अफ़ग़ान युद्ध से इन कंपनियों ने कमाया अरबों का मुनाफ़ा

    • Author, आंखेल बेर्मुदेज़
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ मुंडो

अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका ने अपनी सबसे लंबी और ख़र्चीली लड़ाई लड़ी. इस लड़ाई का अंत 30 अगस्त को हुआ जब आखिरी अमेरिकी सैनिक ने काबुल छोड़ा.

ब्राउन यूनिवर्सिटी के 'कॉस्ट ऑफ़ वॉर' प्रोजेक्ट के मुताबिक अमेरिकी ख़ज़ाने पर इस युद्ध का बोझ 2.3 अरब डॉलर आया.

अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका की वापसी के बाद तालिबान की बढ़ती ताक़त, देश पर क़ब्ज़े और अफ़रा-तफ़री के माहौल को कई विशेषज्ञों ने अमेरिका की हार बताया.

लेकिन कुछ लोगों के लिए ये भले ही हारी हुई लड़ाई हो सकती है, लेकिन कई लोगों के लिए ये मुनाफ़े का सौदा रही.

साल 2001 से 2021 के बीच इस युद्ध में ख़र्च हुए 2.3 अरब डॉलर में क़रीब 1.05 अरब डॉलर अफ़ग़ानिस्तान में रक्षा मंत्रालय के अभियानों को पूरा करने में ख़र्च किए गए.

इस राशि का एक बड़ा हिस्सा उन निजी कंपनियों की सेवाओं पर ख़र्च किया गया जिन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी अभियानों में सहयोग किया था.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया में कैनेडी स्कूल ऑफ़ गर्वनेंस की प्रोफ़ेसर लिंडा बिल्म्स कहती हैं, "इस लड़ाई में अमेरिकी सैनिकों की संख्या बहुत ज़्यादा नहीं थी. सारे वॉलंटियर सैन्य ठेकेदारों (कॉन्ट्रैक्टर्स) ने मुहैया कराए थे. अमेरिकी सैनिकों की तुलना में वहां ठेके (कॉन्ट्रैक्ट) पर काम करने वालों की संख्या दोगुनी थी."

लिंडा बिल्म्स ने बीबीसी मुंडो को बताया कि अफ़ग़ानिस्तान भेजे जाने वाले सैनिकों की संख्या राजनीतिक तौर पर सीमित की गई थी और इसी आधार पर ठेकेदारों की संख्या भी तय की जाती थी.

वह बताती हैं, "वहां ठेकेदार कई तरह के काम करते थे जैसे हवाई जहाज़ में ईंधन भरना, ट्रक चलाना, खाना बनाना, सफ़ाई करना, हेलिकॉप्टर चलाना और सभी तरह के उपकरण और सामग्री को लाना-ले जाना. वो सैन्य ठिकानों, हवाई अड्डों, रनवे आदि का भी निर्माण करते थे."

इन पांच कंपनियों को सबसे ज़्यादा फ़ायदा

अमेरिका और अन्य देशों की 100 से ज़्यादा कंपनियों को अफ़ग़ानिस्तान में सभी तरह की सेवाओं के लिए अमेरिका के रक्षा मंत्रालय से ठेके मिले थे. इनमें से कुछ कंपनियों ने अरबों डॉलर भी कमाए.

'20 ईयर्स ऑफ़ वॉर' प्रोजेक्ट की निदेशक प्रोफ़ेसर हेदी पेल्टियर 'कॉस्ट ऑफ़ वॉर' प्रोजेक्ट का भी हिस्सा हैं.

उन्होंने बीबीसी मुंडो को बताया कि ऐसा कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है जिससे ये पता चले कि किन कंपनियों को सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ है. लेकिन, उन्होंने प्रोजेक्ट के अनुमान बीबीसी मुंडों के साथ साझा किए जो अभी तक छपे नहीं हैं.

ये अनुमान अमेरिकी सरकार की वेबसाइट usaspending.gov पर उपलब्ध डेटा की समीक्षा के आधार पर तैयार किए गए हैं. ये डेटा अमेरिकी सरकार के ख़र्च की आधिकारिक जानकारी देता है जो 2008 के वित्तीय संकट के बाद तैयार किया गया है.

हेदी पेल्टियर कहती हैं, "ये आंकड़े मुख्यतौर पर 2008 से 2021 तक की अवधि पर आधारित हैं. हालांकि, कुछ एक प्रोजेक्ट 2008 से पहले के हैं. ऐसे में साल 2001 से देखें तो असल आंकड़े और ज़्यादा हो सकते हैं."

