अज़रबैजान-आर्मीनिया: दोनों देशों के झगड़े में ड्रोन कैसे बदल रहे जंग की तस्वीर

    • Author, पावेल आक्सेनोव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, रूसी सेवा

नागोर्नो-काराबाख़ विवादित क्षेत्र में मौजूद आर्मीनियाई सैनिकों पर अज़रबैजान के ड्रोन हमलों के वीडियो सामने आये हैं.

ये वीडियो इस बात की ओर इशारा हैं कि बीते तीन दशकों से रुक-रुक कर जारी ये जंग अब अचानक तेज़ हो गई है.

मीडिया में तुर्की के बायरक्तार ड्रोन की तस्वीरें सामने आई हैं जिसके बाद अब चिंता जताई जाने लगी है कि अज़रबैजान ने तुर्की से हथियार खरीदे हैं. इस घटना की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी आलोचना की गई है.

इसी बीच, अज़रबैजान के रक्षा मंत्रालय ने टोह लेने वाले ड्रोन से ली गई तस्वीरें और वीडियो साझा किये हैं जिनमें हमलों के ठिकाने दर्शाये गए हैं.

साथ ही मंत्रालय ने मानवरहित (कामिकाज़े) विमान से ली गई तस्वीरें भी जारी की हैं.

कामिकाज़े मानवरहित विमान को मुख्य रूप से आत्मघाती हमले करने के लिए बनाया जाता है जो उड़ते हुए दुश्मन के ठिकाने से सीधा टकराते हैं और अपने साथ उन्हें भी उड़ा देते हैं.

हाल के वक्त में आर्मीनिया और अज़रबैजान, दोनों ही देश अपने हथियारों का ज़खीरा बढ़ाने में जुटे थे, लेकिन आर्मीनिया के मुक़ाबले अज़रबैजान ने कहीं अधिक मात्रा में हथियार ख़रीदे हैं, जिनमें ड्रोन ख़ासकर शामिल हैं.

बायरक्तार विमान

नागोर्नो-काराबाख़ को लेकर जारी जंग में जिस ड्रोन की सबसे अधिक चर्चा हो रही है वो तुर्की का बायरक्तार टीबी-2 है.

जानकार कहते हैं कि नागोर्नो-काराबाख़ इलाक़े में जारी जंग के जो वीडियो और तस्वीरें अज़रबैजान की सेना ने जारी की हैं, उन्हें टीबी-2 ड्रोन से ही फ़िल्माया गया है.

इस ड्रोन को कुछ साल पहले तुर्की की बायकर नामक एक कंपनी ने बनाया था. ये अपने आप काम करने में सक्षम हैं.

साथ ही टोह लेने के लिए और दुश्मन के ठिकाने का सही अंदाज़ा लगाने में इसका बढ़िया इस्तेमाल होता है. टीबी-2 को ड्रोन जगत का स्टार माना जाता है.

फ़रवरी 2020 में सीरिया में ऑपरेशन स्प्रिंग शील्ड के दौरान और लीबिया में ख़लीफ़ा हफ़्तार की विद्रोही सेना के ख़िलाफ़ पहले भी तुर्की इस ड्रोन का इस्तेमाल कर चुका है.

तुर्की ने यूक्रेन को टीबी-2 ड्रोन बेचे हैं. 6 अक्तूबर को तुर्की की एक समाचार एजेंसी ने कहा कि सर्बिया भी इस ड्रोन को खरीदना चाहता है.

जानकार मान रहे हैं कि आर्मीनिया के ध्वस्त टैंकों की जो तस्वीरें जारी की जा रही हैं वो बायरक्तार टीबी-2 से ली गई हैं.

लेकिन अब तक इसपर किसी तरह की आधिकारिक जानकरी नहीं मिली है जो इस बात की पुष्टि करे कि ये ड्रोन अब अज़रबैजान की सेना में शामिल हैं.

