'कोई भी मरना नहीं चाहता, भले ही देश के लिए क्यों न हो' - रूस से लड़ने हथियार उठाते यूक्रेनी छात्र

    • Author, जेरेमी बोवेन
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, कीएव

एक हफ्ते पहले ही मैं ऐसे युवकों के एक समूह से मिला, जो यूक्रेन में चल रहे युद्ध में रूस के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए कीएव के एक सेंटर में बतौर वॉलेंटियर योगदान दे रहे हैं.

इनमें से ज़्यादातर किशोर थे, जिन्हें अभी स्कूल छोड़े हुए ज़्यादा वक्त नहीं हुआ. उन्होंने मुझे बताया कि तीन दिन की बेसिक ट्रेनिंग के बाद वो युद्ध में फ्रंट लाइन या उसके बेहद क़रीब चले जाएंगे.

19 साल के मैक्सीम लुत्सिक जीव विज्ञान के छात्र हैं, वो मुझसे कहते हैं कि एक हफ्ते से भी कम की ट्रेनिंग के बाद सेना में जवान बनने की कोशिश को लेकर वो परेशान नहीं थे. क्योंकि, स्काउट में वो पांच साल बिता चुके हैं, वहां उन्होंने हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी ली है.

वो 10 साल के थे जब 2014 में यूक्रेन में अलगाववादियों का युद्ध शुरू हुआ था, इन अलगाववादियों को रूस प्रायोजित कर रहा था.

सेना में जुड़ने के लिए मैक्सीम अपने 18 साल के दोस्त दिमित्री किसिलेंको के साथ गए थे जो कि यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र की पढ़ाई कर रहे थे.

ये रिक्रूट्स कुछ ऐसे किशोर थे, जो अब तय कर चुके थे कि उन्हें बच्चा बनकर नहीं रहना है, ये किसी मज़ाक पर जमकर हंस रहे थे ताकि नर्वस न दिखें और ख़ुद को एक बहादुर के तौर पर पेश कर सकें.

इनमें से कुछ अपने घुटनों पर पैड पहने हुए थे, जो बहुत छोटा सा लग रहा था और ऐसा लग रहा था कि वो अपने 12वें जन्मदिन पर स्केटबोर्ड लेकर आए हों. कुछ के पास स्लीपिंग बैग्स थे तो एक के पास योग वाला मैट था.

''ऐसा लग रहा था कुछ दोस्त फेस्टिवल के लिए जा रहे हैं''

जब वो ट्रेनिंग बेस जाने के लिए अपनी बस का इंतज़ार कर रहे थे तो ऐसा लग रहा था कि कुछ दोस्त फेस्टिवल के लिए जा रहे हैं. लेकिन इन किशोरों के हाथ में बंदूक कुछ अलग कहानी कह रही थी. इन सबको एक कलाश्निकोव असॉल्ट राइफल दी गई थी.

मैं दिमित्री और मैक्सिम समेत कुछ वॉलेंटियर्स के संपर्क में था. इस हफ्ते मैं शहर के पूर्वी छोर पर उन पोस्ट पर गया जहां पर वो तैनात थे. यहां पर उन्हें यूनिफॉर्म दे दिए गए थे, साथ ही कवच और पैड-हेलमेट भी मुहैया कराया गया था. ये लड़के अपनी बेसिक ट्रेनिंग का सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश कर रहे हैं.

दिमित्रो ने मुझसे कहा, "मुझे अपनी बंदूक की आदत पड़ गई है. मैंने शूट करना और युद्ध में क्या करना है ये सीख लिया है, साथ ही वो चीज़ें भी सीख ली हैं जो रूस के ख़िलाफ़ लड़ाई में अहम हैं.''

मैक्सीम ज़्यादा चौकन्ना और गंभीर लगते हैं.

"मेरा आत्मविश्वास पहले की तुलना में बढ़ा है, क्योंकि हमें यहां कई तरीकों की जानकारी हुई है, मार्शल आर्ट्स में, मेडिसिन में और युद्ध के मैदान में कहां कैसे क्या करना है, इन सब चीज़ों की जानकारी हुई है.''

यहां सबके दिमाग में एक ही सवाल है कि क्या लड़ाई कीएव की तरफ़ बढ़ी चली आ रही है. दिमित्री का कहना है, "ये निश्चित तौर पर संभव है. हमें बस उन्हें यहीं रोकना है, क्योंकि अगर ये कीएव पहुंचे तो युद्ध ख़त्म हो सकता है."