इन अनुमानों के मुताबिक अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका की शीर्ष तीन ठेकेदार कंपनियां डाइनकॉर्प, फ़्लूअर और केलॉग ब्राउन एंड रूट (केबीआर) हैं.

इन कंपनियों को ये ठेके 'लॉजिस्टिक्स इनक्रीज़ प्रोग्राम विद सिविलियन पर्सनेल (लॉगकैप)' के हिस्से के तौर पर दिए गए थे.

हेदी पेल्टियर बताती हैं, "लॉगकैप बहुवर्षीय व्यापक ठेके हैं जो लॉजिस्टिक्स, प्रबंधन, परिवहन, उपकरण और हवाई जहाज़ के रखरखाव और सहयोग में कई सेवाओं के मौके देते हैं."

डाइनकॉर्प

डाइनकॉर्प के कई कामों में से एक अफ़ग़ानिस्तान की पुलिस और नशारोधी बलों को उपकरण और प्रशिक्षण मुहैया करना था. हामिद करज़ई के अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति रहते कंपनी उन्हें बॉडीगार्ड भी उपलब्ध कराती थी.

हेदी पेल्टियर की गणना के मुताबिक डाइनकॉर्प को 14.4 अरब डॉलर के ठेके मिले जिसमें लॉगकैप के 7.5 अरब डॉलर शामिल हैं.

डाइनकॉर्प को हाल ही में अमेंटम कंसॉर्शियम ने अधिकृत किया है.

डाइनकॉर्प के प्रवक्ता ने बीबीसी मुंडों के सवालों पर अपनी गतिविधियों के बारे में बताया, "2002 के बाद से डाइनकॉर्प इंटरनेशनल ने अपने सरकारी क्लाइंट्स और अफ़ग़ानिस्तान में उनके सहयोगियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया."

प्रवक्ता ने कहा कि एक निजी कंपनी होने के कारण वो अपने ठेकों की और अन्य वित्तीय जानकारियां सार्वजनिक नहीं करती.

फ़्लूअर टेक्सस आधारित कंपनी है जो दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैन्य ठिकानों का निर्माणकार्य देखती थी.

कंपनी की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक़ उसने अफ़ग़ानिस्तान में 76 फ़ॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (छोटे सैन्य ठिकाने) भी संचालित किए. एक लाख सैनिकों को सहयोग किया और एक दिन में एक लाख 91 हज़ार से अधिक को खाना दिया.

हेदी पेल्टियर के मुताबिक फ़्लूअर कॉरपोरेशन को 13.5 अरब डॉलर के ठेके मिले जिसमें से 12.6 अरब डॉलर के ठेके लॉगकैप के अनुरूप हैं.

बीबीसी मुंडो ने फ़्लूअर कंपनी से अफ़ग़ानिस्तान युद्ध में उसकी गतिविधियों की जानकारी देने का अनुरोध किया था, लेकिन ये ख़बर प्रकाशित होने तक उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

केबीआर

कैलोग ब्राउन रूट (केबीआर) अमेरिकी सैनिकों की मदद के लिए इंजीनियरिंग और लॉजिस्टिक संबंधी काम देखती थी. कंपनी उन्हें अस्थायी आवास, भोजन और अन्य आधारभूत सेवाएं प्रदान करती थी.

ये कंपनी नेटो के हवाई हमलों के लिए अफ़ग़ानिस्तान में कई हवाई अड्डों को ज़मीनी स्तर पर सहयोग भी देती थी. इसमें रनवे और हवाई जहाज़ों के रखरखाव से लेकर वैमानिकी संचार का प्रबंधन भी शामिल था.

हेदी पेल्टियर के अनुमान के मुताबिक़ केबीआर को अमेरिकी रक्षा मंत्रालय से 3.6 अरब डॉलर के ठेके मिले.

कंपनी के एक प्रवक्ता ने बीबीसी मुंडो से कहा, "केबीआर ने लॉगकैप के तहत एक प्रतिस्पर्धा से मिले कॉन्ट्रैक्ट के ज़रिए साल 2002 से 2010 तक अमेरिकी सेना को अफ़ग़ानिस्तान में सहयोग दिया. ये कॉन्ट्रैक्ट हमने 2001 में हासिल किया था."

कंपनी प्रवक्ता ने बताया, "इस कार्यक्रम के ज़रिए कंपनी ने अमेरिकी सेना के 82 सैन्य ठिकानों को भोजन, लॉन्ड्री, बिजली, सफ़ाई और रखरखाव जैसी सेवाओं का सहयोग दिया. जुलाई 2009 में सेना ने ये कॉन्ट्रैक्ट डाइनकॉर्प और फ़्लूअर को दे दिया जिन्होंने संयुक्त रूप से इस पर काम किया. केबीआर ने साल 2010 में अपनी सेवाएं ख़त्म कीं."

