इमरान ख़ान का लॉन्ग मार्च आज, कैसे रहे हैं इससे पहले के मार्च

    • Author, फारूक़ आदिल
    • पदनाम, लेखक, स्तंभकार

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान अविश्वास प्रस्ताव के ज़रिये सत्ता से बेदखल होने के बाद सरकार पर जल्द चुनाव के लिए दबाव बढ़ा रहे हैं.

रविवार शाम को उन्होंने "पूरे देश" से 25 मई को देश की राजधानी इस्लामाबाद पहुंचने का आह्वान किया. इस दौरान उन्होंने कहा कि वह ख़ुद ख़ैबर पख़्तूनख़्वा से 'वास्तविक स्वतंत्रता मार्च' का नेतृत्व करते हुए इस्लामाबाद के श्रीनगर (कश्मीर) हाईवे पहुंचेंगे.

हालांकि पाकिस्तान सरकार ने राजधानी में मार्च को रोकने का फ़ैसला किया है. पाकिस्तान के गृह मंत्री राणा सनाउल्लाह खान ने ट्वीट कर जानकारी दी है कि " दंगा-फ़साद रोकने के लिए लॉन्ग मार्च पर रोक लगाई गई है."

वहीं इस संबंध में मंगलवार को हुई एक बैठक के बाद मौजूदा प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ ने कहा कि इस तरह के रणनीति से अर्थव्यवस्थआ को नुक़सान पहुंचता है और इसका असर मज़दूरों पर पड़ता है.

इमरान ख़ान ने कहा है कि उन्हें और पार्टी कार्यकर्ताओं को इस्लामाबाद में जब तक रहना पड़े, रहेंगे. उनकी मांग है कि आम चुनावों की तारीख़ जल्द दी जाए और असेंबलियां भंग की जाएं.

इस मौक़े पर इमरान ख़ान ने नौकरशाही और पुलिस को संबोधित करते हुए कहा, कि अगर उन्होंने इस "शांतिपूर्ण विरोध" के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई की तो यह ग़ैरक़ानूनी होगा. उन्होंने सेना को भी संबोधित करते हुए कहा, कि "अगर आप तटस्थ हैं, तो इसमें भी तटस्थ रहें."

ग़ौरतलब है कि इमरान ख़ान ने सार्वजनिक भाषणों में बार-बार दावा किया है कि वह 20 लाख पीटीआई कार्यकर्ताओं को इस्लामाबाद लाएंगे और तब तक वहीं रहेंगे जब तक चुनाव की तारीख़ों की घोषणा नहीं की जाती.

लेकिन पाकिस्तान में अभी सबसे बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि यह लॉन्ग मार्च इमरान ख़ान के लिए लक्ष्य हासिल करने में कितना मददगार साबित होगा?

इस सवाल का जवाब भी आसान नहीं है, क्योंकि पाकिस्तान में इस तरह के राजनीतिक अभियानों का नतीजा कभी एक जैसा नहीं रहा और न ही उसकी सफलता और असफलता का पैमाना कभी एक जैसा रहा है.

आइए अतीत के कुछ उदाहरणों से इस तरह के विरोधों के इतिहास और उनकी सफलताओं और असफलताओं के बारे में जानने की कोशिश करते हैं.

जब मंत्रियों के घरों पर तैनात कर दी गईं तोपें

पाकिस्तान के गठन के बाद इस तरह का पहला राजनीतिक मार्च साल 1953 में हुआ था. यह 'तहरीक़ ख़त्म-ए-नुबुव्वत' थी. इस आंदोलन के दौरान पाकिस्तान के गठन के बाद देश में पहली बार हड़ताल हुई थी और लाहौर से बड़ी संख्या में लोगों ने तत्कालीन संघीय राजधानी कराची पर चढ़ाई की थी.

विरोध इतना उग्र था कि दैनिक 'ज़मींदार' के अनुसार सरकार के मंत्रियों की रक्षा के लिए उनके घरों पर तोपें तैनात करनी पड़ीं.

