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जंगी ड्रोन: क्या हम युद्ध के हथियारों के नए युग में हैं?
लड़ाई के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ड्रोन कभी सैन्य महाशक्तियों के पास ही हुआ करते थे, लेकिन अब ये विद्रोहियों, छोटे मुल्कों के पास भी मौजूद हैं और युद्ध के तरीक़े को बदल रहे हैं.
पढ़ें जोनाथन मार्कस की ये रिपोर्ट...
अक्सर सैन्य इतिहास में देखा गया है कि कैसे कोई एक हथियार पूरे युद्ध का प्रतीक बन जाता है.
आप चाहे मध्यकालीन युग में अंग्रेज़ धनुर्धर के द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली लंबी धनुष के बारे में सोच सकते हैं या उन बख़्तरबंद टैंकों के बारे में जो दूसरे विश्व युद्ध की ज़मीनी लड़ाई के परिचायक थे.
मानव रहित एमक्यू-1 प्रीडेटर या यूएवी को भी अमेरिका के अफ़ग़ानिस्तान, ईराक या अन्य जगहों पर छेड़े गए आतंकरोधी युद्ध में वही प्रतिष्ठा मिली.
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद यह वो 'यूनिपोलर मोमेंट' था जब अमेरिका नितांत अकेले, बग़ैर किसी चुनौती के एक प्रमुख महाशक्ति के रूप में खड़ा था.
ड्रोन को प्रतिष्ठित प्रतीक वाली स्थिति तब मिली जब प्रीडेटर की टोही विमान के रूप में कल्पना की गई और उसे हेल्फ़ायर मिसाइल से लैस किया गया.
इसके बाद आने वाले रीपर को विशेष रूप से हंटर-किलर के रूप में विकसित किया गया था. इससे पहले आए किसी भी ड्रोन के मुक़ाबले इसकी रेंज कहीं अधिक है, साथ ही ये कहीं अधिक वज़न वाले जंगी सामानों को भी ले जाने में सक्षम है.
ये वैसे किलर हैं जिनसे अमेरिका अपने दुश्मनों को जब, जैसे निशाना बनाना चाहता है बना सकता है, उन जगहों पर भी जहां कि कल्पना उसके दुश्मन भी नहीं कर सकते.
माना जाता है कि ये रीपर ड्रोन ही थे जिसने ईरान के जनरल क़ासिम सुलेमानी को जनवरी 2020 में बग़दाद एयरपोर्ट के बाहर निशाना बनाया था.
लेकिन बहुत थोड़े समय के लिए ही (केवल) अमेरिका या इसराइल (अपनी ड्रोन इंडस्ट्री की बदौलत) इस टेक्नोलॉजी पर राज कर सके. ये युद्धक ड्रोन का पहला युग माना जा सकता है.
तब से अब तक परिस्थियों में बहुत तेज़ी से बदलाव देखा गया है.
युद्धक ड्रोन कई नए खिलाड़ियों (देशों) के मैदान में आने से एक नए युग में प्रवेश कर चुके हैं. यूएवी का इस्तेमाल आतंकवाद, आतंकवाद निरोधी युद्ध से आगे बढ़ते हुए अब पूरी तरह से पारंपरिक युद्ध में बदल गया है. वास्तव में, ड्रोन अपने तीसरे युग के मुहाने पर खड़ा है जहां तकनीक बेहद जटिल और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से जुड़ा है.
हंटर किलर- एमक्यू-9 रीपर
- इसके सामने नोज़ पर कैमरा और नीचे भी सेंसर के साथ वाला कैमरा मौजूद है.
- बेहतर स्थिरता के लिए वी-आकार की टेल
- ये जीपीएस या लेज़र गाइडेड मिसाइल और बम से लैस है
- लंबाईः 10.97 मीटर (36 फ़ीट)
- ऊंचाई: 3.66 मीटर (12 फ़ीट)
- पंखों का फ़ैलाव: 21.12 मीटर (69 फ़ीट 3½ इंच)
- अधिकतम गति: 463 किलोमीटर प्रति घंटा (287 मील प्रति घंटा)
हाल के संघर्ष में टिग्रे पीपल्स लिबरेशन फ़्रंट (टीपीएलएफ़) के विद्रोहियों के हमलों का सामना करते हुए इथियोपिया सरकार के लिए ड्रोन हमलों ने अहम भूमिका निभाई है.
इथियोपिया सरकार ने तुर्की और ईरान से सशस्त्र ड्रोन ख़रीदे हैं. यह भी बताया जा रहा है कि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के ज़रिए चीन की विंग लूंग-2 तक भी उसकी पहुंच है. यूएई ने इसी तरह लीबिया के गृहयुद्ध में अपने सहयोगी जनरल ख़लीफ़ा हफ़्तार को भी चीन में बने ड्रोनों की आपूर्ति की थी.
