यूक्रेन संकट: क्या रूस की आलोचना नहीं करने से भारत की छवि को नुक़सान हुआ है

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रूस और यूक्रेन के बीच जारी भीषण संघर्ष नवें दिन में प्रवेश कर चुका है. इस युद्ध में मिली जानकारी के मुताबिक़ अब तक सैकड़ों रूसी सैनिक और यूक्रेन के लोगों की मौत हुई है.

अमेरिका से लेकर यूरोप के तमाम देश आर्थिक प्रतिबंधों और सार्वजनिक आलोचना के ज़रिए रूस को दुनिया भर में अलग-थलग करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि इस युद्ध को रोका जा सके.

इसी दिशा में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा (यूएनजीए) में रूस के ख़िलाफ़ यूक्रेन पर हमले को लेकर निंदा प्रस्ताव लाया गया जो कि 141-5 वोट से पास हुआ. इस प्रस्ताव में कहा गया है कि रूस यूक्रेन से अपने सैनिकों को बिना शर्त वापस बुलाए.

कुल 193 देशों में से 141 देशों ने रूस के ख़िलाफ़ वोटिंग की और पाँच देशों ने रूस का साथ दिया जिनमें सीरिया जैसे देश शामिल हैं.

यूएनजीए में अपने ख़िलाफ़ प्रस्ताव पास होने पर रूस के विदेश मंत्री ने कहा है कि उसे कई दोस्तों का साथ मिला और पश्चिम अलग-थलग करने में नाकाम रहा है.

इसके साथ ही कुल 35 देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया जिनमें दक्षिण एशियाई देश भारत, पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश और श्रीलंका शामिल हैं.

भारत ने इससे पहले यूएनएससी में रूस के ख़िलाफ़ लाए गए निंदा प्रस्ताव पर हुई वोटिंग में भी हिस्सा नहीं लिया था.

संय़ुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति

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भारत रूस की आलोचना क्यों नहीं कर रहा है?

भारत ने इस मुद्दे पर एक विशेष रुख़ अख़्तियार किया हुआ है जिसके तहत वह टकराव वाले इलाक़ों में तत्काल युद्धविराम की अपील कर रहा है.

रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत के इस रुख़ की पश्चिमी मीडिया में आलोचना की जा रही है. भारत को अमेरिका समेत तमाम यूरोपीय देशों की ओर से दबाव का सामना भी करना पड़ रहा है.

लेकिन भारत अपने रुख़ पर लगातार डटा हुआ है और वह लगातार इस संघर्ष का कूटनीतिक हल निकालने की ज़रूरत पर ज़ोर दे रहा है.

ऐसे में सवाल उठता है कि रूस के ख़िलाफ़ आलोचनात्मक रवैया न अपनाने से भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर क्या असर पड़ेगा.

साथ ही भारत का ये रुख़ रूस के साथ रक्षा संबंधी समझौतों की वजह से तो नहीं है.

बीबीसी ने यूक्रेन संकट पर आधारित अपने एक विशेष कार्यक्रम में रूस में भारतीय राजदूत रहे अनिल त्रिगुणायत और विदेशी मामलों के जानकार हर्ष पंत से बात करके इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की है.

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रूस में भारत के राजदूत रहे अनिल त्रिगुणायत बताते हैं -

भारत हमेशा युद्ध की ओर जाने वाले देशों का विरोध करता है. साल 2010 और 2011 में अमेरिका और नेटो देशों ने जब लीबिया में हमला किया था तो मैं मॉस्को में था. उस वक़्त रूसी नेता काफ़ी कोशिश कर रहे थे कि ये संघर्ष न हो. ऐसे में भारत ने उस वक़्त भी यही स्टैंड रखा था. हालांकि, उस दौरान भी पश्चिमी देशों की मीडिया ने जिस तरह का प्रचार किया, उससे भारत को नुक़सान हुआ.

लेकिन इस मुद्दे पर भारत का ये रुख़ एक सैद्धांतिक रुख़ है जो कि पुराने समय से है. जब भी बड़ी ताक़तों के बीच लड़ाई हुई है तो भारत का नज़रिया हमेशा एक बड़ी तस्वीर देखने का रहा है.

रूस के साथ अगर हमारे रिश्ते बेहद ख़ास और रणनीतिक स्तर के हैं तो अमेरिका के साथ भी हमारी साझेदारी रणनीतिक स्तर की है. आपको पता होगा कि आज क्वॉड की मीटिंग भी होने वाली है. ऐसे में हमारे रिश्ते सभी देशों के साथ अच्छे हैं.