ज़मींदार के 1 मार्च, 1953 के अंक के अनुसार, सरकार ने तहरीक ख़त्म-ए-नुबुव्वत को चलाने वाली कमिटी के सभी सदस्यों को गिरफ़्तार कर लिया. अख़बार के अनुसार गिरफ़्तार किये गए लोगों की कुल संख्या 721 थी.

पंजाब में और विशेष रूप से लाहौर में इस स्थिति के ख़िलाफ़ कड़ी प्रतिक्रिया हुई और दंगे भड़क उठे. इन दंगों में जानोमाल का भारी नुक़सान भी हुआ.

अख़बार के अनुसार पहले स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कर्फ्यू लगाया गया, लेकिन ये अपर्याप्त साबित हुआ. इसलिए लाहौर में मार्शल लॉ लागू करने की स्थिति बन गई थी. यह पाकिस्तान का पहला मार्शल लॉ था. यह मार्शल लॉ वही था जिसके बारे में ब्रिगेडियर एआर सिद्दीक़ी ने लिखा है कि "यह बाद में आने वाले सैन्य सरकारों के लिए एक रिहर्सल साबित हुआ."

'तहरीक ख़त्म-ए-नुबुव्वत' पाकिस्तान का पहला बड़ा और ख़ूनी आंदोलन था. यह आंदोलन उस समय अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल नहीं हुआ क्योंकि योजनाकारों के पास वो लक्ष्य ही नहीं थे जो इस आंदोलन से जुड़े लोगों के मन में थे.

इस घटना के ठीक पांच साल बाद, अयूब ख़ान ने पाकिस्तान में पहली बार पूरे देश में मार्शल लॉ लागू किया. क्या यह महज़ एक संयोग था कि इस मार्शल लॉ के लागू होने में दूसरे कारणों के अलावा एक जुलूस भी इसकी बड़ी वजह बना.

वह जुलूस जो पाकिस्तान में पहली बार मार्शल लॉ की वजह बना

लेकिन ये चुनाव नहीं हो सके. इसकी वजह वह डर था जो उस समय के शासकों के मन में बैठ गया था.

राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्ज़ा और उनके सहयोगी इसलिए डरे हुए थे कि उस दौर में राजनीतिक प्रक्रिया बहुत तेज़ हो गई थी और देश में कुछ नई राजनीतिक ताक़तें उभरी थीं जो तत्कालीन एस्टेब्लिशमेंट और नौकरशाही की अंदरूनी साज़िशों को समाप्त करने के लिए काम कर रही थीं.

इनमें से एक ताक़त वह थी जो कुछ समय पहले ही ख़ान अब्दुल क़य्यूम ख़ान के नेतृत्व में राजनीतिक उतार-चढ़ाव और संकटों पर काबू पाने के बाद फिर से व्यवस्थित हो चुकी थी और शासकों को चुनाव कराने के लिए मजबूर करने के लिए संघर्ष कर रही थी. इस संघर्ष का मील का पत्थर उनके नेतृत्व में निकलने वाला जुलूस था.

उस दौर में इस तरह के जुलूसों को लॉन्ग मार्च का नाम तो नहीं दिया गया था, लेकिन उसकी लंबाई के हिसाब से वह एक लॉन्ग मार्च ही था. रावलपिंडी से शुरू होकर गुजरात में समाप्त होने वाला यही वह जुलूस था जिसकी वजह से मार्शल लॉ लागू किया गया था. डॉक्टर सैयद जाफ़र अहमद पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास की प्रमुख हस्तियों में से एक हैं. उनके अनुसार इस जुलूस की पृष्ठभूमि यह थी कि साल 1956 में पाकिस्तान का पहला संविधान बनने के बाद एक नई चुनी हुई सरकार की ज़रूरत थी और उसके चुनाव के लिए फरवरी 1959 की तारीख़ दी गई थी.