अहम किरदार निभाते ड्रोन
फ़रवरी 2020 में सीरिया में ऑपरेशन स्प्रिंग शील्ड के दौरान और लीबिया में ख़लीफ़ा हफ़्तार की विद्रोही सेना के ख़िलाफ़ पहले भी तुर्की इस ड्रोन का इस्तेमाल कर चुका है.
कई बार सशस्त्र ड्रोनों का निर्णायक असर देखा गया है. इसका लीबिया की मान्यता प्राप्त सरकार के बने रहने में योगदान रहा है तो पिछले साल इसने नार्गोनो-कराबाख़ के युद्ध में भी अहम किरदार निभाया.
तुर्की से प्राप्त ड्रोन की वजह से अज़रबैजान की सेना आर्मीनिया के विवादित क्षेत्र पर अपना नियंत्रण बनाने में सक्षम हुई.
फ़रवरी 2020 में सीरिया में ऑपरेशन स्प्रिंग शील्ड के दौरान और लीबिया में ख़लीफ़ा हफ़्तार की विद्रोही सेना के ख़िलाफ़ पहले भी तुर्की इस ड्रोन का इस्तेमाल कर चुका है.
ड्रोन हमले अक्सर क़ानूनी और नैतिक दुविधाएं पैदा करते हैं. उनकी मारक क्षमता उसे चलाने वाले के कौशल पर निर्भर रहती है. ये उम्मीद कि हथियारों को सीमित करने के समझौतों से उनके इस्तेमाल पर रोक लगाई जा सकेगी, अब तक बेमानी साबित हुई है.
अमेरिका अपनी टेक्नोलॉजी को अपने बेहद क़रीबी सहयोगियों के अलावा किसी अन्य देश को देने का अनिच्छुक रहा है, जबकि अन्य देश ऐसा भेदभाव नहीं करते हैं.
निस्संदेह यूएवी जिस तेज़ी से बढ़ रहा है उसे रोक पाना मुश्किल लगता है.
100 से अधिक देश और बग़ैर देश वाले समूहों के पास ड्रोन मौजूद हैं. इनमें से कइयों के पास तो सशस्त्र ड्रोन मौजूद हैं.
सेंटर फ़ॉर न्यू अमेरिका सिक्योरिटी में डायरेक्टर ऑफ़ स्टडीज़ पॉल शरेर कहते हैं, "ड्रोन का बढ़ना, लगता है जारी रहेगा."
वे कहते हैं, "चीन पूरी दुनिया में सशस्त्र ड्रोनों का सबसे बड़ा निर्यातक है. ईरान, तुर्की जैसी मध्य की शक्तियों के पास ड्रोन की तकनीक मौजूद है और वो विदेशों में ये सिस्टम बेच रहे हैं."
उनका तर्क है कि "कमर्शियल ड्रोन टेक्नोलॉजी इतनी आसानी से उपलब्ध है कि कोई भी कुछ सौ डॉलर के लिए क्रूड डीआईवाई हमलावर ड्रोन बना सकता है, ये कुछ आतंकवादी संगठनों के पास भी मौजूद हैं."
वे कहते हैं कि यूएवी का निर्णायक असर कोई आश्चर्य की बात नहीं है. ये किसी मुल्क को बहुत सस्ते में एयर फ़ोर्स उपलब्ध करा रहे हैं.
ड्रोन कितने कारगर
कोई देश या समूह जो लड़ाकू जेट ख़रीदने का जोख़िम नहीं उठा सकते वे ड्रोन ख़रीद सकते हैं.
वे कहते हैं, "ये ड्रोन भले ही फ़ाइटर जेट की तरह युद्ध में सक्षम नहीं हैं लेकिन कुछ वायु शक्तियों को ये निर्णायक बढ़त दिला सकते हैं. डिजिटल टेक्नोलॉजी की मदद से टोही और सटीक हमले की क्षमता वाले ड्रोन ज़मीनी सेना के लिए काफ़ी घातक हो सकते हैं."
लेकिन गृहयुद्धों में या क्षेत्रीय संघर्षों में यूएवी का उपयोग भविष्य के युद्ध में ड्रोन की अहम भूमिका की महज़ एक झलक भर है.
जब अमेरिका और उसके सहयोगी देश आतंकरोधी अभियानों में जुटे थे, रूस इसकी सीरिया में आजमाइश कर रहा था. रूस इसे बड़े युद्ध में कैसे इस्तेमाल करना है उसे ध्यान में रखते हुए इसने सीरिया को अपना टेस्टिंग ग्राउंड बना रखा था.
सेंटर फ़ॉर नेवल एनालिसिस में रूस स्टडीज़ प्रोग्राम के सदस्य सैमुएल बेंडेट कहते हैं, "सीरिया में रूस के ड्रोन बेड़े ने महत्वपूर्ण ख़ुफ़िया, निगरानी, टोही मिशनों का संचालन किया. ड्रोन के सर्वे की बदौलत रूसी हथियारों, रॉकेट लॉन्च सिस्टम और विमानों से रियल टाइम में लक्ष्यों को निशाना बनाया गया."
