रूस, अमेरिका, ब्रिटेन और चीन के वो लोग जिनके ब्रीफ़केस में होता है परमाणु हमले का बटन – दुनिया जहान

24 फरवरी 2022, रूस में सवेरे का वक़्त.

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन के पूर्वी हिस्से में विशेष सैन्य अभियान का एलान किया और पहले से ही सीमा पर तैनात रूसी सेना ने यूक्रेन पर हमला बोल दिया.

आकार के हिसाब से रूस दुनिया का सबसे बड़ा देश है और यूक्रेन 45वां बड़ा मुल्क.

रूस चाहता है कि यूक्रेन को नेटो का सदस्य न बनाए जाए और पूर्व के देशों में नेटो की सेना तैनात न हो. लेकिन नेटो का सदस्य बनने के लिए यूक्रेन उसके साथ सहयोग बढ़ाना चाहता है.

संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी देशों ने कड़े शब्दों में रूस की निंदा की और उसपर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए. नेटो ने रूस के आसपास मौजूद अपने सदस्य देशों में सैन्य मौजूदगी बढ़ाई और कहा कि यूक्रेन को अपनी रक्षा करने का पूरा हक़ है.

इसके बाद 27 फरवरी को रूसी राष्ट्रपति ने ये कहते हुए अपने परमाणु हथियारों को 'स्पेशल अलर्ट' पर रखने का आदेश दे दिया.

दुनिया में परमाणु हथियारों का सबसे बड़ा ज़खीरा रूस के पास है. ऐसे में जानकार मानते हैं कि रूस के एलान से एक वैश्विक संकट पैदा हो सकता है. हालांकि रूस के साथ अलावा अमेरिका, चीन और ब्रिटेन समेत कई और मुल्कों के पास भी परमाणु हथियार हैं.

परमाणु हथियारों को तबाही के हथियार कहा जाता है. ऐसे में रूस के एलान से तनाव बढ़ना स्वाभाविक है. हालांकि रूस के अलावा अमेरिका, चीन और ब्रिटेन समेत कई और मुल्कों के पास भी ऐसे हथियार हैं.

लेकिन बड़ा सवाल ये है कि परमाणु हथियारों के इस्तेमाल को लेकर क्या प्रोटोकॉल हैं? तबाही के इन हथियारों के ज़खीरे की चाभी किसके पास होती है? रूस, अमेरिका, चीन और ब्रिटेन में परमाणु हथियारों का बटन कौन दबा सकता है?

अमेरिका: न्यूक्लियर फुटबॉल

ब्रूस ब्ला अमरीका के पूर्व मिसाइल लॉन्च अधिकारी थे. वो अब इस दुनिया में नहीं हैं. सत्तर के दशक में उन्होंने अमरीका के ख़ुफ़िया एटमी मिसाइल ठिकानों पर काम किया था.

ब्रूस ब्ला ने बताया, "हमें मिनटमैन कहा जाता था. वो इसलिए क्योंकि आदेश मिलने पर हम एक मिनट के अंदर परमाणु मिसाइल लॉन्च कर सकते थे."

ब्रूस और उनके साथी उस कंप्यूटर मॉनिटर की हर वक्त निगरानी किया करते थे, जिस पर कभी भी मिसाइल लॉन्च करने का आदेश आ सकता था. वो कहते हैं, "अमेरिकी सिस्टम में परमाणु हथियार इस्तेमाल करने का आदेश सिर्फ़ एक व्यक्ति दे सकता है और वो है देश का राष्ट्रपति."

"इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ हर वक्त कुछ ख़ास लोग होते हैं. उनके पास एक ब्रीफकेस होता है जिसे न्यूक्लियर फुटबॉल कहते हैं."

काले रंग का चमड़े का ये ब्रीफकेस दिखने में बड़ा साधारण-सा होता है. लेकिन इसके अंदर ख़ास तरह के उपकरण लगे होते हैं, जिसके ज़रिए राष्ट्रपति अपने वरिष्ठ सलाहकारों और कुछ अन्य बेहद ज़रूरी लोगों से कभी भी बात कर सकते हैं.