रेथियन

सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली चौथी कंपनी रेथियन थी जो अमेरिका में सबसे बड़ी एयरोस्पेस और रक्षा कंपनियों में से एक है. कंपनी को अफ़ग़ानिस्तान में सेवाओं के लिए 2.5 अरब डॉलर के ठेके मिले.

इसका हालिया असाइनमेंट अफ़ग़ान वायुसेना को प्रशिक्षण देना था जिसके लिए उसे साल 2020 में 14 करोड़ 50 लाख डॉलर का ठेका मिला.

एजिस एलएलसी, वर्जीनिया में स्थित एक सुरक्षा और ख़ुफ़िया कंपनी है. अफ़ग़ानिस्तान में सेवाओं के ज़रिए सबसे ज़्यादा कमाने वाली ये पांचवीं कंपनी है. इसे 1.2 अरब डॉवर के ठेके मिले.

ये काबुल में अमेरिकी दूतावास में सुरक्षा मुहैया कराती थी.

बीबीसी मुंडो ने एजिस से अफ़ग़ानिस्तान में उनकी गतिविधियों के बारे में जानने की कोशिश की, लेकिन इस लेख के छपने तक उनकी तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया था.

डिफेंस कंपनियों का मुनाफ़ा?

बीबीसी मुंडो ने जिन विशेषज्ञों से बात की उन्होंने सहमति जताई कि अमेरिकी डिफ़ेंस कॉन्ट्रैक्टर जैसे बोइंग, रेथियन, लॉकहीड मार्टिन, जनरल डायनामिक्स और नॉर्थरोप ग्रुमैन को अफ़ग़ान युद्ध से बहुत फ़ायदा हुआ.

लिंडा बिल्म्स कहती हैं, "इन्होंने युद्ध से बहुत पैसा कमाया."

हालांकि, ये पता लगा पाना मुश्किल है कि उन्हें कितना पैसा मिला क्योंकि उनके कॉन्ट्रैक्ट सीधे तौर पर अफ़ग़ानिस्तान में चल रहे अभियानों से नहीं जुड़े थे.

हेदी पेल्टियर बताती हैं, "इन सभी को अमेरिका में सामान बनाने के लिए ठेके मिले थे जो अफ़ग़ानिस्तान में इस्तेमाल होना था. ऐसे में ये ख़र्चे अफ़ग़ानिस्तान में हुए ख़र्च में शामिल नहीं हुए."

'कॉस्ट ऑफ़ वॉर' प्रोजेक्ट की इस हफ़्ते जारी हुई एक रिपोर्ट के मुताबिक 9/11 के बाद इन पांच कंपनियों को अमेरिकी सैन्य ख़र्च से सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ है.

रिपोर्ट कहती है, "वित्त वर्ष 2001-2020 के बीच इन पांच कंपनियों को अमेरिकी रक्षा मंत्रालय से 2.1 खरब डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट मिले (2021 डॉलर में गणना की गई)."

बीबीसी मुंडो ने इन पांच कंपनियों से सवाल पूछे कि अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध ने उनके व्यवसाय और अनुबंधों को कैसे प्रभावित किया.

जनरल डायनामिक्स ने कॉमेंट करने से इनकार कर दिया जबकि दूसरों ने ये लेख छपने तक कोई जवाब नहीं दिया था.

हेदी पेल्टियर रेथियन कंपनी का उदाहरण देते हुए बताती हैं कि कंपनी ने 2.5 अरब डॉलर से ज़्यादा कमाया है क्योंकि ये आंकड़ा सिर्फ़ अफ़ग़ानिस्तान में सीधे तौर पर मिले ठेकों का है.

वह कहती हैं, "अगर रेथियन को हथियारों या संचार प्रणाली का अनुबंध मिला है और वो अमेरिका में बने हैं और अफ़ग़ानिस्तान में इस्तेमाल हुए हैं तो वो ठेका अफ़ग़ानिस्तान से जुड़ा हुआ नहीं कहलाएगा."

बोइंग भी एफ़-15 और एफ़-18 लड़ाकू विमान बनाती है. लेकिन बोइंग बड़े कॉन्ट्रैक्टर की सूची में नहीं दिखती.

इसी तरह ब्लैकहॉक हेलिकॉप्टर की निर्माता लॉकहीड मार्टिन भी इस सूची में नहीं है.

लिंडा बिल्म्स कहती हैं, "जनरल डायनामिक्स के मामले में उन्होंने अधिकतर हल्के सैन्य वाहन बनाए और अफ़ग़ानिस्तान में साइबर सिक्योरिटी का काफ़ी काम किया."

