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कज़ाख़स्तानः मध्य एशिया में सबसे ताक़तवर राजनेता रहे नूरसुल्तान नज़रबायेव आख़िर कहाँ लापता हैं?
कज़ाख़स्तान में गैस की बढ़ी कीमतों को लेकर शुरू हुए प्रदर्शन ने अब हिंसक रूप ले लिया है. हालात बेक़ाबू होते देख अब रूसी सेना को प्रदर्शनों पर नियंत्रण करने के लिए कज़ाख़स्तान बुलाया गया है.
लेकिन इन सब के बीच वहां के सबसे बड़े नेता और 29 साल तक राष्ट्रपति रह चुके नूरसुल्तान नज़रबायेव दिख नहीं रहे हैं, और सवाल उठ रहा है कि वो कहां लापता हैं?
नूरसुल्तान नज़रबायेव स्वतंत्र कज़ाख़स्तान के पहले राष्ट्रपति थे. अपने लंबे शासन के दौरान उन्होंने जनता के सामने ख़ुद को देश के राष्ट्रपिता के रूप में पेश किया. हालांकि नए साल की हिंसा में दर्जनों लोगों के मारे जाने के बावजूद नज़रबायेव कहीं दिखाई नहीं पड़ रहे हैं.
अभी कज़ाख़स्तान में दिख रही हैं तो केवल नज़रबायेव के नाम की मूर्तियां और उनके नाम पर बनी सड़कें.
इन प्रदर्शनों और हिंसा ने कज़ाख़स्तान में सत्ता के पूर्ण हस्तानांतरण की रफ़्तार को तेज़ कर दिया है. पूर्व राष्ट्रपति नज़रबायेव से सुरक्षा परिषद के प्रमुख के रूप में सत्ता की एकमात्र औपचारिक भूमिका भी छीन ली गई है.
अब राष्ट्रपति कासिम जोमार्त तोकायेव ने ख़ुद को सुरक्षा परिषद का प्रमुख घोषित कर दिया है.
बता दें कि तोकायेव वही शख़्स हैं, जो 2019 में नज़रबायेव के हटने के बाद कज़ाख़स्तान के राष्ट्रपति बनाए गए थे. पिछले साल यानी 2021 में ही नज़रबायेव ने अपने पास बची दो अहम ज़िम्मेदारियां तोकायेव को सौंप दी थीं.
इनमें 'असेंबली ऑफ़ द पीपुल्स ऑफ़ कज़ाख़स्तान' के चेयरमैन का पद और नूर ओटान पार्टी के नेता का पद शामिल था.
कज़ाख़स्तान में नूरसुल्तान नज़रबायेव के कद का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रपति पद से हटने के क़रीब तीन साल बाद भी वहॉं होने वाली हर घटना को उनसे, उनके परिवार से या फिर सहयोगियों से जोड़कर देखा जाता है.
अभी हो रहे प्रदर्शन में भी प्रदर्शनकारियों को उनके विरोध में नारे लगाते सुना गया है. साथ ही, कई जगहों पर उनकी मूर्तियों को भी हटा दिया गया है.
नज़रबायेव के प्रति इतनी नाराज़गी क्यों?
आख़िर लोगों में नज़रबायेव को लेकर इतनी नाराज़गी क्यों हैं? दरअसल, कज़ाख़स्तान पहले सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करता था.
संघ के विघटन से लेकर 2019 तक नज़रबायेव कज़ाखस्तान के राष्ट्रपति रहे. इसलिए वहां की जनता मानती है कि इस देश के जो हालात हैं, उसके लिए नज़रबायेव ही ज़िम्मेदार हैं.
संसाधन संपन्न इस देश का क्षेत्रफल भारत से थोड़ा ही कम क़रीब 27 लाख वर्ग किलोमीटर है.
इस देश की उम्मीदें भी बड़ी रही हैं, लेकिन इसकी आबादी दो करोड़ से भी कम है. इन सबके अलावा और भी कई वजहें हैं, जिनके चलते इस देश का इलाक़े पर और दुनिया में कोई ख़ास असर नहीं हो पाया.
नज़रबायेव के शासनकाल में लोगों की नाराज़गी और सिविल सोसायटी दोनों को पनपने नहीं दिया गया. वहीं संपत्ति का वितरण असमान ढंग से बढ़ता गया.
कज़ाख़स्तान के दो करोड़ नागरिक होने के बाद भी केवल 200 लोगों के हाथों में देश की आधी से अधिक संपत्ति है. देश में क़रीब 400 करोड़पति हैं और उनमें से ज़्यादातर विदेश में ख़ासकर लंदन में रहना पसंद करते हैं.
2008 से 2015 के दौरान, ब्रिटेन जब अपने यहां निवेश करनेवालों को बसने की अनुमति दे रहा था, तब कज़ाख़स्तान के रईस "गोल्डन वीज़ा" पाने की क़तार में सबसे आगे थे.
चैटम हाउस रिसर्च इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार, उस दौरान वहां के 200 से भी ज़्यादा करोड़पतियों को ब्रिटेन में बसने का अधिकार मिला.