ब्रूस ब्ला कहत हैं, "इस ब्रीफ़केस में कार्टून की क़िताब सरीख़ा एक पेज भी होता है जिसमें ग्राफ़िक्स के ज़रिए वॉर प्लान, परमाणु मिसाइलों और उनके लक्ष्य का ब्यौरा रहता है. इसमें ये ब्योरा भी होता है कि हमला हुआ तो कितने लोगों के मारे जाने की आशंका है. राष्ट्रपति को इन बातों को पलक झपकते समझना होता है."

फेडेरेशन ऑफ़ अमेरिकन साइंटिस्ट्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि एक अनुमान के अनुसार 2022 की शुरूआत में दुनिया के 9 देशों के पास क़रीब 12,700 परमाणु मिसाइलें हैं. इनमें से सबसे अधिक रूस के पास हैं और अमेरिका इस मामले में नंबर दो पर है. उसके पास पांच हज़ार से अधिक ऐसी मिसाइलें हैं.

रिपोर्ट के अनुसार रूस के पास 5977, अमेरिका के पास 5428, चीन के पास 350, फ्रांस के पास 290, ब्रिटेन के पास 225, पाकिस्तान के पास 165, भारत के पास 160, इसराइल के पास 90 और उत्तर कोरिया के पास 20 परमाणु मिसाइलें हैं.

अमेरिका में मिसाइल लॉन्च करने की प्रक्रिया की शुरूआत पेंटागन वॉर रूम से होती है लेकिन इसके लिए वॉर रूम को राष्ट्रपति के आदेश की ज़रूरत होती है.

लेकिन राष्ट्रपति का आदेश भी तब माना जाता है जब वो मिसाइल लॉन्च ऑफ़िसर को अपनी एक ख़ास पहचान बताते हैं और ये पहचान एक बिस्कुटनुमा प्लास्टिक कार्ड में होती है.

राष्ट्रपति को हमेशा ये कार्ड अपने साथ रखना होता है. यही वो कार्ड है जिसकी वजह से अमरीकी राष्ट्रपति को दुनिया का सबसे ताक़तवर शख़्स कहा जाता है. राष्ट्रपति से मंज़ूरी मिलने के बाद चंद मिनट के भीतर परमाणु मिसाइल को लॉन्च किया जा सकता है.

ब्रूस ब्ला ने बताया, "राष्ट्रपति का आदेश मिलने के बाद मिनटमैन, यानी ज़मीन पर तैनात एटमी मिसाइल से हमला करने वाले या फिर पनडुब्बी में तैनात मिसाइलों को लॉन्च कोड से खोला जाता है और हमले के लिए तैयार किया जाता है. ब्रूस ब्ला के अनुसार, किसी भी वक़्त न्यूक्लियर मिसाइल लॉन्च करने के लिए दो लोगों की ज़रूरत होती है, जो अपने-अपने कोड बताते हैं. एक तरह से ये दोनों लोग मिसाइल लॉन्च की चाभी होते हैं."

उन्होंने बताया, "मेरे पूरे करियर में एक बार ऐसा हुआ था, जब लगा था कि परमाणु युद्ध छिड़ जाएगा. तब मेरी उम्र कम थी और मुझे पता ही नहीं था कि दुनिया में क्या हो रहा है. उस वक्त हमें डेफ़कॉन 3 (DEFCON 3) अलर्ट मिला कि परमाणु युद्ध के लिए तैयार हो जाओ."

ब्रूस और उनके सहयोगी टिमोथी मिसाइल का लॉन्च कोड यानी चाभी लेकर कुर्सी पर बैठ गए. उन्हें मिसाइल लॉन्च के आख़िरी फ़रमान का इंतज़ार था, लेकिन राहत की बात रही कि वो कभी नहीं आया.

ये साल 1973 की बात थी जब अरब और इसराइल जंग के मैदान में आमने-सामने थे. राहत की बात रही कि परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की नौबत नहीं आई. इससे पहले 1960 के दशक में क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ परमाणु युद्ध के बेहद क़रीब पहुंच गए थे.

लेकिन क्या अमेरिकी राष्ट्रपति किसी ख़तरे के बिना या बिना किसी उकसावे के अपनी ओर से परमाणु मिसाइल लॉन्च करने का आदेश दे सकता है?

