बाइडन ने शी जिनपिंग से कहा- बातचीत जारी रहे ताकि ग़लतफ़हमी न बढ़े

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अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने चीन के राष्ट्रपति और अपने समकक्ष शी जिनपिंग से कहा है कि दोनों देशों के बीच बातचीत जारी रहना ज़रूरी है ताकि किसी भी तरह की ग़लतफहमी को बढ़ने से रोका जा सके.

दोनों नेताओं के बीच इस साल मध्य फरवरी के बाद पहली बार फ़ोन पर बात हुई है. दोनों के बीच आर्थिक मुद्दों समेत जलवायु परिवर्तन और कोरोना महामारी को लेकर चर्चा हुई है.

बातचीत के दौरान बाइडन ने कहा है कि चीन और अमेरिका के बीच संचार के माध्यमों का खुला रहना ज़रूरी है ताकि किसी तरह की गलतफ़हमी पैदा न हो और इस कारण भविष्य में टकराव की स्थिति पैदा न हो.

दोनों नेताओं ने उम्मीद जताई है कि वे पारस्परिक चिंता के मसलों को हल करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं.

बातचीत के बाद चीनी विदेश मंत्री के प्रवक्ता ने कहा है कि अगर चीन और अमेरिका एक दूसरे का सहयोग करते हैं तो इससे न केवल दोनों मुल्कों को फायदा होगा बल्कि पूरी दुनिया को फायदा होगा.

व्हाइट हाउस की ओर से बयान जारी किया गया है जिसमें कहा गया है कि दोनों नेताओं ने दक्षिणी चीन सागर में व्यापार और विवाद जैसे गंभीर मुद्दों पर चर्चा की.

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क्यों अहम है ये बातचीत?

बातचीत के दौरान अमेरिका ने चीनी अधिकारियों से पर्याप्त सहयोग ना मिलने पर निराशा जताई है.

चीन की सरकारी समाचार एजेंसी के अनुसार, इस बातचीत के मुद्दे स्पष्ट थे. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चीन के प्रति अमेरिकी नीतियों के कारण उपजी समस्याओं पर बाइडन से चर्चा की. हालांकि शी जिनपिंग ने यह भी कहा कि दोनों देशों को जलवायु परिवर्तन, कोविड-19 और आर्थिक मुद्दों पर मिलकर काम करना चाहिए.

व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि दोनों नेताओं ने ज़िम्मेदारियों पर चर्चा की. साथ ही इस बात पर भी चर्चा हुई कि कहीं प्रतिस्पर्धा संघर्ष में ना बदल जाए.

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने जनवरी महीने में अमेरिकी राष्ट्रपति का पद संभाला था. उसके बाद से यह दूसरा मौक़ा है जब उन्होंने शी जिनपिंग से बात की है.

हाल के दिनों में अमेरिका और चीन के संबंध तनावपूर्ण रहे हैं. व्यापार, जासूसी और कोरोना महामारी जैसे कई मुद्दों पर तीखी बयानबाज़ी होती रही है.

व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि दोनों नेताओं के बीच एक व्यापक, रणनीतिक चर्चा हुई जिसमें उन्होंने आपसी हित के मुद्दों और क्षेत्रों पर चर्चा की. इसके अलावा दोनों नेताओं के बीच उन मुद्दों पर भी बात हुई जिन पर दोनों देशों के मूल्य और दृष्टिकोण एक-दूसरे से अलग हैं.

जारी बयान में कहा गया है, "अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने यह स्पष्ट किया है कि यह बातचीत अमेरिका और पीआरसी के बीच प्रतिस्पर्धा को ज़िम्मेदारी के साथ निभाने के लिए अमेरिकी प्रयास का हिस्सा थी."

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चीन की सरकारी मीडिया का कहना है कि यह बातचीत स्पष्ट और काफी गंभीर मुद्दों पर थी. इसमें व्यापक रणनीतिक संचार और आपसी टकराव के मुद्दे शामिल थे.

चीन की सरकारी मीडिया सीसीटीवी के अनुसार, चीन के राष्ट्रपति ने कहा कि क्या चीन और अमेरिका अपने संबंधों को ठीक से संभाल सकते हैं क्योंकि यह भविष्य और दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से पूर्व राष्ट्रपति रहे डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से सबसे अधिक बार बात की थी.

अपने प्रशासन के पहले छह महीने के भीतर ट्रंप ने शी जिनपिंग से दो बार फ़ोन पर बात की थी. उन्होंने चीनी राष्ट्रपति को अपने निजी क्लब में भी निमंत्रण दिया था जहां दोनों ने व्यक्तिगत रूप से भी बात की थी.