नसीर अहमद सलीमी दैनिक 'पाकिस्तान' कराची के रेज़िडेंट एडिटर रह चुके हैं. उनके समकालीन पत्रकारों में उनकी विशिष्टता यह है कि उनके पाकिस्तान के संस्थापकों और बाद के समय के केंद्रीय नेतृत्व के साथ न केवल बहुत क़रीबी व्यक्तिगत संबंध थे, बल्कि उस समय की घटनाओं का विवरण भी उनके दिमाग़ में ताज़ा है.

वह कहते हैं, कि "18 मील लंबे इस जुलूस ने शासकों को झकझोर कर रख दिया. उनके सामने अब एक ही रास्ता था कि चुनाव कराने के लिए किये जाने वाले प्रतिरोध को कुचल दिया जाये और यही रास्ता अपनाया गया. ख़ान अब्दुल क़य्यूम ख़ान को गिरफ़्तार कर लिया गया. यही गिरफ़्तारी थी जिसने प्रतिरोध की कमर तोड़ दी और उस समय के 'लौह पुरुष' ख़ान क़य्यूम की प्रतिष्ठा को भी धूमिल कर दिया गया. ख़ान साहब माफ़ीनाम देकर रिहा हुए."

अपनी दृढ़ता और डट जाने की पहचान के साथ मशहूर होने वाले नेता ने माफ़ी क्यों मांगी?

नसीर अहमद सलीमी कहते हैं कि ख़ान क़य्यूम ने अपने एक इंटरव्यू में इस सवाल का जवाब दिया था. एक इंटरव्यू में, उनसे पूछा गया था, कि "आपका जुलूस जितना लंबा था, उतना ही लंबा आपका माफ़ीनामा था. आपने इतनी कम हिम्मत क्यों दिखाई?"

ख़ान क़य्यूम ख़ान ने जवाब दिया, कि "उस जेल में जितनी सख़्त यातना मैंने सही है, उस यातना को कोई बर्दाश्त करके दिखाए तो मैं मान जाऊं."

अयूब ख़ान के मार्शल लॉ के ख़िलाफ़ देश के दोनों हिस्सों, यानी पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, लेकिन लॉन्ग मार्च जैसे जुलूसों की नौबत नहीं आई. इसी तरह, पूर्वी पाकिस्तान के अलग होने से पहले चुनावों और उनके बाद भी बड़े जुलूसों की घटनाएं रिकॉर्ड में नहीं है.

अब्दुल क़य्यूम ख़ान के जुलूस के बाद साल 1977 तक किसी बड़े विरोध मार्च की जानकारी नहीं मिलती है, लेकिन अयूब ख़ान के समय, बुनियादी लोकतंत्र की व्यवस्था के तहत, फ़ातिमा जिन्ना के चुनाव अभियान के दौरान बड़े पैमाने पर एक राजनीतिक आंदोलन हुआ था.

पाकिस्तान नेशनल अलायंस ने 10 अप्रैल, 1977 को एक लॉन्ग मार्च का आह्वान किया. राणा नज़र-उर-रहमान के अनुसार, पीर पगारा के कारण यह लॉन्ग मार्च नहीं हो सका.

लॉन्ग मार्च जैसी भरपूर केंद्रीय गतिविधि न होने के बावजूद, विरोध की चिंगारी पूरे देश में फैल गई थी. गठबंधन की सिविल नाफ़रमानी की अपील कामयाब हो चुकी थी. लोग आवश्यक सेवाओं के बिलों का भुगतान नहीं कर रहे थे और उन्होंने ट्रेनों में बिना टिकट के यात्रा करना शुरू कर दिया था. ये हंगामा कितना बड़ा था इसका अंदाज़ा इस आंदोलन में हताहत होने वालों की संख्या से होता है.

राणा नज़र-उर-रहमान ने लिखा है कि "8 मार्च, 1977 से 5 जुलाई, 1977 तक, देश भर में लगभग 425 लोगों की मौत हुई. कुछ लोग इतनी बुरी तरह से घायल हो गए कि उनके लिए जीवन गुज़ारना मुश्किल हो गया."

इतनी एकजुटता के बावजूद, यह आंदोलन नए आम चुनाव कराने के अपने लक्ष्य को हासिल करने में नाकाम रहा और मार्शल लॉ लागू करने की एक वजह बन गया.

