यूक्रेन और रूस की लड़ाई में परमाणु हमले का ख़तरा कितना है

    • Author, गॉर्डन कॉरेरा
    • पदनाम, बीबीसी के सुरक्षा संवाददाता

यूक्रेन पर जारी हमलों के बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सेना को अपनी प्रतिरोधी शक्तियों को "स्पेशल अलर्ट" पर रखने का आदेश दिया है जिनमें परमाणु हथियार भी शामिल हैं. लेकिन इसका वास्तव में क्या मतलब है?

पश्चिम के विशेषज्ञों का कहना है कि अभी तक ये स्पष्ट नहीं है. ब्रितानी अधिकारियों का कहना है कि पुतिन ने जिस भाषा का इस्तेमाल किया, उससे भी कुछ साफ़-साफ़ पता नहीं लग पा रहा है.

कुछ लोगों का कहना है कि पुतिन अलर्ट के सबसे निचले स्तर से आगे बढ़ने का आदेश दे रहे थे. हालांकि, ये भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता है.

बहुत से लोगों ने पुतिन के बयान का ये अर्थ निकाला कि वो बस जनता को संदेश भर देना चाहते हैं, उनकी मंशा वास्तव में परमाणु हथियार इस्तेमाल करने की नहीं है क्योंकि पुतिन जानते हैं कि ऐसा हुआ तो पश्चिमी देश जवाबी कार्रवाई करेंगे. ब्रिटेन के रक्षा मंत्री बेन वॉलेस ने कहा कि उनका मानना है कि ये घोषणा सिर्फ़ "बयानबाज़ी" थी.

लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं कि परमाणु हमले का जोख़िम नहीं है. स्थिति को क़रीब से देखने की ज़रूरत है.

क्या ये नई धमकी थी?

बीते हफ्ते पुतिन ने चेताया था कि अगर रूस की योजना में किसी ने हस्तक्षेप करने की कोशिश की तो उसे ऐसे परिणाम भुगतने पड़ेंगे, "जो इतिहास में कभी नहीं देखा गया होगा." पुतिन के इस बयान को नेटो के लिए धमकी के तौर पर देखा गया ताकि वो यूक्रेन में सैन्य अभियान न शुरू कर दे. हालांकि, पुतिन ने सीधे तौर पर ये नहीं कहा कि वो आख़िर ये चेतावनी किसे दे रहे हैं.

हालांकि, रूस से तनाव बढ़ने और परमाणु हमले की आशंका को देखते हुए नेटो हमेशा से स्पष्ट करता आया है कि वो यूक्रेन में अपनी सेना नहीं भेजेगा. लेकिन रविवार को पुतिन ने सीधी धमकी दी.

नई चेतावनियां क्यों दे रहे पुतिन?

पुतिन ने कहा है कि ये क़दम पश्चिमी देशों की ओर से दिए जा रहे "आक्रामक बयानों" की प्रतिक्रिया स्वरूप उठाया गया है. सोमवार को क्रेमलिन ने कहा कि ब्रिटेन की विदेश मंत्री लिज़ ट्रस सहित पश्चिमी देशों के अधिकारियों की ओर से यूक्रेन को लेकर आक्रामक बयान दिए गए. पश्चिमी अधिकारियों का भी मानना है कि नई चेतावनी इसलिए आई है क्योंकि हो सकता है कि यू्क्रेन को लेकर पुतिन का अनुमान ग़लत रहा हो.

हो सकता है कि पुतिन ये न समझ पाए हों कि यूक्रेन में युद्ध छेड़ने पर कितने प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा. उन्होंने इस बात को भी कम करके आंका कि कड़ी प्रतिक्रिया से लेकर प्रतिबंध लगाने तक पश्चिमी देश किस हद तक एकजुट हो सकते हैं. इसकी वजह से ही वो नए विकल्पों की तलाश कर रहे हैं.

हाल ही में सेवानिवृत्त हुए एक ब्रिटिश जनरल ने मुझे बताया, "ये ग़ुस्से, हताशा और निराशा के संकेत हैं."

संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत लिंडा थॉमस-ग्रीनफ़ील्ड की समझ से ये भाषा यूक्रेन में युद्ध को सही ठहराने के पुतिन के प्रयास का हिस्सा है. वो ये दावा करना चाहते हैं कि रूस हमलावर नहीं है, बल्कि ख़तरे में है और ख़ुद का बचाव करने की कोशिश कर रहा है.

इस तरह से देखें, तो न्यूक्लियर अलर्ट अपने लोगों को ये संदेश समझाने का एक तरीका भर है. एक और पक्ष ये है कि शायद पुतिन यूक्रेन को सैन्य सहायता देने के पश्चिमी देशों की योजना को लेकर परेशान हैं, इसलिए वो पश्चिमी देशों को ऐसा न करने के लिए चेताना चाहते हैं.

