मोदी-बाइडन कर सकते हैं रूस-यूक्रेन पर चर्चा, भारत-अमेरिका 2+2 वार्ता से पहले वर्चुअल मुलाक़ात

    • Author, विकास पांडे
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

भारत और अमेरिका के बीच 2+2 बैठक से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के बीच बातचीत होने जा रही है.

2+2 यानी भारत और अमेरिका के विदेश और रक्षा मंत्रियों की बैठक वॉशिंगटन में होनी है लेकिन इससे पहले मोदी और बाइडन के बीच कई मुद्दों पर चर्चा होगी.

मंत्रिस्तरीय वार्ता का ये सिलसिला 2018 में शुरू हुआ था जिसे डायलॉग कहा जाता है. इसमें दोनों देशों के बीच संबंधों को बेहतर बनाने पर चर्चा होती है. लेकिन इसे साथ ही एशिया में चीन के मुक़ाबले में भारत को मज़बूत करने की अमेरिका की नीति का भी हिस्सा माना जाता है.

अपने सार्वजनिक बयानों में दोनों देश आपसी हितों के ज्यादातर मुद्दों पर पर एकमत दिखे हैं.

लेकिन यूक्रेन पर रूस के हमले को लेकर दोनों के बयान अलग-अलग रहे हैं.

2+2 की बातचीत से पहले भारत के बयान में कहा गया कि अमेरिका के साथ बातचीत '' समग्र वैश्विक रणनीतिक साझेदारी'' को मज़बूत करेगी.

लेकिन अमेरिका के बयान में '' यूक्रेन पर रूस के हमले से पैदा अस्थिरता के असर'' को कम करने की बात की गई है. इसका मतलब ये है कि अमेरिका एक बार फिर भारत पर रूस के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने का दबाव डाल सकता है.

फरवरी में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के साथ ही भारत और अमेरिका का नज़रिया अलग-अलग रहा है.

भारत ने यूक्रेन के खिलाफ़ रूस के हमले पर अपने बयान में कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया था लेकिन इसने सीधे तौर पर रूस की आलोचना नहीं की थी. रूस के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र की वोटिंग में भी भारत बाहर रहा.

भारत रूस के खिलाफ लगाए गए बैंकिंग प्रतिबंधों की काट निकालने की कोशिश में लगा रहा है ताकि रूसी कंपनियों से सस्ते में तेल खरीदा जा सके.

भारत अगर किसी का पक्ष लेता नहीं दिख रहा है तो इसके पीछे उसकी जियो पॉलिटिकल ज़रूरतें हैं. रूस भारत का पुराना सहयोगी रहा है. वह भारत के हथियारों और दूसरे सैनिक साज़ो-सामान का सबसे बड़ा सप्लायर रहा है. भारत लगभग 50 फीसदी हथियार रूस से ही मंगाता है.

भारत के रुख़ पर भ्रम क्यों?

भारत के एक पूर्व राजनयिक ने कहा है कि भारत के रुख ने अमेरिका को असमंजस में डाल दिया है.

अमेरिका चाहता है कि भारत रूस को अलग-थलग करने की उसकी व्यापक रणनीति का हिस्सा बने. साथ ही वह भारत को चीन के मुकाबले राजनयिक और सैन्य तौर पर कमज़ोर होने देने का जोखिम भी नहीं उठा सकता.

विशेषज्ञों का कहना है कि इस स्थिति ने अमेरिका के लिए भ्रम की स्थिति पैदा की है. उसे समझ नहीं आ रहा है कि इस असमंजस से कैसे निपटा जाए.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में क्वाड की एक बैठक में यूक्रेन के खिलाफ रूस के हमले पर बयान दिया था. बाइडन ने मोदी के इस बयान के बाद कहा था कि यूक्रेन युद्ध पर भारत का रुख एक तरह से ढुलमुल था.

बाइडन के शीर्ष आर्थिक सलाहकार ब्रायन डीज ने बाद में बताया कि रूस के साथ इस तरह का ''खुल्लम खुल्ला रणनीतिक सहयोग'' का मुद्दा काफी अहम है और भारत को लंबी अवधि तक इसका नतीजा भुगतना पड़ सकता है.

लेकिन इससे भी भारत के मौजूदा रुख पर असर नहीं पड़ा और रूस को संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार कमेटी से हटाने के लिए वोटिंग के दौरान भारत बाहर रहा. हालांकि अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार दलीप सिंह भारत के रुख को लेकर थोड़े समझदार दिखे.