इसी साल, 5 अक्तूबर को अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने कहा था कि तुर्की के कुछ ड्रोन उनके पास हैं. हालांकि इस ड्रोन की ख़रीददारी से जुड़ा कोई दस्तावेज़ अब तक प्रकाशित नहीं किया गया है.

इसी साल जून में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी जिसमें कहा गया था कि जल्द की अज़रबैजान की सेना को ये हथियार मिलेंगे.

रूसी पत्रिका आर्म्स एक्पोर्ट्स के मुख्य संपादक आंद्रे फ़्रोलोव कहते हैं कि हो सकता है कि अज़रबैजान ने ख़ुफ़िया तरीके से इस तरह के मानवरहित विमान रखने शुरू किये हों या फिर जंग शुरू होने से ठीक पहले उन्हें ये हथियार मिले हों.

ड्रोन को लेकर विवाद

तुर्की के ड्रोन निर्यात और उसके इस्तेमाल को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी ना होने का एक कारण ये भी हो सकता है कि ये ड्रोन 'थर्ड कंट्री टेक्नोलॉजी' का इस्तेमाल करते हैं.

सोमवार को कनाडा ने घोषणा की कि वह ड्रोन के उत्पादन के लिए तुर्की को तकनीक देना बंद करेगा. कनाडा को शक़ है कि इसका इस्तेमाल नागोर्नो-काराबाख़ में किया जा रहा है.

कनाडाई एनजीओ प्रोजेक्ट 'प्लोशेयर' के अनुसार, नागोर्नो-काराबाख़ इलाक़े में हो रहे ड्रोन हमलों की तस्वीरें बताती हैं कि जिस विमान से ये तस्वीरें ली गईं, उसमें कनाडाई 'एल-3 हैरिस टेक्नोलॉजीस कंपनी' द्वारा बनाये गये यंत्रों का इस्तेमाल किया गया है. एल-3 हैरिस एक मल्टीनेशनल कंपनी है जो रक्षा सौदे भी हाथ में लेती है.

कनाडा की घोषणा के जवाब में तुर्की ने नेटो में अपने सहयोगी देश (कनाडा) पर कुछ आरोप लगाये. तुर्की ने कहा कि वो दोहरे मापदण्ड इस्तेमाल कर रहा है जो सैन्य समझौतों की मूल भावना के ख़िलाफ़ है.

ड्रोन: टोह लेने से लेकर हमले करने तक

अज़रबैजान की सेना कई तरह के मानवरहित विमानों का इस्तेमाल करती है.

अमरीका में बार्ड कॉलेज के सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ ड्रोन्स के अनुसार, तुर्की के पास इसराइल के दो हेरॉन टीपी, दस हर्मेस 4507, सौ स्काई स्ट्राइकर्स और 50 हारोप्स ड्रोन हैं.

इसराइल और अज़रबैजान की जॉइंट कंपनी आज़ाद सिस्टम्स ने एरोस्टार खोजी ड्रोन और कामिकाज़े ऑर्बिटर-1के और ऑर्बिटर-3 बनाये हैं.

साथ ही तटरक्षकों के साथ दो लंबी दूरी तक मार कर सकने वाले हर्मेस-900 तैनात किये गए हैं.

किंग्स कॉलेज लंदन में सैन्य रिसर्चर रॉब ली ने बीबीसी को बताया कि नागोर्नो-काराबाख़ इलाक़े में पहले के मुक़ाबले, मौजूदा वक़्त में जंग के तेज़ होने का एक कारण ऐसे ड्रोन हैं जो बम गिराने में सक्षम हैं.

इससे पहले, अज़रबैजान केवल लॉयटरिंग हथियार इस्तेमाल कर रहा था जो टार्गेट एरिया के आसपास उड़ते हुए अपना ठिकाना तय करते हैं और हमले करते हैं.

आर्मीनिया द्वारा भी एक वीडियो जारी किया गया है. इसमें दिखाई देता है कि एक विमान को किसी एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल ने हमले में उड़ा दिया. यह मिसाइल कुछ-कुछ सोवियत दौर की एन-4 बाइप्लेन जैसी थी.