ब्रूस ब्ला ने बताया, "ऐसी सूरत में ज्वाइंट चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ कमेटी के प्रमुख इस आदेश को मानने से इनकार कर सकते हैं. लेकिन, ऐसा होने की उम्मीद बेहद कम है क्योंकि राष्ट्रपति के मातहत काम करने वाले ऐसे लोगों को आदेश मानने की ट्रेनिंग दी जाती है. इसलिए अगर कोई राष्ट्रपति अपनी तरफ से परमाणु मिसाइल लॉन्च करने का आदेश देता है, तो यक़ीन मानिए उसे रोक पाना बहुत मुश्किल है."

रूस: न्यूक्लियर ब्रीफ़केस

इगोर सजेगेन हथियारों के जानकार हैं. वो रूस के रहने वाले हैं और कभी वहां की सरकार के लिए काम करते थे.

1999 में रूस ने उनपर लंदन में एक कंपनी को सेना से जुड़ी ख़ुफ़िया जानकारी देने का आरोप लगा. इगोर ने खुद को बेगुनाह बताया लेकिन उन्हें 11 साल के लिए जेल में डाल दिया गया. 2010 में वो जेल से रिहा हुए जिसके बाद उन्होंने लंदन में बसने का फ़ैसला किया. वो अब ब्रिटिश डिफेंस थिंक टैंक रूसी में सीनियर फेलो हैं.

इगोर बताते हैं, "अमरीका के न्यूक्लियर फ़ुटबॉल की तरह रूस के राष्ट्रपति के पास भी परमाणु मिसाइलों के कोड वाला न्यूक्लियर ब्रीफ़केस होता है. ये ब्रीफ़केस हमेशा राष्ट्रपति के आसपास होता है. जब वो सोते हैं तब भी वो उनसे 10-20 मीटर के दायरे में रखा होता है. रूस पर किसी हमले की नौबत आने पर ब्रीफ़केस का अलर्ट अलार्म बजने लगता है और फ्लैशलाइट जल जाती हैं, जिससे राष्ट्रपति को फौरन ब्रीफ़केस के पास पहुंचकर प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री से संपर्क साधना होता है."

ऐसे ही दो ब्रीफ़केस रूसी प्रधानमंत्री और रूसी रक्षा मंत्री के पास होते हैं, लेकिन परमाणु हमले का आदेश केवल राष्ट्रपति दे सकते हैं.

इगोर बताते हैं, "वही सुप्रीम कमांडर होते हैं, ये ब्रीफ़केस उनकी ज़िम्मेदारी होती है. आपात स्थिति में वो इस ब्रीफ़केस के ज़रिए सेना के कमांडरों और प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री से बात कर सकते हैं, उन्हें किसी टेलीफ़ोन की ज़रूरत नहीं होती."

ऐसा मौक़ा सिर्फ एक बार आया जब रूस के राष्ट्रपति को इस ब्रीफ़केस को खोलकर ऐक्टिव करना करना पड़ा.

इगोर बताते हैं, "25 जनवरी 1995 को इस ब्रीफ़केस का अलार्म बज उठा था. इसकी लाइट फ्लैश होने लगी थी. दूसरी वॉर्निंग लाइट राष्ट्रपति की डेस्क पर जल रही थी. उस समय बोरिस येल्तसिन राष्ट्रपति थे."

रूसी रडारों को सीमा के पास बैरेंट्स सी के ऊपर एक मिसाइल दिखी थी, जो तेज़ी से रूस की तरफ़ बढ़ रही थी और समय बहुत कम था.

इगोर बताते हैं, "बोरिस येल्तसिन ने अपना ब्रीफ़केस एक्टिव किया. वो प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री से मशविरा कर रहे थे कि अब क्या करना है और इसके लिए उनके पास पांच से नौ मिनट का ही वक़्त था."

रूस की पनडुब्बियों को आदेश दिया गया कि वो पलटकर वार करने के लिए तैयार रहें.

हालांकि बाद में पता चला कि ये वॉर्निंग अलार्म एक फॉल्स यानी ग़लत अलार्म था. ये दरअसल नॉर्वे का एक रॉकेट था, जिसे एक वैज्ञानिक मिशन पर छोड़ा गया था. इसी रॉकेट को रूस की तरफ़ आती मिसाइल समझकर हमले का अलार्म बज गया था.