दांव पर क्या लगा है?

नरेंद्र मोदी और जो बाइडन की बातचीत भले ही द्विपक्षीय रिश्तों के इर्द-गिर्द होगी लेकिन यूक्रेन मुद्दा इस पर काफी हावी रह सकता है.

भारत और अमेरिका के विदेश और रक्षा मंत्रियों की बैठक में भी यह एक एजेंडा होगा.

यूक्रेन को लेकर दोनों पक्ष के रुख में अंतर साफ दिखा है. दोनों पक्षों ने इसे साफ तौर पर माना भी है. लेकिन सिर्फ इस एक मुद्दे की वजह से भारत-अमेरिका के रिश्तों को जोखिम में नहीं डाला जा सकता.

दरअसल अमेरिका एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के वर्चस्व की काट के लिए भारत को एक अहम सहयोगी के तौर पर देख रहा है.

दोनों देशों का मानना है कि उनके बीच कारोबार बढ़ाने की भी काफी संभावना है. दोनों देश द्विपक्षीय कारोबार को 500 अरब डॉलर तक ले जाना चाहते हैं. 2021 में इनके बीच 113 अरब डॉलर का कारोबार हुआ था.

अपनी सेना को हर मोर्चे पर मजबूत करने के लिए भी भारत को अमेरिका की जरूरत है. हथियारों के लिए रूस पर निर्भरता कम करने में भी अमेरिका मददगार साबित हो सकता है.

रूस अभी भी भारत के लिए हथियारों का सबसे बड़ा सप्लायर है. हालांकि की यह निर्भरता 70 फीसदी से घट कर 49 फीसदी तक पहुंच चुकी है. 2011 से लेकर 2015 तक अमेरिका रूस के बाद भारत का सबसे बड़ा हथियार सप्लायर था. लेकिन 2016 से 2021 के दौर में वह इस मामले में फ्रांस और इसराइल से पिछड़ गया.

अमेरिका और भारत, दोनों इन आंकड़ों को दुरुस्त करना चाहते हैं.

एस- 400 डील

बहरहाल, भारत और अमेरिका के बीच इस वक्त पेचीदा मामला एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम सौदे का है. भारत ये सिस्टम रूस से खरीद रहा है. वो ये सिस्टम चीन और पाकिस्तान की सैन्य ताकत का मुकाबला करने के लिए खरीद रहा है.

लेकिन रूस के साथ भारत का यह समझौता 'काउंटरिंग अमेरिकाज़ एडवर्सरिज थ्रू सैंक्शन एक्ट' यानी काटसा के तहत आ जाता है. 2017 में बने इस कानून का मकसद रूस, ईरान और उत्तरी कोरिया के खिलाफ आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबंध लगाना है. यह कानून किसी देश को इन तीनों से रक्षा सौदा करने पर भी रोक लगाता है.

अमेरिका ने 2018 में रूस से एस-400 खरीदने पर चीन के खिलाफ प्रतिबंध लगा दिया था.

लेकिन अमेरिका अब तक भारत के खिलाफ प्रतिबंध लगाने से बचता आया है. पिछले साल दिसंबर में भारत में इसकी पहली खेप भी पहुंच गई. इसके बावजूद अमेरिका ने भारत के खिलाफ कदम नहीं उठाया.

हालांकि यूक्रेन पर रूस के हमले पर भारत के रुख से आपसी संबंधों की पेचीदगियां बढ़ेंगीं.

कुछ अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि इसकी कोई गारंटी नहीं है कि भारत एस-400 सौदे के मामले में अमेरिकी प्रतिबंधों से बच जाएगा.

लेकिन बदले जियोपॉलिटिकल हालात में अमेरिका और भारत दोनों नहीं चाहेंगे कि वे सार्वजनिक तौर पर एक दूसरे खिलाफ रुख़ लेते दिखें.

हालांकि दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों के बीच बैठक में एस-400 सौदा और प्रतिबंध का मुद्दा जरूर उठेगा.

बहरहाल, देखना ये होगा कि दोनों देश एस-400 समेत दूसरे मुद्दों पर अपने मतभेदों को कैसे सुलझाते हैं. इसी से भारत और अमेरिका के संबंधों की दिशा तय होगी.

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