अफ़ग़ानिस्तान: फिर दी जाएगी हाथ-पैर काटे जाने की सज़ा- तालिबान के वरिष्ठ अधिकारी

तालिबान के लड़ाके

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तालिबान शासन में धर्म का पालन सुनिश्चित कराने वाले मंत्रालय के प्रमुख रहे मुल्ला नूरूद्दीन तुराबी ने कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में एक बार फिर अपराध के लिए मौत की सज़ा और हाथ-पैर काटने की सज़ा का प्रावधान रखा जाएगा.

दो दशक पहले तालिबान के शासन के दौरान अपराध के लिए कठोर सज़ा देने के लिए जाने जाने वाले मुल्ला नूरूद्दीन फिलहाल अफ़ग़ानिस्तान की जेलों का दायित्व संभाल रहे हैं.

उन्होंने समाचार एजेंसी एपी को बताया कि, "अगर ज़रूरी हुआ तो हाथ-पैर या शरीर के अंग काटने की सज़ा को फिर से लागू किया जाएगा."

उन्होंने कहा कि 1990 के दशक की तालिबान सरकार के दौरान अपराधियों को इस तरह की सज़ा सार्वजनिक तौर पर दी जाती थी, लेकिन नए शासन के दौरान ऐसा नहीं किया जाएगा.

उन्होंने तालिबान के शासन में कठोर सज़ा की आलोचना पर नाराज़गी जताई और कहा कि, "कोई हमें ये न बताए कि हमारे क़ानून क्या होने चाहिए."

इसी साल 15 अगस्त से अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा करने के बाद से तालिबान कहता आया है कि इस बार की उसकी सरकार आम लोगों को कई तरह की रियायतें देगी और सख़्त क़ानून लागू नहीं करेगी. लेकिन देश के कई हिस्सों से मानवाधिकारों के उल्लंघन और लोगों के साथ बर्बर व्यवहार की ख़बरें मिल रही हैं.

काबुल में महिलाएं

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गुरुवार को ह्यूमन राइट्स वॉच ने चेतावनी दी कि "हेरात में तालिबान हाई-प्रोफ़ाइल महिलाओं की तलाश कर रहा है, महिलाओं के घरों से बाहर जाने पर पाबंदी लगा रहा है और उनके पहनावे को लेकर भी प्रतिबंध लगा रहा है."

अगस्त में मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा था कि अल्पसंख्यक हज़ारा समुदाय के नौ लोगों की हत्या के पीछे तालिबान के लड़ाकों का हाथ है.

उस वक़्त एमनेस्टी की महासचिव एग्नेस कैलामार्ड ने कहा था कि "ये बर्बर हत्याएं तालिबान के पुराने शासन की याद दिलाती है और इस बात की ओर इशारा है कि तालिबान का शासन किस तरह की तबाही ला सकता है."

वीडियो कैप्शन, तालिबान की चुनौतियां

90 के दशक में कैसे दी जाती थी सज़ा

तालिबान के अफ़ग़ानिस्तान पर पूरी तरह कब्ज़ा करने के कुछ दिनों पहले बाल्ख़ प्रांत में तालिबान के एक जज हाजी बदरुद्दीन ने बीबीसी संवाददाता सिकंदर किरमानी से कहा था कि वो अपराध के लिए कठोर सज़ा देने के तालिबान के तरीके और इस्लामिक क़ानून की उसकी समझ का समर्थन करते हैं.

उन्होंने कहा था, "हमारे शरिया क़ानून में शादी से पहले सेक्स अपराध है और इसके लिए महिला या पुरुष को सार्वजनिक तौर पर सौ कोड़े लगाने का प्रावधान है. वहीं शादीशुदा लोगों के लिए पत्थर मार कर मौत की सज़ा का प्रावधान है और जो लोग चोरी करते हैं अपराध साबित होने पर उनके हाथ काट देने की बात कही गई है."

तालिबान की ये कट्टरपंथी सोच कुछ रूढ़िवादी संकीर्ण मानसिकता वाले अफ़ग़ानों से मेल खाती है.

हालांकि सत्ता में आने के बाद से तालिबान अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ बेहतर रिश्ते बनाने की कोशिश कर रहा है और अपनी छवि को पहले से बेहतर बना कर पेश कर रहा है. ऐसे में वो रूढ़िवादी संकीर्ण मानसिकता वाले अफ़ग़ानों के साथ तालमेल बैठाने की भी कोशिश कर रहा है.

1990 के दशक में संगीत सुनने वालों या दाढ़ी काटने वालों को सख़्त सज़ा देने के लिए जाने जाने वाले मुल्ला नूरूद्दीन ने कहा कि तालिबान कठोर सज़ा के प्रावधान को बरकरार रखेगा, हालांकि लोगों को टेलीविज़न देखने, मोबाइल फ़ोन इस्तेमाल करने या तस्वीरें और वीडियो बनाने की इजाज़त दी जाएगी.

तालिबान की पहली सरकार के अपने काम के कारण मुल्ला नूरूद्दीन संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंधों की सूची में हैं.

उन्होंने कहा है कि तालिबान सरकार फिलहाल ये चर्चा कर रही है कि इस तरह की सज़ा को सार्वजनिक तौर पर दी जाए या फिर नहीं. उन्होंने कहा कि इसके लिए "एक नीति बनाई जाएगी."

वीडियो कैप्शन, अफ़ग़ानिस्तान में कई जगहों पर तालिबान के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शन, कई प्रदर्शनकारी हिरासत में.

1990 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान में अपराधियों को सार्वजनिक तौर पर ईदगाह मस्जिद के पास के मैदान में या फिर काबुल स्पोर्ट्स स्टेडियम में सज़ा दी जाती थी.

उस वक्त मुल्ला नूरूद्दीन धर्म का पालन सुनिश्चित करने वाले पुण्य के प्रचार और पाप को रोकने के मंत्रालय के प्रमुख हुआ करते थे और न्याय मंत्री भी थे.

अपने इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "स्टेडियम में सज़ा देने के हमारे नियम की सभी आलोचना करते हैं लेकिन हमने कभी किसी और के नियमों और क़ानूनों पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं की."

वीडियो कैप्शन, पीएम मोदी के बयान पर क्या बोला तालिबान?

संयुक्त राष्ट्र में बोलने की अनुमति चाहता है तालिबान

इसी सप्ताह तालिबान से अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की थी कि उसे न्यूयॉर्क में आयोजित होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा में बोलने की अनुमति दी जाए.

इसके जवाब में जर्मनी के विदेश मंत्री हीको मास का कहना था कि तालिबान के साथ बातचीत जारी रखना बेहद ज़रूरी है लेकिन "इसके लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा उचित स्थान नहीं है."

वहीं क्रेडेन्शियलिंग समिति का हिस्सा बने अमेरिका ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र का अधिवेशन ख़त्म होने से पहले वो इस पर कोई फ़ैसला नहीं करेगा.

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: तालिबान का दोहरा रवैया?

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