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चीन अमरीका को पीछे छोड़कर बन रहा है तकनीक का सुपरपावर?
- Author, सर्वप्रिया सांगवान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कैसा हो अगर आप कोई अच्छा काम करें तो उस काम के लिए आपके खाते में नंबर जुड़ जाएँ, अगर कोई ग़लत काम करें तो उसके लिए नंबर माइनस हो जाएँ.
जैसे आप अपने टैक्स और बिल टाइम से भरते हैं तो आपको प्वाइंट्स मिलें, कोई रेड लाइट जंप कर दी तो उसके लिए प्वाइंट्स घट जाएँ. चीन में इसे सोशल स्कोर कहा जाता है और इस स्कोर को मेन्टेन करने का आधा ज़िम्मा है मशीनों पर.
ये मशीनें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का एक विवादित और दिलचस्प उदाहरण हैं. मशीनें फ़ैसला कर रही हैं कि किसी व्यक्ति का व्यवहार अच्छा है या बुरा है.
ऐसा लगता है कि आने वाले समय में चीन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सुपरपावर बन सकता है.
वैसे अमरीका और चीन के बीच सुपरपावर बनने की होड़ तो लगी ही रहती है लेकिन सुपरपावर बनने का एक ख़ास रास्ता है, जिस पर चीन चल रहा है और वो है तकनीक.
सिर्फ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ही नहीं, आवाज़ और चेहरा पहचानने की तकनीक, बिग डेटा, रोबोटिक्स के क्षेत्र में भी चीन दुनिया में टॉप पर है.
चीन ने अपना स्वदेशी विमान भी बना लिया है. 400 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चलने वाली पहली बुलेट ट्रेन भी बना चुका है, जिसका मॉडल निर्यात के लिए तैयार है.
चीन में ऐपल, जीएम, वोक्सवैगन और टोयोटा जैसी कंपनियाँ अपनी फ़ैक्टरियाँ और रिसर्च सेंटर चला रही हैं.
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चीन में इतना सब कैसे हो रहा है?
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2015 में चीन सरकार ने 10 साल का एक विज़न रखा था, जिसका मक़सद है चीन को उद्योग और तकनीक के क्षेत्र में ताक़तवर बनाना.
चीन खुले तौर पर कह चुका है कि वो सस्ते जूते, कपड़े और खिलौने सप्लाई करने वाली अपनी छवि को बदलना चाहता है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी अपनी मंशा स्पष्ट कर चुके हैं कि वे चीन को साइबर पावर बनाना चाहते हैं.
इस योजना के लिए चीन काफ़ी पैसा लगा रहा है, विदेशी कंपनियों पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीक़े से तकनीक ट्रांसफ़र करने का दबाव भी बना रहा है.
ये कैसे होता है? मसलन, चीन के मार्केट में घुसने के लिए किसी विदेशी कंपनी को लोकल कंपनी से गठजोड़ करना ही होता है.
इसके अलावा चीन अपनी रणनीति के तहत विदेशी कंपनियों को ख़रीदता भी है. जैसे मर्सिडिज़-बेंज़ कार बनाने वाली जर्मन कंपनी डैमलर में चीनी कंपनी गीलि सबसे बड़ी शेयर होल्डर बन गई है.
इसके अलावा चीन के कई सारे क़ायदे क़ानून हैं जो तकनीक वाली कंपनियों को परमानेंट रहने के लिए मजबूर करते हैं.
उदाहरण के लिए ऐपल चीन में एक स्थानीय कंपनी के साथ अपना पहला डेटा स्टोरेज सेंटर खोलने जा रहा है, जिससे वो चीनी सरकार के नए नियमों का पालन करेगा. इससे कंपनी से जुड़ी सारी अहम जानकारियां चीन को मिल जाएँगी.
चीन अपनी सेना में भी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस को बढ़ा रहा है. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के ज़रिए हथियारों के इस्तेमाल से दूर बैठे ही युद्ध को कंट्रोल किया जा सकता है.
चीन आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस वाली मिसाइलों को विकसित कर रहा है, जो टारगेट का पता लगा कर बिना किसी मानवीय मदद के उस पर हमला कर सकती है.
