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अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान अफ़ीम को लेकर क्या सोचता है?
- Author, सिकंदर किरमानी
- पदनाम, अफ़ग़ानिस्तान, बीबीसी न्यूज़
दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान के एक गाँव के छोटे से कमरे में प्लास्टिक की बोरियों में बंद सफ़ेद क्रिस्टल चमक रहे हैं. इन बोरियों में "निर्यात की गुणवत्ता" वाले मेथामफ़ेटामाइन (ख़तरनाक लत वाला एक ड्रग) भरे पड़े हैं.
इसकी ऑस्ट्रेलिया जैसे सुदूर देश में तस्करी की जाएगी. ऐसा होने पर इस कमरे में रखे 100 किलोग्राम के मेथ से क़रीब 20 करोड़ भारतीय रुपए मिल जाएंगे.
अफ़ग़ानिस्तान में ड्रग्स का करोबार बहुत फैला हुआ है. देश में तालिबान का राज आ जाने के बाद यह तेज़ी से फलने-फूलने लगा है. वह लंबे समय से हेरोइन के उत्पादन के लिए जाना जाता है. लेकिन अफ़ग़ानिस्तान पिछले कुछ सालों में क्रिस्टल मेथ का भी एक अहम उत्पादक बनकर उभरा है.
इस धंधे से जुड़े एक सूत्र ने बताया कि देश के दक्षिण-पश्चिम के एक ज़िले में इस ड्रग के 500 से अधिक अस्थायी "कारखाने" काम कर रहे हैं. इनसे अब हर रोज़ क़रीब 30 क्विंटल क्रिस्टल मेथ तैयार हो रहा है.
क्रिस्टल मेथ दे रहा है हेरोइन को टक्कर
ड्रग के रूप में मेथ की तरक़्क़ी को एक खोज ने काफ़ी बढ़ाया है. असल में स्थानीय स्तर पर "ओमान" नाम का एक आम जंगली पौधा होता है. इसे एफेड्रा नाम से भी जानते हैं. इससे एफेड्रिन तैयार की जा सकती है, जो मेथमफ़ेटामाइन ड्रग तैयार करने का मुख्य सामान है.
रेगिस्तान के भीतर मौजूद एक बाज़ार अफ़ग़ानिस्तान के मेथ व्यापार की मुख्य जगह है. वहाँ बिक्री के लिए एफेड्रा पौधों के कई बड़े टीले लगे हैं. पहले ऐसे हालात कभी नहीं देखे गए.
तालिबान पहले एफेड्रा पौधों पर कर लगाता था. लेकिन हाल में उसने एक फ़रमान जारी किया कि अब से इसकी खेती पर प्रतिबंध रहेगा. उसके इस आदेश को बहुत प्रचारित नहीं किया गया.
फ़िलहाल मेथ बनाने वाले लैब काफ़ी व्यस्त हैं. इस धंधे में शामिल एक अफ़ग़ान ने हमें हंसते हुए बताया कि एफेड्रा पर प्रतिबंध लगाने से मेथ का थोक मूल्य रातोरात दोगुना हो गया. हालांकि मेथ का उत्पादन करने वाले एफेड्रा के पौधों से गोदाम भरे हुए थे.
अफ़ग़ानिस्तान में ड्रग कारोबार के बारे में डॉ. डेविड मैन्सफील्ड बड़े जानकार माने जाते हैं. उन्होंने इस काम में शामिल लैब की पहचान करने के लिए उपग्रह से मिलने वाली तस्वीरों का सहारा लेकर मेथ उत्पादन में हो रही वृद्धि का पता लगाया है.
उन्होंने बताया कि एफेड्रा पर प्रतिबंध ऐसे समय लगाए गए, जब इसकी फसल तैयार हो गई थी. वो कहते हैं, "इसलिए इस प्रतिबंध का वास्तविक प्रभाव अगले साल के जुलाई तक भी महसूस नहीं होगा."
मेथ का उत्पादन हेरोइन से अधिक
डॉ. मैन्सफील्ड का मानना है कि अफ़ग़ानिस्तान में इस समय जितनी मेथ पैदा हो रही है, वो वहां तैयार होने वाले हेरोइन से भी ज़्यादा है. अफ़ग़ानिस्तान में पहले से ही अफ़ीम का उत्पादन ख़ूब हो रहा है. हाल ये है कि वहाँ के खेतों में पैदा होने वाले अफ़ीम की मात्रा के दुनिया के कुल उत्पादन का क़रीब 80 फ़ीसदी होने का अनुमान है.