पुलिस से छुपकर बेनज़ीर का रावलपिंडी पहुंचना

पाकिस्तान की राजनीति में लॉन्ग मार्च शब्द की शुरुआत बेनज़ीर भुट्टो ने की थी. उन्होंने साल 1992 में नवाज़ शरीफ़ की सरकार के ख़िलाफ़ 'लॉन्ग मार्च' किया था, जो लाहौर से शुरू हुआ था.

प्रोफ़ेसर ग़फ़ूर अहमद ने अपनी क़िताब 'नवाज़ शरीफ़ का पहला शासनकाल' में लिखा है कि बेनज़ीर ने एलान किया कि 18 नवंबर को राष्ट्रपति आवास और संसद का घेराव किया जाएगा. उन्होंने उम्मीद जताई थी कि अगर संघीय राजधानी में चार लाख लोग इकट्ठा होते हैं, तो यह सरकार नहीं रहेगी. सरकार ने लॉन्ग मार्च से निपटने के लिए असाधारण क़दम उठाए, पुलिस कर्मचारियों की छुट्टियां रद्द कर दी गईं और इस्लामाबाद को सेना के हाथों सौंप दिया गया.

इस्लामाबाद में बेनज़ीर भुट्टो के आवास की घेराबंदी कर ली गई थी लेकिन इसके बावजूद वह रावलपिंडी पहुंचने में सफल रही.

बीबीसी पाकिस्तान के संपादक आसिफ़ फ़ारूक़ी ने पुलिस के जल्दी कार में सवार होने का नाटकीय दृश्य अपनी आँखों से देखा था.

वह बताते हैं, कि "बेनज़ीर के आवास की घेराबंदी की हुई थी. जैसे ही वे कार में सवार होने के लिए घर से निकलती, उन्हें गिरफ़्तार कर लिया जाता था. गिरफ़्तारी से बचने के लिए वह ज़मीन पर उकडू बैठ गई और इसी तरह बैठे बैठे एक-एक क़दम आगे बढ़ती हुई कार तक पहुंच गई. वह कार में तो बैठ गई लेकिन अब आशंका थी कि गाड़ी को आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा."

इस अवसर पर एक पत्रकार ने आयोजकों से कहा कि वह एक ऐसे रास्ते के बारे में जानते हैं जो पुलिस से सुरक्षित है. पत्रकार के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया. पत्रकार ने मोटर साइकिल स्टार्ट की और बेनज़ीर की गाड़ी को बहुत से अनजान रास्तों से निकालकर सुरक्षित रावलपिंडी पहुंचा दिया."

स्तंभकार अयाज़ अमीर ने बताया, कि "यह लॉन्ग मार्च नाकाम रहा. जब बेनज़ीर भुट्टो लियाक़त बाग पहुंचीं तो उनके साथ एक-दो गाड़ियां ही थी. लांग मार्च नाकाम हो गया था, लेकिन असल बात यह है कि इसके बावजूद सरकार घबरा गई थी. इस्लामाबाद की रक्षा के लिए सेना को बुलाने से सरकार की कमज़ोरी ज़ाहिर हो गई थी. यही इस लॉन्ग मार्च का अनूठा पहलू था."

बेनज़ीर भुट्टो ने अगले ही साल यानी 1993 में दूसरे लॉन्ग मार्च की योजना बनाई. यह मार्च आयोजित होने के बिना ही निर्णायक रहा. कुछ दिनों बाद ही नवाज़ शरीफ़ की सरकार गिर गई.

पूर्व सेना प्रमुख जनरल मिर्ज़ा असलम बेग़ ने 12 अगस्त 2014 को 'नवा-ए-वक़्त' में प्रकाशित अपने लेख में पहले मार्च की विफलता और दूसरे लॉन्ग मार्च के हुए बिना ही इसकी सफलता की वजह बताई है.

