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यूक्रेन: जहां देश की अपील पर 'वर्दी' पहन रहे हैं आम लोग
रूस के हमले के बाद से लाखों लोग यूक्रेन छोड़कर चले गए हैं. सैकड़ों की संख्या में लोग सीमाओं पर डटे हैं, जिससे दूसरे देश में जा सकें.
बीते तीन दिनों में यानी जब से रूस ने यूक्रेन ने रूस पर हमला किया है तब से अभी तक क़रीब एक लाख 15 हज़ार से अधिक लोग बॉर्डर पार करके पोलैंड जा चुके हैं.
लेकिन देश छोड़कर जाना इतना आसान है क्या?
भागने वालों में महिलाएं और बच्चे
कुछ लोग दो दिनों से लगातार चले जा रहे हैं. पड़ोसी देशों से लगी सीमाओं से 10-10 किलोमीटर दूर तक लोगों की कतार हैं. तमाम लोग यूक्रेन के मौजूदा हालात से बचकर निकल जाना चाहते हैं.
वहीं रूस मिसाइल बरसा रहा है. अमेरिका में यूक्रेन की राजदूत ने रूस पर आरोप लगाते हुए कहा है, 'रूस आम नागरिकों को निशाना बना रहा है.' अब परमाणु हमले का ख़तरा भी है.
यूक्रेन छोड़कर भागने वालों में ज़्यादातर औरतें और बच्चे ही हैं.
इसकी एक बड़ी वजह यह है कि यूक्रेन में 18 साल से 60 साल के पुरुषों को कहा गया है कि वे 'देश छोड़कर ना जाएं और देश के लिए लड़ें.'
बीबीसी के अलग-अलग संवाददाताओं ने यूक्रेन की अलग-अलग सीमाओं पर सुरक्षित बच निकलने की लिए ख़्वाहिश लिए खड़े बहुत से लोगों से बात की.
24 घंटे की लाइन
लूसी विलियम्सन, पालांका, मोल्दोवा
मोल्दोवा की सीमा से खड़े होकर यूक्रेन को देखने पर लगता है कि यह सिर्फ़ औरतों का ही देश है. मांओं का देश. दादी-नानी का देश. जहां अलग-अलग रंग के सूटकेस लिए सैकड़ों औरतें खड़ी हैं और अपने बच्चों को लेकर उस दिशा में बढ़ी जा रही हैं, जिनके बारे में ख़ुद उन्हें भी नहीं पता.
एना को पलांका क्रॉसिंग प्वाइंट तक पहुंचने में 24 घंटे लग गए. उनकी छोटी सी पीले रंग की कार उस समय कार कम और एक छोटे से घर का स्टोर-रूम लग रही थी. जिसमें ठूंस-ठूंस कर बैग भरे हुए थे, उनकी छह साल की नातिन(बेटी की बेटी) भी इसी कार की पिछली सीट पर थी. हालांकि साथ में कोई बड़ा है, ये भरोसा उसे हिम्मत दिए हुए था, तभी तो वो पिछली सीट पर बैठकर गाने गुनगुना रही थी.
एना और उनकी बेटी दक्षिणी शहर ओडेसा से सीधे यहां पहुंचे थे. लगभग 50 किलोमीटर का सफ़र तय करके.
यह शहर अब रूस के निशाने पर है.
जब हमने एना से बात करना शुरू किय था तो उनके चेहरे पर एक धीरज वाली मुस्कान थी लेकिन बात करते-करते वो ना जाने कहां खो गयी. कुछ शब्दों के बाद ही उनकी आंखें भर गयीं.
अपने पति को याद करके वो फफक पड़ीं.
उनके लिए यह बताना मुश्किल हो रहा था कि वो सिर्फ़ अपनी बेटी और उसकी बेटी के साथ यहां आयी हैं क्योंकि उनके पति देश को रूस के हमले से बचाने के लिए वहीं रुके हैं.
वह कहती हैं, "मैं उम्मीद करती हूं कि पश्चिमी देश इस भयावह परिस्थिति में हमारी मदद करेंगे क्योंकि जो माहौल है उसमें तो फिलहाल सिर्फ़ हमारा देश ही रूस के गुस्से और आक्रमण से जूझ रहा है."
लेकिन दर्द भरी जगहों पर भी उम्मीद दिख जाती है.