पिछले कुछ हफ़्तों से, अफ़ग़ानिस्तान के किसान अफ़ीम की खेती के लिए अपने खेतों को तैयार करने और उसे बोने में व्यस्त हैं. कंधार के पास अपना खेत जोत रहे एक किसान मोहम्मद ग़नी ने बताया, "हम जानते हैं कि ये हानिकारक है. लेकिन हम जिन दूसरी फ़सलों की खेती करते हैं, उससे हमें ज़्यादा आय नहीं होती."
इस साल देश में तालिबान के क़ब्ज़े के बाद अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने देश को मिल रहे किसी भी तरह की मदद को बंद कर दिया. इससे अफ़ग़ानिस्तान की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है. ऐसे में कई किसानों को अफ़ीम सबसे सुरक्षित विकल्प लगता है. उनका कहना है कि भयंकर सूखा पड़ने से जलस्तर में हो रही गिरावट भी दूसरी फसलों को उपजाने से रोकती है.
ग़नी बताते हैं, "हमें यदि भिंडी या टमाटर उपजाना हो, तो इसके लिए कुआं खोदना होगा और तब लागत का आधा भी वसूल नहीं हो पाएगा."
अटकलें लगाई जा रही हैं कि तालिबान शासन देश में अफ़ीम की खेती पर ज़ल्द ही रोक लगा देगा. इससे क़ीमतें बढ़ रही है. इससे प्रोत्साहित होकर कई और किसान अफ़ीम की खेती करने लगे हैं.
तालिबान राज में ड्रग डीलर हो गए 'आज़ाद'
फ़िलहाल अफ़ीम का कारोबार फल-फूल रहा है. भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों को घूस देने वाले और गुपचुप तरीक़े से अफ़ीम के काले पेस्ट की बोरियां बेचने वाले अफ़ीम डीलरों ने बाज़ारों में अब दुकान सजा लिए हैं.
अफ़ीम के एक थोक कारोबारी ने मुस्कराते हुए बताया, "जब से तालिबान ने देश को आज़ाद किया, हम भी पूरी तरह से आज़ाद हो गए हैं."
हालांकि तालिबान अभी भी इसके कारोबार को लेकर संवेदनशील है. हेलमंद प्रांत में बीबीसी को उन्होंने एक बड़े और कुख्यात अफ़ीम बाज़ार को फ़िल्माने से रोक दिया और कहा कि यह "प्रतिबंधित क्षेत्र" है.
बीबीसी ने इस बारे में प्रांतीय सांस्कृतिक आयोग के मुखिया हाफ़िज़ राशिद से बात की और पूछा कि उसे फ़िल्माने से क्या इसलिए रोका गया कि मुनाफ़ा कमाने में तालिबान के लोग भी शामिल थे. ऐसा कहते ही उन्होंने इंटरव्यू को अचानक से ख़त्म कर दिया और धमकी दी कि कैमरे से फुटेज़ डिलीट करो, नहीं तो कैमरा तोड़ दिया जाएगा.
वहीं पास के कंधार में शुरू में हमें एक अफ़ीम के बाज़ार को फ़िल्माने की अनुमति दी गई. लेकिन जब वहां गया तो बताया कि ऐसा करना संभव नहीं है.
इस बारे में काबुल में तालिबान के प्रवक्ता बिलाल करीमी ने बीबीसी को बताया, ''तालिबान किसानों के लिए अफ़ीम का "विकल्प खोजने की कोशिश कर रहा है. हम उन्हें कुछ और दिए बिना उन्हें ऐसा करने से नहीं रोक सकते."
बिना विकल्प के ड्रग पर रोक लगाना है काफ़ी मुश्किल
लोगों तालिबान ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान अफ़ीम पर प्रतिबंध लगा दिया था. हालांकि सरकार से बाहर रहने के दौरान यह कारोबार उनके लिए आमदनी का एक बड़ा स्रोत बन गया था. वैसे इस बात का उन्होंने सार्वजनिक तौर पर हमेशा खंडन किया है.
अफ़ीम का कारोबार करने वाले कई कारोबारियों का मानना है कि यदि तालिबान चाहे तो फिर से ड्रग पर प्रभावी प्रतिबंध लागू हो सकता है. हालांकि दूसरे लोगों को संदेह है कि तालिबान फिर ऐसा करेगा.
एक किसान ने ग़ुस्से से कहा, ''आज जो उनके पास है, उसे उन्होंने अफ़ीम की बदौलत हासिल किया है. हम उन्हें अफ़ीम पर प्रतिबंध लगाने नहीं देंगे, जब तक कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अफ़ग़ानों की मदद नहीं करता. नहीं तो हम भूखे रह जाएंगे और अपने परिजनों का पेट नही पाल पाएंगे."