बेनज़ीर के पहले लॉन्ग मार्च की विफलता का मुख्य कारण यह था कि उन्होंने इसे सफल बनाने के लिए उचित 'होमवर्क' नहीं किया था. अगले साल, यानी 1993 में, बेनज़ीर भुट्टो ने जिस लॉन्ग मार्च की योजना बनाई वो शुरू हुआ, लेकिन इससे पहले कि वह इस्लामाबाद पहुँच पाती, तत्कालीन थल सेना प्रमुख जनरल अब्दुल वहीद काकड़ ने उनके लिए राह आसान कर दी थी. उन्होंने हस्तक्षेप करके राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को इस शर्त पर सत्ता छोड़ने के लिए राज़ी कर लिया था, कि वे 90 दिनों के भीतर चुनाव करा देंगे."

इस तरह बेनज़ीर भुट्टो ने लॉन्ग मार्च को समाप्त कर दिया और 1993 के अंत में होने वाले चुनावों में जीत की तैयारी शुरू कर दी. निस्संदेह, उन्होंने इस लॉन्ग मार्च को सफल बनाने के लिए ज़रूरी होमवर्क किया था.

क़ाजी हुसैन का धरना

नवाज़ शरीफ़ की सरकार गिरने के बाद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने चुनाव जीता और अपनी दूसरी सरकार बनाई.

क़ाज़ी हुसैन अहमद ने बेनज़ीर भुट्टो की इस सरकार के ख़िलाफ़ धरना दिया जो निर्णायक साबित हुआ और उनकी सरकार गिर गई. इस धरने की सफलता का राज़ इसका होमवर्क था लेकिन इस 'होमवर्क' की प्रकृति जनरल मिर्ज़ा असलम बेग़ के बताये हुए होमवर्क से अलग थी.

जमात-ए-इस्लामी के इतिहास के विशेषज्ञ और मौलाना मौदुदी द्वारा बनाई गई पार्टी के वैचारिक प्रवक्ता 'तर्जुमानुल क़ुरान' के संपादक प्रोफ़ेसर सलीम मंसूर ख़ालिद ने बताया कि जमात-ए-इस्लामी ने पाकिस्तान इस्लामी फ़्रंट बनाकर 1993 के चुनाव में हिस्सा लिया तो इससे पीपुल्स पार्टी विरोधी वोट बंट गए.

इस तरह बेनज़ीर भुट्टो फिर से सत्ता में आ गईं. अब पीपुल्स पार्टी विरोधी प्रेस का जमात पर लगातार ये दबाव था कि 'तुमने ही दर्द दिया है, तुम ही दवा दोगे.' दूसरी ओर, देश में ख़राब व्यवसथा और भ्रष्टाचार के क़िस्से आम हो गए थे और हर कथित कहानी की शुरुआत और अंत आसिफ़ ज़रदारी पर होता था.

प्रोफ़ेसर सलीम मंसूर ख़ालिद कहते हैं, "इस पर विडंबना यह कि मीर मुर्तज़ा भुट्टो की सितंबर 1996 में हत्या कर दी गई थी. इससे पहले जून में जमात-ए-इस्लामी बेनज़ीर भुट्टो सरकार के ख़िलाफ़ रावलपिंडी में ज़ोरदार प्रदर्शन करके अपने कार्यकर्ताओं को एकजुट कर चुकी थी."

"इस साल सितंबर-अक्टूबर आते-आते पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नाराज़ लोग और प्रगतिशील नेताओं का एक प्रभावी धड़ा भी इस सरकार को गिराने के लिए लामबंद हो गया था. इस तरह, जमात-ए-इस्लामी और पीपुल्स पार्टी के प्रगतिशील लोगों के बीच, बेनज़ीर भुट्टो की सरकार को गिराने के लिए अनौपचारिक सहयोग का सिलसिला शुरू हो गया. जिसे राष्ट्रपति फ़ारूक़ अहमद ख़ान लुग़ारी और उनके कुछ अन्य दोस्तों डॉक्टर मुबश्शिर हसन और मलिक मेराज ख़ालिद ने समर्थन दिया."

