरने में दूसरे शहरों से आने वाले लोगों में ऐसे लोग भी होते हैं, जो व्यवस्था का हिस्सा होते हैं, कोई सुरक्षा मामलों का इंचार्ज हैं, कोई ड्राइवर है, तो उनके खाने-पीने और अन्य ज़रूरतों का ख़र्च कोई और उठाता है."
इसी तरह कार्यक्रम स्थल पर आने वाले वाहनों का पेट्रोल ख़र्च, हेलीकॉप्टर का ख़र्च, जेनरेटर, इंटरनेट उपकरण, कंटेनरों का स्टाफ़ और उसमें बैठे सोशल मीडिया के लोग यह सभी ऐसे ख़र्चे होते हैं जो दिखाई नहीं देते हैं.
पीटीआई की सोशल मीडिया टीम के ख़र्च का अनुमान क्या हो सकता है? इस सवाल की तलाश में सिबग़ातुल्लाह (हेड सेन्ट्रल मीडिया डिपार्टमेंट, पीटीआई, इस्लामाबाद) से संपर्क किया गया. उनका कहना था कि "पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ की हर शहर में सोशल मीडिया टीम है जो बिना किसी वेतन के काम करती है.
उन्होंने कहा, कि "रैलियों और सभाओं में लोगों की संख्या के अनुसार व्यवस्था की जाती है और पीटीआई इस्लामाबाद की सोशल मीडिया टीम में 50 सदस्य हैं."
उन्होंने कहा, कि "इस्लामाबाद के परेड ग्राउंड में 27 मार्च की रैली की व्यवस्था सोशल मीडिया सचिव द्वारा की गई थी, जो अमेरिका में रहते हैं और वो अपने ख़र्च पर आये और उन्होंने यहां की व्यवस्था की ज़िम्मेदारी उठाई."
हालांकि, हर कोई उनकी इस बात से सहमत नहीं होता है. इस संबंध में एक पदाधिकारी ने कहा कि "कोई भी इतना फ्री नहीं होता है कि मुफ्त में काम करता रहे. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले लोग इसका पैसा ज़रूर लेते हैं."
झंडे किसी भी रैली का अभिन्न अंग होते हैं. लेकिन इन झंडों पर कितना ख़र्च होता है और ये कहां बनते हैं? इस पर आम लोग ध्यान नहीं देते हैं.
झंडे बनाने वाले एक कारीगर के मुताबिक़ "पिछले तीन हफ्तों में क़रीब 50 लाख झंडे बनाए गए हैं. तीन हफ्ते पहले की एक झंडे की क़ीमत 280 रुपये बनती है."
सभाओं के आयोजकों में से एक व्यक्ति का कहना था, कि "झंडों की क़ीमत इस तरह भी बढ़ जाती है कि अगर 20 लाख झंडों का आर्डर दिया जाता है, तो वहां से कम झंडे तैयार किये जाते हैं क्योंकि इनकी गिनती करना मुश्किल होता है."
मुल्तान रैली और इस्लामाबाद परेड ग्राउंड रैली पर कितना ख़र्च आया?
पीटीआई की मुल्तान रैली की व्यवस्था की ज़िम्मेदारी एक स्थानीय संगठन ग्रीनलैंड पर थी. शुरुआत में इस रैली में 45 लाख रुपये के ख़र्च का अनुमान लगाया गया था. लेकिन रैली बढ़ती गई और ख़र्चा भी बढ़ता गया और यह रक़म 65 लाख तक पहुंच गई.
इस 65 लाख में केवल स्टेडियम के अंदर का ख़र्च शामिल है जिसमें 14 हज़ार कुर्सियां, साउंड सिस्टम (डीजे लाहौर और मुल्तान से लिया गया), स्कैनर गेट, तीन जगहों पर स्क्रीन, पानी, टैंट और स्टेज का ख़र्च शामिल थे.
लेकिन स्टेडियम के बाहर के ख़र्च का कोई अनुमान नहीं है.
मुल्तान के एक वरिष्ठ पत्रकार शाकिर हुसैन शाकिर का कहना है, कि "मुल्तान रैली में हुए ख़र्च का शुरूआती अनुमान ग़लत साबित हुआ क्योंकि यह एक कामयाब शो था जिसमें मुल्तान, बहावलपुर, साहीवाल, डेरा ग़ाज़ी ख़ान डिवीज़न से जनता ने भाग लिया था और लगभग एक लाख लोग थे."
27 मार्च को इस्लामाबाद के परेड ग्राउंड में पीटीआई रैली की व्यवस्था देखने वाले एक व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि "उस रैली पर 2 करोड़ 35 लाख रुपये ख़र्च हुए थे. इसमें कुर्सियों, सोफे, लाइट, कंटेनर आदि सहित हर चीज़ का ख़र्च शामिल था. लेकिन इस रैली में बाहर से आने वाले ट्रांसपोर्ट, उसमे इस्तेमाल होने वाले पेट्रोल, डीज़ल, और कर्मचारियों का ख़र्च शामिल नहीं था, और न ही इसमें जुड़वा शहरों में लगने वाले पेनाफ्लेक्स और झंडों की लागत शामिल थी."
इस्लामाबाद परेड ग्राउंड में 27 मार्च की रैली का ज़िक्र करते हुए, पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) के इस्लामाबाद क्षेत्र के अध्यक्ष अली नवाज़ अवान ने कहा, कि 'इसमें लगभग एक करोड़ रुपये का ख़र्च हुआ होगा और कराची में हुई रैली का ख़र्च 16 करोड़ रुपये था, जबकि लोग ज़्यादातर ख़ुद अपना पैसा ख़र्च करते हैं."
पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) के चीफ़ एडमिनिस्ट्रेटर ज़ाहिद काज़मी का कहना था, कि "पीटीआई की रैली की तुलना रायविंड में हुए तब्लीग़ी इज्तिमे से की जा सकती है. इसी तरह पीटीआई की यह राजनीतिक रैली होती है."
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