मदीना में पाकिस्तानी पीएम शहबाज़ शरीफ़ के ख़िलाफ़ लगे 'चोर-चोर' के नारे

शहबाज़ शरीफ़

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इमेज कैप्शन, मदीना में दुआ करते शहबाज़ शरीफ़
    • Author, बेनज़ीर शाह और नज़र-उल-इस्लाम
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू के लिए

सऊदी अरब के दौरे पर गए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ उस वक्त मदीना की एक मंस्जिद में फंस गए जब उनके ख़िलाफ़ 'चोर-चोर' के नारे लगाते लोगों ने उन्हें घेर लिया.

प्रधानमंत्री बनने के बाद शाहबाज़ शरीफ़ अपनी कैबिनेट के मंत्रियों के साथ तीन दिवसीय दौरे पर सऊदी अरब गए थे. इस दौरान वो मदीना की मस्जिद-ए नवाबी गए थे, जहां कथित तौर पर पाकिस्तान तहरीके इंसाफ़ (पीटीआई) के समर्थकों ने उन्हें घेरकर उनके ख़िलाफ़ नारेबाज़ी की.

इस वाकये से जुड़े कई वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए हैं. वीडियो में सुना जा सकता है कि उनके ख़िलाफ़ लोग 'चोर-चोर' के नारे लग रहे थे. वीडियो में नार्कोटिक्स मंत्री नवाब शाहज़ैन बुग्ती और मरियम नवाज़ के ख़िलाफ़ भी जमकर नारेबाज़ी की गई थी.

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बड़ी संख्या में पीटीआई के नेताओं और समर्थकों ने सोशल मीडिया पर इस घटना का समर्थन किया, हालांकि अधिकांश लोगों ने इसकी निंदा की और पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर राजनीति को लेकर लोगों के बीच बढ़ते मतभेद के बारे में चिंता व्यक्त की.

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

हम्माद ख़ान नाम के एक यूज़र ने लिखा, "पीटीआई नेतृत्व युवाओं को हिंसा सिखा रही है. इसका ये नतीजा है कि मदीना मस्जिद और खाना काबा के शहबाज़ शरीफ़ के दौरे के वक्त ये स्पष्ट दिखा. पीटीआई से साफ़ कर दिया है कि क़ुरान की शिक्षा का वो सम्मान नहीं करती. हम इस घटना से आहत हैं और इसका विरोध करते हैं."

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हुसैन अली ख़ान ने लिखा, "मस्जिद-ए-नवाबी में चोर-चोर की नारेबाज़ी सरकार मदीना के अपमान के सिवा कुछ नहीं है. जिन्होंने नारेबाज़ी की है उन्होंने गुनाह किया है. उन्हें माफ़ी मांगनी चाहिए. विरोध दर्ज करना ही था तो मस्जिद के बाहर विरोध प्रदर्शन किए जा सकते थे."

फिज़ा ज़कारिया ने लिखा, "शाहबाज़ शरीफ़ को न पसंद करना और उन्हें समर्थन न देना एक बात है और उनके ख़िलाफ़ मीम्स बनाना और उनका मज़ाक उड़ाना रोज़ा-ए-रसूल के ख़िलाफ़ है. अपने धर्म का सम्मान करना सीखें, हर बात कोई मज़ाक नहीं है."

अर्सलान ख़ान ने सोशल मीडिया पर लिखा, "पीटीआई के समर्थक के तौर पर मैं इस घटना की निंदा करता हूं, पाक मदीना की पाक ज़मीन हमारे लिए इमरान ख़ान और शहबाज़ शरीफ़ की सारी दुनिया से बढ़कर है."

शहबाज़ शरीफ़

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वहीं क़ानून और महिला अधिकार कार्यकर्ता निगहत डाड ने कहा, "ये देखना डरावना है कि पीटीआई के समर्थक और गैंग मस्जिद-ए-नवाबी में क्या कर सकते हैं, और ये भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि पीटीआई नेता इसका समर्थन कर रहे हैं."

इस ट्वीट के जवाब में पीटीआई नेता शिरीन मज़ारी ने कहा, "पीटीआई से घृणा से बाहर निकलिए. ये आम पाकिस्तान हैं जो उन लोगों के ख़िलाफ़ अपने गुस्से का इज़हार कर रहे हैं जिन्होंने साजिश के तहत विदेशी मदद से यहां सत्ता का परिवर्तन किया है."

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पाकिस्तान में राजनीति को लेकर चर्चा तेज़

ये इस तरह की पहली घटना नहीं है. इससे पहले अप्रैल में ही एक शाम अवामी नेशनल पार्टी के समर्थक और बैंकर जियाउल्लाह शाह ने पेशावर में इसी तरह की एक घटना के चश्मदीद बने.