मीडिया में आ रही रिपोर्टों के अनुसार, ये कोई मानवरहित विमान भी हो सकता है जो हमले से पहले एयर डिफ़ेंस पोज़िशन्स की पड़ताल कर रहा हो.

आर्मीनिया नहीं खरीद रहा ड्रोन

रूसी विशेषज्ञ आंद्रेई फ्रोलोव के अनुसार, आर्मीनिया ने हाल में मानव रहित विमानों की ख़रीद नहीं की है. उनका कहना है कि इसकी बड़ी वजह ये है कि आर्मीनिया ने अज़रबैजान की ड्रोन ताक़त को अब तक कम करके आंका होगा.

वे कहते हैं, "आर्मीनिया ने हालांकि ड्रोन ख़रीदने की अपनी किसी योजना का अब तक प्रचार नहीं किया है. पर रूस के पास ऐसे ड्रोन नहीं हैं जिनकी क्षमता ऐसी हो. इसलिए आर्मीनिया को चीन या ईरान से ही ड्रोन ख़रीदने होंगे. लेकिन मामला पैसे पर आकर फंसेगा. रूस से आर्मीनिया कुछ लोन लेकर भी ड्रोन ख़रीद सकता है, कुछ समझौते कर सकता है. लेकिन चीन के साथ इस तरह की डील करना मुश्किल है. रही बात अपने देसी ड्रोन तैयार करने की, तो इसके कोई संकेत दिखाई नहीं देते."

आर्मीनिया अपने यहाँ क्रंक नामक हल्के ड्रोन बनाता है. क्रंक का मतलब है क्रेन. लेकिन इसकी कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है कि विवादित क्षेत्र में इस समय अज़रबैजान के ख़िलाफ़ कितने क्रंक ड्रोन तैनात किये गए हैं.

फ्रोलोव का कहना है कि आर्मीनिया ने रूस से 'टोर शॉर्ट रेंज मिसाइल सिस्टम' ख़रीदा था जो सतह से हवा में मार कर सकता है और इसे ड्रोन हमले रोकने में क़ामयाब माना जाता है. लेकिन इसकी भी जानकारी नहीं है कि विवादित क्षेत्र में इस सिस्टम को तैनात किया गया है या नहीं.

हालांकि, आर्मीनिया ने विवादित क्षेत्र में सोवियत-युग के ओसा और स्ट्रेला मिसाइल सिस्टम को तैनात किया है जो सतह से हवा में मार करता है और इसके बारे में यह जानकारी भी दी गई है कि इसने अज़रबैजान के कुछ ड्रोन मार गिराये हैं.

ड्रोन्स ने अज़रबैजान की मदद की?

अज़रबैजान ने आर्मीनिया के ठिकानों पर ड्रोन हमलों के दर्जनों वीडियो प्रकाशित किये हैं.

इनमें दिखता है कि अज़रबैजान के ड्रोन आर्मीनिया के बख़्तरबंद वाहनों को सबसे ज़्यादा निशाना बना रहे हैं.

इसके अलावा कुछ मौक़ों पर आर्मीनियाई सैनिकों और सैन्य ठिकानों को भी अज़रबैजान के ड्रोन निशाना बना रहे हैं.

वीडियो में दिखता है कि आर्मीनिया के ओसा और स्ट्रेला एंटी-मिसाइल एयर-क्राफ़्ट सिस्टम पर भी अज़रबैजान के ड्रोन्स ने हमला किया.

हालांकि, इस बात की कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है कि विवादित क्षेत्र में अज़रबैजान के ड्रोन्स ने कुल कितने हमले किये हैं और इन हमलों से आर्मीनिया की सैन्य क्षमता कितनी कमज़ोर हुई है.

अगर सिर्फ़ ड्रोन हमलों की बात करें, तो ओसा और स्ट्रेला मिसाइल सिस्टम निर्णायक भूमिका नहीं निभाते हैं.