ऐसे में भारत के रुख़ को काफ़ी संकीर्णता के साथ देखा जा रहा कि चूंकि रूस के साथ हमारे रक्षा क्षेत्र से जुड़े रिश्ते हैं, ऐसे में उसका विरोध न करने की वजह यही है.

हमने ये बात स्पष्ट रूप से रखी है कि संघर्ष नहीं होना चाहिए. यूएन में जब हमने मतदान से ख़ुद को अलग किया तब भी हमने कहा था कि बहुत जल्दी कूटनीति का रास्ता छोड़ दिया गया. भारत ये हमेशा से कह रहा है और भारत इस मुद्दे पर सिर्फ़ बयान नहीं दे रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन को फ़ोन करके संघर्ष ख़त्म करने की अपील की है और कहा है कि कूटनीति को एक मौका मिलना चाहिए.

सभी जानकारों की इस बारे में एक राय है कि असल में ये लड़ाई रूस और यूक्रेन के बीच नहीं है. ये जंग रूस और अमेरिका के बीच है.

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क्या इस रुख़ से भारत की छवि को नुक़सान पहुंचेगा?

इस समय जहां रूस दुनिया में अलग-थलग पड़ता दिख रहा है और कहा जा रहा है कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के नेतृत्व में रूसी आक्रामकता से यूक्रेन तबाही की ओर बढ़ रहा है.

ऐसे में सवाल ये उठता है कि जब दुनिया दो धड़ों में बंटती हुई नज़र आ रही है. भूटान और नेपाल जैसे छोटे देश भी रूस के ख़िलाफ़ मतदान कर रहे हैं. ऐसे में भारत का मौजूदा रुख़ कहीं लंबे समय में भारत का नुक़सान तो नहीं कर देगा?

इस सवाल पर लंदन के 'किंग्स कॉलेज' में विदेश मामलों के विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर हर्ष वी पंत कहते हैं:-

मुझे लगता है कि ये मसला एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा हुआ है. मैं कुछ हद तक त्रिगुणायत जी की बात से सहमत हूं कि ये समस्या इतनी बड़ी है कि इसे सिर्फ़ एक नज़रिए से देखना इसके साथ नांइसाफ़ी करना होगा. लेकिन ये ज़रूर है कि जैसे-जैसे ये युद्ध आगे बढ़ रहा है, भारत की परेशानियां भी बढ़ रही हैं.

इसके तहत हमने ये भी देखा है कि भारत ने अपना पक्ष बदला है, यूएन में जो पहले प्रोसीज़रल वोट हुआ था, उसमें भारत ने दबे शब्दों में क्षेत्रीय संप्रभुता की बात कही थी. लेकिन अगर आप उसके बाद के बयान देखें तो भारत ने ये बात स्पष्ट रूप से कही है कि क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता अंतरराष्ट्रीय क़ानून के मुख्य सिद्धांत हैं.

दूसरे, भारत ने इस बात को उठाया है कि जिस तरह कूटनीति का साथ छोड़ने का दावा किया गया, जिस तरह से बात आगे बढ़ी है, वो ग़लत हुआ है. ऐसे में कहीं न कहीं भारत भी रूस के रवैये को लेकर बेचैन है.

इसी बीच हमने भारत की ओर से यूक्रेन को मानवीय मदद देने की बात भी देखी है. ऐसे में अब ये मसला उस स्थिति में पहुंच रहा है जहां पर भारत की कुछ चिंताएं बढ़ रही हैं क्योंकि इससे व्यापक आर्थिक परेशानी हो रही है.

हमारे छात्रों को परेशानी हुई. दूसरी चीज़ ये है कि जब आप संघर्ष क्षेत्र में होते हैं तब आपको दोनों तरफ़ की मदद चाहिए होती है. उसमें ये बात स्वाभाविक हो जाती है कि आप रूस से भी बात करें और यूक्रेन से भी बात करें और अपने लोगों को बचाएं. लेकिन ये ज़रूर है कि जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ेगा, और ज़्यादा आक्रामकता बढ़ेगी. उससे भारत की परेशानियां और ज़्यादा बढ़ सकती हैं."

(बीबीसी संवाददाता सारिका सिंह और राघवेंद्र राव के साथ बातचीत पर आधारित)

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