AUKUS: ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका ने फ़्रांस की परवाह क्यों नहीं की?

ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और ब्रिटेन के बीच हुए हालिया ऑकस रक्षा समझौते ने पूरी दुनिया में हलचल मचा कर रख दी है.

इस समझौते के तहत ऑस्ट्रेलिया को परमाणु क्षमता से लैस पनडुब्बियां मिलेंगी और साथ ही तीनों मुल्कों के बीच ख़ुफ़िया, साइबर, क्वॉन्टम और अंडरवाटर सिस्टम पर भी सहयोग बढ़ेगा. इस समझौते को लेकर दुनिया भर में अब भी तीखी बहस जारी है.

ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में नेशनल सिक्यॉरिटी कॉलेज के प्रमुख और प्रोफ़ेसर रॉरी मेकाफ़ा ने द डिप्लोमैट से कहा है कि यह समझौता ऑस्ट्रेलिया के हक़ में है. कहा जा रहा है कि ऑकस ऑस्ट्रेलिया की नीति में बड़ी शिफ़्टिंग है. इसका सबसे बड़ा असर तो फ़्रांस पर पड़ा. फ़्रांस से ऑस्ट्रेलिया ने 12 डीज़ल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी का सौदा किया था.

यह सौदा 66 अरब डॉलर का था. लेकिन अब ऑस्ट्रेलिया फ़्रांस की पनडुब्बी के बजाय अमेरिका और ब्रिटेन से परमाणु क्षमता से लैस आठ पनडुब्बियां लेगा. तीनों देशों के बीच गहन बातचीत के बाद यह समझौता हुआ है.

ऑस्ट्रेलिया को ऑकस के तहत जो पनडुब्बियां मिलेंगी, वो इस दशक के बाद ही संभव है. फ़्रांस ने इस समझौते को लेकर कहा है कि उसकी पीठ में छूरा भोंका गया है.

ऑकस रक्षा समझौते की ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री केविन रड ने आलोचना की है. फ़्रांस 24 को दिए इंटरव्यू में रड ने कहा कि फ़्रांस के साथ विवाद विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए झटका है.

ऑकस पर सवाल

रड ने कहा कि फ़्रांस को अधिकार है कि वो अचानक से अरबों डॉलर वाले सौदे के हाथ से निकलने पर ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ बोले. रड ने प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन के फ़ैसले की संसदीय जांच कराने की मांग की है.

केविन ने स्कॉट मॉरिसन के उस तर्क को ख़ारिज कर दिया कि ऑकस राष्ट्र हित में है और चीन के ख़तरों से निपटने में मदद मिलेगी. रड ने कहा कि जब वो एक दशक पहले प्रधानमंत्री थे तब भी चीन एक बड़ा ख़तरा था और उनकी प्राथमिकता में था.

इसी ख़तरे से निपटने के लिए फ़्रांस के साथ पनडुब्बी के लिए समझौता किया गया था. रड ने कहा कि ऑकस में जाने से ऑस्ट्रेलिया और फ़्रांस के द्विपक्षीय रिश्ते प्रभावित होंगे.

रड ने कहा कि ऑकस के तहत मिलने वाली पनडुब्बी में काफ़ी देरी होगी. उन्होंने कहा कि 2030 के दशक तक ऑस्ट्रेलिया को इंतज़ार करना होगा. ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया के टैक्सपेयर्स को यह जानने का हक़ है कि इस सौदे की लागत क्या है. रड ने पूरे सौदे की संसदीय जाँच के लिए अपील की है.

ऑस्ट्रेलिया ने फ़्रांस के साथ समझौता 2016 में किया था. ऑस्ट्रेलिया का अब कहना है कि चीन का ख़तरा जिस हिसाब से बढ़ा है, उसमें फ़्रांस की पारंपरिक पनडुब्बियों से काम नहीं चलता और इसके लिए परमाणु क्षमता से लैस पनडुब्बियां ज़रूरी हो गई थीं.

फ़्रांस चीन को लेकर उदार?

फ़्रांस 24 की एक रिपोर्ट के अनुसार मार्च महीने में ऑस्ट्रेलिया ने अपने सहयोगी ब्रिटेन से संपर्क किया था और उसी से कहा था कि वो अमेरिका से कहे कि तकनीक साझा करे. अब तक अमेरिका ने ये तकनीक केवल ब्रिटेन से ही साझा किया था.

ऑस्ट्रेलियन डिफेंस यूनिवर्सिटी में सामरिक मामलों के प्रमुख ब्रेंडन सर्जेंट ने फ़्रांस 24 से कहा, ''फ्रांस को छोड़कर ऑकस में जाने के पीछे ठोस वजह है. इंडो-पैसिफिक में चीन बहुत तेज़ी से पाँव पसार रहा है और आक्रामक भी हुआ है. इसके बाद एक राय बनी कि चीन का मुक़ाबला करना है तो तैयारी भी उसी हिसाब से होनी चाहिए. पाँच साल पहले बिल्कुल अलग माहौल था. शी जिनपिंग के चीन ने हम सबको हैरान किया है.''