अगर बोरिस येल्तसिन ने उस वक्त परमाणु मिसाइल लॉन्च करने का आदेश दे दिया होता, तो युद्ध के इतिहास में कई नए पन्ने जुड़ जाते.इगोर कहते हैं, "रूस में मिसाइल लॉन्च की तैयारी कितनी पुख्ता है ये जानने के लिए अक्सर ड्रिल की जाती है. कई बार मिसाइल की निगरानी करने वालों को ग़लत लॉन्च कोड देकर हमले की तैयारी के लिए कहा जाता है. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि परखा जा सके कि असल जंग छिड़ने की सूरत में वो परमाणु हमला करने से कहीं हिचकिचाएंगे तो नहीं."

अमेरिका की तरह रूसी सिस्टम में भी ये सुनिश्चित किया गया है कि राष्ट्रपति ने यदि परमाणु हमले का आदेश दे दिया तो हमला होकर रहेगा.

ब्रिटेन: लास्ट रिज़ॉर्ट लेटर

प्रोफ़ेसर पीटर हैनेसी 'द साइलेंट डीप' नाम की क़िताब के सह-लेखक हैं. वो कहते हैं कि ब्रिटिश सेना के पास ट्राइडेंट परमाणु मिसाइलों से लैस चार बेहतरीन पनडुब्बियां हैं, जिनमें से एक नॉर्थ अटलांटिक महासागर में हमेशा तैनात रहती हैं, ये केवल एक इशारा मिलने पर परमाणु हमला कर सकती है.

वो कहते हैं, "नॉर्थ अटलांटिक की ख़ामोश गहराइयों में हर समय कहीं न कहीं पनडुब्बी मौजूद रहती है जिसकी मौजूदगी के बारे में किसी को पता नहीं होता. कोई इस बारे में पता भी नहीं कर सकता."

प्रोफ़ेसर पीटर कहते हैं, "ब्रितानी सिस्टम में परमाणु मिसाइल लॉन्च करने का आदेश सिर्फ़ प्रधानमंत्री दे सकते हैं. उनके एक आदेश पर रॉयल नेवी वैनगार्ड क्लास की पनडुब्बी से परमाणु हमला कर सकती है."

इसके लिए ब्रितानी प्रधानमंत्री नौसेना के दो अधिकारियों को मिसाइल लॉन्च का अपना एक ख़ास कोड बताते हैं. उन दोनों अधिकारियों के पास भी ख़ास कोड होते हैं, वो भी अपने-अपने कोड बताते हैं.

कोड बताने की ये प्रक्रिया, लंदन के बाहर स्थित एक बंकर में पूरी की जाती है. यहीं से महासागर में तैनात पनडुब्बी को एटमी मिसाइल लॉन्च करने का आदेश जारी किया जाता है.

प्रोफ़ेसर पीटर हैनेसी बताते हैं, "पनडुब्बी में भी दो अधिकारी, वायरलेस के ज़रिए ये संदेश रिसीव करते हैं और फिर अपने-अपने कोड का मिलान करके मिसाइल लॉन्च की तैयारी करते हैं."

परमाणु बम दो तरह के होते हैं-

पहला फिशन बम जिनमें न्यूक्लिर फिशन का इस्तेमाल होता है. इसमें जब एक न्यूट्रॉन एटम से टकराता है तो उससे एटम दो टुकड़ों में बंट जाता है. इस प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में उर्जा और रोशनी पैदा होती है.

दूसरा थर्मोन्यूक्लीयर या हाइड्रोजन बम जिनमें न्यीक्लियर फ्यूशन का इस्तेमाल होता है. इसमें बेहद ऊंचे तापमान में हाइड्रोजन के आइसोटोप एक दूसरे से जुड़कर हीलियम बनाते हैं और इस प्रक्रिया में उर्जा और रोशनी पैदा होती है.

प्रोफ़ेसर पीटर उन चुनिंदा लोगों में से एक हैं जिन्हें पनडुब्बी से मिसाइल टेस्ट फ़ायर देखने का मौक़ा मिला.

वो कहते हैं, "कैप्टन ने कुछ सफ़ेद धुंआ-सा दिखाया और फिर समुद्र में जैसे गैस का गोला तेज़ी से दौड़ा. कुछ ही सेकंड में बहुत ज़ोर का धमाका हुआ. समुद्र के पानी पर गैस का विशाल बादल नज़र आया. ये सब बड़े ही नाटकीय तरीके से हुआ. ऐसा लगा मानो समुद्र की गहराई से कोई दैत्य निकलकर बाहर आ गया है."