वैसा ही कुछ यहां भी था. एना के चारों ओर बहुत से ऐसे वॉलेंटियर थे जो यूक्रेन से बचकर आ रहे लोगों को मदद कर रहे थे.
लेकिन क्या एक बसी-बसाई ज़िंदगी,परिवार, सपनों को छोड़कर ज़िंदा रहना आसान है?
एना जैसे बहुत से लोग हैं जो अपने सालों-साल के सपने छोड़कर मोल्दोवा आ चुके है. लेकिन इनमें से शायद किसी एक को भी नहीं पता कि जान तो बच गयी लेकिन ज़िंदगी कैसी होगी.
पर ये फ़िक्र सिर्फ़ अपने लिए नहीं है, उस देश के लिए भी है जहां रहते हुए वे खुद को महफ़ूज़ समझते थे लेकिन आज वही देश अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहा है.
किसी मर्द को इजाज़त नहीं
मार्क लोवेन, पोलैंड
कीएव से पूरी रात का सफ़र.
पोलैंड के इस 19वीं शताब्दी के रेलवे स्टेशन की पहचान बीते कुछ दिनों में बदल चुकी है.
अब यह सिर्फ़ एक रेलवे स्टेशन भर नहीं रह गया है. ये स्टेशन उन लोगों के लिए स्वागत द्वार की तरह है, जिन्हें यहां पहुंचकर ज़िंदा बच जाने की उम्मीद है.
कैटराइना लियोन्तिएवा बताती है कि उन्हें यहां तक पहुंचने में कुल 52 घंटे का समय लगा.
उनके साथ उनकी बेटी भी 52 घंटे का सफ़र तय करके खारकीएव से यहां तक पहुंची हैं.
अपने पासपोर्ट को पूरी मज़बूती से पकड़े उन्होंने पोलैंड में प्रवेश किया है. पोलैंड फिलहाल देश नहीं ज़िंदा बच जाने की उम्मीद बन गया है.
जब मैंने उनसे पूछा कि उन्हें यहां पहुंचकर कैसा लग रहा है तो उनके शब्द बाद में सुनायी दिए, आंखों की नमी पहले दिखाई दे गयी.
वह कहती हैं, "मैं अभी कुछ भी समझ नहीं पा रही हूं. कुछ समझ नहीं आ रहा है. लेकिन मैं बस प्रार्थना कर रही हूं कि ये एक छोटा सा ट्रिप हो जो जल्दी से जल्दी ख़त्म हो जाए."
यहीं वेटिंग रूम में हमें इरेन मिलीं, जो अपने दो छोटे बच्चों के साथ यहां तक आ पहुंची हैं. लेकिन पति... पति देश की सुरक्षा के लिए यूक्रेन में ही हैं.
वह कहती हैं, "केवल औरतों और बच्चों को जाने की अनुमति है. मर्द वहीं रहना चाहते हैं. लड़ना चाहते हैं और देश के लिए अपना खून देना चाहते हैं. वे सभी नायक हैं."
लेकिन पति को पीछे, हमले के बीच छोड़कर आना कितना मुश्किल है?
वह कहती हैं, "मैं अंदर से डरी हुई हूं. हम बस भरोसा और उम्मीद कर रहे हैं कि सब ठीक हो जाएगा और हम साथ होंगे. हम बस प्रार्थना कर सकते हैं और वही कर रहे हैं."
बच्चे ज़िंदा रहें, दुनिया देख सकें इसलिए मां-बाप उन्हें छोड़ दे रहे हैं
निक थोरेपे, हंगरी
विक्टोरिया पश्चिमी यूक्रेन के इरशावा से यहां हंगरी पहुंची हैं.
वह बतती हैं, "मैं अपनी दो बेटियों के साथ यहां हंगरी आयी हूं. मैं उन्हें यहां हमारे रिश्तेदारों के पास छोड़कर, वापस अपने पति के पास चली जाऊंगी."
क्या आपको लौटने पर डर नहीं?
वह कहती हैं, "सच कहूं, डर तो है. लेकिन मुझे ख़ुद से ज़्यादा मेरी बेटियों के लिए डर है. मैं ये साफ़ देख पा रही हूं कि स्थिति ठीक नहीं है लेकिन मैं अपने देश को भी तो नहीं छोड़ सकती. हमें देशभक्त होना ही होगा."
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