परिवार के बारे में क्या सोचते हैं ये वॉलेंटियर

ये किशोर रूस की सीमा के पास के उसी कस्बे से हैं, जिनपर गोलीबारी की जा रही है, अभी भी इनके परिवार वहीं पर हैं. मैंने लड़कों से पूछा कि उनके माता-पिता क्या सोचते हैं कि आप लोग क्या कर रहे हैं. मैक्सिम ने मज़ाकिया लहज़े में कहा कि उनकी मां ने उनसे कहा था कि शेल्टर में ही रहना और खाना बनाने के लिए वॉलेंटियर करना. मैक्सिम ने अपनी तैनाती के बारे में परिवार को नहीं बताया था क्योंकि परिवारवाले परेशान हो जाते.

दिमित्री के परिवारवाले जानते हैं कि वो क्या कर रहे हैं. दिमित्रि ने इस लड़ाई में जुड़ने की शुरुआत मोलोटोव कॉकटेल्स बनाने के लिए वॉलेंटियर करने के साथ की थी. इसके कुछ दिन बाद ही दिमित्रो ने अपने पिता को फ़ोन पर बताया है कि वो टेरिटोरियल आर्मी ज्वाइन करने का फ़ैसला कर चुके हैं. उनके पिता ने उस वक्त कहा था कि हीरो बनने के लिए इतनी ज़्यादा कोशिश न करें.

दिमित्री का कहना है कि वो जो भी कर रहे हैं उनके माता-पिता को उसपर नाज़ है. वो खुश दिख रहे थे. मैंने उनसे पूछा कि आगे क्या होने जा रहा है इसको सोचकर क्या डर लगता है. दिमित्री का कहना था, ''ज़्यादा नहीं, लेकिन इंसान में डर का अहसास होता है, निश्चित तौर पर अगर गहराई से सोचूं तो मैं थोड़ा डरा हुआ हूं, क्योंकि कोई भी मरना नहीं चाहते हैं, चाहे ये मौत देश के लिए ही क्यों न हो. इसलिए हम सबके लिए मौत कोई विकल्प नहीं है.''

दिमित्री और मैक्सीम ने भविष्य के अपने सपनों के बारे में बातचीत की, दोस्तों के साथ मस्ती की, पढ़ाई पूरी की. उनके परिवारवाले निश्चित तौर पर प्रार्थना कर रहे होंगे कि उनके बच्चों के सपने, उनकी ऊर्जा और यहां तक की उनकी ज़िंदगी कोई कहीं ये जंग छीन न ले.

यहां से कुछ किलोमीटर ही दूर दूसरी तरफ़ की फ्रंट लाइन पर रूस की तरफ़ से लड़ रहे युवा जवान है, जहां तक विदेशी पत्रकारों की पहुंच नहीं है. उनमें से कई तो ऐसे हैं जिन्हें पता भी नहीं है कि उन्हें कहाँ भेज दिया गया है, युद्ध में ज़्यादातर युवाओं को ही लड़ने के लिए भेजा जाता है.

मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूं कि उन रूसी युवा जवानों में से कई की आशाएं दिमित्री और मैक्सीम की ही तरह हैं. एक अंतर हो सकता है वो है प्रेरणा की कमी. लेकिन जब दूसरे पक्ष की रिपोर्टिंग ही नहीं कर सकते तो ये भी निश्चित तौर पर कह नहीं सकते.

यूक्रेन के दो युवा जो छात्र से अब सेना के जवान बन गए हैं, वो अपने चेकप्वाइंट पर वापस लौट चुके हैं. प्रोफ़ेशन आर्मी उनसे कुछ मील दूर ही है और वो रूसी सेना से टक्कर ले रही है. लेकिन रूसी सेना अगर आगे आती है तो दूसरे वॉलेंटियर्स की तरह मैक्सिम और दिमित्रो भी फ़ायरिंग में उतरेंगे, मोलोटोव कॉकटेल्स के बक्से को लाने में मदद करेंगे.

अगर ये सब भी काम नहीं करता है तो नेटो सैन्य गठबंधन हज़ारों एंटी-टैंक हथियार लड़ाई के लिए दे रहा है.

तो कीएव में हर कोई युद्ध की तैयारी में है, जवान, वर्दी और बिना वर्दी के आम नागरिक, मैक्सिम और दिमित्री जैसे वॉलेंटियर्स जो रूस के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए तैयार हैं.

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