लंदन स्थित किंग्स कॉलेज के रॉब ली का कहना है, "हमने कई वीडियो देखे हैं जिनमें ओसा और स्ट्रेला डिफ़ेंस सिस्टम को ही निशाना बनाया गया. दरअसल, ये बहुत पुराने डिफ़ेंस सिस्टम हैं. उनके लिए टीबी-2 जैसे ड्रोन को रडार पर पकड़ना चुनौती भरा होता होगा, क्योंकि मूल रूप से इन्हें हेलीकॉप्टर और फ़ाइटर विमानों को हमले को रोकने के लिए तैयार किया गया था."

रूसी सैन्य विशेषज्ञ विक्टर मुरखोव्स्की बताते हैं कि नागोर्नो-क़राबाख़ में लगा एयर-डिफ़ेंस सिस्टम तुलनात्मक रूप से आर्मीनिया में लगे डिफ़ेंस सिस्टम से कम शक्तिशाली है. नागोर्नो-क़राबाख़ वाले एयर-डिफ़ेंस सिस्टम पुराने हैं और उनमें लगे रडार उतने सक्षम नहीं हैं, इसलिए अज़रबैजान के ड्रोन आसानी से उन्हें चकमा दे सकते हैं.

वे कहते हैं, "अज़रबैजान इस कमज़ोरी को समझता है. इस लड़ाई में, विवादित क्षेत्र के ऊपर पायलट वाले विमान देखने को नहीं मिल रहे. अज़रबैजान ने सारी परिस्थिति को समझते हुए ही इस क्षेत्र में हेलीकॉप्टर या लड़ाकू विमान तैनात नहीं किये."

सोशल मीडिया पर अज़रबैजान के ड्रोन हमलों की फ़ुटेज शेयर की जा रही है. लोग इनके बारे में बात कर रहे हैं.

लेकिन मुरखोव्स्की कहते हैं कि ये वीडियो देखकर इन ड्रोन्स की क्षमता का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि ये वीडियो सिर्फ़ इनकी सफलता को दिखा रहे हैं. इनमें कहीं भी ड्रोन के फ़ेल होने या इन पर डिफ़ेंस सिस्टम से हमले होने का पता नहीं चलता.

क्या ड्रोन हमले से बचा जा सकता है?

लंदन स्थित रक्षा विशेषज्ञ रॉब ली का मानना है कि अज़रबैजान के ड्रोन हमलों ने आर्मीनियाई पक्ष को गंभीर नुक़सान पहुँचाया होगा. (हालांकि इसकी सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है.) लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि अज़रबैजान इससे कोई बड़ा फ़ायदा ले पायेगा.

रूसी सैन्य विशेषज्ञ विक्टर मुरखोव्स्की का कहना है कि 'युद्ध क्षेत्र में ड्रोन नये हथियार ज़रूर हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि पहले इनका इस तरह इस्तेमाल नहीं हुआ. ये काफ़ी इस्तेमाल किये गये हैं और इनसे कैसे बचना है, इसके भी तरीक़े निकाले जा चुके हैं. सीरिया के सशस्त्र चरमपंथी समूहों ने ड्रोन्स का मुक़ाबला करने की रणनीति विकसित की है और वो इसमें सफल भी हो जाते हैं. क़राबाख़ के पास अगर आधुनिक डिफ़ेंस सिस्टम ख़रीदने के लिए फंड नहीं है, तो वो सीरिया वाले तरीक़े अपना सकता है और अज़रबैजान के ड्रोन हमलों से अपना बचाव कर सकता है.'

इस स्थिति में, अज़रबैजान के ड्रोन्स को चकमा देने के लिए कुछ डमी सैन्य ठिकाने बनाये जा सकते हैं. इससे आर्मीनिया को शायद मदद मिले. अज़रबैजान के रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी किये गए एक वीडियो में साफ़ तौर पर यह देखा भी जा सकता है कि अज़हरी ड्रोन ने एयर-डिफ़ेंस सिस्टम के एक फ़र्जी मॉडल को निशाना बनाया.

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