परमाणु मिसाइल लॉन्च करने का मतलब है दुश्मन की तबाही इसलिए ये काम बड़ी ज़िम्मेदारी के साथ किया जाता है.

प्रोफ़ेसर पीटर हैनेसी कहते हैं, "ब्रिटेन में जब कोई प्रधानमंत्री बनता है, तो वो अपने हाथों से परमाणु मिसाइलों वाली चार पनडुब्बियों को ख़त लिखता है. इस चिट्ठी को 'लेटर ऑफ़ लास्ट रिज़ॉर्ट' कहा जाता है. ये चिट्ठी पनडुब्बी के तिजोरी में रखी जाती है. प्रोटोकॉल के अनुसार इसे तभी पढ़ा जाना होता है जब ब्रिटेन किसी हमले में पूरी तरह से तबाह हो गया हो."

लेटर ऑफ़ लास्ट रिज़ॉर्ट में पनडुब्बी के कमांडर के लिए क्या आदेश लिखा गया है, ये अब तक किसी को नहीं पता.

जब ब्रिटेन में प्रधानमंत्री बदलते हैं, तो इस चिट्ठी को बिना खोले, बिना पढ़े नष्ट कर दिया जाता है. और हर नया प्रधानमंत्री पनडुब्बी के लिए कमांडर के लिए नई चिट्ठी लिखता है. ब्रिटेन में सालों ये यही सिलसिला जारी है.

चीन: गहरी सुरंगें

टोंग जाओ, बीजिंग में कार्नेगी चिन्हुआ सेंटर फ़ॉर ग्लोबल पॉलिसी में फेलो हैं. वो कहते हैं कि ये वो सबसे गंभीर मुद्दा है जिसका सामना हम इंसान कर रहे हैं. परमाणु हथियार और परमाणु युद्ध का सीधा संबंध इंसान के अस्तित्व से है.

वो कहते हैं, "इतिहास में ऐसे कई मौक़े आए जब हम परमाणु युद्ध के बहुत नज़दीक आ गए और पूरी मानव जाति पर ख़तरा मंडराने लगा."

चीन दुनिया के उन देशों में शामिल है जिनके पास परमाणु हथियारों की ताकत है लेकिन उसकी नीति पहले हमला करने की नहीं है.

टोंग जाओ का मानना है कि इसके पीछे एक बड़ी वजह है और वो ये कि चीन के पास अभी ऐसी क्षमता नहीं है कि वो उसके ख़िलाफ़ होने वाले संभावित परमाणु हमले का पहले पता लगा सके.

वो कहते है, "चीन इंतज़ार करेगा और पहले पुष्टि करेगा कि क्या परमाणु हमला वाकई हुआ है. पुष्टि होने पर हालात का जायज़ा लेगा, समझने की कोशिश करेगा कि हमला किस तरह का है और कितना बड़ा है. उसके बाद ही वो विचार करेगा कि जवाबी कार्रवाई के क्या विकल्प हो सकते हैं."

लेकिन अगर किसी हमले में चीन के सभी बड़े नेता और सैन्य कमांडर मारे जाएं या दुश्मन के हमले में चीन की परमाणु मिसाइल ही तबाह हो जाए, तो ऐसी स्थिति में चीन के पास क्या विकल्प होगा?

टोंग के मुताबिक़, "हमले में अपने नेताओं और अपने परमाणु मिसाइलों को नष्ट होने से बचाने के लिए चीन ने पहले ही काफ़ी तैयारी कर रखी है. उसने इसके लिए गहरी सुरंगों का नेटवर्क बनाया है. कुछ सुरंगें तो पहाड़ी इलाक़ों में ज़मीन के नीचे सौ-सौ मीटर की गहराई में बनी हुई हैं."

मतलब ये कि ज़मीन पर जब जंग का धुंआ उठ रहा होगा, ज़मीन के नीचे गहरी सुरंगों में मौजूद नेता महत्वपूर्ण फ़ैसला ले रहे होंगे. लेकिन चीन में परमाणु हमले का आख़िरी फ़ैसला किसके हाथ में होता है?