बीबीसी मुंडो के सवालों पर पेंटागन की प्रवक्ता जेसिका मैक्सवेल ने इस बात की पुष्टि की कि इन पांच डिफ़ेंस कॉन्ट्रैक्टर्स ने अफ़ग़ानिस्तान में उपकरण और सेवाएं देकर कितना कमाया ये पता लगा पाना मुश्किल है.

उन्होंने कहा, "इसका अनुमान लग पाना असंभव है. रक्षा मंत्रालय इन कंपनियों से कई तरह के उत्पाद और सेवाएं प्राप्त करता है, लेकिन वो सिर्फ़ अफ़ग़ानिस्तान के लिए नहीं होतीं. हम उन्हें दुनिया भर में अभियानों के लिए ख़रीदते हैं. कुछ का इस्तेमाल अफ़ग़ानिस्तान में किया गया है."

क़ीमतों पर एकाधिकार

लिंडा बिल्म्स कहती हैं कि अफ़ग़ान युद्ध में सेवाओं की क़ीमतों के मामले में कंपनियों ने मनमानी की है.

वह कहती हैं, "कई ठेके बिना प्रतिस्पर्धा के दिए गए या उनमें बहुत कम प्रतिस्पर्धा थी. इस तरह की सेवाएं देने वाली बहुत कम कंपनियां हैं, इसलिए कुछ कंपनियों का एकाधिकार हो जाता है."

लिंडा बताती हैं कि कई मामलों में कंपनियां क़ीमतें बढ़ा देती हैं. सेवाओं वाली जगह पर ख़राब सुरक्षा हालात और वहां तक पहुंचने में होने वाली मुश्किलों का हवाला देती हैं.

अफ़ग़ान युद्ध में कॉन्ट्रैक्ट देने के तरीक़े को लेकर रक्षा मंत्रालय की प्रवक्ता ने बताया, "रक्षा मंत्रालय की नीति है कॉन्ट्रैक्ट जितना संभव हो प्रतिस्पर्धा के आधार पर आवंटित करना. हालांकि, अधिकांश हथियार प्रणालियों की उनके विकास के शुरुआती चरणों में निविदा दी गई थी."

लिंडा इसमें भ्रष्टाचार होने की बात भी कहती हैं. उन्होंने बताया, "किसी दीवार पर पेंट करने के लिए 20 गुना दाम लिया जाना अलग बात है, लेकिन पैसे लेना और दीवार पेंट ना करना भ्रष्टाचार है. यानी पेंट करने के लिए कुछ नहीं है फिर भी पैसा रखा गया है."

साथ ही वो बताती हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में सबकॉन्ट्रैक्टर्स को भी काम दिया गया. इसका मतलब है कि मुख्य कॉन्ट्रैक्टर जिसे सरकार से काम मिला था उसने किसी और को ठेका देकर काम पूरा कराया.

लिंडा बिल्म्स के मुताबिक सबकॉन्ट्रैक्टर्स ने कितना पैसा लिया इसका हिसाब नहीं है.

इसे लेकर रक्षा मंत्रालय की प्रवक्ता का कहना है कि देश के नियम और क़ानून "वस्तुओं और सेवाओं की उचित क़ीमतों की गारंटी के लिए एक मज़बूत सुरक्षा प्रणाली प्रदान करते हैं. यहां तक कि उन प्रक्रियाओं में भी जिनमें केवल एक आपूर्तिकर्ता होता है."

कथित भ्रष्टाचार के आरोपों के संबंध में मैक्सवेल का कहना था कि धोखाधड़ी, दुरुपयोग या भ्रष्टाचार के किसी भी सबूत को लेकर रक्षा विभाग के महानिरीक्षक को सूचित किया जाना चाहिए.

द न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार महानिरीक्षक के कार्यालय ने बताया है कि 2008 और 2017 के बीच अमेरिका को अफ़ग़ानिस्तान में पुनर्निर्माण के प्रयासों में दुरुपयोग या धोखाधड़ी के कारण लगभग 15.5 अरब डॉलर का नुक़सान हुआ.

लिंडा बिल्म्स कहती हैं कि युद्ध से एक ही तरह की कंपनी को लाभ नहीं हुआ बल्कि रक्षा उपकरणों से जुड़ी कंपनियों सहित विभिन्न कंपनियों को फ़ायदा हुआ जिनमें लॉजिस्टिक्स से जुड़ी कंपनियां, निर्माण कंपनियां और ईंधन आपूर्तिकर्ता आदि शामिल हैं.

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