पीएम मोदी के यूरोप दौरे का एजेंडा कितना कामयाब रहेगा

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन यूरोपीय देशों- जर्मनी, डेनमार्क, फ्रांस की तीन दिनों की यात्रा के पहले चरण में सोमवार को जर्मनी पहुँचे थे.
ये यात्रा ऐसे वक़्त हो रही है जब यूक्रेन पर रूसी हमले को लेकर पश्चिमी देश लगातार रूस की आलोचना कर रहे हैं.
यूक्रेन को हथियार भेज रहे हैं और भारत पर दबाव बना रहे हैं कि वो भी आलोचना का हिस्सा बने.
इसके अलावा जर्मनी सहित पश्चिमी देश रूस के तेल, कोयले और गैस पर भारी निर्भरता कम करने के लिए क़दम भी उठा रहे हैं.
यूक्रेन हमले के मद्देनजर चांसलर ओलाफ शॉल्त्स जर्मनी की सुरक्षा मज़बूत करने के लिए सेना में 100 अरब यूरो (क़रीब 8,000 करोड़ रुपए) का निवेश करने की घोषणा कर चुके हैं.
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भारत का कहना है कि यूक्रेन में युद्ध रुके और मामले का हल बातचीत और कूटनीति से निकाला जाए.
साल 2022 की नरेंद्र मोदी की इस पहली विदेश यात्रा से पहले यूरोप के कई नेताओं ने भारत का दौरा किया था. इनमें ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन, यूरोपियन यूनियन की प्रमुख उर्सुला वॉन डर लेन शामिल थे.
दिल्ली में आयोजित रायसीना डायलॉग में भाग लेने के लिए भी बहुत से नेता भारत आए.
ये यात्रा ऐसे वक़्त में हो रही है, जब कोरोना महामारी से प्रभावित वैश्विक अर्थव्यवस्था उबरने की कोशिश में है. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने दोबारा चुनाव जीत लिया और जर्मनी के चांसलर ओलाफ शॉल्त्स को पद संभाले अभी ज़्यादा वक़्त नहीं बीता है.
उधर रिपोर्टों के मुताबिक़, स्वीडन और फ़िनलैड नेटो की सदस्यता के लिए अर्ज़ी दाखिल कर सकते हैं. इससे डर है कि रूस की नाराज़गी बढ़ सकती है.
यूरोप यात्रा में प्रधानमंत्री मोदी प्रमुख कारोबारियों और वहाँ बसे भारतीयों से भी मुलाक़ात करेंगे.
इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी द्वितीय नॉर्डिक समिट में भी हिस्सा लेंगे, जिसमें नॉर्वे, स्वीडन, आइसलैंड और फ़िनलैंड भी हिस्सा लेंगे.
अमेरिका के अलावा, भारत एकमात्र देश है जिसके साथ नॉर्डिक देश सम्मेलन स्तर की वार्ता करते हैं.

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यात्रा का उद्देश्य
यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक सामरिक, कूटनीतिक स्थिति पर प्रभाव डाला है. रूस और चीन की नज़दीकियां बढ़ी हैं, भारत में फ़िक्र बढ़ी है कि पश्चिमी देशों का ध्यान चीन से हटकर रूस पर जा टिका है.
भारत पर दबाव है कि वो रूस से आर्थिक संबंधों में कटौती करे, लेकिन भारत ऐसा करने को तैयार नहीं है.
यात्रा से पूर्व जारी एक वक्तव्य में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "यूरोप की मेरी यात्रा ऐसे वक़्त आई है, जब इलाक़े में कई चुनौतियां और विकल्प हैं. इस बातचीत से मेरा मक़सद है कि मैं यूरोपीय सहयोगियों, जो कि भारत की शांति और समृद्धि की खोज के अहम साथी हैं, के साथ सहयोग की भावना को मज़बूत करूं."
अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन लिखते हैं, "भारत को पहले से ज़्यादा यूरोप की ज़रूरत पड़ेगी, चाहे वो रक्षात्मक क्षमताओं का निर्माण हो या अपनी आर्थिक और तकनीकी बदलाव के लिए."
श्याम सरन के मुताबिक जर्मनी मज़बूती के बलबूते यूरोप ऐसे इलाक़े के तौर पर उभरेगा, जो दूसरे साथी देशों को साथ लेकर चले और अमरीका से अलग स्वतंत्र रूप से अपना रोल निभाए.
वो लिखते हैं, "यही वजह है कि भारत यूरोप के साथ अपने चौतरफ़ा संबंधों को मज़बूत करे, एक बदले हुए वैश्विक राजनीति की साझा सोच का निर्माण करे और यूरोप को प्रेरित करे कि वो इंडो-पैसिफ़िक में ज़्यादा बड़ी भूमिका निभाए."
साल 2021 में भारत और जर्मनी ने अपने कूटनीति संबंधों के 70 साल पूरे किए और साल 2000 से वो कूटनीति साझेदार रहे हैं.
जर्मनी जी-सात देशों का अध्यक्ष है और ऐसे वक़्त जब भारत ने सीधे तौर पर यूक्रेन हमले पर रूस की आलोचना नहीं की.

