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कनाडाः जस्टिन ट्रूडो का समय पूर्व चुनाव का दाँव सही या ग़लत? आज हो जाएगा फ़ैसला
कनाडा में पिछले दो वर्ष से भी कम समय में दूसरी बार एक नई सरकार चुनने के लिए मतदान हो रहे हैं. प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रू़डो ने कोरोना महामारी के नाम पर ये कहते हुए समय से पहले ही चुनाव करवाने का एलान किया था कि वो महामारी के बाद आगे की राह तय करने के बार में मतदाताओं की राय समझना चाहते हैं. मगर विपक्ष का आरोप है कि ट्रू़डो ने ये चुनाव संसद में बहुमत हासिल करने के इरादे से करवाया है.
चुनाव में वैसे छह पार्टियाँ रेस में हैं मगर मुख्य मुक़ाबला ट्रूडो की लिबरल पार्टी और कंज़र्वेटिव पार्टी के बीच है जिसके नेता एरिन ओ'टूल हैं.
चुनाव के बड़े मुद्दों में कोरोना महामारी को लेकर किए गए काम, महँगाई और अंतरराष्ट्रीय मंच पर कनाडा का रुख़ जैसे मुद्दे शामिल हैं.
मतगणना मंगलवार को होनी है मगर ये स्पष्ट नहीं है कि रात तक ये पता चल सकेगा कि संसद में किसी एक दल को बहुमत हासिल हो सका है या नहीं.
इस चुनाव में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो अपेक्षित बहुमत हासिल करने में कामयाब हो पाएंगे?
चुनाव सर्वेक्षणों में ट्रूडो की लिबरल पार्टी और प्रतिद्वंद्वी कंजर्वेटिव पार्टी के बीच कांटे की टक्कर बतायी गयी है.
लिबरल पार्टी के संसद में अधिकतम सीट जीतने की संभावना है लेकिन बहुमत हासिल करने को लेकर संशय है. ऐसी स्थिति में विपक्ष के सहयोग के बग़ैर कोई विधेयक पारित कराना संभव नहीं होगा.
जस्टिन ट्रूडो ने अगस्त महीने में ही चुनाव प्रचार शुरू कर दिया था.
इन आम चुनावों के लिए चुनाव प्रचार क़रीब पांच सप्ताह पहले ही शुरू हो गया था. इस दौरान सभी पार्टी के नेताओं ने मतदातओं को अपनी भावी योजनाओं और नीतियों के बारे में बताया.
चुनाव अभियान क्यों रहे ख़ास
विपक्ष का आरोप है कि जल्दी चुनाव कराने का फ़ैसला महत्वाकांक्षा से प्रेरित है.
वहीं जस्टिन ट्रूडो ने कहा है कि ये चुनाव ज़रूरी थे क्योंकि महामारी से उबरने के लिए देश अगला क़दम क्या उठाएगा, यह बेहद अहम होगा.
पिछली बार कनाडा में साल 2019 में आम चुनाव हुए थे. चुनावों के बाद 49 वर्षीय ट्रूडो ने अल्पमत के साथ सरकार बनाई थी. जिसके कारण अपने विधायी एजेंडे को पास कराने के लिए उन्हें विपक्षी दलों पर निर्भर रहना पड़ा.
हालांकि माना जा रहा है कि इस तरह जल्दी चुनाव कराने के फ़ैसले से लोग खुश नहीं हैं और इसका असर लिबरल पार्टी को मिलने वाले समर्थन पर भी पड़ा है. लिबरल पार्टी के लिए समर्थन घटा है और इसके फलस्वरूप कंज़रवेटिव पार्टी के लिए समर्थन में वृद्धि हुई है.
नए कंज़र्वेटिव नेता एरिन ओटोल ने चुनावी अभियान में कड़ी टक्कर दी है. जब उन्होंने चुनाव अभियान शुरू किया था बहुत से कनाडाई लोगों के लिए वह एक अनजान चेहरा थे लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने अच्छी पहुंच हासिल कर ली है.
हालांकि मतदान से पहले के कुछ मुद्दे लिबरल पार्टी के हक़ में नहीं रहे हैं.
कनाडा में लोगों ने जल्दी चुनाव कराने के फ़ैसले पर सवाल उठाए हैं, वो भी ऐसे दौर में जब देश महामारी के प्रभाव से उबरने की कोशिश कर रहा है. पुराने राजनीतिक घोटालों के कारण भी ट्रूडो के लिए चुनाव अभियान मुश्किल रहा.
हालांकि संभावना जताई जा रही है कि इस बार भी कोई एक पार्टी पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर सकेगी और ऐसे में एकबार फिर अल्पमत की सरकार ही बनती नज़र आ रही है.
क्या हैं मुद्दे
कोरोना महामारी के कारण कनाडा में 27,000 से अधिक लोगों की जान चली गई. कुछ इलाक़ों में एकबार फिर संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं. जहां अस्पताल में आईसीयू बेड लगभग भर चुके हैं.
अल्बर्टा में सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल की घोषणा कर दी गई है और दूसरी लहर के दौरान अपनाए गए स्वास्थ्य उपायों को फिर से लागू करना शुरू कर दिया गया है. चुनावी अभियान में यह एक अहम मुद्दा रहा.
कोरोना महामारी को लेकर सरकार की नीति और योजना पर भी प्रतिद्वंद्वियों ने सवाल किये. इसके अलावा कोरोना वैक्सीन भी एक अहम मुद्दा है.
विपक्ष का आरोप
विपक्ष ने समय से पहले चुनाव कराने को लेकर ट्रूडो पर लगातार निशाना साधा है और आरोप लगाया है कि उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा के लिए यह क़दम उठाया है.
ट्रूडो का मानना है कि उनकी सरकार ने दुनिया के कई देशों की तुलना में कोरोना महामारी से निपटने के लिए कहीं सार्थक क़दम उठाए और जनता इसे याद रखेगी, जो मतदान के रूप में नज़र भी आ जाएगा.
ट्रूडो ने अपने एक संबोधन में कहा कि देश को ऐसे लोग नहीं चाहिए जो महामारी के ख़िलाफ़ देश की लड़ाई को कमज़ोर करेंगे.
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