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अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान नेता अनस हक्कानी ने बीबीसी से कहा, सभी पक्षों को एक-दूसरे को माफ़ कर देना चाहिए
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के एक वरिष्ठ सदस्य अनस हक्कानी ने दो दशक तक चले संघर्ष में शामिल दोनों पक्षों से एक-दूसरे को माफ़ करने की अपील की है.
हालांकि हक्कानी नेटवर्क के प्रमुख अनस हक्कानी ने एक इंटरव्यू में बीबीसी से कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में संघर्ष की बड़ी वजह अमेरिका है. उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों को इस बात का दुख है कि इस संघर्ष में बहुत लोगों की जान गई है.
उन्होंने कहा, "हमने कभी 'हक्कानी नेटवर्क' नाम का इस्तेमाल नहीं किया है. ये अफ़ग़ानिस्तान के इस्लामिक अमीरात को बांटने की अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए की योजना का हिस्सा था."
अनस हक्कानी ने कहा कि तालिबान आंदोलन में हक्कानी नेटवर्क की अर्ध स्वायत्त भूमिका थी और इस बात का उसे गर्व है कि अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका के नेतृत्व वाली सेनाओं को बाहर निकालने में वो अहम भूमिका निभा सका है.
उन्होंने कहा, "ये बात सच है कि विदेशियों से लड़ाई करने में हम शामिल रहे हैं और हम इस बात को मानते हैं. हर अफ़ग़ान नागरिक को इस पर गर्व होना चाहिए. इसी लड़ाई के कारण हम यहां से विदेशियों को निकालने में सक्षम हो पाए हैं. ये भी स्वाभाविक है कि युद्ध में जानोमाल का नुक़सान होता है. दोनों ही पक्षों के साथ ऐसा हुआ है और सभी इसके लिए दुखी है."
"हमें इस बात से कोई खुशी नहीं है और हम संघर्ष में शामिल सभी पक्षों से एक-दूसरे को माफ़ करने की अपील करते हैं. ये युद्ध का हिस्सा है. हम बता दें कि इस युद्ध का कारण हम नहीं थे, बल्कि अमेरिका था."
इस साल अगस्त में तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया था जिसके बाद वहां की घरेलू सुरक्षा का ज़िम्मा हक्कानी नेटवर्क को सौंप दिया गया था.
अनस हक्कानी इस नेटवर्क के जानेमाने नेता जलालुद्दीन हक्कानी के बेटे हैं. जदरान क़बीले से संबंध रखने वाले जलालुद्दीन हक्कानी दुनिया के मोस्ट वॉन्टेड चरमपंथियों में शुमार रहे हैं.
1979 में जब सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया, तब हक्क़ानी एक ऐसे मुजाहिदीन के तौर पर उभरे जिन्होंने सोवियत सेनाओं की नाक में दम कर दिया. अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए उस समय बड़ी खुशी से पाकिस्तानी सेना के जरिए जलालुद्दीन हक्कानी और उनके जैसे मुजाहिदीनों को आर्थिक और सामरिक मदद दे रही थी.
सीआईए और आईएसआई की मदद से हक्कानी नेटवर्क अफ़ग़ानिस्तान में अनुभवी और दक्ष लड़ाकों का एक समूह बन गया था. मगर 1990 के दशक की शुरुआत में जब सोवियत संघ का विघटन और अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का उदय हुआ, अमरीका और उसके सहयोगियों ने हक्कानी से दूरी बनाना शुरू कर दिया.
मगर बावजूद इसके हक्कानी नेटवर्क का प्रभाव कम नहीं हुआ. अफ़ग़ानिस्तान में जब एक तरफ़ तालिबान था और दूसरी तरफ अल कायदा, तब भी हक्कानी नेटवर्क का अपना अलग अस्तित्व रहा.
11 सितंबर, 2001 को ट्विन टावर पर हुए हमले के लिए अमरीका ने अल कायदा को ज़िम्मेदार बताते हुए अफ़ग़ानिस्तान में अभियान चलाने का एलान किया. इसी दौरान जलालुद्दीन हक्कानी तालिबान के शीर्ष नेता के तौर पर आख़िरी बार पाकिस्तान की आधिकारिक यात्रा पर आए मगर इस्लामाबाद से वह लापता हो गए.
कुछ महीनों बाद वह वज़ीरिस्तान में सामने आए. यहीं से अब उन्होंने कुछ समय पहले तक अपने सहयोगी रहे अमरीका के खिलाफ अभियान का एलान किया था.
अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी अभियान ने अल कायदा, तालिबान और हक्कानी नेटवर्क को एक-दूसरे के क़रीब लाकर रख दिया. इसी के साथ हक्कानी मोस्ट वॉन्टेड चरमपंथी बन गए.
ISIS-K के तीन नेताओं को अमेरिका ने घोषित किया 'ग्लोबल टेररिस्ट'
इससे पहले अमेरिका के विदेश विभाग ने अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामिक स्टेट की शाखा इस्लामिक स्टेटे खुरासान के तीन सदस्यों को ग्लोबल टेररिस्ट घोषित कर दिया है.
अमेरिका के दूतावास की तरफ़ से जारी बयान में कहा गया है कि अमेरिकी सरकार अपनी सभी आतंकवाद विरोधी क्षमताओं का इस्तेमाल कर ये सुनिश्चित करेगी कि अफ़ग़ानिस्तान फिर से अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का प्लेटफार्म न बन पाए.
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ये लोग अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामिक स्टेट के अभियान संचालित कर रहे हैं. तालिबान के अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा करने के बाद से इस्लामिक स्टेट ने कई बड़े हमले किए हैं.
सलनाउल्लाह गफ़ारी को इस्लामिक स्टेट का नेता या अमीर बताया गया है जबकि सुल्ताम आज़म को समूह का प्रवक्ता बताया गया है. काबुल में हाल में हुए हमलों के लिए मौलवी रजाब को ज़िम्मेदार बताया गया है. इन लोगों को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किए जाने के बाद इनके साथ किसी भी तरह का वित्तीय लेनदेन अवैध होगा.
अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये है कि अफ़ग़ानिस्तान में इस समय उनकी सैन्य मौजूदगी नहीं है. इसी वजह से चरमपंथी संगठनों के लिए वहां फिर से संगठित होना आसान हो गया है.
अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामिक स्टेट की स्थापना साल 2015 में हुई थी और तालिबान के देश पर नियंत्रण करने के बाद भी इस्लामिक स्टेट कई बड़े हमले करने में कामयाब रहा है और बड़ा ख़तरा बना हुआ है.
वहीं तालिबान के एक वरिष्ठ नेता ने तालिबान के लड़ाकों के पाला बदलकर इस्लामिक स्टेट में शामिल होने की रिपोर्टों को खारिज किया है.
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