एक और वजह ये है कि पुतिन प्रतिबंधों को लेकर चिंतित हैं जिनका उन्होंने अपनी घोषणा के दौरान ज़िक्र किया. पुतिन का मानना है कि ये प्रतिबंध रूस में अशांति पैदा करने और उनकी सरकार को उखाड़ फेंकने के मकसद से लगाए गए हैं. हालांकि, आख़िर में देखें तो पुतिन का संदेश नेटो के लिए एक चेतावनी लगता है, कि अगर वो सीधे तौर पर युद्ध में शामिल हुआ तो आगे गंभीर परिणाम हो सकते हैं.

क्या खतरे हैं

अगर ये मान भी लिया जाए कि पुतिन सिर्फ़ धमकी दे रहे थे और अभी उनका परमाणु हथियार इस्तेमाल करने का इरादा नहीं, तो भी एक ख़तरा हमेशा बना हुआ है कि उनके संदेश का आकलन ग़लत न हो जाए.

जानकारों के मुताबिक़ चिंता की बात ये भी है कि पुतिन अलग-थलग हो गए हैं और अपने कुछ सलाहकारों के अलावा वे किसी के संपर्क में भी नहीं हैं, जो उन्हें सच बता सकें. कुछ लोगों को डर है कि उनके फ़ैसले अनिश्चित होते जा रहे हैं.

कुछ लोगों को उम्मीद है कि अगर पुतिन ने कोई भयानक फ़ैसला ले भी लिया तो बाकी लोग उनके आदेशों का पालन नहीं करेंगे. किसी भी परमाणु संघर्ष का जोख़िम भले ही थोड़ा बढ़ गया हो, लेकिन वो अभी भी कम है.

पश्चिमी देश कैसे दे रहे हैं जवाब

अभी तक पश्चिमी देशों की सरकारें इस बात को लेकर सतर्क रही हैं कि वो विवाद को बढ़ाने वाले बयान या कार्रवाई न करें.

अमेरिकी सेना का रक्षा तैयारियों से जुड़ा अपना चेतावनी अलर्ट सिस्टम है जिसे डेफ़कॉन के नाम से जाना जाता है. व्हाइट हाउस के प्रेस सचिव जेन साकी ने कहा कि इस समय अपने परमाणु चेतावनी स्तरों को बदलने का कोई कारण नहीं है.

ब्रिटेन की परमाणु क्षमता संपन्न पनडुब्बियां समुद्र में तैनात हैं और वो भी सार्वजनिक तौर पर कुछ शायद ही बयान दे. फ़िलहाल ऐसा लग रहा है कि इन देशों का मक़सद रूस के बयानों को सिर्फ़ खोखली धमकी के तौर पर देखना है. ये देश इन बयानों को गंभीरता से लेकर या रूस को उकसाने वाली कोई कार्रवाई कर के तनाव नहीं बढ़ाना चाहते हैं.

पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि ये फ़िलहाल परमाणु संकट नहीं है और भविष्य में इसे बनना भी नहीं चाहिए.

क्या पश्चिम को पता चलेगा कि रूस क्या कर रहा है?

ब्रिटेन के रक्षा मंत्री बेन वॉलेस ने बीबीसी को बताया कि रूस के परमाणु हथियारों की गतिविधि में अभी तक उसे कोई बदलाव नहीं दिखे हैं. ख़ुफ़िया सूत्रों ने पुष्टि की है कि इस पर क़रीबी नज़र रखी जा रही है.

शीत युद्ध के दौरान, मॉस्को के परमाणु हथियारों पर नज़र बनाए रखने के लिए पश्चिम में एक विशाल ख़ुफ़िया तंत्र बनाया गया था. गतिविधि में बदलाव के किसी भी संकेत को पकड़ने के लिए सैटेलाइट, इंटरसेप्ट की गई बातचीतऔर अन्य स्रोतों का विश्लेषण किया गया था- जैसे कि हथियारों की तैनाती, बॉम्बर एयरक्राफ़्ट के लिए हथियार या चालक दल तैयार किया जाना ताकि समय रहते सतर्क हुआ जा सके.

शीत युद्ध के दौर में तैयार किया गया वो ख़ुफ़िया तंत्र आज भी कायम है. पश्चिमी देश अब रूसी गतिविधियों को क़रीब से देखेंगे ताकि ये समझ सकें कि रूस के व्यवहार में कोई नया बदलाव तो नहीं आ रहा. हालांकि अभी इसकेकोई संकेत नहीं हैं.

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