सर्जेंट ने कहा, ''फ़्रांस की पनडुब्बियां ख़राब नहीं हैं. हम भविष्य की तरफ़ देख रहे हैं. परमाणु विकल्प को चुनना एक समझदार फ़ैसला है. इससे ऑस्ट्रेलिया लंबे समय और लंबी दूरी तक चीनी क्षमता को जवाब दे सकता है. अभी जो चुनौती है, उसमें परमाणु क्षमता से लैस पनडुब्बी की ही ज़रूरत थी.''

दूसरी तरफ़ ये भी कहा जा रहा है कि चीन के मामले में फ़्रांस से ब्रिटेन और अमेरिका बहुत आश्वस्त नहीं हैं. फ़्रांस का नज़रिया चीन को लेकर ईयू से अलग नहीं है. ये भी कहा जा रहा है कि फ़्रांस चीन को पार्टनर, प्रतिस्पर्धी और प्रतिद्वंद्वी तीनों रूप में देखता है. दूसरी तरफ़ ऑस्ट्रेलिया दो-दो हाथ करने को तैयार है.

द इकनॉमिस्ट के डिफेंस एडिटर शशांक जोशी ने लिखा है कि फ़्रांस का रवैया चीन को लेकर बहुत सतर्क सा है जबकि अमेरिका चाहता है कि चीन के ख़िलाफ़ देश एकजुट हों. मैक्रों ने दिसंबर 2020 में चीन के साथ व्यापार समझौते का भी समर्थन किया था. अमेरिका के बारे में कहा जा रहा है कि वो चीन को लेकर ईयू की नीति से ख़ुश नहीं है.

फ़्रांस 24 से यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में अमेरिकी पॉलिटिक्स के प्रोफ़ेसर रॉबर्ट सिंह ने कहा, ''अमेरिका में फ़्रांस को लेकर संदेह बढ़ा है. ऐसा लग रहा है कि फ़्रांस चीन को लेकर बहुत उदारता दिखा रहा है. दूसरी तरफ़ चीन को लेकर अमेरिका अलग तेवर में है. फ़्रांस की चीन के साथ ट्रेड डील बाइडन प्रशासन के लिए बहुत ही निराशाजनक रही थी. मेरा मानना है कि ऑकस को लेकर फ़्रांस चाहे जितनी नाराज़गी दिखाए अमेरिका इसकी परवाह नहीं करेगा.''

फ़्रांस की नाराज़गी क्यों?

नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर में इंस्टिट्यूट ऑफ़ साउथ एशियन सेंटर के रिसर्च फेलो योगेश जोशी ने ट्वीट कर कहा है कि फ़्रांस का ग़ुस्सा केवल कुछ अरब डॉलर के समझौते पर पानी फिरने से नहीं है.

योगेश जोशी ने अपने ट्वीट में लिखा है, ''ज़ाहिर है कि कई अरब डॉलर का सौदा फ़्रांस के हाथ से निकल गया लेकिन ग़ुस्से की वजह इससे बड़ी है. अमेरिका ने अब तक अपने तकनीक को बाज़ार ले जाने का फ़ैसला नहीं किया था.''

''संभव है कि ऑकस के बाद और सैन्य तकनीक में भी इसे लागू किया जाए. यह पूरी दुनिया के लिए संकेत है कि वो क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर अपनी प्रतिबद्धता से बंधा नहीं रहेगा. इसके बाद चीन का सामना करने के लिए इंडो-पैसिफिक में और रक्षा समझौते होंगे. ऐसे में क्वॉड के बाक़ी देश भी अमेरिकी तकनीक की तरफ़ देखेंगे. इससे फ़्रांस रक्षा बाज़ार निश्चित तौर पर प्रभावित होगा.''

अब तक फ़्रांस ऑकस को लेकर बहुत ही आक्रामक दिख रहा था. उसने ऑस्ट्रेलिया और फ़्रांस से अपने राजदूतों को वापस बुला लिया था. फ़्रांसीसी मीडिया में कहा जा रहा था कि बाइडन फ़्रांस के राष्ट्रपति से फ़ोन पर बातचीत करना चाह रहे थे लेकिन मैक्रों तैयार नहीं हो रहे थे. आख़िरकार बुधवार को मैक्रों और राष्ट्रपति बाइडन की बातचीत हुई. अब फ़्रांस ने कहा है कि अगले हफ़्ते तक उसके राजदूत अमेरिका वापस चले जाएंगे.

मैक्रों के ऑफिस ने कहा है कि राष्ट्रपति बाइडन से बातचीत के बाद सरकार ने अमेरिका में राजदूत को भेजने का फ़ैसला किया है. पिछले हफ़्ते ही फ़्रांस ने अपने राजदूत को वापस बुला लिया था.

(कॉपीः रजनीश कुमार)

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