व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने शुक्रवार को बताया कि राष्ट्रपति बाइडन निचले स्तर के चीनी अधिकारियों के व्यवहार और उनके प्रशासन के साथ ठोस बातचीत को लेकर उपेक्षा और अनिच्छा से तंग आ चुके थे, जिसके बाद राष्ट्रपति बाइडन के अनुरोध पर फ़ोन पर बातचीत की पहल की गई.

इस साल की शुरुआत में, बाइडन प्रशासन और चीन के बीच उच्च स्तरीय वार्ता तनाव भरी रही थी. दोनों पक्षों के अधिकारियों के बीच तीखी बहस हुई थी.

चीन के अधिकारियों ने अमेरिका पर "चीन पर हमला करने के लिए" देशों को उकसाने का आरोप लगाया था. जबकि अमेरिका ने भी चीन पर आरोप लगाए थे.

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'मानवाधिकार और हस्तक्षेप'

अमेरिका और चीन के बीच मुख्य रूप से कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिसे लेकर दोनों देशों के बीच विवाद बना रहता है. इसमें मानवाधिकार और लोकतंत्र प्रमुख मुद्दे हैं.

अमेरिका, चीन पर शिन्जियांग प्रांत में अल्पसंख्यक वीगर मुसलमानों के ख़िलाफ़ नरसंहार का आरोप लगाता रहा है. अमेरिका यह भी कहता है कि चीन नए सुरक्षा क़ानून के बल पर हॉन्ग-कॉन्ग में लोकतांत्रिक अधिकारों को रौंद रहा है.

इस बीच चीन ने बार-बार अमेरिका से कहा है कि चीन के आंतरिक मामलों में अमेरिका हस्तक्षेप करना बंद करे.

दोनों देशों के बीच व्यापार भी एक बड़ा मुद्दा है.

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान, साल 2018 में शुरू हुए व्यापारिक युद्ध से दोनों देश अभी तक बाहर नहीं निकल सके हैं

अमेरिका ने चीन से आयात किए जाने वाले समान पर 360 बिलियन डॉलर से अधिक का टैरिफ़ लगाया था. वहीं चीन ने प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई करते हुए अमेरिका ये आयात किए जाने वाले उत्पादों पर 110 बिलियन डॉलर का टैरिफ़ लगाया था.

अब तक जो बाइडन ने चीन के प्रति पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों को वापस नहीं लिया है. अमेरिका से चीन की नाराज़गी की ये भी एक बड़ी वजह है.

चीन का फ़ाइटर प्लेन

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दक्षिण चीन सागर का मुद्दा

हाल के वर्षों में दक्षिण चीन सागर का मुद्दा चीन और इस क्षेत्र के अन्य देशों के बीच विवाद और टकराव का एक बड़ा कारण बन चुका है.

हाल के सालों में चीन ने दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम रूप से बनाए गए द्वीपों पर अपने सैन्य अड्डे बना लिए हैं. चीन दलील देता है कि इन इलाक़ों पर सदियों से उसका अधिकार है.

फिलीपींस के अलावा ब्रुनेई, मलेशिया, ताइवान और वियतनाम जैसे देश चीन के इन दावों पर आपत्ति जताते हैं. इन देशों में इस इलाक़े को लेकर विवाद कई दशकों से जारी है, लेकिन हाल के सालों में इसे लेकर तनाव में इज़ाफा हुआ है. अमेरिका चीन दावे से असहमत है.

विरोध के बावूद चीन ने इस क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति का विस्तार करना जारी रखा है. हालांकि वह यह भी दावा करता है कि उसके इरादे शांतिपूर्ण हैं.

अफ़ग़ानिस्तान

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अफ़ग़ानिस्तान पर भी विवाद

दोनों देश अफ़ग़ानिस्तान में हो रहे बदलावों पर भी साथ खड़े नहीं दिखते. आने वाले समय में इसे लेकर भी तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है. अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी को लेकर चीन बार-बार अमेरिका की आलोचना करता रहा है.

इस हफ़्ते की शुरुआत में, चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने एक बार फिर अमेरिका पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि अमेरिका के सैनिकों ने अफ़ग़ानिस्तान में "तबाही" मचाई है.

उन्होंने अमेरिका पर "अफ़ग़ान लोगों को भारी नुकसान" पहुंचाने का भी आरोप लगाया था.

उन्होंने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी अभियान के शुरू होने से लेकर अप्रैल 2020 तक वहां कम से कम 47,245 आम नागरिकों की मौत हुई है.

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