तालिबान की तिजोरी खाली, अमेरिका सख़्त; पाकिस्तान, तुर्की, यूरोप तक आँच, चीन-रूस से बनेगी बात

तालिबान के कब्ज़े के बाद से आर्थिक संकट में घिरे अफ़ग़ानिस्तान की आर्थिक चुनौतियां आने वाले दिनों में और भी गंभीर हो सकती है. अमेरिका ने एक बार फिर साफ़ कर दिया है कि उसका तालिबान के 'फ्ऱीज़ फंड' को रिलीज़ करने का कोई इरादा नहीं है.

इस बीच, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने चेतावनी दी है कि अगर अफ़ग़ानिस्तान को तुरंत सहायता नहीं मिली तो स्थिति 'बेहद गंभीर' हो सकती है और अफ़ग़ानिस्तान के आर्थिक संकट का असर पाकिस्तान, ताजिकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों से लेकर तुर्की और यूरोप तक की मुश्किल बढ़ा सकता है.

अफ़ग़ानिस्तान को काफी बड़ी मात्रा में विदेशी सहायता मिलती थी. ब्रिटेन की सरकार का अनुमान है कि ओईसीडी (ऑर्गनाइजेशन फॉर इकॉनमिक कॉपरेशन एंड डेवलपमेंट) देशों ने साल 2001 से 2019 के बीच अफ़ग़ानिस्तान को 65 अरब अमेरिकी डॉलर का दान किया था.

कारोबारी रास्ते से इसमें से एक बड़ी रकम ईरान, पाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान तक पहुंची थी. अब इन देशों तक कारोबारी फ़ायदा तो नहीं ही पहुंच रहा है, आशंका ये है कि अफ़ग़ानिस्तान के बदहाल होने से इनकी परेशानी खासी बढ़ सकती है.

मददगार चीन-रूस

तालिबान ने 15 अगस्त को काबुल पर कब्ज़ा किया था. तब से अफ़ग़ानिस्तान की तमाम दौलत और संसाधन ज़ब्त हो चुके हैं. मानवीय मदद के अलावा देश को मिलने वाली तमाम सहायता पर रोक लगी हुई है.

कहीं से भी नकदी और दूसरी रकम नहीं मिल पा रही है. अफ़ग़ानिस्तान की तिजोरी पूरी तरह खाली हो गई है.

अमेरिका का ज़ब्त फंड देने से इनकार और आईएमएफ़ की चेतावनी ऐसे दौर में सामने आई हैं जब रूस मॉस्को में तालिबान के साथ एक वार्ता की मेजबानी कर रहा है. इसे 'मॉस्को फॉर्मेट' नाम दिया गया है.

इस बैठक में चीन और पाकिस्तान समेत 10 देशों के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं लेकिन अमेरिका इसमें हिस्सा नहीं ले रहा है.

अफ़ग़ानिस्तान में लाखों लोग गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं. मदद मुहैया कराने वाली कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान के लोगों तक तुरंत सहायता पहुंचाया जाना ज़रूरी है.

रूस के विदेश मंत्री ने कहा है कि उनका देश चीन और पाकिस्तान को साथ लेकर अफ़ग़ानिस्तान की मदद करना चाहता है. लेकिन अभी उनका तालिबान को मान्यता देने का इरादा नहीं है. ऐसे में मदद कितनी और किस सूरत में होगी, ये साफ़ नहीं है.

अमेरिका ने क्या कहा?

उधर, बीबीसी की पश्तो सेवा के मुताबिक अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान की ज़ब्त की गई रकम तालिबान को लौटाने से एक बार फिर मना कर दिया है. ये रकम अफ़गानिस्तान की करेंसी में है.

इसकी कीमत अरबों डॉलर है और इसका बड़ा हिस्सा अमेरिका में है. तालिबान की ओर से इस रकम को दिए जाने की माँग लगातार की जाती रही है.

अमेरिका के उप वित्त मंत्री के हवाले से बताया गया है कि उनके देश की राय है कि तालिबान पर पाबंदियाँ जारी रखना ज़रूरी है. हालांकि, अमेरिका मानवीय सहायता पहुंचाने के हक़ में है.

अमेरिका के वित्त मंत्रालय ने कहा, " हमारा लक्ष्य तालिबान शासन और हक़्कानी नेटवर्क पर पाबंदी बनाए रखने का है लेकिन हम चाहते हैं कि मानवीय सहायता मिलती रहे. "

यही मंत्रालय अमेरिका की ओर से दूसरे देशों और लोगों पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों में प्रमुख भूमिका निभाता है.

