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क्या अमेरिका की ये 'सिल्वर फ़ॉक्स' पुतिन को चकमा दे पाएगी?
दुनिया की सबसे ताक़तवर राजनयिकों में शुमार वेंडी शरमन को सिल्वर फ़ॉक्स के नाम से भी जाना जाता है. इसकी दो वजहें है, एक तो उनके बर्फ़ से सफ़ेद बाल और दूसरा चालाकी से समझौते कर लेने का उनका स्टाइल.
वेंडी ने यूरोप में हो रही रूस-अमेरिका वार्ता का नेतृत्व किया.
शरमन अमेरिका की उप-विदेश मंत्री हैं. ये अमेरिका के विदेश मंत्रालय के शीर्ष पदों में से एक है.
शरमन ने इस सप्ताह रूस के राजनयिकों से मुलाक़ातें करके यूक्रेन के मामले पर चर्चा की जहां दांव पर बहुत कुछ लगा है.
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन की सीमा के पास एक लाख के क़रीब रूसी सैनिक तैनात किए हैं. यूक्रेन को रूस के आक्रमण का डर है और पश्चिमी देशों ने रूस को ऐसा न करने के लिए चेताया है.
अमेरिकी अधिकारियों को उम्मीद है कि वो रूस के राजनयिकों से वार्ता के ज़रिए संकट का समाधान कर लेंगे. शरमन पूरा ज़ोर लगा रही हैं.
वेंडी शरमन की शख़्सियत
वॉशिंगटन में वो अपने तेवर के लिए चर्चित हैं. उन्होंने इससे पहले कई मुश्किल परिस्थियों का सामना भी किया है.
राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के कार्यकाल के दौरान उन्होंने उत्तर कोरिया के साथ समझौता करने की कोशिश की थी. ये समझौता उत्तर कोरिया को परमामु हथियार कार्यक्रम को रोकने के लिए तैयार किया गया था.
2011 में उन्होंने ईरान से परमाणु समझौते पर वार्ता कर रही अमेरिकी टीम का नेतृत्व किया था. तब बराक ओबामा राष्ट्रपति थे.
उन्होंने ईरान और छह शक्तिशाली देशों के बीच परमाणु समझौता कराने में अहम भूमिका निभाई थी. अमेरिका और ईरान के अलावा इस समझौते में फ़्रांस, ब्रिटेन, चीन, रूस और जर्मनी शामिल थे.
पूर्व राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने बाद में अमेरिका को इस समझौते से अलग कर लिया था और ये समझौता लगभग टूट गया था. अब इसे फिर से जीवित करने के प्रयास किए जा रहे हैं.
एक समय शरमन ने कहा था कि जब वो वार्ता कर रही होती हैं तब एक महिला होने की वजह से उन्हें कोई मुश्किल नहीं आती है. हालांकि ईरान में महिलाओं और पुरुषों के आपस में वार्ता करने को लेकर सख़्त नियम लागू हैं.
इस वार्ता के बारे में शरमन ने कहा था, "जब मैं ईरानियों के सामने बैठी थी तब में संयुक्त राज्य अमेरिका थी और शायद एक महिला के रूप में मैं ऐसी बातें कह देती हूं जो बहुत सख़्त नहीं लग रही होती हैं, लेकिन जब मैं सख़्त होती हूं और फिर नरम हो जाती हूं तो उससे गहरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि ये अप्रत्याशित होता है."
72 वर्षीय शरमन के बाल छोटे हैं और वार्ता का माहौल सख़्त होने के बावजूद वो हमेशा अच्छी तरह तैयार दिखती हैं. अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में शरमन के साथ काम करने वाले एक ब्रितानी राजनयिक कहते हैं, 'उनका एक बाल भी कभी भी इधर से उधर नहीं होता.'