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ब्लूमबर्ग में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़, जर्मनी में इस बात पर बहस चल रही है कि क्या जून में होने वाली बैठक में प्रधानमंत्री मोदी को बुलाया जाए या नहीं.
विदेश मंत्रालय प्रवक्ता अरिंदम बागची ने इस पर कहा कि सही वक़्त पर वो ढेर सारी बात कहेंगे, अगर ये यात्रा होती है.
ब्लूमबर्ग की एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़, जर्मन चांसलर ने भारत को इस बैठक में बुलाने का फ़ैसला किया है.
प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा से ठीक पहले रविवार को पत्रकारों से बातचीत में विदेश सचिव विनय क्वात्रा के मुताबिक़, प्रधानमंत्री मोदी की यूरोप यात्रा का मुख्य उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच 'बहुआयामी' संबंधों को मज़बूत करना है.
जर्मनी में पूर्व भारतीय राजदूत गुरजीत सिंह टाइम्स ऑफ़ इंडिया अख़बार में लिखते हैं, "जर्मनी और भारत सहमत हैं कि रूस को अलग-थलग नहीं किया जा सकता और उससे जुड़ा रहा जाए और ज़ोर दिया जाए कि वो नियमों के भीतर रहे."
एक तरफ़ जहाँ ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने भारत के साथ दीवाली तक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर पहुँचने की बात की है, यूरोप के साथ व्यापार समझौते का रास्ता लंबा दिखता है.
प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा पर इस पर बातचीत की उम्मीद है.
यूरोपीय कमिशन राजदूत युगो एस्टुटो ने कहा है कि भारत और यूरोपीय यूनियन साल 2024 में दोनो ही तरफ़ चुनावी प्रक्रिया की शुरुआत से पहले एक व्यापार और निवेश समझौते पर पहुँचने पर बात कर रहे हैं.
उधर श्याम सरन लिखते हैं कि भारत को रूस के साथ संबंधों का दर्जा गिराने की ज़रूरत नहीं.

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चीन को लेकर फ़िक्र
जर्मनी में पूर्व भारतीय राजदूत गुरजीत सिंह लिखते हैं कि चाहे ग्रीन पार्टी हो, फ्री डेमोक्रेट्स हों, वो चीन को उतना पसंद नहीं करते जितना सीडीयू/सीपीडी गठबंधन था.
ओलाफ शॉल्त्स का संबंध सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी से है जबकि पूर्व चांसलर एंगेला मर्केल क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी से थीं. उनके वक़्त रूस के तेल, गैस और कोयले पर जर्मनी की निर्भरता बढ़ी.
राजदूत गुरजीत सिंह लिखते हैं, "जर्मनी की रूस को लेकर नीति के चीथड़े उड़ जाने के बाद चीन को लेकर एहतियात रखने वाले पार्टनर बीजिंग से प्रतिद्वंद्वी की तरह निपटना चाहते हैं... भारत नहीं चाहता कि यूक्रेन में रूस की कार्रवाई से चीन के उल्लंघनों से ध्यान हटे."
गुरजीत सिंह कहते हैं, "वे लोग (ग्रीन पार्टी से जुड़े लोग) भारत से बहुत ख़ुश होंगे क्योंकि पिछले एक दशक में भारत-जर्मन भागीदारी से भारत के वातावरण-अनुकूल नीतियां गहरी हुई हैं. जर्मनी ने कई ग्रीन आइडियाज़ जैसे सोलर पावर, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, स्मार्ट सिटीज़ और नमामि गंगे के लिए एक अरब डॉलर से ज़्यादा देने का वादा किया है."
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