"इससे एक बार फिर ये परिभाषित हो रहा है कि रूस की सेना आज की तारीख़ और भविष्य में युद्ध के मैदान में यूएवी की मदद और सर्वे की गई युद्ध क्षेत्र की तस्वीरों के माध्यम से कैसे लड़ेगी. ये कुछ ऐसा है जो आज से पहले जनरलों के पास नहीं था."
रूस और ड्रोन
यूक्रेन से लड़ाई में रूस यूएवी का योजनाबद्ध तरीक़े से उपयोग कर रहा है. पूर्वी यूक्रेन में रूस में निर्मित कई ड्रोन मार गिराए गए हैं.
बेंडेट कहते हैं कि ख़ुफ़िया जानकारी एकत्र करना और टोही की भूमिका निभाना ड्रोन का मुख्य मिशन है. ख़ास क़िस्म के रूसी ड्रोन इसके लिए एकदम फ़िट बैठते हैं.
इलेक्ट्रॉनिक युद्ध वो कला है जिसमें दुश्मन की ताक़त का अंदाजा उनके भेजे संकेतों से लगा कर और उसके संचार को बाधित कर उसे अलग-थलग कर दिया जाता है.
रूस उन्नत और आधुनिक तकनीक के मामले में अमेरिका से एक दशक पीछे हो सकता है, लेकिन रूसी सेना अपने लड़ाकू दस्ते में ड्रोन को शामिल करने में उससे कहीं आगे हो सकती है.
बेंडेट कहते हैं, "मिलिट्री ड्रोन पूरे रूसी सैन्य बल के पास मौजूद है और इसकी उपयोगिता देखी जा चुकी है, जब यूक्रेन की बख्तरबंद इकाइयों की तुरंत पहचान कर ली गई थी. उसके संचार को रोक दिया गया था और तोपखाने को उनकी ओर मोड़ दिया गया था.''
क्यों ड्रोन से मुक़ाबला आसान नहीं
वास्तव में यूक्रेन के पास भी तुर्की के ड्रोन हैं, उसने उनका इस्तेमाल डोनबाल के रूसी समर्थक अलगाववादियों पर किया भी था.
उच्च तीव्रता वाले युद्ध के मैदान से परे ड्रोन आज भी विद्रोही और मिलिशिया यूनिट इस्तेमाल कर रहे हैं.
लेकिन ड्रोन के ख़तरे की अगर भली भांति पहचान कर ली जाए तो भी इसका मुक़ाबला करना इतना आसान नहीं होगा.
पॉल शरेर कहते हैं, "आज इस्तेमाल किए जाने वाले अधिकतर ड्रोन पारंपरिक विमानों से कहीं छोटे होते हैं और उन्हें अलग तरह से हवाई सुरक्षा भी चाहिए होती है. वो बहुत धीमी गति से और कम ऊंचाई पर उड़ते हैं. इसका मतलब ये है कि कई सारे एयर डिफ़ेंस सिस्टम में उन्हें मार गिराने का तरीक़ा मौजूद नहीं है."
वे कहते हैं, "कई देश ड्रोन के हमले पर जवाबी कार्रवाई कैसे करें, ये विकसित करने में जुटे हैं. आने वाले वक़्त में हम युद्ध के मैदान में ड्रोन को रोकने के और भी कई कारगर तरीक़े देखेंगे."
हालांकि बड़ी संख्या में ड्रोन के हमले की सूरत में इसे रोकना बड़ी चुनौती होगी क्योंकि कम लागत वाले ड्रोन बड़ी संख्या में बनाए जा सकते हैं. तथाकथित भविष्य के 'ड्रोन स्वार्म्स' के बारे में ख़ूब बातें होती रही हैं.
पॉल शरेर कहते हैं, "हमने बड़ी संख्या में ड्रोन से हमले को देखा है, जब 2018 में सीरियाई विद्रोहियों ने 13 ड्रोनों की मदद से रूसी एयर बेस पर हमला किया था."
हालांकि, पॉल शरेर ज़ोर देकर कहते हैं ड्रोनों का बढ़ना स्वार्म्स (मधुमक्खियों जैसा) की तरह नहीं है.
स्वार्म्स के बारे में वो कहते हैं कि ऐसे हमलों को ड्रोनों की संख्या से नहीं, बल्कि आपस में सहयोग करने की उनकी क्षमता और बग़ैर किसी इंसानी हस्तक्षेप के चलाए जाने से परिभाषित किया गया है.
ड्रोन स्वार्म्स का इस्तेमाल अलग दिशा में और लगातार हमले में किया जा सकता है.
और अंत में वो ये भी चेतावनी देते हैं कि युद्ध की दशा और दिशा को बदलने में इसका (ड्रोनों के इस्तेमाल का) नाटकीय प्रभाव हो सकता है.
जोनाथन मार्कस बीबीसी के पूर्व रक्षा संवाददाता और एस्टर यूनिवर्सिटी के स्ट्रैटेजी ऐंड सिक्योरिटी इंस्टीट्यूट में ऑनररी प्रोफ़ेसर हैं.
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