"हालांकि, नवाज़ शरीफ़ की मुस्लिम लीग इस दृश्य से अलग थलग थी. फिर जनरल ज़िया-उल-हक़ के दौर में अस्तित्व में आने वाली सिविल सोसायटी भी इस गठजोड़ का हिस्सा बन गई."

"इस धरने के कुछ ही समय बाद, नवंबर के पहले सप्ताह में, राष्ट्रपति लुग़ारी ने बेनज़ीर भुट्टो सरकार को भंग कर दिया और भुट्टो के दाहिने हाथ और पीपीपी के प्रगतिशील धड़े के एक सम्मानित सदस्य मलिक मेराज ख़ालिद के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार बना दी. चुनाव हुए जमात-ए-इस्लामी ने चुनाव का बहिष्कार किया और नवाज़ शरीफ़ दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में आ गए."

बेनज़ीर सरकार के गिरने के बाद, नवाज़ शरीफ़ दो-तिहाई बहुमत के साथ सरकार बनाने में कामयाब हो गए.

अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान, उन्हें कई तरह के संकटों का सामना करना पड़ा, लेकिन उनके कार्यकाल के दौरान लॉन्ग मार्च जैसी कोई घटना नहीं हुई.

यह स्थिति फिर एक बार जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के दौर में पैदा हुई.

न्यायपालिका बहाली आंदोलन और राष्ट्रव्यापी लॉन्ग मार्च

जब जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने पाकिस्तान के चीफ़ जस्टिस को हद से हटा दिया, तो इसके ख़िलाफ़ वकीलों ने जस्टिस इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी के नेतृत्व में देशभर में मार्च किया.

इस आंदोलन के दूसरे चरण में एक और राष्ट्रव्यापी लॉन्ग मार्च हुआ, जिसका समापन इस्लामाबाद में एक रैली से हुआ. न्यायपालिका बहाली आंदोलन के ये दोनों अभियान नाकाम रहे.

न्यायपालिका बहाली आंदोलन का तीसरा प्रयास लॉन्ग मार्च के नाम से ही हुआ. इसका नेतृत्व पूर्व प्रधानमंत्री मियां मोहम्मद नवाज़ शरीफ़ ने किया था.

सलमान गनी पाकिस्तान के उन गिनेचुने पत्रकारों में से एक हैं जो मुस्लिम लीग (नवाज़) और शरीफ़ परिवार के राजनीतिक यात्रा के बारे में सब कुछ जानते हैं. वह इस मार्च की शुरुआत से ही नवाज़ शरीफ़ के क़रीब रहे और उन्होंने इस गतिविधि के विभिन्न पहलुओं और समय-समय पर हो रहे बदलावों की समीक्षा की.

सलमान गनी ने बताया, "दिन की शुरुआत से संकेत मिल जाता था कि आज की राजनीतिक गतिविधि का श्रेय किसी को मिल सकता है तो वह जमात-ए-इस्लामी है या पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़. मुस्लिम लीग कहीं दिखाई नहीं दे रही थी. लेकिन यह धारना तब तक रही जब तक कि मुस्लिम लीग के समर्थक सड़कों पर नहीं आ गए. मुस्लिम लीग के जुलूस में शामिल होने वाले लोग मॉडल टाउन से निकले. इसके बाद फ्रेम से सब बाहर हो गए. लाहौर में मुस्लिम लीग के अलावा कुछ भी नहीं था."

सलमान ग़नी के मुताबिक़, यह लॉन्ग मार्च अभी कमोंकी तक ही पहुंचा होगा कि सेना प्रमुख ने नवाज़ शरीफ़ से संपर्क किया और उन्हें आश्वासन दिया कि जजों को बहाल किया जा रहा है. इसलिए आप मार्च को वहीं रोक दें.

पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में, इस लॉन्ग मार्च को एक युग का अंत और एक नए युग की शुरुआत कहा जा सकता है.