अपनी कार की मरम्मत करते समय उन्होंने देखा कराची में पीटीआई की रैली का सीधा प्रसारण करने के लिए चारों तरफ बड़े-बड़े पर्दे लगाए गए थे. रात तक इन पर्दों के पास अच्छीखासी भीड़ जमा हो गई और लोग डीज़ल-डीज़ल के नारे लगाने लगे.

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान इस शब्द का इस्तेमाल अपने विरोधी मौलाना फ़ज़लुर्रहमान पर निशाना साधने के लिए करते रहे हैं.

जियाउल्लाह शाह के अनुसार, "कुछ देर में मौलाना फ़ज़लुर्रहमान के समर्थक भी वहां एकत्र हो गए और वो इमरान के ख़िलाफ़ 'यहूदी एजेंट' के नारे लगाने लगे. स्थिति को देखकर डर लगने लगा था, ऐसा लग रहा था कि किसी भी वक्त हिंसा हो सकती है."

जियाउल्लाह शाह कहते हैं कि इन दिनों पाकिस्तान में राजनीति की बात करने मुश्किल होता जा रहा है. वो कहते हैं, "व्हाट्सऐप ग्रुप पर आपके परिचित आपसे दूर हो जाते हैं, वो ग्रुप छोड़ देते हैं या गाली-गलौच करते हैं."

इमरान ख़ान सरकार के ख़िलाफ़ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के सफल होने से पहले इमरान ख़ान ने आरोप लगाया था कि उनके विरोधियों ने उनकी सरकार गिराने के लिए उनके ख़िलाफ़ कथित विदेशी साज़िश की थी. इस दौरान वो 'ग़लती' से अमेरिका का नाम भी ले बैठे थे.

इमरान ख़ान की रैली

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हालांकि देश के शीर्ष सैन्य और ख़ुफ़िया नेतृत्व ने 'विदेशी साजिश' से जुड़े किसी तरह के सबूत मिलने से इनकार किया था.

प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ की अध्यक्षता में राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की बैठक के बाद ऐलान किया गया कि उनकी जांच में विदेशी साजिश का ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है, जिसका ज़िक्र बार-बार इमरान ख़ान करते रहे हैं.

इसके बाद सुरक्षा एजेंसियों ने विदेशी साज़िश का सबूत न मिलने की बात दोहराई. अमेरिका ने भी राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के बयान का स्वागत किया था.

लेकिन इमरान ख़ान के समर्थक बार-बार ये आरोप दोहरा रहे हैं. इमरान ख़ान ने भी बेहद आक्रामक रुख़ अख़्तियार किया है. रैलियों और सोशल मीडिया पर वो मौजूदा सरकार को निशाने पर ले रहे हैं.

जब से इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया है तब से सोशल मीडिया पर ऐसी ख़बरें साझा करने की घटनाएं बढ़ रही हैं. इससे ऐसा लगता है कि राजनीति को लेकर समाज में मतभेद गहरा हो रहा है और सोशल मीडिया पर इमरान ख़ान के समर्थकों और आलोचकों के बीच भी चर्चा हो रही है.

इमरान ख़ान की रैली

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पाक समाज में बढ़ा मतभेद

फ़ोटो पत्रकार अनसिया सैय्यद ने हाल में ट्विटर पर लिखा कि कराची के एक अस्पताल में एक डॉक्टर की राजनीतिक चर्चा के कारण वो अपने पिता का इलाज नहीं करवा पाईं.

उनका कहना है कि डॉक्टर पीटीआई समर्थक थे और जब उन्हें पता चला कि उनके पिता पत्रकार हैं तो उन्होंने राजनीति पर उनसे उनकी राय जाननी चाही. जिसके बाद वो डॉक्टर राजनीति के बारे में बात करते रहे लेकिन उन्होंने मरीज़ को देखा तक नहीं.

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इसी तरह लाहौर के एक सरकारी अस्पताल में काम करने वाले डॉ. अर्सलान कहते हैं कि इफ्तार के लिए जब वो अपने दोस्त के घर गए थे तब वहां हुई राजनीतिक चर्चा सुनकर वो दुखी हुए.

वो कहते हैं कि उन्हें इस बात का आश्चर्य हुआ कि जो लोग पहले ख़राब प्रशासन के लिए इमरान ख़ान सरकार की आलोचना कर रहे थे वो विदेशी हस्तक्षेप के उनके दावे पर भरोसा कर रहे थे.

पीटीआई नेशनल असेंबली के सदस्य शेर अली अरबाब ने बीबीसी को बताया कि वो मानते हैं कि हाल के दिनों में समाज में राजनीति को लेकर मतभेद बढ़ा है, हालांकि वो मानते हैं कि ये रातोंरात होने वाली प्रक्रिया नहीं बल्कि दशकों में होने वाली प्रक्रिया है.