'द फ़ॉक्स' नाम कैसे मिला
शरमन को अपना नाम ईरानी लोगों से मिला है जो वार्ता को लेकर उनके नज़रिए की वजह से उन्हें 'द फ़ॉक्स' कहने लगे थे.
विदेश मंत्रालय में उनके सहकर्मियों ने इस नाम को अपना लिया. वार्ता के दौरान वो टी-शर्ट पहनते थे जिस पर सिल्वर फ़ॉक्स लिखा होता था.
विदेश मंत्रालय में उनके क़रीबी कहते हैं कि जब वो अंतरराष्ट्रीय मंच पर वार्ता में शामिल होती हैं तो सबकी निगाहें उन पर होती हैं. सब उनकी प्रसंशा करते हैं, कई बार इसमें डर भी होता है.
तुर्की में अमेरिका के पूर्व राजदूत रहे जेम्स जेफ़री कहते हैं, "वो बहुत तेज़ हैं और बहुत गहनता से बात करती हैं." जेम्स ने शरमन के काम को क़रीब से देखा है.
कूटनीति कला भी उन्होंने अपने असाधारण तौर तरीके से ही सीखी है. यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेरीलैंड के स्कूल ऑफ़ सोशल वर्क से शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने बाल्टिमोर में बच्चों की देख-रेख का काम किया.
बच्चों के लिए काम
1980 के दशक में वो उत्पीड़न के शिकार बच्चों के मामलों पर काम करती थीं, लेकिन ऐसे बच्चों के लिए की जा रही कोशिशों से असंतुष्ट थीं. ऐसे में व्यवस्था को बदलने के लिए वो एक सामुदायिक कार्यकर्ता बन गईं. बाद में उन्हें प्रांत के बाल कल्याण विभाग के निदेशक के तौर पर नौकरी मिल गई और उन्होंने एक राजनीतिक व्यक्ति की प्रतिष्ठा हासिल कर ली.
वो बाद में राष्ट्रपति क्लिंटन के प्रशासन का हिस्सा बनीं. वो राजनतिक मामलों की पहली महिला अंडर सेक्रेटरी थीं.
इस सप्ताह वो अपनी कला की परीक्षा करने जा रही हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस के साथ वार्ता ख़ासतौर पर मुश्किल होती है और अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए शरमन को अपना पूरा कौशल लगाना होगा. उनका मक़सद है यूरोप में एक और बड़े युद्ध को रोकना.
सोमवार को उन्होंने जिनेवा में रूस के एक राजनयिक दस्ते से वार्ता की थी. इसमें रूस के उप विदेश मंत्री सर्गेई रयाबकोफ़ भी शामिल हैं.
बुधवार को उन्होंने फिर से नेटो की बैठक में ब्रसेल्स में रूसी अधिकारियों से वार्ता की.
रूस और अमेरिका का गतिरोध
रूस की कई मांगे हैं- अमेरिकी अधिकारियों को ये मानना होगा कि वो पूर्व की दिशा में नेटो की सेनाओं को नहीं बढ़ाएंगे. रूस ये भी चाहता है कि अमेरिकी अधिकारी ये गारंटी दें कि यूक्रेन को नेटो का हिस्सा नहीं बनने दिया जाएगा.
ऐसे में रूस और अमेरिका की बातचीत में गतिरोध आ गया है. बात आगे बढ़ती नहीं दिख रही है.
जिनेवा में वार्ता के बाद शरमन ने पत्रकारों से कहा था, "हम अपनी बात पर टिके रहे."
यूरोप में चल रही वार्ता दोनों ही पक्षों के लिए चुनौतीपूर्ण है. रयाबकोफ़ ने पत्रकारों से कहा कि शरमन के साथ उनकी वार्ता उपयोगी और उत्साहवर्धक रही है.
उन्होंने कहा, "वार्ता मुश्किल थी, लंबी थी, बहुत पेशेवर थी, गहरी, ठोस और बिना धार को कुंद करने के प्रयासों के."
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