उन रईसों ने बढ़ चढ़कर ब्रिटेन की अचल संपत्तियों में निवेश किया. इससे लोगों के साथ-साथ पुलिस और अदालत का ध्यान इस मामले की ओर गया.
अंग्रेज़ों ने नज़रबायेव की बेटी दरिगा और उनके नाती नुराली अलीयेव के दो घरों और अपार्टमेंट को ज़ब्त करने की कोशिश की. बाद में उन्होंने अदालत में साबित किया कि वो सारी संपत्तियां उनके ही पैसे से खरीदी गई थीं.
उन्होंने साबित किया कि संपत्तियों को खरीदने में उनके पूर्व पति राख़त अलीयेव की आपराधिक आय का कोई इस्तेमाल नहीं हुआ था.
कज़ाख़स्तान में अमेरिका के राजदूत रह चुके विलियम कर्टेनी ने बताया, "पिछले कुछ सालों के दौरान नज़रबायेव परिवार द्वारा यूरोप में खरीदी गई आलीशान संपत्तियों का मामला लगातार उठता रहा. और कज़ाख़स्तान के लोगों के भड़कने की एक वजह ये भी हो सकती है. ऐसा लगता है कि नज़रबायेव को अब इसकी बड़ी राजनीतिक क़ीमत अदा करनी होगी."
इन सारी परेशानियों के बावजूद, नज़रबायेव के परिवार और वहां के रईसों ने हमेशा पश्चिमी मुल्कों का सहारा लिया है.
अमेरिका और यूरोप के बड़े बिज़ेनस अख़बारों में कज़ाख़स्तान की उपलब्धियों के बारे में ढेर सारे लेख लगातार छपते रहे हैं. देश की सबसे बड़ी कंपनियों ने अपने शेयर को लंदन स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध करवाया है.
देश की राजधानी नूर-सुल्तान को पश्चिमी देशों के मशहूर आर्किटेक्ट ने फिर से बनाया. नई बनी राजधानी में 'स्पेशल ऑनेस्ट कोर्ट' खोले गए जिनमें व्यापारिक, सिविल और मध्यस्थता के मामले निपटाने के लिए ब्रिटेन से बहुत महंगे जज बुलाए गए.
यह भी हुआ कि यूरोप के मुक़ाबलों में खेलने के लिए 2002 में देश की फ़ुटबॉल टीम को एशियाई महासंघ से हटाकर यूरोप के यूईएफ़ए में शामिल करा दिया गया.
समस्याओं को टालना अब संभव नहीं
पश्चिमी देशों के सिस्टम में फिट होने की नज़रबायेव की महत्वाकांक्षा ने कज़ाख़स्तान को अपने पड़ोसी देशों उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और ताजिकिस्तान के तानाशाही शासकों से दूर कर दिया.
हालांकि अब यह देश तेज़ी से पश्चिम विरोधी खेमे में जा रहा है. चीन के साथ कज़ाख़स्तान के आर्थिक और रणनीतिक तौर पर अहम रिश्ते हैं, वहीं रूस के साथ उसके क्षेत्रीय स्तर पर अहम संबंध हैं.
दोनों मुल्क सोवियत संघ के विघटन के बाद हुए समझौते कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन (सीएसटीओ) का हिस्सा हैं.
इस समझौते में शामिल अन्य सदस्य देश हैं- बेलारूस, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और आर्मीनिया. मौजूदा संकट से साफ़ हुआ कि यह देश बिना उनकी मदद के अपनी सुरक्षा व्यवस्था भी बहाल नहीं रख सकता.
तोकायेव ने विरोध प्रदर्शनों को पूरी तरह से कुचल देने का निश्चय किया और दंगा करने वालों को चरमपंथी कहा.
साथ ही इन पर क़ाबू पाने के लिए बाहर से सुरक्षाबलों को बुलाया. सरकार ने यदि देश की व्यवस्था में सुधारों की प्रकिया को अपनाने के बजाय नीतियों को सख़्त करने की कोशिश की, तो पश्चिम के समर्थक होने का आख़िरी भ्रम भी ध्वस्त हो जाएगा.
नर्गिस कासेनोवा हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में डेविस सेंटर फ़ॉर रशियन एंड यूरेशियन स्टडीज़ से जुड़ी हैं. उन्होंने इस देश के बारे में लिखा, "हमारे यहां कॉस्मोपोलिटन रईस वर्ग बहुत बड़ा है और उनमें से अधिकांश रूस-बेलारूस की तरह के दमन और अलगाव को पसंद नहीं करते."
हालांकि, देश अब उस मुक़ाम पर आ खड़ा हुआ है, रईस वर्ग इन दावों को अब अलविदा कह सकता है.
कासेनोवा ने चेतावनी देते हुए कहा, "कज़ाख़स्तान के सिस्टम में गंभीर समस्याएं हैं और अब उनके हल को बाद में ढूंढ़ा नहीं जा सकता. अब हर जगह का हर शख़्स इसे समझ रहा है."
नज़रबायेव दशकों से लोगों से ख़ुशहाली और समृद्धि का वादा करते रहे हैं, लेकिन उनकी सफलताएं बेहद मामूली हैं.
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