उनका कहना है कि इसका एक कारण ये है कि देश में लोग राजनीति और लोकतंत्र को लेकर परिपक्व नहीं हुए हैं. वो कहते हैं, "अब तक देश में एक भी प्रधानमंत्री अपना संवैधानिक कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए हैं. इसके साथ ही शिक्षा की कमी और कम साक्षरता दर भी इस मतभेद का कारण हैं."

हालांकि शेर अली अरबाब का कहना है कि इसके लिए इमरान ख़ान को दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि "राजनीतिक असहिष्णुता ने समाज में" अपनी जड़ें जमा ली हैं.

पाकिस्तान में पीएमएल-एन की रैली

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वो 90 के दशक की राजनीति का उदाहरण देते हैं. वो कहते हैं कि इस समस्या का समाधान राजनीतिक दलों में लोकतंत्र को बढ़ावा देना है. वो कहते हैं, "यब अजीब बात है कि राजनीतिक नेता लोकतंत्र, मज़बूत संस्थानों और क़ानून के शासन की बात करते हैं लेकिन उनकी अपनी पार्टियां वंशानुगत राजनीति और तानाशाही का संकेत है."

वो कहते हैं कि राजनेताओं को यह सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि सेना संवैधानिक और पेशेवर दायरे के भीतर काम करे और ये तभी संभव है जब राजनेता सत्ता की अपनी इच्छा पर काबू पा लें.

लाहौर में समाजशास्त्र और राजनीति के प्रोफ़ेसर उमर जावेद ने कहा कि पाकिस्तान ने 2011 में भी इसी तरह का ध्रुवीकरण देखा था. उस वक्त पीटीआई पहली बार आम चुनाव से दो साल पहले राजनीतिक पर्दे पर बड़ी ख़िलाड़ी बनकर उभर रही थी.

उनका कहना है कि अविश्वास प्रस्ताव के सफल होने के बाद एक बार ध्रुवीकरण शुरू हो गया है और इमरान ख़ान अगले चुनाव से पहले अपने मताधार को मज़बूत करने के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं.

प्रोफ़ेसर उमर जावेद ने बीबीसी उर्दू से कहा, "राजनीतिक ध्रुवीकरण में पीटीआई की भूमिका अहम रही है. पीटीआई एक ऐसी पार्टी है जो खुद को यथास्थिति के ख़िलाफ़ और पारंपरिक अभिताज वर्ग के ख़िलाफ़ पेश करती है. उसकी पूरी राजनीतिक ब्रांडिंग खुद को दूसरे राजनीतिक विकल्पों से अलग करना है. वो दूसरों को पूरी तरह खारिज करती है."

हालाँकि वो इस बात से सहमत नहीं हैं कि पाकिस्तान असल में उतना ही बँटा हुआ है जितना सोशल मीडिया पर दिखता है. वो कहते हैं, "अगर आप 2018 के चुनावों के मतदान के आंकड़ों को देखें, तो पीएमएल-एन या पीटीआई के मतदाताओं की एक बड़ी संख्या ऐसे वोटरों की थी जो अपने पसंदीदा उम्मीदवार की गैरमौजूदगी में किसी अन्य पार्टी को वोट देने को तैयार थे."

वो ये मानते हैं कि इस बात की स्पष्ट तस्वीर आने वाले चुनावों में ही दिखेगी कि पाकिस्तानी मतदाता ध्रुवीकृत हैं भी या नहीं.

वीडियो कैप्शन, पाकिस्तान की वो जगह जहां हिंदू-मुसलमान मिलकर गायों को बचा रहे

पेशावर में कार मरम्मत की एक छोटी-सी दुकान के मालिक रिज़वान अहमद कहते हैं कि राजनीति को लेकर समाज में बढ़ते मतभेद के लिए केवल पीटीआई नहीं बल्कि सभी राजनीतिक दल ज़िम्मेदार हैं.

वो कहते हैं कि वो राजनेताओं की आपसी तनातनी से तंग आ गए हैं क्योंकि नेता महंगाई जैसी लोगों की ज़िंदगी से जुड़े मुद्दों पर ध्यान नहीं दे रहे.

पिछले सप्ताह उन्होंने अपनी दुकान से एक बोर्ड लटका दिया जिस पर लिखा था, "कृपया राजनीतिक चर्चा से परहेज़ करें."

उन्होंने बीबीसी से कहा, "जब तक ये राजनीतिक दल अपनी लड़ाई ख़त्म नहीं करेंगे, वो आम लोगों के लिए कैसे काम करेंगे?"

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