ताहिर-उल-क़ादरी की एंट्री और पीटीआई का धरना

इस सफल राजनीतिक गतिविधि के बाद, 2013 में एक बड़ी राजनीतिक गतिविधि अल्लामा ताहिर-उल-क़ादरी की तरफ से हुई. उनकी पार्टी, पाकिस्तान अवामी तहरीक ने 2013 के आम चुनावों की घोषणा से ठीक पहले इस्लामाबाद में एक धरना दिया और घोषणा की, कि इस धरने में 50 लाख लोग शामिल हो रहे हैं.

अज़ीम चौधरी कहते हैं कि इस धरने में कुछ हज़ार लोग ही शामिल हुए और यह धरना बिना किसी सफलता के समाप्त हो गया.

पीपुल्स पार्टी की सरकार ने अल्लामा ताहिर-उल-क़ादरी को फेस स्विंग देने के लिए मुस्लिम लीग (क्यू) के नेतृत्व के ज़रिये उससे बातचीत की. ताहिर-उल-क़ादरी इस धरने के लिए 2013 के चुनावों को रोकना चाहते थे, लेकिन यह कोशिश नाकाम रही.

इस कोशिश के विफल होने के बाद, एक साल बाद अगस्त 2014 में ताहिर-उल-क़ादरी दोबारा एक जुलूस के साथ इस्लामाबाद पहुंचे, जिसे लॉन्ग मार्च का नाम दिया गया था. इस बार पाकिस्तान तहरीक-ए-इन्साफ़ भी उनके साथ थी.

अपने भाषणों में, ताहिर-उल-क़ादरी ने व्यवस्था को बदलने की मांग की. उनकी तुलना में पीटीआई की मांग अधिक राजनीतिक थी.

पिछली आधी सदी से संघीय राजधानी में राजनीतिक रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार मोहम्मद नवाज़ रज़ा कहते हैं, कि "अगस्त के अंत तक, ये दोनों धरने अलग अलग रहे, लेकिन 30 अगस्त को एक साथ आ गए और इन्होंने उन इमारतों पर हमला कर दिया जो पाकिस्तान पर शासन की प्रतीक हैं. सुप्रीम कोर्ट की दीवारों पर गंदे कपड़े पहले ही लटकाए जा चुके थे.

संसद भवन की सुरक्षा दीवारों पर हमला करके उन्हें भी क्षतिग्रस्त कर दिया गया था. इसके बाद दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं ने मिलकर प्रधानमंत्री आवास पर हमला बोल दिया. इस हमले में एक क्रेन भी शामिल थी ताकि सुरक्षा इन्तज़ामों को नष्ट किया जा सके.

हमलावरों ने एक तरफ़ प्रधानमंत्री आवास पर हमला किया और दूसरी तरफ़ राष्ट्रपति आवास के सबसे अहम गेट तक पहुंच गए. पुलिस ने इन कार्रवाईयों को रोकने का प्रयास किया तो उनपर भी हमला किया गया. इस हमले में इस्लामाबाद पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी इस्मातुल्लाह जुनेजो गंभीर रूप से घायल हो गए.

अज़ीम चौधरी के मुताबिक़, पीटीवी का क़ब्ज़ा छुड़ा लेने के बाद धरने की ताक़त टूट गई. सत्तर दिनों के बाद, अल्लामा ताहिर-उल-क़ादरी ने यह कहकर धरना समाप्त कर दिया कि सरकार का कुछ नहीं बिगाड़ा जा सकता है. इस धरने के ख़त्म होने के बाद पीटीआई का धरना और भी कमज़ोर हो गया.

इमरान ख़ान और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ का यह धरना 126 दिनों तक चला. यह धरना इस मायने में ऐतिहासिक है कि इससे पहले पाकिस्तान में किसी अन्य राजनीतिक दल ने इतना लंबा धरना नहीं किया.

धरने की ताक़त और उपस्थिति में निश्चित रूप से उतार-चढ़ाव आता रहा, लेकिन चार महीने से भी अधिक समय तक इसे बनाए रखना राजनीतिक इतिहास की एक असाधारण घटना है, लेकिन इसके बावजूद धरने के नेतृत्व के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है, कि आख़िर इस इतने बड़े धरने से इस पार्टी ने क्या हासिल किया?