इस बीच ये आशंका भी जाहिर की जा रही है कि अमेरिका की ओर से लगाई गई पाबंदियाँ अफ़ग़ानिस्तान की दिक्कतें बढ़ा सकती हैं और वहां बड़ा मानवीय संकट खड़ा हो सकता है.

अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का कहना है कि वो तालिबान शासन को मान्यता नहीं देना चाहते लेकिन दिक्कतों से जूझ रहे अफ़ग़ानिस्तान के लोगों की मदद करना चाहते हैं.

करीब एक महीने पहले अमेरिका ने मानवीय मदद मुहैया कराने वाली संस्थाओं और गैर सरकारी संगठनों को अफ़ग़ानिस्तान में मानवीय मदद का सामान पहुँचाने की इजाज़त दी थी. इसका तालिबान ने स्वागत किया था.

आईएमएफ़ की चेतावनी

उधर, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान की आर्थिक दिक्कतें प्रवासी संकट को बढ़ा सकती है. अफ़ग़ानिस्तान के पड़ोसी देशों से लेकर तुर्की और यूरोप तक इसका असर देखने में आ सकता है.

आईएमएफ़ ने आगाह किया है कि इस साल अर्थव्यवस्था का आकार 30 फ़ीसदी तक सिकुड़ सकता है. इसकी वजह से लाखों लोग ग़रीबी रेखा के नीचे जा सकते हैं और मानवीय संकट और भी गंभीर हो सकता है.

आईएमएफ़ ने आगाह किया है कि इस स्थिति का असर अफ़ग़ानिस्तान के पड़ोसियों पर भी होगा. क्योंकि उन्हें अफ़ग़ानिस्तान के साथ कारोबारी रिश्तों की वजह से बड़ी रकम हासिल होती रही है.

अपने अनुमान को जाहिर करते हुए आईएमएफ़ ने कहा है,"जो देश अफ़ग़ानिस्तान के शरणार्थियों को आने दे रहे हैं, वहां नागरिकों के संसाधनों पर बोझ बढ़ सकता है. मजदूरों के सामने काम का संकट हो सकता है और सामाजिक तनाव की स्थिति बन सकती है."

आईएमएफ़ ने कहा है कि स्थिति संभालनी है तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अफ़ग़ानिस्तान तक तुरंत मदद पहुँचानी चाहिए.

पाकिस्तान-ईरान के खजाने पर कितना बोझ

अभी ये साफ़ नहीं है कि अफ़ग़ानिस्तान के कितने शरणार्थी दूसरे देशों में जाएंगे.

आईएमएफ़ का कहना है कि अगर दस लाख और शरणार्थी हुए तो ताजिकिस्तान के लिए उन्हें अपने यहां रखने के लिए 1000 लाख डॉलर (करीब साढ़े सात अरब रुपये) की ज़रूरत होगी. ईरान को 3000 लाख डॉलर (साढ़े 22 अरब रुपये) और पाकिस्तान को 5000 लाख डॉलर (करीब 37 अरब रुपये) चाहिए होंगे.

बीते महीने ताजिकिस्तान ने कहा था कि वो अफ़ग़ानिस्तान के और अधिक शरणार्थियों को अपने यहां जगह नहीं दे सकता है. ख़ासकर तब तक जब तक कि उसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आर्थिक मदद नहीं मिलती है. मध्य एशिया के दूसरे देशों ने भी साफ़ कर दिया है कि अफ़ग़ानिस्तान के शरणार्थियों को अपने यहां जगह देने का उनका कोई इरादा नहीं है.

तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने जी-20 के सम्मेलन में कहा था कि वो अफ़ग़ानिस्तान के शरणार्थियों को अपने यहां आने देने के लिए तैयार नहीं हैं.

उन्होंने कहा कि उनके देश में पहले से 36 लाख सीरियाई शरणार्थी हैं और तुर्की एक बार फिर शरणार्थियों की एक नई बाढ़ को झेल नहीं पाएगा. तुर्की में इस समय दुनिया की सबसे बड़ी शरणार्थी आबादी रहती है.

आर्थिक दुष्परिणाम रोकने के लिए बीते हफ़्ते जी-20 ने अफ़ग़ानिस्तान की अर्थव्यवस्था में अरबों डॉलर के निवेश की बात की थी.

आईएमएफ़ ने ये भी आगाह किया है कि इस बात की भी चिंता जाहिर की जा रही है कि अफ़ग़ानिस्तान तक जो रकम पहुंचेगी, उसका इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए वित्त मुहैया कराने में हो सकता है.

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