चीन के शहर शेन्ज़ेन में आर्टिफ़िशिय़ल इंटेलिजेंस पर काम करने वाली ढेरों कंपनियाँ हैं. इनमें से कई कंपनियाँ हेल्थकेयर सेक्टर को और आधुनिक बनाने के लिए काम कर रही हैं.
चीन की समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक़, 2007 से चीन एक ऐसा सॉफ्टवेयर विकसित कर रहा है, जो युद्ध के मैदान में तेज़ गति और सटीकता के साथ फ़ैसले लेने में मददगार साबित होगा.
ड्रोन तकनीक
ड्रोन तकनीक को ही लीजिए. अमरीका ने अपनी ड्रोन तकनीक किसी भी देश को देने से इनकार किया है. तो चीन ने इसके उलट एलान कर डाला कि वो अपनी ड्रोन तकनीक को दूसरे देशों को निर्यात करेगा.
तो चीन ने अपना टारगेट बनाया कि वो उन देशों को सैन्य तकनीक का निर्यात करेगा, जो अमरीका के क़रीबी नहीं हैं.
चीन दुनिया भर में ड्रोन के एक मुख्य सप्लायर के रूप में उभरा है. इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज़ के मुताबिक़ चीन ने मिस्र, नाइजीरिया, पाकिस्तान, सऊदी अरब और बर्मा को ड्रोन बेचे हैं.
द इकॉनोमिस्ट के मुताबिक़ चीन ने पिछले 20 सालों में किसी भी देश से ज़्यादा तेज़ी से न्यूक्लियर प्लांट बनाए हैं. चीन में 43 जीगावाट कैपेसिटि के न्यूक्लियर प्लांट है और वो सिर्फ़ अमरीका और फ्रांस से पीछे है.
आख़िर इतना सब चीन कैसे कर पाता है?
चीन की स्टार्ट अप कंपनियों को टैक्स में छूट मिलती है, सरकारी कॉन्ट्रैक्ट मिलते हैं, दफ़्तर के लिए जगह मिलती है.
चीन की सरकार बड़ी कंपनियों के साथ मिलकर काम कर रही है जैसे बाइडू, अलीबाबा, टेनसेंट.
इसी तरह चीन आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस स्टार्ट अप्स के लिए सबसे बड़ा कैपिटल मार्केट बन गया है.
चीन के पास फ़ायदा है डेटा का और सस्ते श्रम का. दूसरा चीन पूरी दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण सप्लाई चेन है. इसके शेनज़ेन और गुआंगज़ोऊ शहर में लगभग हर चीज़ का कंपोनेंट बनता है. लगभग सभी स्मार्टफ़ोन्स की चिप चीन में बनती है. इस वजह से दुनिया भर की तकनीक में चीन का एक्सेस है.
देखा जाए तो चीन तकनीक की शक्ति पाने के लिए आविष्कार को ज़रूरी नहीं मानता, उसके लिए ज़रूरी है कि तकनीक किसी की भी हो, वो उसे हासिल करे, इस्तेमाल करे. हार्वर्ड बिज़नेस रिव्यू के मुताबिक़ चीन आविष्कार में पीछे है.
स्मार्टफोन के चिप डिज़ाइन टूल के लिए भी अमरीका और जर्मनी की तरफ़ ही देखना पड़ता है. सेमीकंडक्टर बनाने में भी चीन सफलता हासिल नहीं कर पाया है.
अभी हाल ही में भारत सरकार ने डेटा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए 59 चीनी ऐप्स को बैन किया है. साइबर थ्रेट के गेम में चीन बहुत आगे निकल चुका है. अमरीका, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश चीन पर बौद्धिक संपत्ति चोरी करने के आरोप लगा चुके हैं और इसकी कुछ कंपनियों पर कार्रवाई भी कर चुके हैं.
अगर कोई पूछे कि चीन के लिए क्या ज़रूरी है..प्रोफ़िट या पावर? तो ये कहना ग़लत नहीं होगा कि चीन के लिए प्रोफ़िट ही पावर है.
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