टोंग जाओ बताते हैं कि "ये सब गोपनीय बातें हैं लेकिन लोग मानते हैं कि चीन में सेना क्या करेगी इसका फ़ैसला कम्युनिस्ट पार्टी के पोलितब्यूरो की स्टैंडिंग कमिटी करती है. अंतिम फ़ैसला कमिटी का होगा या राष्ट्रपति का, ये वाकई किसी को नहीं पता."

चीन के मामले में एक बात और ग़ौर करने वाली है. जानकार मानते हैं कि हो सकता है कि अपने ऊपर परमाणु हमला होने के कई हफ़्तों या महीनों तक खामोश रहे और फिर पलटवार करे, क्योंकि शुरुआत से ही चीन, पहले हमला करने की पश्चिमी देशों की नीति का विरोधी रहा है.

टोंग जाओ कहते हैं, "चीन ने जब परमाणु हथियारों की ताकत हासिल कर ली तब उसके नेता माओ त्सेतुंग ने तय किया कि इस मामले में चीन एक ज़िम्मेदार देश बनेगा. उसके नेताओं ने उस समय बखूबी समझा कि हिरोशिमा-नागासाकी में क्या हुआ था."

लेकिन ये तब की बात थी. चीन का रुख़ अब बदल रहा है. पश्चिमी देशों की सोच का असर उसपर भी पड़ रहा है. 2015 में चीन ने ज़मीन पर परमाणु और पारंपरिक मिसाइलों पर काम करने वाली ब्रांच को स्थायी तौर पर सेना में शामिल कर लिया और उसे पीपल्स लिबरेशन आर्मी रॉकेट फोर्स का नाम दिया. कई दूसरे देशों की तरह वो भी हाइपरसोनिक तकनीक पर काम कर रहा है और अपने परमाणु हथियारों का ज़खीरा बढ़ाने की कोशिश में लगा हुआ है.

टोंग जाओ कहते हैं, "कुछ जानकार चाहते हैं कि अमरीका या रूस के राष्ट्रपतियों की तरह चीन के राष्ट्रपति के पास भी परमाणु हमले का आदेश देने का अधिकार होना चाहिए, ताकि वो दुश्मन के हमले की आशंका देखकर बचाव में पहले ही हमला करने का आदेश जारी कर सकें. यही वजह है कि चीन इन दिनों ताक़तवर रडार विकसित कर रहा है और लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें बना रहा है."

जानकार मानते हैं कि हो सकता है कि अगले कुछ सालों में परमाणु हमले को लेकर चीन भी पहले इस्तेमाल न करने की अपनी नीति बदल दे.

जिस वक्त आप ये लेख पढ़ रहे हैं उस वक्त दुनिया के किसी कोने में कुछ लोग किसी ख़ास कंप्यूटर की स्क्रीन पर नज़रें गड़ाए होंगे, कुछ लोग किसी बंकर में बैठ कर अपने नेता के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे होंगे, और किसी पनडुब्बी का कमांडर ये सोच रहा होगा कि लेटर ऑफ़ लास्ट रिज़ॉर्ट पढ़ने की नौबत कभी आएगी या नहीं.

अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और चीन की इन मिसालों से साफ़ है कि परमाणु हमला करने के लिए आपके पास ऐसा कमांड और कंट्रोल सिस्टम होना चाहिए, जिसकी मदद से कहीं से भी, कभी भी हमले का का आदेश जारी किया जा सके.

हालांकि जानकार कहते हैं कि किसी भी नेता को इस तरह का हमला करने का ख़याल नहीं आएगा, क्योंकि उसे पता है कि इसका मतलब होगा- तबाही.

हिरोशिमा नागासाकी पर हुए परमाणु हमले के बाद ये दुनिया कई बार परमाणु युद्ध के कगार तक पहुंची लेकिन किसी नेता ने अब तक परमाणु हमले का बटन नहीं दबाया.

लेकिन परमाणु हथियारों को हाई अलर्ट पर रखने के रूसी राष्ट्रपति के आदेश ने एक बार फिर दुनिया पर परमाणु युद्ध की दहलीज पर ला खड़ा किया है.

इस दहलीज के उस पार सिर्फ तबाही है और परमाणु बटन दबाने का किसी नेता का एक फ़ैसला इस पूरी दुनिया को बर्बाद कर सकता है.

प्रोड्यूसर- मानसी दाश

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)