इमरान ख़ान के लॉन्ग मार्च का क्या होगा नतीज़ा?

इसी सवाल से एक दूसरा सवाल यह भी उठाता है, कि ऐसे कौन से कारक हैं जो इस स्तर के किसी राजनीतिक आंदोलन की कामयाबी सुनिश्चित करते हैं?

इतिहासकार प्रोफ़ेसर सलीम मंसूर ख़ालिद ने इस सवाल का जवाब अपेक्षाकृत अलग तरीक़े से देते हैं. उनका मानना है कि अगर हम ये विश्लेषण करें कि निकट भविष्य में इमरान ख़ान का राजनीतिक अभियान कितना कामयाब होगा, जिसके तहत वो लाखों लोगों को एकजुट करने का दावा कर रहे हैं, तो पाकिस्तान की सारी राजनीतिक गतिशीलता समझ में आ जाएगी और इस सवाल का जवाब भी मिल जाएगा.

वो कहते हैं, "पाकिस्तान की ख़ास राजनीतिक संस्कृति में, यह संभव नहीं है कि ऐसे किसी समूह को वापसी की इजाज़त दी जाए. इसलिए मुझे लगता है कि इस नए अभियान से अराजकता तो ज़रूर पैदा होगी, लेकिन कोई बदलाव नहीं आ सकेगा."

इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिस्टोरिकल एंड सोशल रिसर्च के प्रमुख प्रोफ़ेसर डॉक्टर सैयद जाफ़र अहमद इन मामलों को व्यापक दृष्टिकोण से देखते हैं, लेकिन उनका मानना है कि पाकिस्तान इस समय अपने इतिहास के एक बहुत ही अनोखे अनुभव से गुज़र रहा है.

वह स्वीकार करते हैं कि देश में अब तक बड़े पैमाने पर जो राजनीतिक आंदोलन होते आए हैं उनकी सफलता के पीछे केवल राजनीतिक कारक नहीं रहे हैं, बल्कि एस्टेब्लिशमेंट की भूमिका भी रही है.

इसके बावजूद, वह वर्तमान स्थिति को "असाधारण" मानते हैं और कहते हैं कि संस्थानों पर व्यक्तित्व को प्राथमिकता देने के रवैये और अतीत में जर्मनी जैसे राष्ट्रवाद, कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों पर संस्थानों का लामबंद होना, ये सभी ऐसे कारक हैं जिससे एक बड़ी उथलपुथल मच सकती है और जिसकी वजह से बदलाव की शुरुआत हो सकती है लेकिन यह विनाशकारी होगा.

वो कहते हैं, "कोई भी राजनीतिक अभियान केवल इस वजह से सफल नहीं होता है कि उसने कितने लोगों को इकट्ठा किया है और कितना बड़ा धरना किया है. इसके पीछे कुछ दूसरे कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इस पहेली को हम इस तरह सुलझा सकते हैं कि इमरान ख़ान को एक मसीहा की तरह लाया गया था लेकिन यह प्रयोग बुरी तरह नाकाम रहा. इस नाकाम गुट को सत्ता से बाहर करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी."

पाकिस्तान डेवलपमेंट फ़ोरम के सीनियर फेलो नसीरुद्दीन महमूद को इस स्थिति में रोशनी की एक किरण नज़र आती है. उनका मानना है कि लगभग चार साल के अनुभव ने देश को आर्थिक और राजनीतिक पतन के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है.

वो कहते हैं, "अब अगर उसी ख़राबी को दोबारा रास्ता मिल जाता है तो देश कभी भी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाएगा. इसलिए, कुछ कड़े फ़ैसले लेना ज़रूरी हो गया है, ताकि संविधान, लोकतंत्र और आर्थिक स्थिरता का मार्ग साफ़ किया जा सके. इसके अलावा, देश एक और चुनाव का जोखिम उठा ही नहीं सकता है."

इस पृष्ठभूमि में, वे किसी भी अभियान को निरर्थक मानते हैं.

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