अफ़ग़ानिस्तान के कई हिस्सों में ड्रग उद्योग स्थानीय अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है.
हेलमंद में गांवों के एक समूह गंडम रेज में केवल धूल भरे बजरी के रास्ते से जा सकते हैं. लेकिन ये जगह दुनिया के हेरोइन कारोबार के लिहाज से एक अहम स्थान है. यहां केवल अफ़ीम बेचने के लिए काफ़ी संख्या में दुकान और कारखाने हैं.
यहां के हर कारखाने में 60-70 लोग हेरोइन को प्रोसेस करने में लगे हैं. इसकी तस्करी पाकिस्तान और ईरान में होती है. उसके बाद ये तस्करी होकर पश्चिम में यूरोप और दुनिया के बाक़ी हिस्सों में जाती है.
यूरोप जाते जाते ड्रग हो जाता है 50 गुना महंगा
वहाँ के एक स्थानीय सूत्र ने बताया कि निर्यात होने वाले हेरोइन की क़ीमत क़रीब 90 हज़ार रुपए प्रति किलोग्राम होती है. लेकिन ब्रिटेन के एक पूर्व ड्रग तस्कर ने बीबीसी को बताया कि ब्रिटेन पहुँचते-पहुँचते इसकी क़ीमत बढ़कर क़रीब 50 लाख रुपये प्रति किलोग्राम हो जाती है.
इस तरह से हेरोइन के इस बढ़े हुए दाम का अधिकांश हिस्सा ड्रग्स की ढुलाई करने वालों की जेब में चला जाता है. हालांकि तालिबान हेरोइन उत्पादकों पर कर लगाता है.
डॉ. मैन्सफील्ड बताते हैं, ''ड्रग्स से तालिबान को जो कमाई होती है, उसे अक्सर बढ़ाकर बताया जाता है. इससे होने वाली आय दूसरे स्रोतों की तुलना में कम होती है. उनका अनुमान है कि तालिबान को 2020 ड्रग पर लगाए गए कर से क़रीब 26 करोड़ भारतीय रुपये मिला, जो उनके लिए बहुत अहम था. तालिबान जब पहली बार सत्ता में थे, तब उन्हें ड्रग्स वो भी केवल अफ़ीम पर प्रतिबंध लगाने में छह साल लग गए.''
अफ़ग़ान अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति को देखते हुए डॉ. मैन्सफील्ड का मानना है कि तालिबान ऐसा शायद ही करें. उनके अनुसार, ऐसा करने का मतलब अपने समर्थक रह चुके लोगों को सत्ता में आने के बाद दंडित करने जैसा होगा.
हालांकि तालिबान के प्रवक्ता बिलाल करीमी ने बीबीसी को बताया कि ड्रग का उत्पादन बंद करने से अफ़ग़ानिस्तान और अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोनों को मदद मिलेगी, लिहाज़ा दुनिया को भी इसमें मदद करनी चाहिए.
अफ़ग़ानिस्तान में भी काफ़ी है खपत
ऐसा नहीं है कि अफ़ग़ानिस्तान के ड्रग्स का कारोबार केवल निर्यात के सहारे चल रहा है. देश में भी इसकी ख़ासी खपत होती है और इसका अफ़ग़ान आबादी पर काफ़ी विनाशकारी प्रभाव पड़ा है.
राजधानी काबुल के बाहरी इलाक़े के की एक व्यस्त सड़क पर कई लोग छोटे-छोटे समूह बनाकर क्रिस्टल मेथ और हेरोइन का सेवन करते हुए मिले.
एक आदमी ने बताया, "अब अफ़ग़ानिस्तान में इस ड्रग्स के बनने से यह सस्ता हो गया है. पहले यह ईरान से आता था और तब एक ग्राम मेथ क़रीब 1,500 अफ़ग़ानी (1,100 भारतीय रुपये) में आता था. इसकी क़ीमत अब घटकर 30 से 40 अफ़ग़ानी (20 से 30 रुपये) रह गई है."
वहां का हाल काफ़ी ख़राब है. कुछ लोग तो नालियों में गिरे रहते हैं. एक दूसरे आदमी ने बताया, ''एक कुत्ता भी ऐसे नहीं जी सकता, जैसे कि हम यहाँ जीते हैं.''
तालिबान अक्सर लत लगे लोगों के घेरकर उन्हें पुनर्वास केंद्र भेज देते हैं, लेकिन वे फिर लौटकर सीधा यहीं आ जाते हैं.
फ़िलहाल और अधिक ड्रग्स अफ़ग़ानिस्तान और विदेश में बाज़ार में उतरने को तैयार है.
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